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अध्याय 13 / 25 पढ़ने में 12 मिनट

आधा सच

शादी डॉट कॉम द्वारा Avni Oberoi

चांचल की उँगली उस बटन पर पड़ी, और एक ही पल में मोहल्ले के सौ फ़ोन एक साथ काँप उठे। और उन सौ फ़ोनों में एक फ़ोन चतुर्वेदी घर की बैठक में पड़ा था, गोलू का फ़ोन, जो अभी-अभी टन्न से बज उठा।

गोलू ने आदतन स्क्रीन उठाई, और उसका ख़ून जम गया। कॉलोनी वाले ग्रुप में एक तस्वीर तैर रही थी। एक पर्ची की तस्वीर। ऐप से छपी हुई एक प्रोफ़ाइल। ऊपर एक जाना-पहचाना चेहरा, नीचे एक शब्द, और उसके नीचे चांचल आंटी का दहकता हुआ सवाल।

"नहीं, नहीं, नहीं। ...ये तो बुआ की काया वाली प्रोफ़ाइल है। और चांचल आंटी ने लिख दिया है, 'क्या ये तलाक़शुदा काया चतुर्वेदी की सांवी नहीं लगती'। ...और ये पूरे मोहल्ले में घूम रहा है। सौ फ़ोन में। ...हे भगवान, अब क्या करूँ?"

सोलह साल का वो चौकीदार, जो अब तक घर की दीवारों के अंदर आग बुझाता आया था, आज पहली बार उस आग को दीवारों के बाहर, पूरे मोहल्ले में फैला हुआ देख रहा था। ये आग अब उसके अकेले बुझाने से बड़ी थी।

और तभी दादी पुष्पा कमरे में आईं, हाथ में चाय की ट्रे, और उन्होंने अपने पोते का उड़ा हुआ रंग देखा। इस घर में एक ही चेहरा था जो सारे राज़ जानता था, और वो चेहरा इस वक़्त सफ़ेद पड़ा हुआ था।

"गोलू? ...ये मुँह क्यों उतरा है? ...फ़ोन में क्या है? दिखा मुझे। ...और झूठ मत बोलना, मैं तेरी नानी की सास हूँ, तेरे चेहरे की हर लकीर पढ़ लेती हूँ।"

"दादी... चांचल आंटी ने पूरे मोहल्ले में बुआ की ऐप वाली तस्वीर भेज दी है। काया वाली। और साथ में लिख दिया है कि ये सांवी है। ...अब हर आंटी के फ़ोन में बुआ का राज़ है। ...ये मैं नहीं रोक सकता, दादी। ये मेरे हाथ से निकल गया।"

दादी पुष्पा ने वो तस्वीर देखी, और उनके हाथ की ट्रे एक पल को काँपी। ये वो खेल नहीं था जो वो चला रही थीं। ये उनकी बहू, उनकी बेटी जैसी सांवी थी, जिसे पूरा मोहल्ला एक बार फिर 'तलाक़शुदा' कह कर चौराहे पर खड़ा करने वाला था।

"वो चांचल... उस औरत की ज़बान एक दिन उसी को ले डूबेगी। ...पर अभी रोने का वक़्त नहीं है, गोलू। अभी सांवी को बचाना है। अगर वो अभी घर आई और उसने ये देखा, इस घर के सामने, तो वो टूट जाएगी। ...कुछ कर, जल्दी।"

और ठीक उसी पल, जैसे किस्मत को घर की हँसी से चिढ़ हो, बाहर का दरवाज़ा खुला, और सांवी अंदर आई। नदी किनारे से लौटती हुई, चेहरे पर महीनों बाद एक हल्की सी उम्मीद लिए, अनिकेत के साथ बिताए उस बिना-नक़ाब वाले घंटे की गरमाहट अब भी अपने साथ लिए।

उसने कमरे में क़दम रखा, और देखा कि दादी और गोलू, दोनों, एक फ़ोन पर झुके हुए थे, और उनके चेहरे पर वो चीज़ थी जो किसी दुर्घटना की ख़बर पर होती है। सांवी का दिल एक पल को रुका।

"क्या हुआ? ...आप दोनों ऐसे क्यों देख रहे हैं? ...दादी, फ़ोन में क्या है? ...मुझे दिखाइए।"

और इससे पहले कि कोई रोक पाता, सांवी की नज़र स्क्रीन पर पड़ी। और वहाँ, अपने ही घर की बैठक में, अपनी दादी के फ़ोन में, उसने अपनी काया वाली तस्वीर देखी, अपनी उम्र, और वो एक शब्द, तलाक़शुदा, और नीचे पूरे मोहल्ले का वो सवाल, क्या ये सांवी है।

"ये... ये तो काया है। ...मैं हूँ। ...ये पूरे मोहल्ले में? ...सबको पता चल गया? ...कि मैं... कि काया..."

और तभी गोलू, जिसने रात-रात भर स्क्रीनों से लड़ना सीखा था, बीच में कूद पड़ा। उसके पास सफ़ाई का वक़्त नहीं था, बस एक जुआ था, और उसने वो जुआ खेल दिया।

"नहीं बुआ, रुको! सबको पता नहीं चला! ...देखो, मैंने अभी ग्रुप में डाल दिया है कि ये फ़ोटो नक़ली है, ऐप से चुराई हुई किसी और की तस्वीर पर आपका नाम चिपकाया गया है। ...मैंने दस आंटियों को समझा दिया है कि आजकल ये 'डीपफ़ेक' चलता है, किसी के भी चेहरे पर कुछ भी लिख देते हैं। ...और चांचल आंटी की तो वैसे भी कोई इज़्ज़त नहीं करता। आधे लोग तो पहले ही उन्हें झूठा मान चुके हैं।"

ये पूरी तरह सच नहीं था। गोलू ने आधी तस्वीर धुँधली की थी, आधा शक बोया था, और आधी उम्मीद पर छोड़ दिया था। पर उस घबराई हुई शाम में, वो आधा सच ही सांवी और नंगी होने के बीच खड़ी इकलौती दीवार थी।

"बिल्कुल! ...मैं अभी उस चांचल को फ़ोन करती हूँ। हिम्मत कैसे हुई उसकी, मेरी बहू की तस्वीर पर ऐसा घटिया इल्ज़ाम लगाने की। ...सांवी, तू बिल्कुल परेशान मत हो। कल तक ये सब ठंडा पड़ जाएगा। मोहल्ले की याददाश्त एक दिन की होती है। परसों कोई और तमाशा मिल जाएगा इन्हें।"

और तरक़ीब चल गई। शक की तलवार एक पल को नीचे झुक गई। पर जो चीज़ गोलू नहीं बचा सका, वो सांवी के अंदर टूट चुकी थी। वो थोड़ी सी उम्मीद, जो अभी-अभी नदी किनारे जागी थी, अब उसकी आँखों में बुझ रही थी।

"मैंने सोचा था... आज मैंने सोचा था कि मैं फिर से जी सकती हूँ। ...और देखो, एक ही शाम में मोहल्ला मुझे फिर से चौराहे पर ले आया। ...काया एक ग़लती थी। मुझे जीने का हक़ ही नहीं है, दादी। मुझ जैसी औरत को बस चुपचाप, सिर झुका कर, दीवारों के पीछे रहना चाहिए।"

और उस रात, बेकरी के पीछे वाले उस छोटे कमरे में, जहाँ कल तक एक उम्मीद जागी थी, अब एक फ़ोन बज रहा था। स्क्रीन पर एक नाम, अनिकेत। एक बार। दो बार। तीसरी बार।

और सांवी ने उस बजते हुए फ़ोन को देखा, उस आदमी का नाम देखा जिसने आज ही उसका सबसे बड़ा राज़ जान कर भी उसका हाथ थामने की कोशिश की थी, और फिर उसने वो किया जो डर इंसान से करवाता है। उसने फ़ोन उलटा कर के रख दिया। घंटी बजती रही, और वो सुनती रही।

"नहीं, अनिकेत। ...अगर मोहल्ला काया तक पहुँच गया है, तो कल तुम तक भी पहुँचेगा। और मैं तुम्हें ये तमाशा नहीं देखने दूँगी। ...तुम्हारे लिए भी, मेरे लिए भी, बेहतर यही है कि काया मर जाए। आज। अभी। ...माफ़ कर दो।"

और उधर, शहर के दूसरे कोने में, एक कोमल इंसान अपने फ़ोन को घूरता रहा, जो बार-बार बज कर, बिना उठे, कट जाता था। उसने सोचा शायद वो थक गई है, शायद कल बात होगी। उसे नहीं पता था कि जिस औरत ने आज पहली बार अपना नक़ाब उतारा था, वो आज ही उसके सामने एक और, कहीं मोटी दीवार खींच रही थी। दो लोग, एक ही दिन में, इतने पास और फिर इतने दूर।

पर वो डर सिर्फ़ सांवी तक नहीं रुका। इस घर की हवा में अब एक ज़हर घुल गया था, और वो ज़हर सबसे पहले उस आदमी तक पहुँचा जो सबसे ज़्यादा डरा हुआ था। जगदीश। जिसने बरामदे से गुज़रते हुए दादी और सांवी की फुसफुसाहट का एक टुकड़ा सुन लिया था। ऐप। मोहल्ला। पर्ची। पकड़ी गई।

"अगर मोहल्ले की एक औरत ऐप से सांवी को पहचान सकती है... तो कोई कर्नल रणविजय को भी पहचान सकता है। ...मेरी तस्वीर भी तो उसी ऐप पर है। अगर किसी ने वो पर्ची छाप ली, अगर किसी ने पहचान लिया कि रिटायर्ड कर्नल असल में डाकख़ाने का बूढ़ा बाबू है... तो? ...तो पूरे मोहल्ले में मेरा मज़ाक बनेगा। मेरे बच्चों के सामने।"

और उस डर में, जगदीश ने अपना फ़ोन उठाया, और उस औरत का नाम खोला जिसने बरसों बाद उसकी शाम की चाय को अकेला रहने से बचाया था। सरिता। जिसे कल ही उसने मिलने का वादा किया था।

"सरिता जी... माफ़ कीजिए। कल की मुलाक़ात... वो नहीं हो पाएगी। ...दरअसल मुझे अचानक बाहर जाना पड़ रहा है। ...नहीं, कब लौटूँगा, पता नहीं। ...आप मेरा इंतज़ार मत कीजिएगा। ...मैं शायद... मैं शायद इस उम्र में ये सब करने के लायक़ नहीं हूँ। ...जय हिंद।"

और जगदीश ने फ़ोन रख दिया, हाथ काँपते हुए। उसने अभी-अभी अपनी ज़िंदगी की उस इकलौती गरमाहट पर, अपने ही हाथों, बर्फ़ डाल दी थी। घर का सबसे मीठा रिश्ता, जो अभी खिलना शुरू ही हुआ था, एक फ़ोन कॉल में मुरझा गया। डर की यही आदत है, वो सबसे पहले उसी को मारता है जिसे आप सबसे ज़्यादा चाहते हैं।

और तीसरा दिल भी उसी शाम की आँधी में डगमगा गया। मानव, जो कल तक इरा के साथ हँसते हुए थोड़ा कम अकेला हो रहा था, आज घर की इस घबराहट में अपने सबसे पुराने ज़ख़्म पर लौट आया। नक़ली मानव वाला ज़ख़्म।

"दादी, एक बात बताओ। ...वो जो गोलू ने मेरे नाम से इरा को शायरी भेजी, हफ़्तों तक... इरा उसी नक़ली मानव पर मरती थी। ...और अब मैं सोचता हूँ, क्या इरा को असली मैं पसंद हूँ? या वो अब भी उसी झूठे शायर को ढूँढ रही है मुझमें? ...मैं तो अपनी ही ज़िंदगी में दूसरे नंबर पर हूँ, दादी।"

और दादी पुष्पा, जो जानती थीं कि वो नक़ली शायर गोलू नहीं, वो ख़ुद थीं, एक पल को काँप गईं। उनके होंठों पर सच आ कर रुक गया। उन्हें पोते की आँखों में वो दर्द दिखा जो उन्हीं की उँगलियों ने, प्यार में, अनजाने में, बो दिया था।

"बेटा... इरा को जो पसंद है, वो तू है। ...वो शायरी तो बस... बस एक ग़लती थी। ...तू उस ग़लती को अपने और इरा के बीच मत आने दे। ...जा, उससे बात कर। सीधे। सच्चे मन से।"

"नहीं दादी। ...जब तक मुझे ये नहीं पता कि इरा मुझे किसलिए चाहती है, असली मानव के लिए या नक़ली शायर के लिए, तब तक मैं उसके पास नहीं जाऊँगा। ...मुझे किसी और के लिखे प्यार का उधार नहीं चाहिए। ...मैं दूर ही ठीक हूँ।"

और इस तरह, एक ही शाम में, एक ही छत के नीचे, तीन दिल पीछे हट गए। सांवी अनिकेत से। जगदीश सरिता से। मानव इरा से। जिस राज़ को खुल कर हल्का हो जाना था, उसने खुलने के डर से सबको और गहरे, और अकेले, अपने-अपने कमरों में धकेल दिया। घर पहले से कहीं ज़्यादा उलझा, और पहले से कहीं ज़्यादा अकेला।

और उस रात खाने की मेज़ पर एक ऐसी चुप्पी थी जो चतुर्वेदी घर में पहले कभी नहीं थी। दाल-रोटी थी, पर किसी को भूख नहीं थी। जगदीश प्लेट में कौर घुमाता रहा। सांवी नज़र नीची किए बैठी रही। मानव गुमसुम। और गोलू, थका हुआ, सबके चेहरे बारी-बारी पढ़ता हुआ।

और मेज़ के सिरे पर, दादी पुष्पा बैठी थीं, और उन्होंने अपने पूरे परिवार को एक साथ बिखरते देखा। तीन अकेले दिल, तीनों अपने-अपने डर के पीछे छुपे, तीनों सच से भागते हुए। और एक बूढ़ी औरत, जिसने पूरी उम्र सबको जोड़ने में लगा दी थी, आज उन्हें टूटते देख रही थी।

और फिर, दादी पुष्पा ने बहुत धीरे से अपना चम्मच नीचे रखा। इतने धीरे कि उसकी आवाज़ पूरी मेज़ पर गूँज गई। सबकी नज़रें उठीं। और दादी ने एक लंबी, थकी हुई साँस ली।

"बस। ...बहुत हो गई ये चोरी-छिपी। ...इस घर में हर कोई एक नक़ाब पहने घूम रहा है, और मुझे सब दिखता है। सबका दर्द, सबका डर, सबका झूठ। ...तो अब बस। कल से मैं चुप नहीं बैठूँगी। ...कल से इस घर के सारे रिश्ते मैं ख़ुद ढूँढूँगी। खुल कर। सबके सामने।"

और पूरी मेज़ पत्थर की हो गई। सांवी का हाथ रुक गया। जगदीश का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। मानव ने दादी को घूरा। और गोलू, जो एकलौता जानता था कि दादी के हाथ में असल में क्या है, उसकी साँस गले में ही अटक गई।

और दादी पुष्पा ने अपना फ़ोन उठाया, और उसे मेज़ के बीचोंबीच घुमा दिया, ताकि हर कोई देख सके। स्क्रीन पर एक जाना-पहचाना नारंगी ऐप खुला था। परफेक्ट रिश्ता।

"ये देखो। परफेक्ट रिश्ता। इसी पर आजकल सब रिश्ते होते हैं। ...और तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारी बूढ़ी दादी को कुछ नहीं आता? ...मैंने भी इस पर एक खाता बना रखा है। अभी, इसी वक़्त, मैं तुम सबको दिखाती हूँ कि इस पर क्या-क्या है, और कैसे मैं तुम सबके लिए एक-एक रिश्ता ढूँढूँगी। ...रुको, बस ये खुलने ही वाला है।"

और गोलू का दिल बैठ गया। क्योंकि दादी का वो 'खाता' कोई आम खाता नहीं था। वो नक़ली मानव वाला खाता था। वो कठपुतली, जिसे दादी ख़ुद चलाती थीं, जिसमें इरा के साथ की हर चैट थी, हर शायरी थी, हर वो झूठ था जिसका बोझ गोलू ने अपने कंधों पर लिया था। और अब वो पूरा खाता, पूरे परिवार की आँखों से, बस एक टैप की दूरी पर था।

दादी की उँगली स्क्रीन की तरफ़ बढ़ी। जगदीश, सांवी, मानव, सब झुक कर उस चमकते फ़ोन की तरफ़ देखने लगे। और गोलू, मेज़ के उस पार, मुँह खोले, बिना आवाज़ के चीख़ता हुआ, उठने की कोशिश करता हुआ, जानता था कि अगली एक टैप में इस घर के सारे नक़ाब, एक साथ, इसी मेज़ पर उतर जाएँगे। ...और दादी की उँगली स्क्रीन को छूने ही वाली थी।

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