अध्याय 21 / 25 पढ़ने में 11 मिनट
चार रिश्ते
शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi
एक ही फ़्रेम में खड़ी चार दुनियाएँ आख़िरकार खुल कर सामने आ जाती हैं, सांवी को पता चलता है कि अनिकेत उसी सरिता का बेटा है जिसका हाथ उसके पापा ने थाम रखा है, और चारों समझ जाते हैं कि अगर बड़े शादी करें और छोटे भी, तो ये परिवार का पेड़ हँसी की एक गुत्थी बन जाएगा। बात गरमजोश और अजीब दोनों है, पर कोई साफ़ हल नहीं, क्योंकि तलाक़ का सच अब भी अधूरा लटका है, और तभी अनिकेत का अपना छुपाया हुआ ग़म एक फिसलन में झलक जाता है और सांवी को चोट पहुँचाता है कि जिस आदमी ने उसका तलाक़ सहजता से अपनाया, उसने ख़ुद एक पूरी दुनिया छुपा रखी थी। और ऐन उसी पल, पूरी शाम चुपचाप फ़ोन ताने घूमती चांचल आंटी खड़ी हो कर ऐलान करती
सांवी वहीं खड़ी थी, हॉल के बीचोंबीच, और उसका दिमाग़ अब भी उस तस्वीर को समझने से इनकार कर रहा था। अनिकेत, एक महिला, और उस महिला के हाथ में उसके अपने पापा का हाथ। तभी अनिकेत की नज़र उस पर पड़ी, और उसका चेहरा एक पल को खिल उठा।
"सांवी! ...तुम यहाँ? ..." और फिर उसे याद आया कि वो अपनी माँ के साथ खड़ा है, और उसकी आवाज़ थोड़ी सँभल गई। "...माँ, ये... ये सांवी हैं। ...वही, जिनका मैं ज़िक्र करता हूँ। ...हमारी गली वाली, बेकरी वाली।"
"जानती हूँ, बेटा।" सरिता मुस्कुराई, पर उस मुस्कान के पीछे एक ऐसी नरमी थी जो पहले से बहुत कुछ जानती थी। "...मैं जानती हूँ ये कौन हैं। ...चतुर्वेदी घर की बेटी। ..." और फिर उसने बग़ल में खड़े जगदीश की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ काँप गई। "...और शायद, आज मुझे ये भी पता चल रहा है कि ये किसकी बेटी हैं।"
सांवी की नज़र सरिता से अपने पापा पर गई, और वापस अनिकेत पर। और वो अनदेखी डोर, जो पूरे मौसम से इस परिवार के गिर्द कसती आ रही थी, अब चारों के सामने खुल कर तन गई। सांवी के मुँह से बस एक फुसफुसाहट निकली।
"अनिकेत... ये तुम्हारी माँ हैं? ...और पापा... आप... आप जिस सरिता जी की बात करते हैं, जिनसे आप... ये वही हैं? ...अनिकेत की माँ? ..." उसकी साँस उखड़ने लगी। "...मतलब... आप जिससे प्यार करते हैं, वो मेरे... मेरे अनिकेत की माँ हैं?"
"हाँ, बेटा।" जगदीश की आवाज़ में कोई हैरानी नहीं थी, बस एक थकी हुई नरमी। "...मुझे ये कुछ दिन पहले ही पता चल गया था। ...जिस दिन मैं सरिता के घर सच बताने गया, उस दिन अंदर से एक आवाज़ आई थी, 'माँ'। ...और वो आवाज़ अनिकेत की थी। ...मैं तब से ये गिरह अकेले ढो रहा था। ...आज ये अपने आप खुल गई।"
और फिर, कुछ पलों की सन्नाटे भरी हैरानी के बाद, उस पूरी गुत्थी की बेतुकी सुंदरता चारों पर एक साथ उतरी। सरिता ने अपने माथे पर हाथ रखा, आधी हँसती, आधी घबराती।
"अरे राम! ...ज़रा रुको, मुझे गिन लेने दो। ...अगर मैं जगदीश जी से शादी करूँ, ...और मेरा बेटा अनिकेत सांवी बेटी से, ...तो मैं सांवी की सास भी बनूँगी और उसकी सौतेली माँ भी? ...और जगदीश जी अपनी ही बेटी के ससुर और समधी दोनों? ...हे भगवान, ये तो कोई गणित का सवाल हो गया!"
"और मैं? ...मैं सांवी का पति बनूँगा और उनका... देवर जैसा कुछ? ..." उसने सिर पकड़ लिया। "...माँ, अब से हमारे घर के रिश्ते समझाने के लिए एक चार्ट बनाना पड़ेगा। ...दीवार पर टाँगेंगे।"
"चार्ट से भी काम नहीं चलेगा, बेटा। ...ज़रा सोचो, शादी के कार्ड पर क्या लिखेंगे? ...दूल्हा भी चतुर्वेदी की तरफ़ से, दुल्हन भी, ...और दोनों तरफ़ के मेहमान भी वही! ..." और फिर वो हँसते-हँसते रुक गया, और उसने सरिता की तरफ़ नरमी से देखा। "...पर सच कहूँ सरिता, ...मुझे ये गुत्थी अच्छी लग रही है। ...बरसों बाद, इस घर में इतनी उलझन है, कि लगता है ज़िंदगी वापस आ गई।"
"मुझे भी, जगदीश जी।" सरिता ने धीरे से कहा। "...हम दोनों ने एक-दूसरे से झूठ बोल कर शुरुआत की थी, ...आप कर्नल बन कर, मैं हेडमिस्ट्रेस बन कर। ...और देखिए, आज हमारे झूठ ने हमारे बच्चों को भी एक-दूसरे तक पहुँचा दिया। ...शायद ऊपर वाला भी सोचता होगा, इन बुड्ढों को सीधे रास्ते से तो कुछ समझ ही नहीं आता।"
"ये... ये हो ही नहीं सकता। ...पूरे कानपुर में, पूरी दुनिया में, उस ऐप ने मेरे पापा को और मुझे, एक ही परिवार में जा कर टकरा दिया? ..." और उसकी हँसी के बीच एक आँसू निकल आया। "...मम्मी सच में ऊपर से हमारा मज़ाक उड़ा रही हैं। पूरा परिवार एक ही जाल में।"
और एक पल के लिए, वहाँ सिर्फ़ गरमाहट थी। चार अकेले लोग, जो एक अजीब सी तक़दीर से एक-दूसरे में उलझ गए थे, और अब अकेले नहीं थे। जगदीश ने सरिता का हाथ थोड़ा और कस कर थाम लिया, और सांवी को पहली बार लगा कि शायद ये उलझन कोई सज़ा नहीं, कोई तोहफ़ा है।
और उसी गरमाहट में, सांवी ने ठान लिया। अगर सब कुछ आज खुल ही रहा है, तो वो भी अपना आख़िरी सच आज ही कह देगी। उसने एक गहरी साँस ली, और अनिकेत की तरफ़ मुड़ी।
"अनिकेत, ...तुमसे मिलने से पहले मैं एक बात कहना चाहती हूँ। ...जो मैं महीनों से टालती आई हूँ। ...मैं तलाक़शुदा हूँ। ...मेरी शादी टूट चुकी है। ...और अब तक मैं इसे एक शर्म की तरह छुपाती रही, पर आज नहीं। ...अगर तुम मुझे अपनाना चाहते हो, तो मेरे इस पूरे सच के साथ अपनाओ।"
"बेटा," सरिता आगे बढ़ी और उसने सांवी का हाथ थाम लिया, इससे पहले कि अनिकेत कुछ कह पाता। "...तलाक़ कोई दाग़ नहीं है। ...जिसने तुम्हें अकेला छोड़ा, वो बदनसीब था, तुम नहीं। ...इस घर में तुम्हें कोई तरस से नहीं देखेगा। ...बस प्यार से।"
और वो शब्द, जिनकी सांवी को दो साल से तलाश थी, आख़िरकार उसे मिल गए, और वो भी उस औरत से जिसे वो अभी-अभी मिली थी। सांवी की आँखें भर आईं। उसने राहत से अनिकेत की तरफ़ देखा, इस उम्मीद में कि वो भी यही कहेगा। पर अनिकेत की नज़र कहीं और थी।
क्योंकि ठीक उसी पल, अनिकेत की जेब में उसका फ़ोन जगमगा उठा। और जैसे ही उसने उसे निकाला, स्क्रीन की रोशनी में, एक पल को, सांवी की नज़र उस पर पड़ गई। स्क्रीन पर एक छोटी बच्ची की तस्वीर थी, और ऊपर लिखा था, 'घर से'। अनिकेत ने बिजली की तेज़ी से फ़ोन उलट दिया, पर देर हो चुकी थी।
"अनिकेत? ...ये... ये फ़ोन घर से आ रहा है? ...और ये बच्ची... कौन है ये? ...तुम्हारी फ़ोन की स्क्रीन पर एक छोटी बच्ची की तस्वीर क्यों है?"
"वो... वो कुछ नहीं। ...बाद में बताता हूँ। ...अभी नहीं, सांवी। ...प्लीज़।" उसने फ़ोन काट दिया, और उसका पूरा चेहरा, जो अभी तक खुला और गरम था, अचानक बंद हो गया, जैसे किसी ने एक कमरे का दरवाज़ा भड़ाक से बंद कर दिया हो।
"अनिकेत, ...बेटा, अब तो सांवी को बता ही दो। ...कब तक छुपाओगे अपनी परी को? ..." और फिर सरिता ने अपनी ही ज़बान पर हाथ रख लिया, ये देख कर कि उसने कितनी बड़ी बात कह दी है। "...माफ़ करना। ...ये तुम्हारा हक़ है बताने का। ...मैं चुप हो जाती हूँ।"
और वो एक शब्द, परी, सांवी के सीने में किसी काँटे की तरह उतर गया। परी। उसका मतलब था एक बच्ची। एक ऐसी दुनिया जो अनिकेत ने उससे पूरी तरह छुपा रखी थी। वो अभी-अभी अपना सबसे बड़ा सच, अपना तलाक़, उसके सामने खोल कर खड़ी थी, और उसे अब पता चल रहा था कि जिस आदमी ने उसका सच सहजता से अपनाया, उसने ख़ुद एक पूरी दुनिया ताले में बंद रखी थी।
और उसके साथ ही, वो पुराना डर फिर लौट आया, वही डर जिसके साथ वो दो साल से जी रही थी। कि वो कभी किसी के लिए पूरी नहीं होगी। कि हर आदमी के पास उससे छुपाने के लिए कुछ न कुछ होगा, और आख़िर में वो फिर अकेली रह जाएगी। उसकी आँखों में आया वो नरम पानी अब जमने लगा था।
"तुम्हारी... परी? ...तुम्हारी कोई बच्ची है, अनिकेत? ...और तुमने मुझे कभी बताया नहीं? ...मैं तुम्हें अपना हर टूटा हुआ टुकड़ा दिखा रही थी, ...और तुमने... तुमने एक पूरी बच्ची छुपा ली मुझसे?"
"सांवी, ऐसा नहीं है। ...मैं डर गया था। ...मैंने सोचा अगर मैंने पहले ही बता दिया, तो तुम... तुम भाग जाओगी। ...मुझे बस थोड़ा वक़्त चाहिए था, तुम्हें सब ठीक से बताने के लिए। ...ये यहाँ, इस भीड़ में, इस तरह... ऐसे नहीं बताना चाहता था मैं।"
"तुम्हें डर था कि मैं भाग जाऊँगी। ..." उसकी आवाज़ काँप रही थी। "...अनिकेत, मैं वो औरत हूँ जिसे उसके अपने पति ने छोड़ दिया। ...मैं भागने वाली नहीं, छोड़े जाने वाली हूँ। ...और फिर भी मैं आज यहाँ, सबके सामने, अपना सबसे बड़ा ज़ख़्म खोल कर खड़ी हो गई। ...और तुम्हें लगा मैं तुम्हारी एक बच्ची का सच नहीं संभाल पाऊँगी? ...तुमने मुझे इतना कमज़ोर समझा?"
"नहीं, सांवी, कमज़ोर नहीं... मैं ख़ुद कमज़ोर था। ..." उसने उसका हाथ थामना चाहा, पर सांवी ने एक क़दम पीछे ले लिया। "...उसकी माँ जब गई, तो मैंने अपने आप से वादा किया था कि उसकी ज़िंदगी में कोई ऐसा नहीं आएगा जो उसे अधूरा प्यार दे। ...इसलिए मैंने उसे सबसे छुपा रखा। ...तुमसे भी। ...ये मेरा डर था, तुम्हारी कमज़ोरी नहीं।"
और वो दोनों वहाँ खड़े रह गए, आमने-सामने, दो लोग जो दोनों छुपे हुए थे। एक ने अपना तलाक़ छुपाया था, दूसरे ने अपनी बच्ची। और अब, जब एक दरवाज़ा खुला था, तो दूसरा और कस कर बंद हो गया था। जगदीश और सरिता चुपचाप खड़े ये टूटता-जुड़ता पल देख रहे थे, किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इसे कैसे संभालें।
"बेटा, अनिकेत," जगदीश ने धीरे से कहा। "...जो भी है, वो यहाँ इस शोर में हल नहीं होगा। ...ये बातें दिल से होती हैं, भीड़ से नहीं। ...चलो, थोड़ा शांत हो जाते हैं, फिर..."
पर उस शाम के पास एक और धमाका बचा हुआ था। और वो धमाका पूरे मौसम से इस परिवार के इर्द-गिर्द मँडरा रहा था, एक दूरबीन और एक व्हाट्सएप ब्रॉडकास्ट लिस्ट के साथ। चांचल आंटी।
चांचल पूरी शाम एक कोने में खड़ी, अपना फ़ोन ताने, चुपचाप सब कुछ फ़िल्मा रही थी। कर्नल का सच, बेटी का सामने आना, दो परिवारों की गुत्थी, सब उसके फ़ोन में क़ैद था। और अब, जब उसे लगा कि उसके हाथ मोहल्ले का सबसे बड़ा तमाशा लग गया है, वो एक कुर्सी पर चढ़ कर खड़ी हो गई।
"रुकिए, रुकिए, सब लोग! ...ज़रा इधर देखिए! ...आज मैंने वो देखा है जो पूरा मोहल्ला महीनों से नहीं देख पाया! ...चतुर्वेदी ख़ानदान का पूरा तमाशा! ...नक़ली कर्नल, तलाक़शुदा बेटी, ...और वो पोता जो असल में कोई है ही नहीं! ...और ये सब अब पूरा मोहल्ला देखेगा, अभी, इसी वक़्त!"
"चांचल आंटी, नहीं! ...प्लीज़, ऐसा मत कीजिए! ..." सांवी उसकी तरफ़ लपकी, पर भीड़ बीच में थी। "...आप नहीं समझ रहीं, इससे कितने लोगों को चोट पहुँचेगी! ...रुक जाइए!"
"चोट? ...अरे बेटा, सच हमेशा थोड़ा चुभता है! ...और मोहल्ले को सच जानने का पूरा हक़ है! ..." उसने फ़ोन ऊँचा उठाया, कैमरा पूरे हॉल की तरफ़ घुमाया, और उसकी उँगली स्क्रीन के लाल बटन पर आ गई। "...तो चलिए, आज परफेक्ट रिश्ता संगम से, सीधे आपके फ़ोन पर! ...चतुर्वेदी परिवार लाइव!"
पूरा परिवार एक साथ उसकी तरफ़ लपका। जगदीश ने हाथ बढ़ाया, अनिकेत आगे कूदा, सांवी चीख़ी। पर बहुत देर हो चुकी थी। चांचल का अंगूठा उस लाल बटन पर गिर चुका था। स्क्रीन पर एक अक्षर उभर आया, जो हर फ़ोन की सबसे डरावनी चीज़ है। लाइव।
और उसी एक पल में, चतुर्वेदी परिवार का हर छुपा हुआ राज़, हर नक़ाब, हर टूटा हुआ टुकड़ा, कानपुर के सैकड़ों फ़ोनों की तरफ़ बहने लगा। मोहल्ले की हर आंटी, हर अंकल, हर रिश्तेदार अब वो देखने वाला था जो इस परिवार ने बरसों छुपाया था। और उस पूरे तमाशे के बीचोंबीच खड़े थे, एक नक़ली कर्नल, उसकी तलाक़शुदा बेटी, और वो लड़का जिसकी अपनी बच्ची का सच अभी-अभी हवा में लटका था। कैमरा चल रहा था। और अब छुपने की कोई जगह नहीं बची थी।
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