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Chapter 8 of 26 12 min read

मुश्किल फ़ैसला

साया बनके by Avni Oberoi

अगली सुबह की रौशनी बंगले में किसी सवाल की तरह उतरी। सुहाना बेदी अपने कमरे में खड़ी थी, और उसके सामने बिस्तर पर उसका खुला हुआ बैग था, आधा भरा हुआ।

नौ साल उसने एक दीवार बनाई थी, इस उम्मीद पर कि उसके पीछे का ग़म कभी बाहर नहीं आएगा। ये नौकरी साफ़-सुथरी होनी थी, एक हीरो, एक धमकी, एक घेरा। पर अब ये नौकरी ख़ुद उसका ज़ख़्म बन चुकी थी। जिसे उसे बचाना था, वही उसकी बर्बादी की जड़ था।

उसने लैपटॉप खोला और एजेंसी का वो फ़ॉर्म भरने लगी जो उसने अपने पूरे करियर में कभी नहीं भरा था। कारण, हितों का टकराव। दरख़्वास्त, फ़ौरन तबादला। उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर रुकीं, फिर चलीं, फिर रुक गईं।

और तभी दरवाज़े पर आहट हुई। आर्यन खड़ा था, और उसकी नज़र सीधे उस आधे भरे बैग पर टिकी थी। उसने कोई मुखौटा नहीं पहना था। इस सुबह उसके चेहरे पर सिर्फ़ एक आदमी था।

"तुम जा रही हो।"

"मैं एजेंसी से अपनी जगह किसी और को भेजने की दरख़्वास्त कर रही हूँ। कल तक कोई और ऑफ़िसर आ जाएगा। मुझसे बेहतर। जो इस केस में उलझा हुआ न हो।"

"उलझा हुआ। ... तुमने ये नहीं कहा कि 'जो डरता न हो', या 'जो ज़्यादा क़ाबिल हो'। तुमने कहा 'जो उलझा हुआ न हो'। यानी तुम ख़ुद मान रही हो कि तुम उलझी हुई हो। मुझ में।"

"मैं मान रही हूँ कि मैं उस आदमी की हिफ़ाज़त नहीं कर सकती, जिसने मेरे दोस्त का नाम मिटाया और मेरी ज़िंदगी की जड़ें काट दीं। ये पेशेवर तौर पर ग़लत है, आर्यन। और मैं अपने पेशे में कभी ग़लत नहीं होती। सिर्फ़ ज़िंदगी में होती हूँ।"

उसने बैग की ज़िप बंद की, एक साफ़, आख़िरी आवाज़ के साथ। और उसने इंतज़ार किया कि अब वो शुरू होगा, वो जाना-पहचाना क्लाइंट वाला डर। 'प्लीज़ मत जाओ, मैं दुगना दूँगा, मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।'

"ठीक है।"

बस इतना। 'ठीक है।' कोई गिड़गिड़ाहट नहीं, कोई सितारे की हड़बड़ाहट नहीं। और यही वो चीज़ थी जिसने सुहाना का हाथ दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते-बढ़ते रोक दिया।

"बस? 'ठीक है'? तुम्हारी जान को ख़तरा है, आर्यन। कल रात एक औरत तुम्हारे गले पर चाकू रख कर गई थी। और तुम इतनी आसानी से अपने इकलौते हिफ़ाज़त वाले हाथ को जाने दे रहे हो?"

"और नौ साल से जो चाकू मेरे अपने सीने में गड़ा है, कैप्टन, उसका क्या? तुम मेरी जान बचाने आई थीं। पर सच बताऊँ, मेरी जान तो नौ साल पहले उसी एक रात चली गई थी। जो आज तुम्हारे सामने खड़ा है, वो सिर्फ़ एक चलता-फिरता मुखौटा है। तुम एक ऐसी चीज़ की पहरेदारी कर रही हो, जो पहले से मरी हुई है।"

उसकी आवाज़ में कोई अदाकारी नहीं थी, कोई कैमरा नहीं था। सिर्फ़ एक आदमी था, जो पहली बार अपने आप को ईमानदारी से देख रहा था। और सुहाना, जो जाने के लिए मुड़ी थी, दरवाज़े पर ठहर गई।

"तुम बार-बार पूछती रहीं, मैं क्यों भागा। कल मैंने आधा जवाब दिया। आज जाने से पहले पूरा सुन लो। फिर चली जाना, मैं नहीं रोकूँगा।"

उसने दीवार का सहारा लिया, जैसे लफ़्ज़ों का बोझ उसे खड़ा न रहने दे रहा हो। और नौ साल का सबसे गहरा सच, पहली बार, बिना किसी सफ़ाई के, बाहर आने लगा।

"उस रात बत्रा ने मेरे हाथ में एक काग़ज़ थमाया, और मेरे कान में एक बात कही। और मैंने वो बात मान ली। सुहाना, उसी एक पल में मैं वो आर्यन नहीं रहा, जिससे तुमने मोहब्बत की थी। मैं एक और आदमी बन गया। एक बुज़दिल। एक बिका हुआ आदमी। मैंने अपने आप को उस रात बेच दिया, और क़ीमत थी, एक दोस्त की ख़ामोशी।"

"और मैं जानता था, पूरी दुनिया को मैं धोखा दे सकता हूँ, पर तुम्हें नहीं। तुम मेरी आँखों में वो नया, गंदा आदमी एक झलक में देख लेतीं। और मैं ये बर्दाश्त नहीं कर सकता था। जिस औरत ने मुझ में सबसे अच्छा इंसान देखा, वो मुझ में सबसे घटिया इंसान देखे? नहीं। तो मैंने वो होने ही नहीं दिया। मैं भाग गया। तुम्हारी आँखों के उस आईने से, जिसमें मेरी असली शक्ल दिखती थी।"

कोई बहाना नहीं था इस बार। कोई मजबूरी को वजह बना कर पेश करना नहीं। बस एक नंगा, भद्दा सच, जो उसने नौ साल अपने भीतर सड़ने दिया था। और उस सच की ईमानदारी में एक अजीब सी गर्मी थी, एक ऐसी बेबसी, जो झूठ से कहीं ज़्यादा क़रीब खींचती है।

"तुम्हें पता है इसमें सबसे ज़ालिम बात क्या है, आर्यन? अगर तुम उस रात मेरे पास आते, टूटे हुए, बिके हुए, बुज़दिल, और बस इतना कह देते जितना अभी कहा... मैं तुम्हारा हाथ थाम लेती। मैं तुम्हारे साथ खड़ी होती, तुम्हारे ख़िलाफ़ नहीं। हम तीनों मिल कर उस बत्रा से लड़ते।"

"तुमने सिर्फ़ आकाश को नहीं खोया, आर्यन। तुमने मुझसे मेरे साथ लड़ने का हक़ छीन लिया। तुमने ये फ़ैसला अकेले कर लिया कि मैं कमज़ोर हूँ, कि मैं तुम्हारा सच सह नहीं पाऊँगी। और यही तुम्हारा सबसे बड़ा अपमान था। मेरे लिए।"

"मुझे पता है। हर एक रात, नौ साल से, मुझे यही पता चलता है। और यही मेरी असली सज़ा है, आकाश की मौत नहीं, तुम्हारी वो थमी हुई ज़िंदगी, जो मैंने अपने डर से रोक दी।"

अब वो बहुत क़रीब था। इतना क़रीब कि नौ साल का फ़ासला अचानक चंद साँसों में सिमट आया। कमरे की हवा भारी हो गई। सुहाना का दिल, जो एक कैप्टन के हुक्म में रहता था, अचानक बाग़ी हो उठा।

"मैं तुमसे माफ़ी नहीं माँग रहा, सुहाना। माफ़ी का मैं हक़दार नहीं। मैं बस चाहता हूँ कि जाने से पहले, एक बार, तुम मुझे उन्हीं आँखों से देखो जिनसे नौ साल पहले देखा था। बस एक बार।"

"मैं तुम्हें उन आँखों से नहीं देख सकती, आर्यन। क्योंकि उन आँखों वाली लड़की तुमने उसी रात दफ़ना दी थी, जिस रात तुम बिना कुछ कहे चले गए थे।"

उसका हाथ उठा, उसके चेहरे की तरफ़, और एक पल को दोनों उसी कगार पर खड़े थे जहाँ नौ साल की दीवार बस गिरने ही वाली थी। उसकी उँगलियाँ उसकी गाल से बस एक बाल की दूरी पर थीं।

"नहीं। ... तुमने आज भी सब नहीं कहा। आकाश की मौत का पूरा सच अब भी तुम्हारे अंदर बंद है। और जब तक वो एक ताला बंद है, तुम्हारे और मेरे बीच सिर्फ़ यही दीवार खड़ी रहेगी। मैं एक अधूरे सच पर अपना दिल नहीं गिरा सकती। दोबारा नहीं।"

और वो मुड़ी और बालकनी की तरफ़ चली गई, जहाँ समंदर की नमकीन हवा उसके जलते हुए चेहरे से टकराई। भीतर एक कैप्टन और एक औरत में जंग छिड़ी थी, और उस जंग का मैदान उसका अपना सीना था।

उसने समंदर को देखा और हिसाब लगाया, ठंडे दिमाग़ से, जैसे किसी मोर्चे का नक़्शा पढ़ रही हो। अगर वो चली गई, तो एक अजनबी ऑफ़िसर आर्यन की पहरेदारी करेगा। और आकाश का सच? वो इसी दरवाज़े से, उसके अपने बैग के साथ, हमेशा के लिए बाहर चला जाएगा।

और तभी उसके भीतर एक नई, साफ़ बात जगी। वो इस घर में एक हीरो को बचाने आई थी। पर अब उसका मोर्चा बदल चुका था। आकाश का सच सिर्फ़ एक जगह ज़िंदा था, इसी घर में, इसी आदमी के बग़ल में, जहाँ क़ातिल भी चक्कर काट रहा था। सच और क़ातिल, दोनों यहीं थे।

वो भीतर लौटी। आर्यन अब भी वहीं खड़ा था, हारा हुआ, जाने के लिए तैयार। सुहाना ने लैपटॉप उठाया, और उस तबादले की दरख़्वास्त को, एक बटन दबा कर, मिटा दिया।

"तुम... तुम रुक रही हो? क्यों? अभी तो तुमने कहा कि तुम मेरी हिफ़ाज़त नहीं कर सकती।"

"मैं तुम्हारी हिफ़ाज़त के लिए नहीं रुक रही, आर्यन। ग़लतफ़हमी में मत रहना। मैं इसलिए रुक रही हूँ कि आकाश का सच इसी घर की किसी दीवार में दफ़न है, और उसे खोदने की सबसे अच्छी जगह तुम्हारे बग़ल में खड़े रहना है।"

"मैं तुम्हारी बॉडीगार्ड बन कर नहीं रुक रही। मैं आकाश की वो आवाज़ बन कर रुक रही हूँ, जो नौ साल पहले दबा दी गई थी। तुम्हें ज़िंदा रखना अब सिर्फ़ मेरा फ़र्ज़ है, आर्यन। मेरी चाहत नहीं। ये फ़र्क़ याद रखना।"

कोई मोहब्बत नहीं, कोई तरस नहीं। सिर्फ़ इंसाफ़ की एक ठंडी, चमकती धार। और अजीब बात ये थी कि आर्यन को इस ठंडी सच्चाई में उस झूठी नरमी से कहीं ज़्यादा सुकून मिला, जो लोग उसे रोज़ परोसते थे।

"और मैं? इस नई लड़ाई में मैं क्या हूँ, कैप्टन?"

"तुम मेरा सबसे बड़ा सुराग़ हो। और मेरा सबसे बड़ा गुनहगार भी। दोनों एक साथ, एक ही जिस्म में। मैं तुम्हें बचाऊँगी, ताकि तुम एक दिन गवाह बन सको। तुम्हारी जान की मुझे इसलिए ज़रूरत है, आर्यन, ताकि तुम्हारी ज़ुबान ज़िंदा रहे।"

"नौ साल पहले तुम मुझसे कहती थीं, आर्यन, तू स्टेज पर हीरो है, पर असल ज़िंदगी में सबसे बड़ा डरपोक है। ... तुम हमेशा सही होती थीं, सुहाना। बस मैंने बहुत देर से माना।"

और एक पल को, बहुत महीन सा, सुहाना के होंठ के कोने में वो पुरानी हँसी काँपी, वो जो थिएटर की उन भीगी रातों की थी, टूटे पंखे और उधार के कपड़ों वाली। फिर उसने उसे फ़ौरन दबा दिया, जैसे दुश्मन के इलाक़े में गिरा हुआ कोई हथियार उठा कर छिपा लिया हो। ये वक़्त यादों का नहीं था।

और जिस वक़्त सुहाना अपनी लड़ाई का नया नक़्शा खींच रही थी, इस घर के दूसरे कोने में एक और औरत अपनी लड़ाई का नक़्शा दोबारा बना रही थी। बस सुहाना को अभी ये पता नहीं था।

अजीब बात थी। पिछले तीन दिन घर में एक झूठा सुकून तैर रहा था। कमला बाई फिर से रसोई में गुनगुनाने लगी थी, जग्गी फिर उसकी चाय पर बैठ कर पुराने क़िस्से सुनाने लगा था, और सब कुछ इतना सामान्य लग रहा था कि सुहाना का शक और गहरा हो गया। उसे फ़ौज ने यही सिखाया था, जब सब कुछ सबसे ठीक लगे, तभी कोई चीज़ सबसे ग़लत होती है।

और फिर वो हुआ, जिसने सुहाना की रीढ़ में सबसे गहरी ठंडक भर दी। कुछ नहीं हुआ। तीन दिन गुज़र गए। न शीशे पर कोई लाइन, न जेब में कोई पुर्ज़ा, न कोई सूखा गुलाब, न कोई आधी रात की आहट। पूरी तरह ख़ामोशी।

"तीन दिन से कुछ नहीं, आर्यन। कोई धमकी नहीं, कोई पैग़ाम नहीं। और यही मुझे सबसे ज़्यादा डरा रहा है। जो शिकारी अचानक शोर करना बंद कर दे, समझ लो वो अब बात करने के मूड में नहीं। वो अब सिर्फ़ वार की तैयारी कर रहा है।"

"शायद वो डर गई हो? तुमने उसे उस रात लगभग पकड़ ही लिया था। नक़ाब खींच लिया था।"

"नहीं। जो औरत नौ साल तक एक-एक मनका पिरो कर एक माला बुन सकती है, वो एक रात की नाकामी से नहीं डरती। वो सिर्फ़ अपना खेल बदल रही है। शोर से ख़ामोशी की तरफ़। और ख़ामोश दुश्मन सबसे ख़तरनाक होता है, क्योंकि उसकी अगली चाल का कोई शोर नहीं होता।"

"तो अब क्या करें हम? बस इंतज़ार करें, कि वो कब, कहाँ, कैसे वार करेगी?"

"नहीं। इंतज़ार शिकार करते हैं, शिकारी नहीं। अब तक मैं उसके पैग़ामों का पीछा कर रही थी। अब मैं उस इंसान का पीछा करूँगी। जो भी वो है, उसकी एक जड़ है, एक अतीत है, एक ज़ख़्म है। और उसका वो ज़ख़्म एक ही जगह जा कर मिलता है। आकाश पर। मैं वहीं से उसे खोदना शुरू करूँगी।"

उस रात, सब सो जाने के बाद, सुहाना ने आकाश की बहन की वो आख़िरी तस्वीर अपने हाथ में ली, जो उसने बक्से से चुपचाप रख ली थी। शाम की आधी रौशनी में, उस लड़की की आधी छिपी हुई आँखें उसे घूर रही थीं।

एक औरत, आकाश से जुड़ी हुई। जो नक़ाब पहन कर वार करती है। और एक बहन, जो नौ साल पहले हर काग़ज़ से मिटा दी गई। सुहाना के फ़ौजी दिमाग़ ने दोनों धागों को एक-दूसरे के क़रीब रखा। पर उन्हें पूरी तरह जोड़ पाती, उससे पहले ही उसकी थकी हुई आँखें उस आधे छिपे चेहरे पर अटक गईं, और आगे नहीं बढ़ पाईं।

"मैं तुझे ढूँढ निकालूँगी। तू ही इस पूरी पहेली की चाबी है, आकाश की बहन। तेरे भाई के साथ जो हुआ, तूने उसे देखा है, मुझे यक़ीन है। और मैं तुझ तक पहुँचूँगी, उससे पहले कि तू, या तेरे नाम पर कोई और, इस खेल को ख़त्म कर दे।"

उसने वो तस्वीर सिरहाने रख दी और आँखें मूँद लीं, इस यक़ीन के साथ कि वो एक खोई हुई बहन की तलाश में निकली है, किसी दूर, अनजान शहर में छिपी एक अजनबी की।

उसे नहीं पता था कि जिसे ढूँढने की उसने अभी क़सम खाई है, वो कहीं दूर नहीं है। वो उसी गलियारे के उस पार, उसी छत के नीचे, एक नरम तकिये पर सिर रखे सो रही है, और कल सुबह फिर, हमेशा की तरह, बिना चीनी वाली कड़क कॉफ़ी ले कर, मुस्कुराती हुई, इसी दरवाज़े पर दस्तक देगी।

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