DesiHub

अध्याय 24 / 26 पढ़ने में 12 मिनट

ट्रिगर पर उँगली

साया बनके द्वारा Avni Oberoi

सील। हर दरवाज़ा, हर निकास, हर खिड़की। बत्रा का ऑडिटोरियम अब एक क़िला था, और उसके अँधेरे गलियारों में एक जंग शुरू होने वाली थी। नियंत्रण-कक्ष में, नैरा एक प्रसारण-कंसोल के सामने बैठी थी, फ़ोन पर एसीपी नायक की लाइन खुली रखे। और सुहाना, दरवाज़े पर, अपनी वर्दी की पेटी कसते हुए।

"नैरा, यहीं रहो। इस कंसोल से नज़र मत हटाना। ... जिस पल मैं वो रिकॉर्डिंग ले कर आऊँ, हमें उसे इसी फ़ीड पर चलाना है, उसी पर जिस पर बत्रा का झूठ चला। ... नायक को लाइन पर रखो। और चाहे कुछ भी हो जाए, ये कुर्सी मत छोड़ना।"

उसने रेडियो अपने होंठों के पास लाया। बाहर, पीछे वाले सर्विस दरवाज़े पर, जग्गी खड़ा था, एक हाथ में इक़बाल की दी हुई वो नन्ही रिकॉर्डिंग, और सामने बत्रा के आदमियों की एक क़तार।

"जग्गी, पीछे वाला सर्विस दरवाज़ा। मैं अंदर से खोलती हूँ। ... तीन मिनट। मुझे बस तीन मिनट दो। ... और वो रिकॉर्डिंग, चाहे कुछ भी हो जाए, अपनी जान से ज़्यादा सँभालना। वही आज आर्यन की ज़िंदगी है।"

"तीन मिनट? कैप्टन, मैं यहाँ बत्रा की पूरी फ़ौज से अकेला भिड़ रहा हूँ, और तुम तीन मिनट माँग रही हो! ... अरे मैं फ़ौजी हूँ, कोई डाकिया नहीं! ... पर फ़िक्र मत करो, ये रिकॉर्डिंग मेरे सीने से चिपकी है। इसे लेने के लिए पहले इस जट्ट को गिराना पड़ेगा। ... दरवाज़ा खोलो, मैं आ रहा हूँ।"

और सुहाना गलियारे में उतरी। पहला आदमी कोने से निकला, चाकू ताने। सुहाना झुकी, उसकी कलाई मोड़ी, और चाकू फ़र्श पर खनका। दूसरा पीछे से आया। एक कोहनी, एक घुटना, और वो भी ढेर। वो रुकी नहीं। हर क़दम पर एक दुश्मन, और हर दुश्मन पर बरस रही थी नौ साल की वो ट्रेनिंग। ये अब वो पहरेदार नहीं थी जो हर दरवाज़े पर नियम बनाती थी। ये एक तूफ़ान था, जिसकी आँख में एक ही मक़सद था, आकाश की आवाज़ को उसकी मंज़िल तक पहुँचाना।

और बाहर, जग्गी अपनी अकेली जंग लड़ रहा था, एक हाथ रिकॉर्डिंग पर, एक मुक्का दुश्मनों पर। एक आदमी उस पर झपटा, और जग्गी ने उसे पंजाबी गालियों की एक बौछार और एक ज़बरदस्त धक्के के साथ दीवार पर दे मारा। उसकी क़मीज़ फट चुकी थी, माथे से ख़ून बह रहा था, पर उसके चेहरे पर वही बेफ़िक्र मुस्कान थी जो सिर्फ़ एक सच्चे फ़ौजी के चेहरे पर होती है।

तीन मिनट में वो पीछे वाले सर्विस दरवाज़े तक पहुँच गई, दो और आदमियों को पीछे छोड़ती हुई। उसने भारी लोहे की कुंडी खींची, और दरवाज़ा खुला। बाहर जग्गी खड़ा था, पसीने में तर, मुस्कुराता हुआ, और उसकी मुट्ठी में वो नन्ही रिकॉर्डिंग।

"ले लो। ... आकाश की अपनी आवाज़, नौ साल पुरानी, पर आज भी ज़िंदा। ... इक़बाल सर ने कहा है, ये उनकी अमानत थी, आज इसे इसकी मंज़िल तक पहुँचा दो। ... और नायक बाहर है, पूरी फ़ोर्स के साथ, पर बत्रा के आदमियों ने गेट जकड़ रखे हैं। तुम इसे बस लाइव कर दो, बाक़ी नायक सँभाल लेगा।"

"तुमने आज आकाश की आवाज़ बचाई है, जग्गी। ... तुम अंदर मत आना, तुम पीछे से नायक के लिए ये दरवाज़ा खुला रखो, चाहे कैसे भी। ... अगर मैं दस मिनट में न लौटूँ, तो नायक को किसी भी तरह अंदर धकेलना। ... ये आख़िरी लड़ाई है।"

रिकॉर्डिंग मुट्ठी में, सुहाना नियंत्रण-कक्ष की तरफ़ दौड़ी। पर बीच के गलियारे में उसने वो देखा जिसने उसके क़दम रोक दिए। बत्रा के तीन आदमी, आर्यन को घसीटते हुए, अपने मालिक के पास ले जा रहे थे। आर्यन के होंठ से ख़ून बह रहा था, पर उसकी आँखों में अब भी वही आग थी।

"उससे अपने हाथ हटाओ। ... मैं आख़िरी बार कह रही हूँ।"

उन्होंने हँस कर बंदूकें उठाईं। ग़लती। सुहाना बिजली की तरह उनके बीच घुसी, पहले की बंदूक ऊपर, दूसरे का घुटना नीचे, तीसरे को सीधे दीवार पर। तीन साँसों में, तीनों फ़र्श पर। और आर्यन आज़ाद, उसके सामने, हाँफता हुआ।

"तुम... तुम हमेशा ठीक वक़्त पर आती हो। ... नौ साल पहले भी, और आज भी। ... सुहाना, वो रिकॉर्डिंग? क्या वो सच में..."

"आकाश की अपनी आवाज़। हाँ, वही है। ... इधर आओ, इस कोने में, नीचे रहो। ... कंसोल तक पहुँचने में हमें एक और गलियारा पार करना है, और वो आदमियों से भरा है।"

और उस अँधेरे कोने में, एक दीवार की ओट में, गोलियों और शोर से कुछ ही पल की दूरी पर, वो दोनों एक-दूसरे के इतने क़रीब थे कि सुहाना आर्यन की हर हाँफती साँस अपनी त्वचा पर महसूस कर सकती थी। नौ साल की जंग, और बीच में सिर्फ़ एक साँस की दूरी।

"सुहाना। ... अगर आज रात मैं न बचूँ, तो एक बात जान लो। ... मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा। ... नौ साल पहले मैं तुमसे दूर भागा, पर तुमसे प्यार करना एक पल के लिए भी नहीं छोड़ा। हर फ़िल्म में, हर भीड़ में, हर रात, मैं तुम्हें ढूँढता रहा। ... ये कोई मिन्नत नहीं है। बस एक सच है, जो मैं मरने से पहले तुम्हें दे देना चाहता हूँ।"

"तुम्हें ये अभी कहना था? ... अभी, जब हर तरफ़ मौत खड़ी है, और मेरे हाथ में तुम्हारी ज़िंदगी? ... नौ साल मैंने तुम्हारा इंतज़ार नहीं किया, आर्यन, मैंने तुम्हें भुलाने की कोशिश की। हर मिशन में, हर वर्दी में, हर अजनबी शहर में। और हर रोज़ नाकाम रही। ... और अब, इस बंद ऑडिटोरियम में, बंदूकों के बीच, तुम मुझसे कह रहे हो कि तुमने कभी नहीं छोड़ा।"

और एक पल को, उस मौत के गलियारे में, दोनों की साँसें एक हो गईं। सुहाना का माथा आर्यन के माथे से छू गया, उसकी उँगलियाँ आर्यन की क़मीज़ की सिलवट में उलझ गईं। नौ साल की सारी दीवारें, सारी नफ़रत, सारा फ़र्ज़, एक पल को पिघल कर उस अँधेरे कोने में बह गया। सब कुछ थम गया, जंग, शोर, वक़्त, यहाँ तक कि वो गोलियाँ जो चंद क़दम दूर चल रही थीं। और फिर, बहुत मुश्किल से, फ़ौजी ने आशिक़ को पीछे खींच लिया, अपने ही सीने से।

"नहीं। अभी नहीं। ... पहले तुम्हें ज़िंदा उस कंसोल तक पहुँचाना है, और आकाश की आवाज़ को पूरे देश तक। ... उसके बाद, अगर हम दोनों ज़िंदा बचे, ... तो मैं तुम्हें वो जवाब दूँगी जो नौ साल से मेरे सीने में बंद है। ... अभी, मेरे पीछे रहो।"

"ठीक है। ... पर याद रखना, तुमने वादा किया। ज़िंदा बचने का, और जवाब देने का। ... आज मैं जीना चाहता हूँ, सुहाना। नौ साल में पहली बार, मैं सच में जीना चाहता हूँ।"

और वो दोनों उस आख़िरी गलियारे में उतरे, दीवार से दीवार, कोने से कोने। सुहाना आगे, रिकॉर्डिंग एक हाथ में, दूसरा हाथ हर ख़तरे पर तना हुआ। दो आदमी रास्ते में आए, और दो फ़र्श पर गए। और आख़िरकार, नियंत्रण-कक्ष का दरवाज़ा सामने था।

वो अंदर घुसे। नैरा कंसोल पर थी, उँगलियाँ काँपती हुईं पर तैयार। सुहाना ने वो नन्ही रिकॉर्डिंग उसके हाथ में थमाई, और नैरा ने उसे कंसोल में जोड़ दिया। स्क्रीन पर एक फ़ाइल उभरी, आकाश की आवाज़, नौ साल पुरानी, चलने के लिए तैयार।

"चलाओ इसे, नैरा। उसी लाइव फ़ीड पर, जिस पर बत्रा का झूठ चला। ... पूरे देश तक। अभी।"

पर जैसे ही नैरा की उँगली उस बटन की तरफ़ बढ़ी, कमरे के दूसरे दरवाज़े से एक ठंडी आवाज़ गूँजी, और सब जम गए। योहान बत्रा वहाँ खड़ा था, अपने सुरक्षा-प्रमुख के साथ, और उसकी बंदूक की नाल सीधे आर्यन की कनपटी पर।

"उँगली रोक लो, बेटी। ... एक इंच और, और तुम्हारे इस सितारे का दिमाग़ इस कंसोल पर बिखर जाएगा। ... मैं जानता था तुम कुछ ले कर आओगे। मैं हमेशा एक क़दम आगे होता हूँ। ... वो रिकॉर्डिंग निकालो, अभी, वरना ये अपनी असली मौत यहीं मरेगा, बिना कैमरे के, बिना किसी गवाह के।"

और वहाँ, उस छोटे से कमरे में, पूरी जंग एक बिंदु पर आ कर रुक गई। एक तरफ़ आर्यन की कनपटी पर बत्रा की बंदूक। दूसरी तरफ़ कंसोल पर नैरा की काँपती उँगली, एक बटन से एक इंच दूर। और बीच में सुहाना, जिसकी अपनी बंदूक बत्रा के प्रमुख पर तनी थी।

"तुमने आर्यन को पकड़ा है, बत्रा। ... पर मेरी बंदूक तुम्हारे आदमी पर है, और मेरा निशाना कभी नहीं चूकता। ... तुम एक गोली चलाओगे, मैं दो चलाऊँगी। ... ये तुम्हारी जीत नहीं है। ये बराबरी है। और बराबरी में वो जीतता है जिसके पास खोने को कम हो।"

"बराबरी? ... कैप्टन, मेरे पास खोने को एक पूरा साम्राज्य है, और तुम्हारे पास खोने को बस ये एक आदमी। ... मुझे लगता है मेरा पलड़ा भारी है। ... वो बटन मत दबने देना, वरना मैं क़सम खाता हूँ, आर्यन की मौत आकाश की मौत से भी दर्दनाक होगी।"

पर आर्यन, कनपटी पर बंदूक लगे हुए भी, मुस्कुराया। नौ साल के डर के बाद, वो पहली बार नहीं डरा। उसने सीधे नैरा की आँखों में देखा, अपने मरे हुए दोस्त की बहन की आँखों में।

"दबा दो वो बटन, नैरा। ... मेरी परवाह मत करो। ... तुम्हारे भाई की आवाज़ नौ साल से एक क़ब्र में दबी है। आज उसे बाहर आने दो। ... अगर उसकी आवाज़ के बदले मेरी जान जाती है, तो ये सबसे सस्ता सौदा है जो मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में किया।"

"तू मरने से नहीं डरता? ... नौ साल तूने मेरे एक इशारे पर सिर झुकाया, मेरे पैर छुए, मेरी हर धमकी पर काँपा। ... और आज, इस एक औरत की वजह से, तू मौत के सामने मुस्कुरा रहा है? ... ये लड़की तुझे मार डालेगी, आर्यन। बिल्कुल वैसे ही जैसे आकाश अपनी ज़िद में मरा।"

"नहीं, बत्रा। तुम ग़लत हो। ... ये लड़की, और वो लड़की, हम दोनों इसे बचाने आए हैं, तुमसे। ... आकाश ज़िद में नहीं मरा। वो सच के लिए मरा। और आज उसका सच तुम्हें ले डूबेगा, चाहे तुम कितनी भी आग लगा लो।"

और बत्रा की आँखों में पहली बार सच्चा डर उतरा। ये आदमी अब उसकी ज़ंजीर से आज़ाद था, और आज़ाद आदमी से बड़ा कोई ख़तरा नहीं होता। उसने अपने प्रमुख को इशारा किया, और उस आदमी ने अपनी जेब से एक लाइटर निकाला, और उसकी लौ कंसोल के तारों के पास ले गया।

"तो फिर इसे भी जला देते हैं। ... जैसे मैंने अपनी तिजोरी जलाई थी, जैसे मैंने आकाश को मिटाया था। ... आग मेरी सबसे पुरानी दोस्त है, कैप्टन। ... एक चिंगारी, और ये रिकॉर्डिंग, ये कंसोल, और ये तीनों, सब राख। एक और मामूली 'हादसा'।"

सुहाना का दिमाग़ बिजली की तरह हिसाब लगा रहा था। लौ कंसोल के पास, बत्रा की बंदूक आर्यन पर, उसकी अपनी बंदूक प्रमुख पर, और नैरा की उँगली उस बटन पर। चार ज़िंदगियाँ, एक पल, और हर रास्ते के आख़िर में एक मौत।

"आर्यन। ... याद है मैंने कहा था, मैं तुम्हें गिरने नहीं दूँगी? ... जो भी हो, ज़मीन पर रहना, नीचे झुके रहना। ... मैं नौ साल पहले तुम्हें बचा नहीं पाई थी। आज बचाऊँगी। ... मुझ पर भरोसा रखो।"

"मुझे तुम पर हमेशा भरोसा था, सुहाना। ... नौ साल पहले भी। ... बस अपने आप पर नहीं था।"

और उस पल, नैरा ने अपने भाई की तस्वीर याद की, वो सूखा गुलाब, वो चुराया हुआ नाटक, वो नौ साल की ख़ामोशी। और उसकी काँपती उँगली अचानक स्थिर हो गई। बत्रा ने वो स्थिरता देखी, और उसकी बंदूक का घोड़ा दबने लगा।

और उसी पल सुहाना ने छलांग लगाई, अपनी बंदूक छोड़ कर, सीधे उस लौ और आर्यन के बीच। पर जैसे ही वो हवा में उठी, बत्रा की बंदूक की नाल एक इंच घूमी, अब आर्यन से हट कर, सीधे सुहाना पर। और आर्यन ने वो घूमती नाल देख ली।

बाक़ी सब एक ही पल में हुआ। नैरा की उँगली बटन पर गिरी, और आकाश की आवाज़ नौ साल बाद उस लाइव फ़ीड पर, करोड़ों स्क्रीन पर फूट पड़ी। लौ कंसोल के तारों से टकराई। और एक अकेली गोली, उस बंद कमरे में, गरज कर चली, ठीक उसी लम्हे जब सच पूरे देश के सामने ज़िंदा हुआ।

गोली की गरज और आकाश की आवाज़, दोनों एक साथ, उस कमरे में और उन करोड़ों स्क्रीन पर गूँजे। धुआँ उठा, चिंगारियाँ बिखरीं, और एक जिस्म फ़र्श पर गिरा। पर उस धुएँ और उस गूँजती आवाज़ के पार, किसी को नहीं दिखा कि वो कौन था। सच अभी-अभी लाइव हुआ था। और एक गोली अभी-अभी किसी के सीने में उतर चुकी थी।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।

साया बनके