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अध्याय 18 / 25 पढ़ने में 11 मिनट

एक ही हॉल

शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi

रात के साढ़े बारह बजे, दादी के कमरे में, वो कॉपी अब भी खुली पड़ी थी। उसी लाइन पर। अट्ठानवे प्रतिशत। कर्नल और काया। और उस पर दबा हुआ एक 'हाँ'। मानव उस पन्ने को घूर रहा था, और उसके अंदर घबराहट किसी टूटे नल की तरह टपक रही थी।

"दादी, ये सुबह तक ऐसे नहीं रह सकता। ...सोचो, अगर सुबह दीदी ने ऐप खोला, और उसे दिखा कि किसी 'कर्नल' ने उसमें रुचि दिखाई है, और वो 'कर्नल' अपना ही बाप है... ...या अगर पापा ने खोला। ...ये मैच आज रात, अभी, इसी वक़्त मिटाना होगा। सुबह होने से पहले।"

"पर मिटाऊँ कैसे, बेटा? ...मैं तो बस देखती हूँ, लिखती हूँ, छूती नहीं। ...मुझे तो ये भी नहीं पता कि 'रुचि वापस' कहाँ से लेते हैं। ...इस घर में एक ही जीव है जो ये जादू जानता है। और वो अभी घोड़े बेच कर सो रहा है।"

और वो जीव था गोलू। जिसने इस पूरे घर के अकाउंट अपने हाथों बनाए थे, और जो पिछले कई महीनों से सबका राज़ अपने सीने में ढो रहा था। मानव और पुष्पा दबे पाँव उसके कमरे में घुसे और उसे झिंझोड़ा।

"रात के साढ़े बारह बजे? ...किसका रिश्ता टूटा, किसका जुड़ गया? ...मैं सोलह साल का हूँ, यार। मेरे दोस्त गेम खेलते हैं, और मैं इस घर के तीन-तीन बूढ़ों की love life चला रहा हूँ। ...बोलो, अब क्या फट गया।"

"गोलू, सुन। ...ऐप ने पापा के 'कर्नल' और दीदी की 'काया' को अट्ठानवे प्रतिशत का मैच बता दिया है। ...और किसी ने उस पर 'रुचि है' दबा दिया है। ...पापा और दीदी, गोलू। सगे बाप-बेटी।"

"क्या?! ...अंकल और दीदी का मैच? ...और किसी ने टैप भी कर दिया? ...छी छी छी, ये तो सोच कर ही रूह काँप जाए। ...रुको, घबराओ मत। मैंने ही सबके अकाउंट बनाए थे, हर पासवर्ड मुझे पता है। ...दो मिनट में 'रुचि' वापस ले कर मैच उड़ा देता हूँ।"

"पता है, मेरे दोस्त हैं न, वो रात को अपनी गर्लफ़्रेंड से चोरी-छिपे बात करते हैं और डरते हैं कि घरवालों को पता न चल जाए। ...और एक मैं हूँ, जो अपने घरवालों की चोरी-छिपे वाली बातें संभालता हूँ। ...दादा-दादी, माँ-बाप, बुआ, सबका इश्क़ मेरे सिर पर। ...मुझे तनख़्वाह मिलनी चाहिए इस घर से।"

गोलू ने आँखें मलते हुए लैपटॉप खोला, उस भरोसे के साथ जो सिर्फ़ उसी को होता है जिसने ख़ुद ये पूरी इमारत खड़ी की हो। सबसे पहले वो काया के अकाउंट में गया, देखा, और उसका माथा ठनका।

"रुको। ...ये 'रुचि' काया ने नहीं भेजी। ...ये तो 'कर्नल' के अकाउंट से गई है। ...मतलब टैप अंकल ने किया है। ...शायद नींद में, या match का popup आया और अँगूठा ग़लत बटन पर पड़ गया। ...कोई बात नहीं, कर्नल के अकाउंट में घुस कर वापस ले लेता हूँ।"

गोलू ने पापा का पुराना पासवर्ड टाइप किया। स्क्रीन हिली। ग़लत। उसने फिर टाइप किया, धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर। फिर से, ग़लत। उसका आत्मविश्वास पहली बार डगमगाया।

"पासवर्ड ग़लत? ...ये कैसे हो सकता है? ...मैंने ख़ुद बनाया था, 'postman123'। ...अरे नहीं। ...अंकल ने पासवर्ड बदल दिया है। ...जिस आदमी को मैंने ईमोजी भेजना सिखाया था, उसने पासवर्ड बदल दिया।"

"पापा ने? ...वो जगदीश चतुर्वेदी, जिन्हें आज तक टीवी का सही रिमोट नहीं मिलता, जो फ़ोन को कान से एक इंच दूर रख कर चिल्ला कर बात करते हैं, ...उन्होंने पासवर्ड बदल दिया? ...आज ही के दिन।"

"याद है, कुछ हफ़्ते पहले वो कितना डर गया था, कि कोई उसे पकड़ न ले? ...तभी बदला होगा। ...देखा, डर आदमी को चालाक बना देता है। ...मेरा भोला बेटा भी ताला लगाना सीख गया।"

और तभी लैपटॉप के कोने में खुली उस वीडियो कॉल से एक शांत आवाज़ आई। मानव कैफ़े से लौटते वक़्त इरा की कॉल काटना भूल गया था, और इरा, दूसरे छोर से, इस पूरे सर्कस को बड़े मज़े से देख रही थी।

"मैं सब सुन रही हूँ, वैसे। ...तुम्हारा परिवार किसी वेब सीरीज़ से कम नहीं। ...और गोलू, एक बात सुनो, पासवर्ड reset बिल्कुल मत करना। ...reset करोगे तो अंकल के फ़ोन पर code का मैसेज आएगा, और वो जाग जाएँगे। ...तुम्हें उनका पुराना पासवर्ड बूझना पड़ेगा।"

"इरा दीदी सही कह रही हैं। ...Reset किया तो OTP आया, OTP आया तो अंकल जागे, अंकल जागे तो पूरा खेल ख़त्म। ...तो अब guess करना पड़ेगा। ...बताओ जल्दी, अंकल इस दुनिया में सबसे ज़्यादा किस चीज़ से प्यार करते हैं?"

"क्रिकेट! ...उसका सचिन। ...डाल, 'sachin'। ...नहीं? ...तो उसका वो पुराना स्कूटर, नंबर छह-आठ-दो। ...नहीं? ...उसकी पेंशन वाली पासबुक का नंबर, मुझे रट्टा है।"

"ग़लत। ...ग़लत। ...दादी, पेंशन नंबर भी ग़लत। ...तीन और ग़लत कोशिशें, और अकाउंट पूरे घंटे के लिए लॉक हो जाएगा। ...सोच-सोच कर डालो, तुक्का मत मारो।"

"उसका वो पुराना डाकघर, जहाँ वो तीस साल बैठा। ...'kanpur post'। ...नहीं? ...उसकी वो साइकिल, जो वो चिट्ठियाँ बाँटने ले जाता था। ...अरे, वो इंसान तो अपनी पुरानी हर चीज़ से चिपका रहता है। ...कोई पुरानी चीज़ ही होगी, बेटा, कोई पुरानी।"

"'kanpur post' भी नहीं। ...दादी, वो पुरानी चीज़ों से नहीं, वो पुराने लोगों से चिपकता है। ...बस दो कोशिशें बची हैं। ...अगली ग़लत हुई तो हम आधी रात को हाथ मलते बैठे रहेंगे, और सुबह वो मैच दीदी के फ़ोन पर चमकता मिलेगा।"

"रिटायरमेंट का साल डाल, दो हज़ार पंद्रह। ...उसी दिन तो उसने वर्दी उतारी थी, वही तो उसकी आख़िरी बड़ी तारीख़ थी। ...डाल जल्दी, गोलू।"

"ग़लत। ...मानव, बस एक कोशिश बची है। ...इसके बाद अकाउंट पूरे घंटे के लिए लॉक, और फिर सुबह तक ये मैच ऐसे ही ज़िंदा रहेगा, दीदी की आँखों के सामने आने के इंतज़ार में। ...आख़िरी guess। सोच-समझ कर बोलो।"

और उस हड़बड़ी के बीच, अचानक, मानव चुप हो गया। उसकी नज़र दीवार पर टँगी उस पुरानी, धुँधली तस्वीर पर गई, जिसमें एक मुस्कुराती हुई औरत थी, जिसे इस घर ने बरसों पहले खो दिया था। और मानव की आवाज़ भर्रा गई।

"गोलू... रुक। ...एक नाम बचा है, जो हम सबसे आख़िर में डालते हैं। ...माँ का नाम डाल। ...'सुमित्रा'।"

और गोलू ने, धीरे से, एक-एक अक्षर, वो नाम टाइप किया। स-मि-त्रा। एंटर दबाया। एक पल को स्क्रीन रुकी। और फिर वो खुल गई। पासवर्ड सही था।

इतने साल बीत गए, इतनी राख जम गई, और वो आदमी, जो ऐप पर एक बहादुर कर्नल बना फिरता था, अपने दिल की उस तिजोरी की चाबी अब भी उसी नाम में रखता था, जिसे वो खो चुका था। जगदीश चतुर्वेदी का पासवर्ड, आज भी, उसकी सुमित्रा थी।

"मेरा बेटा। ...इतने बरस हो गए, इसने ऊपर से चाहे कर्नल की वर्दी पहन ली हो, ...पर अंदर, आज भी, उसका सारा ताला उसकी सुमित्रा है। ...अकेलापन आदमी को झूठ बोलना सिखा देता है, बेटा, पर प्यार भूलना नहीं सिखाता।"

"देखा मानव? ...मैंने कहा था न। ...तुम्हारा घर झूठ नहीं बोलता, तुम्हारा घर प्यार छुपाता है। ...जो आदमी अपनी गुज़री पत्नी के नाम पर अपना दिल ताले में रखे, वो बुरा आदमी नहीं हो सकता। ...चलो, अब जल्दी वो मैच उड़ाओ, इससे पहले कि रात और भारी हो जाए।"

गोलू की उँगलियाँ तेज़ी से चलीं। वो मैच वाले पन्ने पर पहुँचा, वो 'रुचि है' वाला दबा हुआ बटन ढूँढा, और उस पर 'रुचि वापस लें' दबा दिया। स्क्रीन पर लिखा आया, रुचि वापस ले ली गई। और कर्नल तथा काया के बीच का वो भयानक धागा, चुपचाप, टूट गया।

"हो गया। ...मैच withdraw। ...अब दीदी को ज़िंदगी में कभी नहीं दिखेगा कि 'कर्नल' ने उसमें रुचि... ...भगवान का लाख-लाख शुक्र है। ...अब मैं जा कर सोता हूँ, और कल स्कूल में मैथ की परीक्षा है, जिसकी मुझे..."

गोलू का वाक्य बीच में ही रुक गया। क्योंकि जगदीश के उसी अकाउंट पर, अचानक, एक बड़ा चमकीला बैनर फूट पड़ा। मानव, पुष्पा, और स्क्रीन पर इरा, तीनों की नज़र एक साथ उस पर जमी।

"रुको। ...ये क्या है? ...'परफेक्ट रिश्ता संगम'। ...एक असली, आमने-सामने का मिलन समारोह। इसी इतवार, शहर के बड़े हॉल में। ...और नीचे लिखा है... 'आप पंजीकृत हैं'। ...अंकल ने तो पहले से register कर रखा है!"

"तो? ...एक मिक्सर ही तो है। ...पापा वहाँ जाएँगे, सरिता जी से आमने-सामने मिलेंगे। ...अच्छी बात है, गोलू। दो बूढ़े लोग मिलेंगे। इसमें घबराने की क्या बात है?"

"नहीं मानव, तुम समझ नहीं रहे। ...एक ही hall। ...रुको, मैं दीदी का, यानी काया का अकाउंट चेक करता हूँ।" ...उसने काया का अकाउंट खोला, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। ..."दीदी भी register्ड है। इसी संगम में।"

"और नक़ली मानव वाला अकाउंट... ...दादी। ...आपने भी मानव के नाम से register कर दिया?! ...इसी इतवार, इसी हॉल के लिए?!"

"मैंने... मैंने सोचा इरा वहाँ होगी तो 'मानव' को उससे आमने-सामने मिलवा दूँगी। ...अरे बाप रे। ...मैंने तो ख़ुद ही सबको एक ही टोकरी में डाल दिया।"

"रुको, रुको, रुको। ...मेरे पास भी उसी संगम का न्योता आया था। ...और मैंने तो असली मानव को घसीट कर वहाँ ले जाने का पूरा प्लान बना रखा है। ...मतलब मैं भी वहाँ हूँ। ...ये तो पूरा परिवार एक ही जगह पहुँच रहा है।"

और गोलू, अपनी कुर्सी में धँसता हुआ, एक-एक नाम गिनने लगा, जैसे कोई डूबता हुआ आदमी लहरें गिनता है। उसने मैच के आँकड़े मिलाए, और तस्वीर और भयानक होती चली गई।

"एक मिनट। ...अगर सब अपने-अपने match से मिलने आ रहे हैं, ...तो दीदी के लिए अनिकेत भी आएगा। ...और अंकल के लिए सरिता जी भी आएँगी। ...और वो दोनों, अनिकेत और सरिता, माँ-बेटा हैं। ...मतलब उस एक हॉल में, एक साथ..."

"उस एक हॉल में, एक ही शाम... ...पापा 'कर्नल' बन कर, दीदी 'काया' बन कर, सरिता जी, अनिकेत, इरा, तुम, मैं, और दादी 'मानव' बन कर। ...सब के सब, अपने-अपने नक़ाब पहने, एक ही छत के नीचे। ...गोलू, ये तो एक बम है जिसकी सुई इतवार पर लगी है।"

और ठीक उसी पल, गोलू का फ़ोन कँपकँपाया। मोहल्ले वाला व्हाट्सएप ब्रॉडकास्ट। सबका सिर एक साथ उस स्क्रीन की तरफ़ घूमा। और गोलू ने, बुझी हुई आवाज़ में, आख़िरी कील ठोक दी।

"और... और बचा-खुचा भी सुन लो। ...मोहल्ले के ग्रुप में चांचल आंटी का ताज़ा मैसेज। ...'मैं भी इस संगम में जा रही हूँ, बहनो। वहीं से किसी न किसी का पर्दाफ़ाश होगा, देख लेना।' ...चांचल आंटी भी वहाँ होंगी। पूरी दूरबीन और ब्रॉडकास्ट लिस्ट समेत।"

"तो ठीक है। ...अगर क़िस्मत ने सारे नक़ाब एक ही कमरे में बुला ही लिए हैं, ...तो हम भागेंगे नहीं। ...ये घर बहुत दिन छुपा। ...शायद अब वक़्त आ गया है कि सारे झूठ एक ही छत के नीचे खड़े हों, और देखें कि कौन सा टिकता है।"

"शायद दादी सही कह रही हैं। ...इस घर में सबने प्यार को इतना छुपाया है कि अब वो घुट रहा है। ...हो सकता है वो संगम कोई आफ़त न हो, बल्कि वो एक मौक़ा हो। ...वो एक कमरा, जहाँ आख़िरकार सारे नक़ाब गिर सकते हैं।"

और उस रात, वो न्योते पक्का कर गए। आठ लोग, आठ राज़, एक हॉल, इसी इतवार। जिस एल्गोरिदम ने पूरा एक मौसम चुपके-चुपके इस परिवार को एक-दूसरे की तरफ़ धकेला था, उसने आख़िरकार सबको एक ही कमरे में, एक ही शाम, बुक कर दिया था। और इस बार कोई 'रुचि वापस' का बटन नहीं था। इतवार की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी।

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