अध्याय 20 / 25 पढ़ने में 12 मिनट
आमने सामने
शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi
पिता और बेटी, दोनों नक़ाब में पकड़े गए, संगम की भीड़ से निकल कर एक ख़ामोश कोने में आ जाते हैं, और शर्म की जगह उनके बीच बरसों की जमी हुई बर्फ़ पिघल जाती है। जगदीश के नक़ली मेडल और सांवी की बरसों बाद लगाई लाली, दोनों एक साथ हँसी और आँसू में बदल जाते हैं, और दो अकेले लोग पहली बार एक-दूसरे को अपना पूरा सच बता देते हैं, बाप का अकेलापन और बेटी का तलाक़ का बोझ। गोलू भागता हुआ पहुँचता है, किसी तूफ़ान की उम्मीद में, और दोनों को साथ हँसते-रोते पा कर पहली बार अपना बोझ उतरता महसूस करता है। दोनों ठान लेते हैं कि आज छुपना बंद, जगदीश सरिता को ढूँढने जाता है और सांवी अनिकेत को। और नई हिम्मत के साथ फ़र्श पार क
पूरा हॉल तालियों से गूँज रहा था, पर उस शोर के बीचोंबीच दो लोग पत्थर बन गए थे। मंच से बार-बार एक ही नाम पुकारा जा रहा था, और वो नाम अब किसी के लिए ढाल नहीं, एक खुली किताब था। कर्नल रणविजय अपनी बेटी को देख रहे थे, और काया अपने पिता को।
"कर्नल रणविजय जी! ...अरे कर्नल साहब, आप कहाँ खो गए? ...मंच पर आइए न, ...ये पूरा हॉल आपके लिए तालियाँ बजा रहा है!"
और तभी जगदीश ने वो किया, जो किसी कर्नल ने कभी नहीं किया। वो मंच की तरफ़ एक क़दम भी नहीं बढ़ा। उसने झुक कर, भीड़ की ओट में, अपनी बेटी की कलाई थामी, और धीमे से फुसफुसाया।
"चल... चल यहाँ से, बेटा। ...जल्दी। ...इस भीड़ के सामने नहीं। ...मुझसे यहाँ नहीं होगा।"
और दोनों उठ खड़े हुए। एक तरफ़ चमकते मेडलों वाला नक़ली कर्नल, दूसरी तरफ़ बरसों बाद सजी-सँवरी उसकी बेटी। दोनों उस उम्मीदों से भरी भीड़ को चीरते हुए, एक साइड के दरवाज़े से बाहर निकल गए, जहाँ संगम का शोर एक धीमी सी गूँज बन कर रह गया।
हॉल के पीछे एक सुनसान सीढ़ी थी, एक टिमटिमाता बल्ब, और उसके नीचे खड़े थे दो लोग, जिनके नक़ाब अब उतर चुके थे। जगदीश की छाती पर वो मेडल अब बोझ लग रहे थे, और सांवी के होंठों पर वो लाली, जो उसने बरसों बाद लगाई थी, अब काँप रही थी। कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
"आप... कर्नल रणविजय? ...पापा, आपने... आपने मेडल पहने हैं? ..." और उसने आगे बढ़ कर एक मेडल छुआ, और उसकी हँसी बीच में ही अटक गई। "...ये तो असली भी नहीं हैं। ...ये तो ट्रॉफ़ी की दुकान वाले हैं। ...मैंने बचपन में ऐसे ही मानव को दिलवाए थे।"
"हाँ। ...नक़ली हैं। ...सब नक़ली है, बेटा। ...मेडल, कर्नल, वो रोब, वो फ़ौज की बातें जो मैं रात-रात भर मोबाइल पर रटता था। ...जगदीश चतुर्वेदी ने ज़िंदगी में कभी बंदूक नहीं छुई। ...उसने बस चिट्ठियाँ बाँटी हैं। ...चालीस साल, दूसरों के सुख-दुख के लिफ़ाफ़े।"
सांवी की हँसी अब आँखों में उतर आई थी। वो अपने पापा को देख रही थी, वो आदमी जो घर में हमेशा सीधा, कड़क, और थोड़ा उदास रहता था, और अब उसके सामने एक चोर की तरह पकड़ा खड़ा था, नक़ली मेडलों में सजा, शरम से झुका हुआ।
"पर क्यों, पापा? ...आपको इन सबकी क्या ज़रूरत थी? ...आप... आप जैसे हैं, वैसे भी तो..."
"जैसा हूँ, वैसे कौन देखता है, बेटा? ...एक बूढ़ा, रिटायर्ड डाकबाबू, जिसकी पत्नी बारह साल पहले चली गई। ...जिसके बच्चे अपने-अपने ग़म में डूबे हैं। ...जो शाम को अकेले चाय पीता है और टीवी की आवाज़ इसलिए तेज़ रखता है कि घर की चुप्पी न सुनाई दे।"
"मुझे... मुझे शरम आती थी, सांवी। ...इस उम्र में किसी का साथ चाहना, ये सोच कर कि लोग क्या कहेंगे। ...'बुड्ढे को अब क्या सूझी'। ...तो मैंने सोचा, अगर जगदीश को कोई नहीं चाहेगा, तो एक कर्नल बना लेता हूँ। ...उसे शायद कोई चाह ले।"
और सांवी के अंदर कुछ टूट गया। क्योंकि ये दर्द उसे रटा हुआ था। ये वही डर था जिसके साथ वो हर रात सोती थी। उसने अपने पापा का काँपता हाथ थामा, और उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"पापा... मैं भी उसी ऐप पर हूँ। ...मैं भी छुपी हुई हूँ। ...आप कर्नल रणविजय हैं न? ...मैं काया हूँ। ...वो हँसने वाली, बेफ़िक्र काया, जो असल में मौजूद ही नहीं। ...आपने एक कर्नल गढ़ा, मैंने एक ऐसी लड़की गढ़ी जिसका कभी तलाक़ नहीं हुआ।"
जगदीश ने सिर उठाया। ये पहली बार था जब उसकी बेटी ने उसके सामने वो शब्द कहा था। तलाक़। वो शब्द जो इस घर में हमेशा फुसफुसाहटों में, तरस भरी नज़रों में, बंद दरवाज़ों के पीछे रहता था। और आज उसकी बेटी ने उसे सीधे, अपनी आवाज़ में कहा था।
"आपको पता है पापा, वो जो रिश्ते वाले आते हैं न, वो मुझे देखते ही नहीं। ...वो 'तलाक़शुदा' देखते हैं। ...जैसे मेरे माथे पर लिखा हो। ...जैसे मैं कोई टूटी हुई चीज़ हूँ जिसे कोई दया करके ले ले। ...तो मैंने भी एक नाम के पीछे छुप कर देखना चाहा, कि क्या कोई मुझे... सिर्फ़ मुझे देख सकता है? ...बिना उस लेबल के?"
"और मैं... मैं तेरे सिरहाने बैठ कर तुझे ये कभी नहीं कह पाया। ...मैं भी तो उन्हीं लोगों में से एक था न, जो तुझे तरस से देखते थे। ...मुझे लगता था चुप रहना ही तेरा सम्मान है। ...पर मेरी चुप्पी ने तुझे और अकेला कर दिया। ...माफ़ कर दे, बेटा। ...तेरा बाप डरपोक निकला।"
और फिर, उस भारी पल के बीच, उस पूरी बात की बेतुकी हास्यता उन दोनों पर एक साथ हावी हो गई। सांवी ने आँसू पोंछते हुए एक हिचकी ली, जो आधी रुलाई थी और आधी हँसी।
"पापा, ...ज़रा सोचिए। ...आप एक नक़ली कर्नल, मैं एक नक़ली काया, ...और हम दोनों एक ही ऐप पर, एक ही वाई-फ़ाई से, एक ही घर से... प्यार ढूँढ रहे थे! ...और किसी को कानोंकान ख़बर नहीं! ...हम कितने बड़े वाले बुद्धू हैं, पापा।"
"और सिर्फ़ हम दो नहीं, बेटा। ...तेरी दादी... वो भी उसी ऐप पर मानव बन कर बैठी हैं। ...तीन पीढ़ियाँ, एक छत, और सबके अपने-अपने नक़ाब। ...अगर तेरी माँ ऊपर से देख रही होगी न, तो पेट पकड़ कर हँस रही होगी। ...और फिर मुझे डाँट रही होगी, कि बुड्ढे, मेडल तो ढंग के ख़रीद लेता।"
माँ का ज़िक्र आते ही दोनों एक पल को चुप हो गए। पर ये वो पुरानी, भारी चुप्पी नहीं थी। ये एक हल्की, नरम चुप्पी थी, जैसे कोई पुराना ज़ख़्म पहली बार धूप में सुखाया जा रहा हो। जगदीश ने बेटी का सिर अपने कंधे पर रख लिया।
"तेरी माँ कहती थी, जगदीश, सबसे बड़ी बुज़दिली अकेले रह कर ख़ुश होने का नाटक करना है। ...बस, बहुत हो गया नाटक, बेटा। ...आज मैं तेरे सामने खड़ा हूँ, बिना कर्नल के। ...बस जगदीश। ...और मुझे शरम नहीं आ रही।"
"और मैं आपके सामने खड़ी हूँ, बिना काया के। ...बस सांवी। ...तलाक़शुदा सांवी। ...और आज पहली बार, मुझे भी शरम नहीं आ रही, पापा।"
और ठीक उसी नाज़ुक, पाक पल में, एक सोलह साल का लड़का, हाँफता हुआ, पसीने में तर, उस सीढ़ी पर आ टपका। गोलू। वो किसी तूफ़ान की उम्मीद में भागा चला आया था, उसके दिमाग़ में सौ आपदाएँ थीं, और वो चीख़ने ही वाला था।
"दीदी! अंकल! ...रुकिए, कुछ मत बोलिए, ...मैं सब समझा दूँगा! ...अंकल, ये मेडल वाली बात का एक लॉजिकल एक्सप्लेनेशन है, ...और दीदी, वो काया वाली बात, वो असल में..." और फिर वो रुक गया। उसने देखा। बाप और बेटी, एक-दूसरे को थामे, हँस रहे थे।
गोलू की साँस अटक गई। वो पूरा मौसम आग बुझाता रहा था, झूठ पर झूठ का पुल बाँधता रहा था, और आज, पहली बार, आग लगने के बजाय, दो लोग गले लग कर रो-हँस रहे थे। उसके हाथ अपने आप नीचे गिर गए।
"आप दोनों... आप दोनों लड़ नहीं रहे? ...आपको... आपको सब पता चल गया? ...और आप... ठीक हैं?" और उसकी आवाज़ अचानक भर्रा गई। "...मैं इतने महीनों से ये डर लिए घूम रहा था कि जिस दिन आप सबको पता चलेगा, ये घर टूट जाएगा। ...और आप दोनों यहाँ... हँस रहे हैं।"
"इधर आ, गोलू। ...तूने इस पूरे बूढ़े-जवान परिवार का बोझ अकेले अपने कंधों पर उठाया। ...सोलह साल की उम्र में। ...तूने हम सबके नक़ाब संभाले, ताकि हम में से कोई गिर न जाए। ...आज वो बोझ उतार दे, बेटा। ...आज से तेरी ड्यूटी ख़त्म।"
"अंकल, प्लीज़, इमोशनल मत होइए, ...वरना मैं भी रो दूँगा, और फिर मानव मुझे पूरी ज़िंदगी चिढ़ाएगा। ..." और उसने आँख पोंछी। "...वैसे सच बताऊँ? ...अलीबाई विभाग बंद करके मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। ...आप लोग जानते हैं झूठ याद रखना कितना थका देने वाला काम है?"
सांवी ने हँसते हुए पूछा कि मानव और इरा कहाँ हैं, और गोलू ने फ़ोन उठा कर देखा, जहाँ मानव के संदेशों की झड़ी लगी थी।
"मानव भाई अंदर हॉल में इरा के साथ मोर्चा संभाले हैं। ...लिखा है, 'चांचल आंटी पूरी शाम फ़ोन ताने घूम रही हैं, कुछ न कुछ पका रही हैं। इरा उन पर नज़र रखे है।' ...और नीचे लिखा है, 'दीदी और पापा को ढूँढा? ज़िंदा हैं दोनों?' ..." गोलू ने मुस्कुरा कर टाइप किया, "...ज़िंदा भी हैं, और अब आज़ाद भी।"
और फिर जगदीश ने अपनी बेटी के दोनों कंधे थामे, और उसकी आँखों में देखा। उसकी अपनी आँखों में अब वो पुरानी घबराहट नहीं थी। एक नई, शांत हिम्मत थी।
"सुन, बेटा। ...आज हम दोनों यहाँ छुपने नहीं आए थे। ...हम दोनों किसी को ढूँढने आए थे। ...तो चल, ढूँढते हैं। ...तू जा, अपने उस इंसान से मिल, और उसे सब बता दे, तलाक़ भी, काया भी, सब। ...और मैं जाता हूँ, अपनी... अपनी उस दोस्त से मिलने।"
"आपकी वो दोस्त... सरिता जी? ...जिनका ज़िक्र करते ही आपके कान लाल हो जाते हैं?"
"चुप कर। ...कान लाल नहीं होते। ..." और फिर उसकी मुस्कान नरम पड़ गई, और एक पल को उसकी आँखों में एक बादल आया और चला गया, कोई ऐसी बात जो वो जानता था और अभी कहना नहीं चाहता था। "...तू बस अपनी हिम्मत मत हारना। ...जा। ...तेरा बाप आज तुझ पर गर्व कर रहा है।"
और जगदीश ने वो बात अपने सीने में ही रखी, वो गिरह जो सिर्फ़ वो जानता था, कि जिस सरिता से वो प्यार करता है, वो उसी लड़के की माँ है जिससे उसकी बेटी का दिल जुड़ा है। पर आज नहीं, उसने सोचा। आज बेटी की हिम्मत का दिन है। ये उलझी हुई गिरह, ये अपने आप खुलेगी, या फिर सबके सामने।
और दोनों, बाप और बेटी, एक-दूसरे का हाथ एक बार दबा कर, अलग-अलग दिशाओं में उस चमकते हॉल की तरफ़ लौटे। एक अपनी सरिता को ढूँढने, एक अपने अनिकेत को। दो अकेले लोग, जो अब अकेले नहीं थे। गोलू पीछे खड़ा उन्हें जाते देखता रहा, और पहली बार उसे लगा कि शायद, शायद ये सब ठीक हो जाएगा।
"बस अनिकेत, आज। ...आज मैं तुम्हें सब बता दूँगी। ...जो लड़की तुम्हें ऑनलाइन मिली, और जो तुम्हारी गली में चाय बनाती है, दोनों एक ही हैं। ...और दोनों टूटी हुई हैं, पर छुप-छुप कर जीना नहीं चाहतीं। ...बस मुझे ढूँढ लेने दो तुम्हें।"
और भीड़ को चीरती हुई सांवी की नज़र आख़िरकार उस चेहरे पर जा टिकी, जिसे वो पिछले दो महीने से भूल नहीं पाई थी। अनिकेत। हॉल के उस पार, एक खम्भे के पास खड़ा। उसका दिल एक अजीब सी उम्मीद से भर गया, और उसके क़दम तेज़ हो गए।
पर अनिकेत अकेला खड़ा नहीं था। उसके पास एक महिला खड़ी थी, गरमजोश, हँसती हुई, बालों में हल्की सफ़ेदी। सांवी ने पहले उन्हें ठीक से नहीं देखा। उसकी नज़र तो बस अनिकेत पर थी। पर जैसे-जैसे वो पास आई, वो महिला मुड़ी, और सांवी के क़दम धीमे पड़ गए।
क्योंकि उस महिला ने किसी का हाथ थाम रखा था। सांवी की नज़र उस थमे हुए हाथ पर गई, फिर उस हाथ के मालिक के चेहरे पर। और उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। क्योंकि वो हाथ उसके पापा का था। जगदीश का। कर्नल रणविजय का।
सांवी वहीं जम गई, हॉल के बीचोंबीच, भीड़ उसके इर्द-गिर्द बहती हुई। एक फ़्रेम में उसकी पूरी दुनिया खड़ी थी। उसका अनिकेत। एक अजनबी महिला, जो अनिकेत को अपने पास खड़ा किए थी। और उस महिला का हाथ थामे, उसके अपने पापा। तीन चेहरे, और उनके बीच खिंची हुई एक अनदेखी डोर, जिसका एक सिरा अभी-अभी सांवी के हाथ में आया था।
"...ये महिला... पापा का हाथ क्यों थामे हैं? ...और अनिकेत... अनिकेत इनके साथ क्यों खड़ा है? ...इनके इतने पास? ...जैसे..." और उसकी साँस बीच में ही अटक गई, क्योंकि उसका दिमाग़ वो जोड़ लगा रहा था, जिसे लगाने से वो डर रही थी।
अनिकेत ने उस महिला को 'माँ' कह कर कुछ कहा। और सांवी के कानों में वो एक शब्द, माँ, किसी घंटी की तरह गूँज गया। वो महिला अनिकेत की माँ थीं। और वही महिला, उसके पापा का हाथ थामे खड़ी थीं। सांवी की दोनों दुनियाएँ, उसकी और उसके पापा की, एक ही परिवार में जा कर उलझ गई थीं। वो अनिकेत को सब बताने आई थी, और अब वो बस वहीं खड़ी थी, जड़, बेआवाज़, अपनी पूरी ज़िंदगी को एक ही फ़्रेम में टूटते और जुड़ते देखती हुई।
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