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Chapter 15 of 26 13 min read

मेहमान या क़ातिल

साया बनके by Avni Oberoi

प्रीमियर में सिर्फ़ तीन दिन बचे थे। सुहाना का जाल, बहुत ख़ामोशी से, बिछ रहा था। नैरा हर इंतज़ाम मुकम्मल कर रही थी, हर पास, हर सीट, हर मिनट, और सुहाना उसे देखती और सोचती कि इस घर में कम से कम एक चीज़ तो भरोसे के लायक़ है। और ठीक उसी सुबह, बंगले के बड़े लोहे के फाटक के बाहर, काली गाड़ियों का एक पूरा क़ाफ़िला आ कर रुका।

एक के बाद एक, आठ काली गाड़ियाँ। और बीच वाली से जो आदमी उतरा, उसे देख कर पूरे बंगले की हवा बदल गई। सत्तावन-अट्ठावन साल का, चाँदी जैसे बाल, बेदाग़ सफ़ेद बंद-गला, और एक ऐसी चाल, जिसमें बादशाहों वाली सुस्ती थी। ऐसे लोग चलते नहीं, ज़मीन उनके पैरों के नीचे बिछती जाती है।

सुहाना ने देखा कि उस आदमी के अंदर आते ही, पूरा घर एक क़दम पीछे हट गया। नौकर दीवारों से चिपक गए, माली अपने औज़ार छोड़ कर सीधे खड़े हो गए, और यहाँ तक कि नैरा भी, हमेशा शांत रहने वाली नैरा भी, एक पल को ठिठकी, और उसकी नज़र फ़र्श पर झुक गई। ये डर किसी धमकी का नहीं था। ये उस डर की तरह था जो आदमी को भगवान या शैतान के सामने आता है।

और आर्यन। देश का सबसे बड़ा सुपरस्टार, वो आदमी जिसके एक इशारे पर करोड़ों लोग झूमते थे, उस आदमी को देख कर एक पल में एक डरे हुए बच्चे में बदल गया। उसके कंधे झुक गए, उसकी मुस्कान काँपने लगी, और सुहाना ने पहली बार अपने क्लाइंट को इतना छोटा, इतना बेबस देखा।

"योहान अंकल! आप... आपने बताया भी नहीं कि आ रहे हैं। मैं ख़ुद एयरपोर्ट आ जाता। आइए, अंदर आइए। ये मेरे लिए कितनी बड़ी बात है कि आप ख़ुद..."

"मेरे शेर। ... रुक, रुक। इतना घबरा क्यों रहा है? मैं कोई मेहमान थोड़ी हूँ जिसके लिए तुझे इंतज़ाम करना पड़े। मैंने तुझे बनाया है, आर्यन। बाप एयरपोर्ट पर नहीं बुलाया जाता, बाप ख़ुद चल कर आता है, जब उसे लगता है कि उसके बेटे के घर में कुछ ठीक नहीं चल रहा।"

"और मैंने सुना है, तेरे घर में कोई साया घुस आया है। कोई पागल, जो मेरे शेर को धमकियाँ दे रहा है। तो मैंने सोचा, ये छोटा-मोटा कूड़ा साफ़ करना किसी नौकर के बस का नहीं। ये काम बत्रा ख़ुद करेगा। मैं यहाँ इसीलिए आया हूँ, बेटा। इस मसले को हमेशा के लिए ख़त्म करने। अपने तरीक़े से।"

अपने तरीक़े से। सुहाना ने वो चार लफ़्ज़ ग़ौर से सुने। एक आम आदमी के मुँह में ये लफ़्ज़ हमदर्दी होते। पर इस आदमी के मुँह में, इनमें से बारूद की बू आ रही थी। इस आदमी का तरीक़ा वो था, जिसमें मसले हल नहीं होते, मसले ग़ायब हो जाते हैं।

"और ये... ये कौन है? अच्छा, ये होंगी वो मशहूर कैप्टन बेदी। मेरे शेर की नई पहरेदार। ऐजेंसी वालों ने बहुत तारीफ़ की थी तुम्हारी, बेटी। फ़ौज की, अनुशासन की मूरत। पर एक बात बताओ, इतनी नाज़ुक कलाई पर इतना बड़ा बोझ? एक अकेली लड़की, और मेरे शेर की जान?"

"जान बचाने के लिए कलाई की नहीं, नीयत की मज़बूती चाहिए होती है, सर। और मेरी नीयत में कोई कमज़ोरी नहीं। आर्यन सर की सुरक्षा मेरी ज़िम्मेदारी है, और मैं अपनी ज़िम्मेदारी किसी के साथ नहीं बाँटती। आपका आना अच्छा लगा। पर सुरक्षा के मामले में, अब तक की हर व्यवस्था मेरी है, और वैसी ही रहेगी।"

और उस एक पल में, सुहाना के भीतर सारे टुकड़े एक साथ जुड़ गए। योहान बत्रा। वही नाम जो उस मुहूर्त की तख़्ती पर था। वही नाम जिसके खाते में आर्यन का पैसा हर महीने, नौ साल से, बूँद-बूँद बह रहा था। ये वो आदमी था जिसने आकाश को मिटाया, आर्यन को ख़रीदा, और उसकी क़ब्र का किराया आर्यन की ही जेब से वसूला। वो आक़ा, जिसे वो ढूँढ रही थी, अभी उसके सामने, मुस्कुराता हुआ खड़ा था।

और उसी पल एक और सच सुहाना पर उतरा। ये आदमी वो साया नहीं है जो घर के अंदर से वार करता है। ये तो बाहर का शिकारी है, आक़ा। यानी अब इस घर में दो नहीं, तीन ताक़तें थीं, और तीनों एक ही रात, एक ही मंच पर टकराने वाली थीं। और तीनों के मक़सद अलग थे।

"वाह। नीयत की मज़बूती। बहुत ख़ूब कहा, कैप्टन। पर एक छोटी सी नसीहत, बेटी, एक बूढ़े की तरफ़ से। इस दुनिया में नीयत सबसे सस्ती चीज़ है। यहाँ जीतता वो है जिसके पास ताक़त हो। और तुम्हारे पास, अगर बुरा न मानो, बस एक पिस्तौल और एक ज़िद है। मेरे पास... मेरे पास बहुत कुछ है।"

"जानती हूँ, सर। आपके पास बहुत कुछ है। इतना कुछ, कि लोग हर महीने, बिना नागा, आपको उसका किराया चुकाते हैं। पर एक बात मैंने फ़ौज में सीखी है। जो चीज़ें ख़रीदी जाती हैं, वो एक दिन ख़रीदने वाले के ख़िलाफ़ भी बिक सकती हैं। किराया कब तक चुकाया जाएगा, ये किराएदार तय नहीं करता, सर। मकान मालिक तय करता है।"

और पहली बार, योहान बत्रा की उस मख़मली मुस्कान के नीचे कुछ हिला। बहुत महीन, बहुत हल्का, जिसे सिर्फ़ सुहाना जैसी नज़र पकड़ सकती थी। उसकी आँखें एक पल को सिकुड़ीं, और उन्होंने सुहाना को दोबारा नापा, इस बार एक पहरेदार की तरह नहीं, एक ख़तरे की तरह। ये लड़की कुछ जानती थी। और जो जानता है, वो या तो ख़रीदा जाता है, या ख़त्म किया जाता है।

"तुम बहुत होशियार हो, कैप्टन बेदी। इतनी होशियार, कि कभी-कभी होशियारी उम्र नहीं देखने देती। इस शहर में बहुत से होशियार लोग, बहुत जवानी में, बहुत ख़ामोश हो गए। मुझे उम्मीद है, तुम अपनी होशियारी को अपनी उम्र से ज़्यादा लंबा नहीं होने दोगी। ये सिर्फ़ एक बूढ़े की दुआ है, और कुछ नहीं।"

"दुआ का शुक्रिया, सर। पर मैं बद्दुआओं के बीच पली-बढ़ी हूँ। मुझे उनसे डर नहीं लगता। अब अगर इजाज़त हो, तो मुझे अपने काम पर लौटना है। प्रीमियर में तीन दिन हैं, और मेरे पास एक साये को पकड़ने के लिए बहुत कम वक़्त।"

"एक आख़िरी बात, कैप्टन। ये साया, ये पागल जो मेरे शेर के पीछे पड़ा है, इसे तुम मुझ पर छोड़ दो। इसे पकड़ने की कोशिश मत करो। पकड़ने में मुक़दमे होते हैं, बयान होते हैं, अख़बारों में तमाशा होता है। मेरे तरीक़े में इनमें से कुछ नहीं होता। बस एक रात, और फिर हमेशा के लिए ख़ामोशी। साफ़, ख़ामोश, और आसान।"

"मैं मुजरिमों को पकड़ती हूँ, सर, मिटाती नहीं। और जो इंसान इस साये के पीछे है, उसकी अपनी एक कहानी है, अपना एक ज़ख़्म है। मैं चाहती हूँ वो अदालत में बोले, किसी क़ब्र में नहीं। आपका तरीक़ा और मेरा तरीक़ा, ठीक यहीं, इसी मोड़ पर अलग हो जाते हैं।"

और योहान ने उसे एक लंबी, ठंडी नज़र से देखा, जैसे कोई शिकारी दूसरे शिकारी को नापता है। दोनों समझ चुके थे कि उस साये को ले कर उनका मक़सद बिल्कुल उलटा था। योहान उसे हमेशा के लिए मिटाना चाहता था, ताकि सच भी उसी के साथ दफ़न हो जाए। और सुहाना उसे ज़िंदा चाहती थी, बोलता हुआ, गवाही देता हुआ। एक ही शिकार, और उसके पीछे दो अलग शिकारी।

सुहाना वहाँ से हटी, पर उसका दिमाग़ आग की तरह जल रहा था। अब तस्वीर साफ़ थी। एक तरफ़ योहान, जो चाहता था कि नौ साल पुराना सच हमेशा के लिए क़ब्र में रहे, चाहे उसके लिए आर्यन को, साये को, या उसे, किसी को भी मिटाना पड़े। दूसरी तरफ़ वो साया, आकाश की बहन, जो चाहती थी कि आर्यन उसी सच को सरेआम क़ुबूल करे। और बीच में वो ख़ुद, जो दोनों चाहती थी, सच भी, और आर्यन की साँसें भी।

अंदर, स्टडी में, योहान ने आर्यन को अकेले में बिठाया, और उसकी आवाज़ की मख़मल एक पल में लोहे में बदल गई। सुहाना दरवाज़े के पास ही थी, और उसने हर लफ़्ज़ सुना।

"अब मेरी बात सुन, बेटा, ध्यान से। प्रीमियर की उस रात, तू मंच पर जाएगा, मुस्कुराएगा, और सिर्फ़ वही कहेगा जो मेरे लोग तेरे हाथ में पर्ची पर लिख कर देंगे। कोई इक़बाल नहीं, कोई पुराना क़िस्सा नहीं, कोई साया नहीं। और ये लड़की, ये कैप्टन बेदी, इसे उस रात से पहले चलता कर। मेरे अपने लोग तेरी हिफ़ाज़त करेंगे। बाहर वालों पर मुझे भरोसा नहीं।"

"अंकल, पर... सुहाना ने पूरी व्यवस्था कर रखी है। वो जानती है ये साया कैसे काम करता है, किस तरफ़ से आएगा। अगर मैं उसे अभी हटा दूँ, तो..."

"तो कुछ नहीं होगा, बेटा। नौ साल से तेरी हर साँस मैंने सँभाली है। जिस दिन तूने मेरी बात मानी, उस दिन तू सितारा बना। और जिस दिन किसी और की सुनी, उस दिन... ख़ैर, वो दिन आया ही नहीं, क्योंकि तू समझदार लड़का है। एक अनजान औरत के लिए अपने बाप की बात नहीं टालेगा। है ना?"

और वहाँ, उस स्टडी में, नौ साल का पूरा डर आर्यन के गले पर आ बैठा। ये वही पल था। वही चौराहा, जहाँ नौ साल पहले वो ग़लत तरफ़ मुड़ गया था। योहान की बात मानना आसान था, सुरक्षित था, आदत थी। और सुहाना का साथ देना, उस आदमी के सामने, ख़ुदकुशी जैसा था। सुहाना ने साँस रोक ली। ये फ़ैसला सिर्फ़ आर्यन का था।

"नहीं, अंकल। ... माफ़ कीजिए, पर नहीं। कैप्टन बेदी रहेंगी। उनकी व्यवस्था रहेगी। ये मेरी जान का सवाल है, और इस एक मामले में, मैं अपना फ़ैसला ख़ुद करूँगा। बाक़ी हर बात में मैं आपका बेटा हूँ, अंकल, पर अपनी पहरेदार, मैं ख़ुद चुनूँगा।"

और कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी छा गई, जैसे किसी ने पहली बार भगवान के सामने सिर उठा कर 'नहीं' कहा हो। सुहाना का दिल एक पल को धड़कना भूल गया। नौ साल में पहली बार, आर्यन साहनी ने योहान बत्रा के सामने अपनी रीढ़ सीधी की थी। एक छोटा सा 'नहीं'। पर उस छोटे से 'नहीं' की क़ीमत, दोनों जानते थे, बहुत बड़ी होगी।

"वाह। ... मेरे शेर के मुँह से 'नहीं'। नौ साल में पहली बार। ... ठीक है, बेटा। जैसी तेरी मर्ज़ी। रख अपनी पहरेदार। मैं बूढ़ा आदमी, भला तेरी ख़ुशी के आड़े क्यों आऊँ।" "बस इतना याद रखना, आर्यन। जो चीज़ें मैं देता हूँ, वो मेरी दी हुई होती हैं। और जो अपनी मर्ज़ी से लेता है, उसे उसकी क़ीमत भी अपनी मर्ज़ी से चुकानी पड़ती है।"

योहान उठा, आर्यन के गाल को बड़े प्यार से थपथपाया, और बाहर निकल गया, अपनी मख़मली मुस्कान वापस चेहरे पर सजाए। पर सुहाना ने उन दोनों को देखा, और वो समझ गई। ये मामला ख़त्म नहीं हुआ था। आर्यन ने अभी-अभी एक ऐसी दीवार को धक्का दिया था, जो पलट कर उसे कुचल सकती थी। और फिर भी, उसने ये किया था। उसके लिए।

"मैंने अभी क्या कर दिया, सुहाना? नौ साल से मैं उस आदमी की परछाईं से भी डरता था। और आज मैंने उसकी आँखों में देख कर 'नहीं' कह दिया। मेरे हाथ काँप रहे हैं। पर पता है... पता है, नौ साल में पहली बार, मुझे अपने आप से शर्म नहीं आ रही।"

"आज तुमने डर के बजाय एक इंसान को चुना, आर्यन। यही तो शुरुआत है। ... पर होशियार रहो। शेर को जब पहली बार कोई 'नहीं' कहता है, तो वो गुर्राता नहीं, वो चुप हो जाता है। और योहान बत्रा की ख़ामोशी, उसकी दहाड़ से ज़्यादा ख़तरनाक है।"

और सुहाना का वो अंदेशा, उसी शाम, सच होता दिखा। सूरज ढलते-ढलते, बंगले के फाटक के बाहर फिर हलचल हुई। इस बार गाड़ियाँ नहीं, एक पूरी फ़ौज। काले कपड़ों में, कानों में तार लगाए, चौड़े कंधों वाले दर्जनों आदमी, क़दम-दर-क़दम, पूरे बंगले में फैलने लगे। योहान की अपनी निजी सुरक्षा।

"कैप्टन बेदी, नाराज़ मत होना। तुम रहोगी, जैसा मेरे शेर ने चाहा। पर प्रीमियर इतना बड़ा है कि उसे एक अकेली लड़की नहीं सँभाल सकती, चाहे वो कितनी भी क़ाबिल हो। तो मेरे कुछ लोग, बस मदद के लिए, हर दरवाज़े पर, हर चौकी पर रहेंगे। सितारे की हिफ़ाज़त सबसे ज़रूरी है, है ना? आख़िर, हम सब यही तो चाहते हैं। कि मेरा शेर उस रात महफ़ूज़ रहे।"

और सुहाना की आँखों के सामने, एक-एक कर के, उसकी हर व्यवस्था योहान के आदमियों के हाथ में जाती चली गई। मुख्य दरवाज़ा, उनका। पीछे का रास्ता, उनका। मेहमानों की जाँच वाली चौकी, उनकी। स्टेज के पीछे का हर गलियारा, उनका। नैरा की बनाई हर योजना, अब योहान के आदमियों के हवाले।

"ये मेरी ड्यूटी है, मिस्टर बत्रा। हर दरवाज़ा, हर चौकी, मेरी निगरानी में होना चाहिए। आप मुझे मेरे ही घेरे से बाहर नहीं कर सकते। अगर उस रात कुछ हुआ, तो ज़िम्मेदारी मेरी है, और मैं अपनी ज़िम्मेदारी अंधे हाथों में नहीं छोड़ सकती।"

"बाहर कौन कर रहा है, बेटी? मैं तो सिर्फ़ मदद कर रहा हूँ। तुम एक हो, मेरे पास सौ हैं। तुम एक दरवाज़े पर खड़ी हो सकती हो, मैं हर दरवाज़े पर। अगर तुम्हें सच में मेरे शेर की जान प्यारी है, तो तुम शुक्रिया कहोगी, एतराज़ नहीं। या फिर... तुम्हें उसकी हिफ़ाज़त से ज़्यादा, अपनी अकड़ प्यारी है?"

और तभी, सुहाना को वो एहसास हुआ, जिसने उसकी रीढ़ को बर्फ़ कर दिया। योहान ने बहुत सफ़ाई से, बहुत नरमी से, उसे उसकी अपनी बिसात से बाहर कर दिया था। प्रीमियर की रात, जिस ज़मीन पर वो अपना जाल बिछाने वाली थी, अब वो ज़मीन उसकी नहीं थी। आर्यन के इर्द-गिर्द का हर दरवाज़ा अब उस आदमी के हाथ में था।

"नौ बजकर चालीस मिनट पर, वो साया आर्यन तक पहुँचने की कोशिश करेगी। और उस पल, आर्यन और उस साये के बीच, मैं नहीं, इस आदमी के लोग खड़े होंगे। वो आदमी, जो ख़ुद आर्यन को सबसे ज़्यादा ख़ामोश देखना चाहता है। जिसने आकाश को मिटाया, वो अब आर्यन के हर दरवाज़े का पहरेदार है।"

और सुहाना को अपने पैरों तले की ज़मीन खिसकती महसूस हुई। मेहमान बन कर आया योहान बत्रा अब उस घर का असली मालिक बन बैठा था, और उसकी फ़ौज हर दरवाज़े पर तैनात थी, 'सितारे की हिफ़ाज़त' के नाम पर। पर सुहाना जानती थी, इस पूरे मैदान में एक ही आदमी ऐसा था जो आर्यन की मौत से सबसे ज़्यादा राहत पाता। और अब, प्रीमियर की उस रात, आर्यन की ज़िंदगी और मौत के बीच खड़ी होने वाली, वही आदमी की फ़ौज थी। जाल शिकार के लिए बिछा था। पर उस जाल का दरवाज़ा, अब ख़ुद शिकारी के हाथ में था।

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