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अध्याय 24 / 25 पढ़ने में 11 मिनट

दिल की सुनी

शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi

पूरी दुनिया एक नन्ही बच्ची के एक सवाल पर टिकी थी। 'आप भी चली जाओगी क्या?' सांवी उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई, ठीक उसकी आँखों की सीध में। अनिकेत पीछे खड़ा, साँस रोके। सांवी जानती थी कि इस पल में एक भी झूठा शब्द इस बच्ची का भरोसा हमेशा के लिए तोड़ देगा। तो उसने सच चुना।

"मैं तुम्हें एक झूठ बोल कर ख़ुश नहीं करूँगी, अनवि। ...मैं ये नहीं कह सकती कि कल क्या होगा, ये तो किसी को नहीं पता। ...पर मैं तुम्हें एक सच्चा वादा कर सकती हूँ। ...मैं तुम्हारी मम्मा की जगह लेने नहीं आई। ...वो जगह हमेशा उन्हीं की रहेगी। ...मैं तो बस एक नई दोस्त बनने आई हूँ। ...और एक बात, ...अगर मैं कभी गई भी, तो चुपके से नहीं जाऊँगी। ...तुम्हें बता कर, गले लगा कर जाऊँगी। ...पक्का।"

नन्ही अनवि ने अपनी आँखें सिकोड़ीं, जैसे वो हर शब्द को तौल रही हो। बड़े लोग हमेशा कहते थे 'सब ठीक हो जाएगा', 'मैं हमेशा रहूँगी', और फिर चले जाते थे। पर ये आंटी कुछ अलग कह रही थी। ये कह रही थी कि उसे नहीं पता। और अजीब बात ये थी कि यही 'मुझे नहीं पता' उस बच्ची को सबसे सच्चा लगा।

"आप... आप झूठ नहीं बोल रहीं? ...बड़े लोग तो हमेशा झूठ बोलते हैं। ..." फिर उसने केक के डिब्बे की तरफ़ देखा। "...ये केक... इसमें कौन सा रंग है? ...मुझे नीला रंग पसंद है। ...और पीला भी।"

"अरे, ये तो कमाल है! ...मुझे भी नीला और पीला पसंद है! ...इस केक के ऊपर देखो, ...मैंने एक नीली तितली बनाई है, ...और उसके पंखों पर थोड़ा पीला। ..." उसने डिब्बा खोला, पर उसे अनवि की तरफ़ नहीं बढ़ाया, बस बीच में रख दिया। "...जब तुम्हारा मन करे, तब खाना। ...कोई जल्दी नहीं।"

और फिर, बहुत धीरे, वो नन्हा हाथ आगे बढ़ा, और तितली के एक पंख से थोड़ी सी नीली क्रीम उठा कर मुँह में रख ली। एक पल रुकी। फिर उसकी आँखें थोड़ी बड़ी हुईं। अनिकेत ने पीछे खड़े-खड़े साँस रोक रखी थी, और सांवी ने भी। ये पल किसी परीक्षा के नतीजे जैसा था।

"ये... ये तो बहुत अच्छा है। ..." उसने बहुत गंभीरता से ऐलान किया, जैसे कोई जज फ़ैसला सुना रहा हो। "...पापा, इनका केक मम्मा वाली दुकान से भी अच्छा है। ..." फिर वो सांवी की तरफ़ मुड़ी। "...आंटी, क्या आप मुझे नीली तितली बनाना सिखाओगी? ...मैं चित्र बनाती हूँ, पर तितली नहीं आती।"

और बस, इतने में, वो दरवाज़ा जो बरसों से बंद था, एक इंच खुल गया। कोई बड़ी घोषणा नहीं, कोई फ़िल्मी गले-मिलना नहीं। बस एक नीली तितली, और एक बच्ची की जिज्ञासा। सांवी की आँखों में आँसू आ गए, पर वो मुस्कुरा रही थी। उसने अनिकेत की तरफ़ देखा, जो पीछे खड़ा, चुपचाप रो रहा था, बरसों बाद राहत के आँसू।

"वो... वो किसी को इतनी जल्दी अपने पास नहीं आने देती, सांवी। ..." उसकी आवाज़ काँप रही थी। "...और तुम्हें उसने तितली सिखाने को कह दिया। ...तुम्हें पता है इसका क्या मतलब है? ...इसका मतलब है उसने तुम्हें अपने क़िले में आने की इजाज़त दे दी। ...ये कोई छोटी बात नहीं है।"

और फिर वो एक दोपहर की बात नहीं रही। वो कई शांत दोपहरें बन गईं। कभी बेकरी में अनवि आटे में हाथ डुबोए बैठी होती, कभी पार्क में सांवी उसे तितलियाँ बनाना सिखाती, कभी अनवि उसे अपनी माँ की वो धुँधली तस्वीर दिखाती और सांवी बिना जलन के, बड़े प्यार से उसे सुनती। धीरे-धीरे, प्यार कोई तूफ़ान नहीं, एक बूँद-बूँद गिरती बारिश बन कर उस घर में उतरा।

और एक दोपहर, अनवि ने चुपचाप अपनी ड्रॉइंग बुक से एक चित्र फाड़ा और सांवी की गोद में रख दिया। सांवी ने देखा, और उसकी साँस अटक गई। चित्र में एक घर था, ऊपर एक धुँधली सी औरत आसमान में, एक तारा बनी हुई, अनवि की मम्मा। और नीचे, घर के दरवाज़े पर, तीन आकृतियाँ हाथ थामे खड़ी थीं। पापा, अनवि, और एक तीसरी औरत, जिसके हाथ में एक नीली तितली थी।

"ये मम्मा हैं, ...वो अब तारा बन गई हैं, आसमान में। ...और ये पापा, ...ये मैं, ...और ये आप हैं। ...तितली वाली। ..." फिर उसने ज़रा सोच कर जोड़ा। "...मम्मा ऊपर से देख रही हैं, ...और वो नाराज़ नहीं हैं। ...मुझे पता है। ...क्योंकि आप उनकी जगह नहीं ले रहीं। ...आप बस... एक और हैं।"

"हाँ, बेटा। ...मैं बस एक और हूँ। ..." सांवी की आँखों से आँसू बह निकले, पर उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे। "...और तुम्हारी मम्मा, वो हमेशा सबसे ऊपर रहेंगी, उस सबसे चमकीले तारे की तरह। ...और हम सब यहाँ नीचे, उनकी रोशनी में हँसते रहेंगे। ...ये चित्र मैं अपनी पूरी ज़िंदगी संभाल कर रखूँगी।"

और उधर, चतुर्वेदी घर में, दो बुज़ुर्ग एक अजीब सी उलझन को चाय की प्यालियों पर सुलझा रहे थे। जगदीश और सरिता आमने-सामने बैठे थे, और बीच में काग़ज़ पर एक टेढ़ा-मेढ़ा चित्र बना था, उनके परिवार का पेड़, जो अब किसी उलझी हुई पतंग की डोर जैसा लग रहा था।

"सरिता जी, मैंने तीन बार बनाया है ये चित्र, और तीनों बार दिमाग़ घूम जाता है। ...देखिए, अगर हम शादी करें, तो आप मेरी पत्नी। ...और आपका बेटा अनिकेत मेरा दामाद, क्योंकि वो मेरी सांवी से शादी करेगा। ...तो मेरा दामाद मेरा... सौतेला बेटा भी हुआ? ...और अनवि मेरी नातिन भी और परनातिन भी? ...हे भगवान, इस घर में रिश्ते जोड़ने के लिए गणित का प्रोफ़ेसर बुलाना पड़ेगा।"

"अरे छोड़िए ये चित्र, जगदीश जी! ..." सरिता ने हँसते हुए वो काग़ज़ एक तरफ़ रख दिया। "...रिश्तों को नाम की क्या ज़रूरत? ...अनवि हमें जो बुलाना चाहे, बुलाए। ...नानी, दादी, जो भी। ...बच्चे को प्यार चाहिए, चार्ट नहीं। ...और मुझे इस उम्र में एक बात समझ आई है, ...जो घर हँसी से भरा हो, उसमें रिश्तों के नाम अपने आप ठीक हो जाते हैं।"

"आप सही कहती हैं, सरिता जी। ..." उसने मेज़ के पार उनका हाथ थामा। "...हम दोनों ने झूठ से शुरुआत की थी, एक कर्नल और एक हेडमिस्ट्रेस। ...और आज हम अपने असली रूप में, अपने बच्चों के साथ, इस पूरी उलझन के बीच बैठे हैं। ...और सच कहूँ, ...मैं इस उलझन के बिना अब जीना नहीं चाहता। ...आप मेरे बाक़ी के दिन, इसी उलझन के साथ, मेरे साथ बिताएँगी?"

"बिताऊँगी, जगदीश जी। ...पूरी उलझन के साथ। ..." फिर उसने शरारत से जोड़ा। "...पर एक शर्त पर। ...अब कोई नक़ली मेडल नहीं। ...और कोई नक़ली फ़ौजी शब्द नहीं। ...बस असली जगदीश। ...वही मुझे पसंद है।"

और वो दो बुज़ुर्ग, जो कभी एक कर्नल और एक हेडमिस्ट्रेस के नक़ाब में मिले थे, अब इस घर का सबसे मीठा रिश्ता बन गए थे। कोई हड़बड़ी नहीं, कोई दिखावा नहीं, बस दो लोग जो अपने बाक़ी दिन एक-दूसरे की चाय की पसंद याद रखते हुए बिताना चाहते थे। इससे सच्ची कोई शादी नहीं होती।

और घर का सबसे नया जोड़ा, मानव और इरा, ये सब एक कोने से देख रहे थे, मुस्कुराते हुए। उनका रिश्ता तो सबसे पहले सुलझ गया था, दो लोग जो नोक-झोंक में एक-दूसरे को चाहने लगे थे। इरा अब अक्सर चतुर्वेदी घर आती, और मानव के साथ उसकी वो प्यारी लड़ाइयाँ इस घर की नई रौनक़ बन गई थीं। एक ही छत, जहाँ कभी तीन लोग अलग-अलग छुप कर तनहा थे, अब तीन जोड़ों की हँसी से गूँज रही थी।

पर इस पूरे प्यार की जो असली कारीगर थी, वो अजीब तरह से चुप बैठी थी। पुष्पा। वो अपनी कुर्सी पर बैठी, सबको ख़ुश देख रही थी, पर उसके चेहरे पर एक हल्की सी उदासी थी। मानव उसके पास आया, और शरारत से उसका हाथ थाम कर बोला।

"हाँ, हाँ, अब सब मेरा मज़ाक उड़ाओ। ...'देखो, बुढ़िया ने कठपुतली चलाई'। ..." फिर उसकी आवाज़ नरम हो गई। "...पर सच बताऊँ? ...मैंने सबके रिश्ते जोड़ दिए। ...जगदीश का, सांवी का, मानव का। ...और मैं? ...मैं वहीं की वहीं, अकेली बैठी हूँ, अपनी उसी पुरानी कुर्सी पर। ...माली सबके बग़ीचे सजा देता है, और उसका अपना आँगन ख़ाली रह जाता है।"

और तभी पूरे परिवार ने, जिसे पुष्पा ने आशीर्वाद दिया था, तय किया कि अब उसकी बारी है। मानव ने ऐलान किया कि दादी को अब किसी और का नहीं, अपना रिश्ता ढूँढना है, और वो भी परिवार मिल कर ढूँढेगा। पुष्पा ने ना-ना करते हुए भी, अपनी आँखों के कोने में एक चमक छुपा ली। उसकी सज़ा, उसकी वो 'कठपुतली' वाली बदनामी, अब एक आशीर्वाद बन रही थी।

"अरे हट, चल भाग यहाँ से! ...इस उम्र में मेरा रिश्ता? ...लोग क्या कहेंगे? ..." पर उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे। "...और वैसे भी, जो औरत सबके रिश्ते जोड़ती हो, उसे कोई मर्द झेल भी पाएगा? ..." फिर उसने धीरे से जोड़ा, जैसे ख़ुद से कह रही हो। "...पर सच कहूँ, ...इतने साल में ये पहली बार है कि किसी ने मेरे अकेलेपन के बारे में पूछा है। ...अच्छा लगा।"

और उस शाम, चतुर्वेदी घर की उसी छत के नीचे, जहाँ कभी तीन बंद दरवाज़े थे, अब सब एक साथ बैठे थे। और उन्होंने एक फ़ैसला किया। बस, अब कोई छुपा-छुपी नहीं। तीनों रिश्तों का जश्न, सांवी और अनिकेत, जगदीश और सरिता, मानव और इरा, सब एक साथ, एक ही आँगन में, पूरे मोहल्ले के सामने मनाया जाएगा। कोई नक़ाब नहीं, कोई शर्म नहीं।

"तो तय रहा! ...कल शाम, इसी आँगन में, तीनों रिश्तों की एक साथ ख़ुशी! ...पूरा मोहल्ला बुलाएँगे, चांचल आंटी को भी! ...और इस बार कोई किसी से कुछ नहीं छुपाएगा। ...इस घर ने बहुत छुप कर जी लिया। ...अब ये घर खुल कर हँसेगा।"

और उस रात, बरसों बाद, चतुर्वेदी घर की हर खिड़की से रोशनी और हँसी छलक रही थी। सांवी अनवि के लिए एक रंगीन केक की योजना बना रही थी, सरिता जगदीश को चाय पर चिढ़ा रही थी, मानव और इरा किसी बात पर लड़ रहे थे, और गोलू, जो पूरे मौसम सबके झूठ ढोता रहा था, आज पहली बार बिना किसी डर के, आराम से सोफ़े पर पसरा हुआ था। सब कुछ, आख़िरकार, ठीक लग रहा था।

पर पुरानी शर्म को एक आख़िरी मुलाक़ात करनी बाक़ी थी। अगली शाम, जश्न से ठीक एक रात पहले, जब घर सजावट में डूबा था, बाहर गली में एक गाड़ी आ कर रुकी। एक चमकती, महँगी गाड़ी, जो इस मोहल्ले की नहीं लगती थी। और गोलू, जो बाहर रंगीन झालरें टाँग रहा था, उसे देख कर रुक गया।

गाड़ी का दरवाज़ा खुला, और उसमें से एक आदमी उतरा। इस्त्री की हुई शर्ट, हाथ में महँगी घड़ी, चेहरे पर वो चिकनी, खोखली मुस्कान जो सांवी ने दो साल पहले हमेशा के लिए दफ़्न कर दी थी। उसने चतुर्वेदी घर के गेट की तरफ़ देखा, जहाँ जश्न की तैयारियाँ चल रही थीं, और उसकी मुस्कान थोड़ी और चौड़ी हो गई।

"अरे वाह, ...लगता है घर में कोई ख़ुशी है। ..." उसकी आवाज़ में वही पुरानी चिकनाई थी, वही खोखलापन। "...गोलू, है न? ...कितना बड़ा हो गया। ...अंदर जा कर सांवी को बता दे, ...उसका समीर आया है। ...उससे कुछ ज़रूरी बात करनी है। ...बहुत ज़रूरी।"

और गोलू के हाथ से रंगीन झालर छूट गई। वो नाम, समीर, इस घर में बरसों से एक गाली की तरह फुसफुसाया जाता था, वो नाम, जिसने सांवी को तोड़ा था, वो नाम, जो उसकी हर तरस भरी नज़र की जड़ में था। और अब वो नाम, वो आदमी, ठीक उस जश्न की पूर्व-संध्या पर, चतुर्वेदी घर के गेट पर खड़ा था, अपनी वही चिकनी मुस्कान लिए, अपनी 'ज़रूरी बात' लिए। पुरानी शर्म का आख़िरी साया, ठीक तब लौटा था, जब घर आख़िरकार रोशनी में आने वाला था।

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