अध्याय 8 / 25 पढ़ने में 11 मिनट
दो नाम, एक लड़की
शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi
अनिकेत के हाथ अब एक असली नाम है, 'सांवी', और अगली सुबह बेकरी पर चाय पीते हुए वो उसी एक चेहरे में दो औरतों को देखता है, काया और सांवी, और नरमी से टटोलता है, जबकि सांवी, बेख़बर कि उसका राज़ खुल चुका है, और भी सख़्ती से छुपने लगती है। उधर इरा के शक को शांत करने के लिए दादी पुष्पा को 'मानव' बन कर एक पूरा नक़ली चचेरा भाई गढ़ना पड़ता है, और झूठ एक परत और गहरा हो जाता है, गोलू सिर पकड़ लेता है। जगदीश अपनी ही बेटी के हाथों पकड़े जाने से घबरा कर ऐप छोड़ना चाहता है, पर सरिता की एक गर्म चिट्ठी उसे लौटा लाती है। और रात को गोलू ऐप का नया 'फ़ैमिली सर्कल' फ़ीचर देख कर जम जाता है, जो चौबीस घंटे में घर की हर प
सुबह की पहली धूप बेकरी की खिड़की से अंदर आ रही थी, और अनिकेत अपनी रोज़ वाली मेज़ पर बैठा एक नाम को उलट-पुलट रहा था, जो रात भर उसके दिमाग़ में करवटें बदलता रहा था। सांवी। वो देख रहा था उस औरत को जो काउंटर के पीछे चाय छान रही थी, वही सादा जूड़ा, वही झुकी हुई मुस्कान। और उसके पीछे, उसी चेहरे पर, वो दूसरी औरत तैर रही थी, काया, जो एक हफ़्ते से उसके फ़ोन में हँसती थी। दो नाम। एक चेहरा। और अनिकेत अब उन्हें अलग नहीं कर पा रहा था।
"एक अदरक वाली चाय, दीदी। ...और सुनिए, कल शाम एक अजीब बात हुई। एक पुराने कैफ़े में गया था, किसी से मिलने। और वो इंसान अचानक भाग गया। बिना कुछ कहे। ...आपको ऐसा लगता है, कि लोग भाग क्यों जाते हैं?"
कैफ़े। सांवी के हाथ में चाय की छलनी एक पल को रुक गई। उसे लगा जैसे किसी ने बर्फ़ का पानी उसकी रीढ़ पर उँडेल दिया हो। ये आदमी कैफ़े की बात क्यों कर रहा है? क्या इसे पता चल गया?
"पता नहीं, भैया। लोग भागते हैं तो उनकी कोई वजह होगी। ...आपकी चाय। दस रुपए। और कुछ?"
अनिकेत ने वो एक पल का ठहराव सुन लिया, चाय की छलनी का रुकना, आवाज़ का अचानक 'भैया' और 'दस रुपए' के पीछे छुप जाना। और उसके अंदर एक चीज़ पक्की हो गई। ये डर काया वाला डर था। पर उसने ये भी देखा कि ये औरत कितनी बुरी तरह घिरी हुई है।
"और कुछ नहीं, दीदी। बस... एक बात। जो इंसान कल भागा, मैं उस पर गुस्सा नहीं हूँ। मुझे लगा शायद वो डरा हुआ था। और डरे हुए लोगों को पकड़ना नहीं चाहिए। उन्हें बस ये यक़ीन दिलाना चाहिए कि भागने की ज़रूरत नहीं।"
सांवी ने काउंटर की लकड़ी को कस कर पकड़ लिया। उसका दिल कह रहा था, कह दे, अभी कह दे, ये आदमी अच्छा है, ये समझेगा। पर उसका डर, दो साल पुराना, ज़ंग लगा हुआ, उसके गले पर बैठ गया।
"आप... आप बहुत बातें करते हैं, भैया, एक चाय के लिए। ...अगली बार कम अदरक? आपकी नाक लाल हो जाती है।"
तभी बेकरी सुबह की भीड़ से भर गई, और सांवी ने उस भीड़ को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया। एक साथ तीन ऑर्डर, हाथ उड़ते हुए, कुछ भी, बस उन सब्र भरी आँखों के सामने एक पल भी स्थिर न खड़ा रहना पड़े। पर एक बार, सिर्फ़ एक बार, उसने चुरा कर उसकी तरफ़ देखा। और वो पहले से देख रहा था। किसी ग्राहक की तरह नहीं। किसी ऐसे इंसान की तरह जिसे कुछ मिल गया हो, और वो इंतज़ार कर रहा हो कि वो चीज़ ख़ुद को महफ़ूज़ महसूस करे।
"मैं रोज़ आता हूँ, दीदी। कल भी आऊँगा, परसों भी। कोई जल्दी नहीं है। जिस दिन आपका मन करे, उस दिन बात कर लीजिएगा। और जिस दिन न करे, उस दिन बस चाय दे दीजिएगा। ...दोनों चलेंगी।"
और अनिकेत मुस्कुरा दिया, और पीछे हट गया। क्योंकि वो जानता था कि कुछ दरवाज़े धक्के से नहीं खुलते। उसने चाय उठाई, और जाते-जाते, बहुत धीरे से, एक बात कही, इतनी धीरे कि वो सुने या न सुने।
"जो भी आपका नाम हो, दीदी... मुझे वो नाम अच्छा लगता है। दोनों ही।"
दोनों। सांवी की साँस रुक गई। पर जब तक उसने पलट कर देखा, अनिकेत दरवाज़े से बाहर, गली की धूप में जा चुका था, और सांवी वहीं खड़ी रह गई, हाथ में एक ठंडी छलनी, और सीने में एक ऐसा डर जिसे वो अब पहचान नहीं पा रही थी, कि ये डर है, या उम्मीद। और उसी वक़्त, चतुर्वेदी घर की ऊपर वाली मंज़िल पर, एक और मोर्चे पर एक और लड़ाई छिड़ चुकी थी। दादी पुष्पा अपने पलंग पर, तकिये के सहारे, अपनी वो नीली नोटबुक खोले बैठी थीं, जिसमें हर मैच का हिसाब लिखा रहता था। और सामने, ज़मीन पर, गोलू सिर थामे बैठा था।
"गोलू, ये इरा ने क्या लिख भेजा है। ...कल कैफ़े में एक आदमी था, बिल्कुल तुम्हारे जैसा, वही शक्ल, पर बदतमीज़, मेरी मेज़ छीन ली। वो कौन था, मानव? ...हे राम। इसने असली मानव को देख लिया।"
"दादी, बता दीजिए ना सच। कि वो असली मानव था, और आप नक़ली। एक बार बोल दीजिए, सब ख़त्म। मैं फिर आराम से बोर्ड की पढ़ाई करूँ।"
"सच? पगला गया है? अभी इरा फँसी है, अभी छोड़ दूँ? ...नहीं। सुन। हम उसे बताएँगे कि वो बदतमीज़ आदमी मानव का चचेरा भाई था। हाँ। मंगल। मानव और मंगल। एक जैसे चेहरे, उल्टे स्वभाव।"
"दादी! अब आप एक और आदमी बना रही हैं? पहले नक़ली मानव, अब नक़ली मंगल? इस घर में असली लोग कम, नक़ली लोग ज़्यादा हो गए हैं! मैं इनका हिसाब कहाँ रखूँ?"
"तू लिख। मंगल, दूर के ताऊ का लड़का, बचपन से जलन रखता है मानव से, क्योंकि मानव पढ़ने में तेज़ था और मंगल... मंगल गुटखा खाता था। कैफ़े में जान-बूझ कर मेज़ छीनी होगी, बदला निकालने। लिख, लिख जल्दी।"
और इस तरह, चतुर्वेदी घर के झूठों के जंगल में एक और पेड़ उग आया, मंगल, जो कभी पैदा ही नहीं हुआ था, पर जिसकी अब एक शक्ल थी, एक स्वभाव था, और एक गुटखे की लत भी। गोलू ने काँपते हाथ से नोटबुक में लिखा, और अपनी क़िस्मत पर रोया।
"दादी, और अगर इरा ने कहा कि मुझे मंगल से मिलवाओ? माफ़ी वग़ैरह के लिए? तब? तब क्या एक और आदमी लाएँगे इस घर से? कितने नक़ली लोग बनाएँगे आप? ये घर है या फ़िल्म की कास्टिंग?"
"मंगल विदेश चला जाएगा। दुबई। लोग दुबई चले जाते हैं, फिर कोई नहीं पूछता। लिख, मंगल को नौकरी लग गई, दुबई शिफ़्ट हो गया, अब फ़ोन नहीं उठाता। बस। किस्सा ख़त्म।"
और गोलू ने नोटबुक में लिखा, मंगल, दुबई। एक आदमी जो एक ही दोपहर में पैदा हुआ, बड़ा हुआ, कैफ़े में बदतमीज़ी की, और विदेश भी चला गया, बिना कभी असल में मौजूद हुए। गोलू को लगा कि उसका सिर अब सचमुच फट जाएगा।
"अब लिख इरा को। ...इरा, वो मेरा चचेरा भाई मंगल था, हमारी शक्ल मिलती है पर दिल नहीं। उसकी बदतमीज़ी की मैं माफ़ी माँगता हूँ। तुम्हारे जैसी समझदार लड़की को ऐसे लोगों से नहीं उलझना चाहिए। ...बस, इतना काफ़ी है। भेज दे।"
उधर इरा ने वो मैसेज पढ़ा, और आधा मान लिया, आधा नहीं। क्योंकि इरा फ़िज़ियोथेरेपिस्ट थी, और उसका काम था झूठी हड्डियों और सच्ची चोटों में फ़र्क़ पहचानना। उसने मन में एक छोटी सी पर्ची लगा ली, चचेरा भाई। हूँ। देखते हैं। और वो पर्ची उसने फेंकी नहीं, सँभाल कर रख ली।
"दादी, एक बात पूछूँ? आप इतनी मेहनत क्यों कर रही हैं? रात-रात भर जाग कर, नक़ली भाई बना कर, नोटबुक भर कर। मानव चाचा को तो पता भी नहीं। ...आपको क्या मिलेगा इससे?"
"क्या मिलेगा? ...बेटा, इस घर में सब को कोई न कोई मिला है। तेरे पापा को तेरी मम्मी। सांवी को उसका, चलो जो भी हुआ। बस मानव अकेला रह गया, और मैं। ...अब मैं तो बूढ़ी हो गई। पर मानव के लिए एक हाथ ढूँढ दूँ, तो शायद ऊपर जा कर तेरे दादा जी को मुँह दिखाने लायक़ हो जाऊँ।"
और गोलू चुप हो गया। क्योंकि पहली बार उसे दिखा कि दादी की ये सारी शरारत, ये सारी चालाकी, एक अकेली औरत की उस ख़्वाहिश से निकल रही थी कि उसके जाने के बाद इस घर में कोई अकेला न रह जाए। नक़ली मानव के पीछे एक बहुत सच्ची दादी बैठी थी। और उधर, घर के एक और कोने में, एक तीसरा दिल हार मान रहा था। जगदीश। कल कैफ़े में अपनी ही बेटी के सामने पकड़े जाते-जाते बचा था, और उस डर ने उसकी सारी हिम्मत निचोड़ ली थी। उसने ऐप खोला। कर्नल रणविजय की प्रोफ़ाइल। और अंगूठा 'अकाउंट हटाएँ' बटन के ऊपर ले गया। बहुत हुआ ये नाटक। एक साठ साल का डाकिया कर्नल बनने चला था। बेवक़ूफ़। उसने सरिता को एक आख़िरी मैसेज लिखना शुरू किया, अलविदा वाला। पर उसकी उँगली भेजने से पहले, स्क्रीन पर सरिता का मैसेज आ गिरा। और वो अलविदा नहीं था। वो गर्म था। ...कर्नल साहब, कल आपका फ़ोन ज़रूरी रहा होगा, कोई बात नहीं। पर पता है, आपके जाने के बाद मैं दो ठंडी चाय के सामने बैठी रही, और मुझे बुरा नहीं लगा। क्योंकि पंद्रह साल बाद किसी के लौटने का इंतज़ार करना भी अच्छा लगता है। ...चाय फिर कभी? और जगदीश की उँगली 'अकाउंट हटाएँ' से फिसल कर रुक गई। उसने वो मैसेज तीन बार पढ़ा। किसी के लौटने का इंतज़ार करना भी अच्छा लगता है। और उस अकेले आदमी ने, अपनी आँखों में एक हल्की सी नमी लिए, वो बटन नहीं दबाया। कर्नल रणविजय एक दिन और ज़िंदा रहा। सरिता की एक चिट्ठी के सहारे। उसने आदत के मारे फ़ौज की एक और बात गूगल करनी चाही, कल के लिए, कोई भारी-भरकम रेजिमेंट का नाम। पर बीच में उसकी उँगली रुक गई। उसे याद आया कि सरिता को उसकी सबसे सच्ची बात सबसे अच्छी लगी थी, वो ख़ाली कमरे वाली। और उसने सोचा, शायद अगली बार वो थोड़ा कम कर्नल बनेगा, और थोड़ा ज़्यादा जगदीश। सिर्फ़ थोड़ा। हिम्मत धीरे-धीरे आती है। और फिर रात आई। घर सो गया। तीनों झूठ अपने-अपने तकियों पर सो गए। और गोलू, हमेशा की तरह, जागता रहा, तीन प्रोफ़ाइलों का अकेला चौकीदार, चिप्स का पैकेट खोले, अपने लैपटॉप की नीली रोशनी में।
"पापा की प्रोफ़ाइल, ठीक। दादी वाली मानव प्रोफ़ाइल, ठीक। सांवी बुआ की काया, ठीक। सब अलग-अलग, सब छुपे हुए। बस ऐसे ही चलता रहे तो मैं बोर्ड तक ज़िंदा बच जाऊँगा।"
और तभी, स्क्रीन पर, परफेक्ट रिश्ता की तरफ़ से एक चमकदार सूचना उभरी। कोई साधारण मैच वाली घंटी नहीं। एक बड़ा, नारंगी, ख़ुशी से उछलता ऐलान। और गोलू ने उसे पढ़ा, और उसके हाथ से चिप्स का पैकेट छूट गया।
"नया फ़ीचर... फ़ैमिली सर्कल। ...अब अपने पूरे परिवार के लिए एक साथ रिश्ते ढूँढें! आपके घर की सभी प्रोफ़ाइलें आपके सभी कॉन्टैक्ट्स के साथ अपने आप साझा की जाएँगी, ताकि रिश्तेदार मिल कर सही जोड़ी चुन सकें। ...नहीं। नहीं नहीं नहीं।"
गोलू की उँगलियाँ काँपने लगीं। उसे पूरी तबाही एक झटके में दिख गई। एक ही घर, एक ही वाई-फ़ाई, एक ही फ़ोन-बुक। इसका मतलब ऐप पापा की कर्नल वाली प्रोफ़ाइल, दादी की नक़ली मानव वाली प्रोफ़ाइल, और सांवी बुआ की काया, तीनों को, अपने आप, पूरे ख़ानदान के हर कॉन्टैक्ट को भेज देगा।
"रुको, रुको। अगर मैं सारे कॉन्टैक्ट्स ही हटा दूँ? फ़ोन-बुक ख़ाली, तो किसको जाएगा? ...नहीं। पूरे घर के फ़ोन से नंबर कैसे मिटाऊँ, पापा सुबह ताऊ जी को फ़ोन नहीं लगा पाएँगे तो सीधा मुझ पर शक करेंगे। ...ये रास्ता बंद।"
और जैसे ऐप ने उसकी हर चाल पहले से सोच रखी हो, उसने फ़ीचर बंद करने का बटन ढूँढा, और वो बटन धुँधला, बेजान, दबने से इनकार करता हुआ मिला। नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था, ये सुविधा व्यवस्थापक द्वारा प्रबंधित है, बदली नहीं जा सकती। गोलू समझ गया, ये कोई साधारण घंटी नहीं, ये एक जाल था, और जाल के दाँत थे।
"हर कॉन्टैक्ट को? मतलब... बड़े ताऊ जी को। लखनऊ वाली बुआ को। रिश्ते वाले सारे अंकल-आंटी को। और... और मोहल्ले की चांचल आंटी को! सबको एक साथ पता चल जाएगा कि इस घर के तीन लोग नक़ली नाम से ऐप पर बैठे हैं!"
और स्क्रीन पर, उस नारंगी ऐलान के नीचे, एक छोटी सी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। फ़ैमिली सर्कल अपने आप चालू होगा, चौबीस घंटे में। तेईस घंटे, उनसठ मिनट। अट्ठावन।
"चौबीस घंटे। मेरे पास चौबीस घंटे हैं, इस पूरे घर के तीन-तीन राज़ को पूरी दुनिया के सामने खुलने से रोकने के लिए। ...अकेले। ...भगवान, तूने पास कराने की मन्नत तो दूर, अब तो ज़िंदा रहने की मन्नत माँगनी पड़ेगी।"
एक सोलह साल का लड़का, एक नीली स्क्रीन, और एक टिकती हुई घड़ी। घर में तीन लोग चैन से सो रहे थे, ये सोच कर कि उनका राज़ महफ़ूज़ है। और उन तीनों के सिरहाने, एक अनदेखी घड़ी उनके सारे झूठों को दुनिया के सामने ला खड़ा करने की उलटी गिनती गिन रही थी। ...और गिनती शुरू हो चुकी थी।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।