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अध्याय 23 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

अनिकेत का राज़

शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi

अभी-अभी उस हॉल ने अपनी ख़ुशी पाई थी, और अब वो फिर से साँस रोके खड़ा था। अनिकेत माइक थामे खड़ा था, और उसका चेहरा उन सबसे अलग था जिन्होंने अभी अपने नक़ाब उतारे थे। उन सबके चेहरे पर राहत थी। अनिकेत के चेहरे पर एक पुराना, गहरा ग़म था, जिसे वो पहली बार बाहर निकालने जा रहा था।

"मैंने कभी किसी को धोखा नहीं देना चाहा था। ...पर मैं भी एक नक़ाब में जी रहा था, सांवी। ...तुम सबकी तरह। ..." उसने एक गहरी साँस ली। "...मैं एक विधुर हूँ। ...मेरी पत्नी, ...वो कुछ साल पहले गुज़र गई। ...और मेरी एक बेटी है। ...अनवि। ...छह साल की।"

और वो शब्द, विधुर, हॉल में किसी तमाशे की तरह नहीं, एक चुपचाप उदासी की तरह उतरा। जो लोग अभी तक तालियाँ बजा रहे थे, वो अब चुप हो गए। ये कोई मज़ेदार राज़ नहीं था। ये एक ऐसे आदमी का दर्द था, जो अकेले एक बच्ची पाल रहा था। सांवी की आँखें अनिकेत पर जमी थीं, और उसके अंदर ग़ुस्सा और तरस, दोनों एक साथ लड़ रहे थे।

"पर ये बात मैं इस भीड़ में, इस माइक पर पूरी नहीं कर सकता, सांवी। ...ये तमाशा नहीं है। ...ये मेरी बेटी की ज़िंदगी है। ...क्या तुम... क्या तुम मेरे साथ थोड़ी देर, वहाँ, उस शांत कोने में चल कर बैठोगी? ...मैं तुम्हें सब बताना चाहता हूँ। ...तुम्हारी आँखों में देख कर। ...बिना किसी कैमरे के।"

और सांवी, दुखी भी और खिंची हुई भी, उसके पीछे चल पड़ी। हॉल के शोर से दूर, एक शांत बरामदे में, जहाँ बाहर की ठंडी हवा आ रही थी और अंदर की तालियाँ बस एक दूर की गूँज बन गई थीं। दोनों एक बेंच पर बैठ गए, एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर। कुछ पल तक सिर्फ़ हवा बोली।

"तुमने मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाई, अनिकेत। ...एक बच्ची। ...मैं तुम्हें अपना हर ज़ख़्म दिखा रही थी, अपना तलाक़, अपना डर, ...और तुम बस सुनते रहे, और अपनी ये पूरी दुनिया एक ताले में बंद रखी। ...क्यों? ...क्या तुम्हें मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं था?"

"भरोसा तुम पर नहीं, अपने आप पर नहीं था, सांवी। ..." उसकी आवाज़ भर्रा गई। "...मेघा, ...मेरी पत्नी, ...जब अनवि सिर्फ़ दो साल की थी, तब वो बीमार पड़ी। ...एक ऐसी बीमारी जो धीरे-धीरे उसे ले गई। ...मैंने उसे अपनी आँखों के सामने... रोज़ थोड़ा-थोड़ा जाते देखा। ...और जाते-जाते उसने मेरा हाथ थामा और कहा, 'अनिकेत, अनवि को कभी अधूरा प्यार मत देना।'"

और वो वादा, जो अनिकेत ने अपनी मरती हुई पत्नी से किया था, धीरे-धीरे एक क़ैद बन गया था। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी अनवि के इर्द-गिर्द बुन ली थी, और उसकी उस छोटी सी दुनिया में किसी को नहीं आने दिया, इस डर से कि कहीं कोई आए और फिर चला जाए, और वो नन्ही बच्ची एक बार फिर टूट जाए।

"पता है सांवी, ...पिछले साल स्कूल में 'मेरी माँ' पर एक चित्र बनाना था। ...और अनवि ने एक धुँधली सी औरत बनाई, जिसका चेहरा उसे ठीक से याद ही नहीं। ...उस रात वो मुझसे पूछती रही, 'पापा, मम्मा की आँखें कैसी थीं? ...उनकी हँसी कैसी थी?' ...और मेरे पास सिर्फ़ एक तस्वीर थी दिखाने को। ...उस रात मैंने तय किया कि इस बच्ची को अब और कोई नुक़सान नहीं पहुँचेगा। ...किसी से भी नहीं।"

और सांवी उस आदमी को देख रही थी, और उसे पहली बार वो सब दिखा जो उसने पहले नहीं देखा था। वो अनिकेत जो सुबह चार बजे उठ कर बेटी का टिफ़िन बनाता है, जो उसकी चोटियाँ बनाना सीखने के लिए यूट्यूब देखता है, जो अपनी चित्रकारी की किताबें रात को बनाता है ताकि दिन उस नन्ही का हो। एक अकेला बाप, जिसका सारा प्यार अनदेखा, अनकहा, बस बहता रहता था।

"इसीलिए मैं ऐप पर आया, सांवी। ...अपनी बेटी को छुपा कर। ...क्योंकि मैं जानना चाहता था कि क्या कोई मुझे... सिर्फ़ मुझे चाह सकता है? ...इससे पहले कि उसे पता चले कि मेरे साथ एक बच्ची है, एक गुज़री हुई पत्नी की याद है, एक पूरा बोझ है। ...मैं वही डर लिए घूम रहा था, जो तुम लिए घूम रही थीं। ...कि कहीं मेरा 'लेबल' मुझसे पहले न पहुँच जाए।"

और उसके उस डर में, सांवी को आख़िरकार अपना ही डर सुनाई दिया। वो 'तलाक़शुदा' का लेबल, और ये 'विधुर, एक बच्ची वाला' का लेबल, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू थे। दो लोग, जो अपने-अपने अतीत को छुपा कर, बस ये जानना चाहते थे कि क्या कोई उन्हें उनके सबसे बुरे दिन से परे भी देख सकता है।

"पता है अनिकेत, ...मेरी शादी में, मैं एक बच्चा चाहती थी। ...बहुत। ..." उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "...पर वो कहते थे, अभी नहीं, अभी नहीं। ...और फिर एक दिन उन्होंने कहा कि उन्हें ये शादी ही नहीं चाहिए। ...तो एक तरफ़ तुम हो, जिसके पास एक बच्ची है और तुम उसे बचाना चाहते हो। ...और एक तरफ़ मैं हूँ, जिसे एक बच्चा मिला ही नहीं। ...अजीब है न, तक़दीर कैसे-कैसे खेल खेलती है।"

और उस एक बात ने, बिना किसी शोर के, उन दोनों के बीच कुछ बदल दिया। अनिकेत के पास एक बच्ची थी जिसे एक माँ की तलाश थी। सांवी के पास एक माँ का दिल था जिसे एक बच्चा नहीं मिला। दो अधूरे टुकड़े, जो शायद, बस शायद, एक-दूसरे की जगह फ़िट हो सकते थे। पर सांवी अभी भी डरी हुई थी, क्योंकि उम्मीद ही तो सबसे डरावनी चीज़ है।

"मैं समझती हूँ, अनिकेत। ...सच में समझती हूँ। ...क्योंकि मैंने भी यही किया। ..." फिर वो रुकी, और उसकी आवाज़ काँप गई। "...पर ये... ये बराबर नहीं है। ...मेरा तलाक़ मेरा अतीत है। ...तुम्हारी बेटी तुम्हारा आज है, तुम्हारा कल है। ...अगर मैं तुम्हारी ज़िंदगी में आई, तो मैं सिर्फ़ तुम्हारी नहीं, उसकी भी ज़िम्मेदारी लूँगी। ...और अनिकेत, ...मुझे नहीं पता कि मैं एक अच्छी माँ बन पाऊँगी या नहीं।"

और वहाँ, उस ठंडे बरामदे में, उस पूरी बात का असली बोझ सांवी के कंधों पर आ बैठा। ये कोई फ़िल्मी प्यार नहीं था, जहाँ सब कुछ आसान हो जाता है। ये एक असली दूसरा मौका था, अपनी पूरी उलझन के साथ। एक बच्ची, जिसने अपनी माँ खोई थी। एक याद, जिससे उसे कभी मुक़ाबला नहीं करना चाहिए। और उसका अपना डर, कि वो ख़ुद अधूरी है।

"मुझे डर है, अनिकेत। ...कि तुम्हारी बेटी मुझे कभी अपना न पाए। ...कि वो मुझे देख कर सोचे, ये मेरी मम्मा की जगह लेने आई है। ...मैं किसी की जगह नहीं लेना चाहती। ...और मुझे ये भी डर है कि... कि जिस औरत को उसका अपना पति पूरा नहीं मानता, वो एक बच्ची के लिए पूरी माँ कैसे बनेगी?"

"तुमसे कोई किसी की जगह लेने को नहीं कह रहा, सांवी। ..." उसने पहली बार उसका हाथ थामा, धीरे से। "...मेघा अनवि की माँ थी, और हमेशा रहेगी। ...उसकी एक तस्वीर हमारे घर में हमेशा टँगी रहेगी। ...पर एक दिल में सिर्फ़ एक इंसान की जगह नहीं होती। ...तुमसे मैं ये नहीं माँग रहा कि तुम उसकी माँ बनो। ...बस इतना, कि तुम उसे प्यार करो, अपने तरीक़े से। ...बाक़ी वो नन्ही ख़ुद तय कर लेगी।"

और वो दोनों वहाँ बैठे रहे, अपने-अपने नक़ाब उतार कर, पहली बार एक असली, मुश्किल, सच्चे भविष्य को तौलते हुए। ये पहली मुलाक़ात की वो हल्की-फुल्की गुदगुदी नहीं थी। ये उससे कहीं गहरा कुछ था। दो टूटे हुए लोग, जो एक-दूसरे के टूटे टुकड़ों के साथ एक पूरी ज़िंदगी बनाने की सोच रहे थे।

"मैं... मैं वादा नहीं कर सकती कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, अनिकेत। ...पर मैं इतना कर सकती हूँ। ...मुझे उससे मिलने दो। ...अनवि से। ...बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी दिखावे के। ...मुझे बस उसे देखने दो, और उसे मुझे देखने दो। ...और फिर, जो होगा, वो हम दोनों की नहीं, उस नन्ही की आँखों से तय होगा।"

"तुम... तुम सच में उससे मिलोगी? ..." उसकी आँखों में एक नमी चमकी। "...पर सांवी, वो आसान बच्ची नहीं है। ...उसने अपनी माँ खोई है, इसलिए वो हर नए चेहरे से डरती है। ...वो शायद तुमसे रूखी बात करे, ...या कुछ ऐसा पूछ ले जो सीधा दिल पर लगे। ...बच्चे झूठ नहीं जानते, वो सीधे सच पर वार करते हैं।"

"तो ठीक है। ...मैं भी उससे सच ही बोलूँगी। ...बच्चों से झूठ नहीं चलता, ये मुझे भी पता है। ...तुम बस मुझे उससे मिला दो, अनिकेत। ...बाक़ी मैं उस पर छोड़ दूँगी।"

"वो... वो बहुत प्यारी है, सांवी। ...ज़िद्दी है, बिल्कुल अपनी माँ की तरह। ...उसे रंग बहुत पसंद हैं, दिन भर चित्र बनाती रहती है। ...और उसे झूठ से सख़्त नफ़रत है। ...अगर तुमने उससे एक भी झूठ बोला, चाहे उसे ख़ुश करने के लिए ही, तो वो पकड़ लेगी, और फिर कभी भरोसा नहीं करेगी। ...तो जो भी कहना, सच कहना। ...चाहे वो सच मुश्किल ही क्यों न हो।"

"रंग पसंद हैं? ..." पहली बार, उस पूरी भारी बातचीत में, सांवी के होंठों पर एक असली मुस्कान आई। "...तो शायद हम दोनों में एक बात तो सी है। ...मुझे भी रंग पसंद हैं। ...मेरी बेकरी की हर मिठाई का अपना एक रंग होता है। ...शायद मैं उसके लिए कुछ रंगीन बना कर ले जाऊँ। ...बिना किसी उम्मीद के। ...बस एक तोहफ़ा।"

और फिर, कुछ ही दिन बाद, एक शांत इतवार की सुबह। संगम का शोर, वो लाइव वाला तूफ़ान, सब पीछे छूट चुका था। अनिकेत के छोटे से घर के बाहर, एक छोटे से पार्क में, जहाँ सुबह की धूप झूलों पर पड़ रही थी, सांवी खड़ी थी। हाथ में एक छोटा सा डिब्बा, जिसमें उसने ख़ुद अपने हाथों से एक केक बनाया था। और उसका दिल संगम की उस पूरी रात से ज़्यादा ज़ोर से धड़क रहा था।

और वहाँ, अनिकेत की टाँग के पीछे छुपी, एक छोटी सी परछाईं खड़ी थी। अनवि। छह साल की, दो चोटियाँ, बड़ी-बड़ी सतर्क आँखें, और एक ऐसी सावधानी जो इतनी छोटी उम्र के बच्चे में नहीं होनी चाहिए। वो सांवी को ऐसे देख रही थी जैसे कोई पहरेदार किसी अजनबी को देखता है, अपने पूरे छोटे से क़िले की रखवाली करती हुई।

"अनवि, बेटा, ...ये सांवी आंटी हैं। ...इन्होंने तुम्हारे लिए एक केक बनाया है, अपने हाथों से। ...हेलो बोलोगी नहीं? ...अरे, शरमाओ मत। ...ये बहुत अच्छी हैं।"

"नमस्ते, अनवि। ...मुझे पता है तुम मुझे नहीं जानती। ...और तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं। ...मैं तुम्हें कुछ करने को नहीं कहूँगी। ...ये केक यहाँ रख देती हूँ, ...अगर मन करे तो खा लेना, न मन करे तो रहने देना। ..." और वो वहीं, थोड़ी दूरी पर, एक झूले पर बैठ गई, बिना उसके पास जाए।

पर वो नन्ही एक इंच भी नहीं हिली। उसने केक की तरफ़ देखा तक नहीं। उसकी वो बड़ी-बड़ी आँखें सीधे सांवी के चेहरे पर टिकी रहीं, जैसे वो उसकी आँखों के पीछे कुछ ढूँढ रही हो। कुछ पल यूँ ही गुज़रे, अनिकेत साँस रोके खड़ा रहा, और फिर वो नन्ही अपने पापा की टाँग के पीछे से धीरे-धीरे निकल कर सांवी की तरफ़ दो क़दम आई।

वो नन्ही सांवी के ठीक सामने आ खड़ी हुई, अपनी छोटी सी ठोड़ी उठाए, जैसे कोई नन्हा जज किसी बड़े मुक़दमे का फ़ैसला सुनाने वाला हो। सांवी घुटनों के बल बैठने ही वाली थी कि नन्ही ने अपना मुँह खोला, और एक ऐसा सवाल पूछा जिसने सांवी की साँस रोक दी।

"आप भी चली जाओगी क्या? ..." उसकी छोटी सी आवाज़ बिल्कुल सपाट थी, बिना किसी नाटक के। "...मेरी मम्मा भी गई थी। ...वो भी कहती थी वो हमेशा रहेगी। ...फिर एक दिन वो सो गई और उठी ही नहीं। ...तो आप भी चली जाओगी? ...सच बताना। ...झूठ मत बोलना।"

और वो सवाल, इतना छोटा, इतना सीधा, इतना भारी, वहाँ हवा में लटक गया। अनिकेत की साँस अटक गई। ये वही पल था जिसका उसे डर था। एक बच्ची का सच, जो सीधे दिल पर वार करता है। सांवी की आँखों में आँसू आ गए, पर उसने उन्हें रोका, क्योंकि वो जानती थी कि ये पल आँसुओं का नहीं, सच का है। उसने केक का डिब्बा एक तरफ़ रखा, और धीरे-धीरे, उस नन्ही बच्ची की आँखों की सीध में आने के लिए, वो उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई। इस एक सवाल के जवाब पर, तीन ज़िंदगियाँ टँगी थीं। और सांवी ने अपना मुँह खोला।

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