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Chapter 19 of 26 13 min read

अधूरा इंसाफ़

साया बनके by Avni Oberoi

जग्गी की गाड़ी मुंबई की रात को चीरती हुई भाग रही थी। पीछे, बत्रा का ऑडिटोरियम अब भी लाल आसमान में जल रहा था, और उसकी राख इन तीनों की त्वचा पर, बालों में, साँसों में बसी थी। सुहाना की मुट्ठी में वो प्लास्टिक में लिपटा पैकेट था, नैरा के नौ साल का निचोड़, और वो उसे यूँ थामे थी जैसे वो किसी की धड़कती जान हो।

"जग्गी बंगले नहीं जाएगा, नैरा। बत्रा की पहली नज़र वहीं जाएगी। समंदर के उस पार एक बंद फ़्लैट है, एजेंसी का, जिसका रिकॉर्ड कहीं नहीं है। आज की रात हम वहीं रुकेंगे। न फ़ोन, न रोशनी, न कोई आवाज़। ... जब तक मैं ये न समझ लूँ कि ये सबूत असली है, हम तीनों एक कमरे में, एक-दूसरे की नज़र में रहेंगे।"

वो सुनसान फ़्लैट धूल और अँधेरे से भरा था। जग्गी बाहर पहरे पर रुक गया। और जब दरवाज़ा बंद हुआ, जब भागने की रफ़्तार थमी और एड्रेनालाईन उतरा, तो उस छोटे से कमरे में एक और चीज़ भर गई। ख़ामोशी। और उस ख़ामोशी में, नौ साल का सारा दबा हुआ हिसाब, धीरे-धीरे, सतह पर आने लगा।

"नौ साल, आर्यन। ... नौ साल मैंने ये चेहरा एक मुखौटे के पीछे छुपा कर रखा, इस पल के लिए। जब तुम मेरे सामने खड़े होगे, बिना भीड़ के, बिना कैमरे के, बिना उस झूठी मुस्कान के। ... मेरा भाई तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त था। उसने तुम्हें अपना घर दिया, अपना खाना, अपनी 'साया'। और तुमने उसका नाम अपने पोस्टर के नीचे दफ़ना दिया।"

"हाँ, नैरा। ... मैंने दफ़नाया।"

"मैं तेरह साल की थी जब वो मरा। तेरह की! और सब ने कहा वो पागल था, नाकाम था, इसीलिए मर गया। मेरे स्कूल में लोग मुझे 'उस पागल की बहन' कहते थे। मेरी माँ उस बदनामी में घुल-घुल कर मर गई। ... और तुम? तुम उसी साल देश के सबसे बड़े सितारे बन गए, उसी 'साया' पर, जिसका नाम बदल कर तुमने 'परछाईं' रख दिया।"

और सुहाना एक कोने में खड़ी, दोनों के बीच बँटी हुई थी। एक तरफ़ आकाश की बहन, जिसका हर आँसू सच्चा था। दूसरी तरफ़ आर्यन, वो आदमी जिससे वो नौ साल पहले प्यार करती थी और जिसे वो अब भी, अपनी हर कोशिश के बावजूद, अपने भीतर से निकाल नहीं पाई थी। उसका अपना ग़म भी उसी आग में जल रहा था।

"तुम जो कह रही हो, नैरा, वो सब सच है। और मेरे पास उसका कोई जवाब नहीं है। कोई बहाना नहीं। ... मैं डर गया था, और मैंने डर को अपनी ज़िंदगी बना लिया। मैंने तुम्हारे भाई की मौत पर अपनी शोहरत की इमारत खड़ी की। हर तालियों की गूँज में, मैं जानता था कि नीचे किसकी क़ब्र है।"

"जानते थे? ... जानना काफ़ी नहीं है, आर्यन! जानना तो एक बुज़दिल भी लेता है! मेरे भाई ने अपनी जान इसलिए दी क्योंकि उसने मिटने से इनकार कर दिया था। और तुमने? तुमने मिटने को हाँ कह दी। अपने-आप को मिटा कर एक चमकता हुआ पुतला बन गए, बत्रा की उँगली पर नाचने वाला।"

और सुहाना से रहा नहीं गया। नौ साल की उसकी अपनी चुप्पी, अपना ग़म, अपना अधूरा सवाल, सब एक साथ उबल पड़ा। वो भी उसी मेज़ पर बैठी थी जब आकाश ने आख़िरी बार हँस कर 'साया' के आख़िरी सीन पढ़े थे। उसने भी उस मौत में एक भाई खोया था, और एक प्रेमी भी।

"नैरा, रुको। ... मैं भी वहाँ थी। आकाश मेरा भी दोस्त था। और ये आदमी, ये मेरा भी था। एक ही रात में मैंने दोनों खो दिए, एक क़ब्र में और एक इस झूठी दुनिया में। ... तो अगर किसी को इससे हिसाब माँगने का हक़ है, तो वो सिर्फ़ तुम नहीं हो। मैं भी हूँ।"

"तो फिर तुमने उसे चूमा क्यों, दीदी? ... हाँ, मैं जानती हूँ। उस रात, प्रीमियर से पहले, तुम दोनों... मैंने देखा था। ... तुम मेरे भाई से प्यार करती थीं, और तुम इस आदमी के होंठों पर वापस चली गईं, जिसने उसे बेचा। ये इंसाफ़ है, दीदी? ये आकाश की याद के साथ क्या है?"

और वो बात, जो सुहाना नौ रातों से अपने भीतर छुपा कर घुट रही थी, अब भरी हवा में तैर रही थी। उसका चुम्बन। उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी, उसका सबसे गहरा अपराधबोध। उसने आँखें झुका लीं। उसके पास इसका भी कोई जवाब नहीं था। तीनों वहाँ खड़े थे, एक-दूसरे के ज़ख़्मों को नोचते हुए, और हर वार सच्चा था।

"उसे छोड़ो, नैरा। ... सुहाना का उस चुम्बन में कोई गुनाह नहीं है। गुनाह मेरा है। नौ साल पहले भी, और उस रात भी। अगर किसी ने आकाश की याद के साथ ग़द्दारी की है, तो वो मैं हूँ, सुहाना नहीं। ... तुम मुझ पर वार करो, नैरा। जितना चाहो। पर उस पर नहीं।"

और उस एक वाक्य में कुछ बदल गया। नैरा का ऊँचा हाथ हवा में रुक गया। नौ साल से वो जिस आदमी से नफ़रत करती आई थी, उसने पहली बार वार अपने ऊपर लिया था, किसी और को बचाने के लिए। उसकी आँखों का ग़ुस्सा एक पल को डगमगाया, और उसके नीचे वो चीज़ दिखी जो हमेशा से वहाँ थी। एक तेरह साल की लड़की का टूटा हुआ दिल।

"मुझे मेरा भाई वापस चाहिए, आर्यन। ... बस मुझे मेरा भाई वापस चाहिए। तुम्हारी माफ़ी से वो वापस नहीं आएगा। तुम्हारी शर्मिंदगी से वो वापस नहीं आएगा। ... मैंने अपनी पूरी जवानी एक क़ब्र के इर्द-गिर्द बिता दी, और अब मेरे पास बस ये राख बची है।"

"मैं तुमसे माफ़ी नहीं माँगूँगा, नैरा। ... क्योंकि जो मैंने किया, वो माफ़ी के लायक़ है ही नहीं। मैं बस इतना कहूँगा कि मैंने किया। मैंने तुम्हारा भाई खोने दिया। मैंने अपनी चुप्पी बेची। ये मेरा गुनाह है, और मैं इसे अपने नाम के साथ ढोऊँगा, चाहे इसकी क़ीमत मेरी जान हो या मेरा सितारा। ... तुम मुझे सज़ा दो या न दो, मैं ख़ुद को कभी बरी नहीं करूँगा।"

और वहीं, उस धूल भरे अँधेरे कमरे में, सुहाना के भीतर अठारह क़िस्तों में जमी हुई बर्फ़ में पहली दरार पड़ी। उसने नौ साल एक बुज़दिल की तस्वीर को दिल में गाड़ा था। पर एक बुज़दिल सफ़ाई देता है। एक बुज़दिल गिड़गिड़ाता है। ये आदमी न सफ़ाई दे रहा था, न गिड़गिड़ा रहा था। ये अपने गुनाह को अपने कंधों पर उठाए, सीधा खड़ा था। और यही सबसे मुश्किल काम था।

"नैरा। ... देखो हम क्या कर रहे हैं। हम तीनों, एक कमरे में बंद, एक-दूसरे को नोच रहे हैं। तीनों को एक ही आदमी ने बर्बाद किया। तीनों को एक ही आग में जलाया गया। ... और आज रात, जब हम एक-दूसरे का गला पकड़े बैठे हैं, तो कहीं दूर एक आदमी अपनी गाड़ी में बैठा मुस्कुरा रहा होगा। क्योंकि यही तो वो चाहता है। यही उसका सबसे बड़ा हथियार है।"

"योहान बत्रा। ... वो हमें एक-दूसरे से लड़ता देखना चाहता है।"

"नौ साल से वो यही करता आया है, नैरा। उसने आर्यन को उसके अपने डर से बाँधा, तुम्हें तुम्हारे ग़ुस्से से, और मुझे मेरे ग़म से। हम तीनों अलग-अलग लड़ते रहे, और वो बेदाग़ बैठा रहा। ... अगर हम आज रात भी एक-दूसरे को नोचते रहे, तो कल सुबह वो जीत जाएगा, और आकाश हमेशा के लिए एक पागल का नाम रह जाएगा। ... पर अगर हम तीनों एक हो जाएँ..."

और पहली बार, उन तीन बिखरे हुए इंसानों ने एक-दूसरे को दुश्मन की तरह नहीं देखा। एक तरफ़ आर्यन के पास वो सच था जो सिर्फ़ वहाँ मौजूद कोई जान सकता था। दूसरी तरफ़ नैरा के पास नौ साल का जमा किया हुआ सबूत। और बीच में सुहाना, वो फ़ौजी दिमाग़ जो इन बिखरे टुकड़ों को एक हथियार में ढाल सकती थी।

"मैं तैयार हूँ, सुहाना। जो भी करना है। अगर इसके लिए मुझे भरी दुनिया के सामने खड़े हो कर ये कहना पड़े कि मैं एक चोर हूँ, एक बुज़दिल हूँ, तो मैं वो भी कहूँगा। मेरा सितारा, मेरा नाम, मेरी दौलत, सब आकाश के इंसाफ़ के आगे राख है। ... बस एक मौक़ा दो मुझे, नैरा। ग़लती सुधारने का नहीं, सुधारने की कोशिश करने का।"

"मैं तुम पर भरोसा नहीं करती, आर्यन। शायद कभी न करूँ। ... पर मैं बत्रा से तुम्हें ज़्यादा नफ़रत करती हूँ। और अगर उस शैतान को गिराने के लिए मुझे तुम्हारे साथ खड़ा होना पड़े, तो मैं खड़ी हो जाऊँगी। ... पर याद रखना। जिस दिन बत्रा गिरेगा, उस दिन तुम्हारा हिसाब मुझ पर बाक़ी रहेगा।"

"बस यही काफ़ी है, नैरा। भरोसा नहीं, मक़सद एक। ... आज रात से हम तीन अलग-अलग लड़ने वाले नहीं, एक हैं। और बत्रा को अब एक अकेले डरे हुए सितारे या एक अकेली बहन से नहीं, हम तीनों से लड़ना होगा।"

और वो कच्चा सा गठजोड़ बन गया। तीन टूटे हुए लोग, एक ही दुश्मन के ख़िलाफ़। नैरा अपनी झुलसी बाँह पर एक कपड़ा बाँधने कमरे के दूसरे कोने में चली गई, और पहली बार उस रात, कमरे में एक अजीब सी नरमी उतरी। सुहाना और आर्यन, थके हुए, काले पड़े हुए, एक ही खिड़की के पास आ खड़े हुए।

"तुमने मुझे उस आग में छोड़ा नहीं, सुहाना। ... तुम वापस अंदर गईं, उस लड़की के लिए, जो नौ साल से मुझे धमकियाँ दे रही थी। ... और नौ साल पहले, मैं तुम्हें एक चिट्ठी तक नहीं लिख पाया था। ... तुम कितनी बहादुर हो, और मैं कितना छोटा।"

"चुप रहो और हाथ इधर करो। ... ये जलन गहरी है। ... नौ साल मैंने ख़ुद को यक़ीन दिलाया कि तुम एक बुज़दिल थे, कि तुमने मुझे इसलिए छोड़ा क्योंकि मैं तुम्हारी नई दुनिया के लायक़ नहीं थी। ... और आज नैरा ने कहा कि उस रात तुम आकाश के लिए लड़े थे, कि तुम्हें पीटा गया था। ... मैं क्या मानूँ, आर्यन? नौ साल की मेरी नफ़रत झूठी थी?"

और वहाँ, उस अँधेरी खिड़की के पास, सुहाना की उँगलियाँ आर्यन के जले हुए हाथ पर थीं, बहुत नरमी से, किसी फ़ौजी की तरह नहीं, किसी पुरानी आदत की तरह। उनके बीच की दूरी फिर काग़ज़ भर की रह गई थी। आर्यन की साँस उसकी कनपटी को छू रही थी, और नौ साल की वो आग, जो उन्हें बार-बार दहलीज़ पर रोक देती थी, फिर सुलगने लगी।

"तुम्हारी नफ़रत झूठी नहीं थी, सुहाना। मैं सच में एक बुज़दिल था। पर मैंने तुम्हें इसलिए नहीं छोड़ा कि तुम मेरी दुनिया के लायक़ नहीं थीं। ... मैंने तुम्हें इसलिए छोड़ा क्योंकि तुम्हारी आँखें आईने की तरह थीं। और मैं उनमें अपना बिका हुआ चेहरा देखने से डरता था। ... तुम अकेली थीं जिनसे मैं झूठ नहीं बोल पाता। इसलिए मैं भाग गया।"

"नौ साल से मेरा काम लोगों को बचाना है, आर्यन। ... और आज मैंने पहली बार सोचा कि शायद सबसे मुश्किल इंसान को बचाना बाक़ी है। ख़ुद को। तुमसे। ... मैंने कभी किसी को इतने पास नहीं आने दिया, क्योंकि मेरी ड्यूटी है दूरी रखना। पर तुम... तुम मेरी ड्यूटी और मेरे ज़ख़्म, दोनों हो।"

और वो दहलीज़ फिर सामने थी। आर्यन ने अपना जला हुआ हाथ उठा कर सुहाना के गाल पर रखा, राख से लिपटी उसकी त्वचा पर, और सुहाना ने पीछे नहीं हटी। इस बार नहीं। उसकी आँखें बंद हो गईं। नौ साल की दीवार, आज की आग में झुलस कर, आख़िरकार भरभरा कर गिरने लगी। उनके होंठ एक पल की दूरी पर थे।

"सुहाना... अगर आज रात हम में से कोई न बचे... तो मैं चाहता हूँ कि तुम्हें एक बार, बिना किसी झूठ के, ये पता हो... कि नौ साल मैंने रोशनी में जी कर भी अँधेरा जिया, क्योंकि उस अँधेरे में तुम नहीं थीं।"

और उनके होंठ मिले, इस बार डर से नहीं, दबाव से नहीं, बल्कि एक ऐसे सच से जो नौ साल से दफ़न था। धीमा, गहरा, राख और नमक का स्वाद लिए। दुनिया, बत्रा, आग, सब एक पल को घुल गए। बस दो लोग बचे, जो एक-दूसरे को नौ साल पहले खो चुके थे, और आज इस अँधेरी दहलीज़ पर फिर से पा रहे थे। और फिर, बहुत धीरे, सुहाना पीछे हटी, पर इस बार बर्फ़ बन कर नहीं। इस बार, एक इंसान बन कर।

"ये अभी नहीं, आर्यन। ... जब तक बत्रा ज़िंदा है, जब तक आकाश का नाम दागी है, तब तक मैं पूरी तरह तुम्हारी नहीं हो सकती। मेरा एक हाथ हमेशा हथियार पर रहेगा। ... पर आज पहली बार, मैं ये कह सकती हूँ कि जिस दिन ये सब ख़त्म होगा... उस दिन शायद मैं रुक जाऊँ। सिर्फ़ सुहाना बन कर।"

और तभी नैरा दूसरे कोने से लौटी। उसने उन दोनों को खिड़की के पास देखा, इतने पास, और एक पल को उसके चेहरे पर एक अजीब सा भाव आया, आधा दर्द, आधा वो पुरानी लड़की जो कभी सुहाना को अपनी भाभी मानती थी। फिर उसने वो भाव निगल लिया। उसके हाथ में उसका फ़ोन था, वही जो सुहाना ने बंद करवाया था, और उसकी स्क्रीन की रोशनी में उसका चेहरा अचानक पीला पड़ गया।

"मैंने... मैंने सिर्फ़ एक पल के लिए फ़ोन चालू किया, ये देखने के लिए कि क्या मेरे पुराने सूत्र ने कुछ भेजा है। ... कैप्टन। हमें अभी यहाँ से निकलना होगा।"

"मैंने कहा था फ़ोन नहीं, नैरा! ... क्या हुआ? क्या देखा तुमने? साफ़-साफ़ बताओ।"

नैरा ने फ़ोन की स्क्रीन घुमाई। उस पर बत्रा के अंदरूनी हलक़े का एक संदेश था, वही सूत्र जिसे नैरा ने नौ साल में बड़ी मेहनत से बनाया था। और उस संदेश को पढ़ते ही, उस छोटे से कमरे की हवा जम गई।

"बत्रा को पता है, दीदी। ... उसे पता चल गया है कि हम तीनों आग से ज़िंदा निकल आए। सितारा, बहन, और बॉडीगार्ड, तीनों साबुत। ... और उसने अभी-अभी एक फ़ोन किया है। सिर्फ़ एक। ... मैं उस आदमी को नौ साल से जानती हूँ। जब बत्रा एक फ़ोन करता है, तो उसका मतलब होता है कि सुबह होने से पहले... ये सबूत, और हम तीनों, इस दुनिया में नहीं रहेंगे।"

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