Chapter 4 of 26 11 min read
अनजाना मेहमान
आर्यन की फ़िल्म 'आग़ाज़' की शूटिंग सुहाना की सख़्त निगरानी में दोबारा शुरू होती है और पूरा सेट शक से भर जाता है, को-स्टार रिया की जलन, हड़बड़ाया डायरेक्टर, और फ़िल्म वक़्त पर ख़त्म करने का दबाव। तभी एक ढीली की गई भारी लाइट और एक छेड़ा गया स्टंट आर्यन को कुचलने ही वाला होता है कि सुहाना उसे खींच लेती है, नौ साल बाद उनका पहला असली स्पर्श, पहली चिंगारी जो दोनों नहीं चाहते। जाँच बताती है कि तोड़फोड़ अंदर के किसी हाथ की है, और दिन ढलते-ढलते बंद सेट पर एक ऐसा आदमी चला आता है जिसे सुहाना ने कभी क्लियर नहीं किया, और आर्यन का चेहरा ऐसे सफ़ेद पड़ जाता है जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो।
फ़िल्म सिटी का सबसे बड़ा स्टूडियो। तीन सौ लोग, बीस लाइटें, एक करोड़ का सेट। और आज पहली बार, इस पूरी अफ़रा-तफ़री के बीच खड़ी थी एक औरत, जिसका काम था इस सब को क़ाबू में रखना।
सुहाना के लिए ये सरहद से भी मुश्किल मोर्चा था। सरहद पर दुश्मन सामने होता है। यहाँ हर मुस्कुराता चेहरा एक मुमकिन दुश्मन था। "कैप्टन, ये फ़िल्म वाले पागल हैं जी। एक सीन के लिए तीन घंटे, और खाने के लिए पंद्रह मिनट। और वो देखो, कैटरिंग वाला वो नया लड़का, कल से आया है। किसी को उसका अता-पता नहीं।"
"हर नए चेहरे की लिस्ट बनाओ, जग्गी। और उन ऊपर वाली लाइटों के नीचे कोई खड़ा न हो जब तक मैं न कहूँ। पुराना स्टूडियो, पुरानी ज़ंजीरें। मुझे ये छत पसंद नहीं।"
"आपको तो कोई छत पसंद नहीं आती कैप्टन। खुला आसमान भी आप शक के दायरे में रखती हैं।"
सुहाना के होंठ एक पल को हिले, शायद मुस्कान थी, शायद नहीं। जग्गी की बकबक इस पूरे ज़हरीले माहौल में इकलौती ताज़ा हवा थी। "कैप्टन, प्लीज़! आप मेरे सेट पर बंदूक़ ले कर घूमेंगी तो एक्टर एक्ट कैसे करेंगे? मेरे पास सिर्फ़ आज का दिन है ये सीक्वेंस ख़त्म करने को। एक दिन का बीस लाख जाता है!"
"और एक गोली का एक रुपया जाता है, मिस्टर खन्ना। मुझे अपना काम करने दीजिए, आप अपना कीजिए।"
राजवीर खन्ना। डायरेक्टर। पसीने में भीगा, नज़रें इधर-उधर भागती हुई, फ़ोन हर दो मिनट में बजता हुआ। सुहाना ने ग़ौर किया कि हर बार फ़ोन देख कर उसका चेहरा और उतर जाता था।
एक आदमी जो किसी दबाव में था। किसी ऐसे दबाव में जो एक फ़िल्म की डेडलाइन से कहीं बड़ा था। सुहाना ने उसे भी अपनी सूची में डाल लिया।
तभी एक ख़ुशबू का बादल सेट पर उतरा, और उसके पीछे, हीरों में लदी, फ़िल्म की हीरोइन, रिया सभरवाल। "ओह, तो ये हैं आर्यन की नई बॉडीगार्ड। कितना... क्यूट। आर्यन, तुमने कभी अपने साथ इतनी देर तक किसी लड़की को खड़ा रखा है? वो भी बिना डेट पर ले जाए?"
"रिया, ये मज़ाक़ की बात नहीं है। जान का ख़तरा है।"
"जान का ख़तरा तो मुझे भी है, जान। दिल टूटने का। पर मेरे लिए कोई फ़ौज नहीं आती।"
रिया सभरवाल। कभी आर्यन की क़रीबी। अब सिर्फ़ को-स्टार। और उसकी हर हँसी के पीछे एक टूटा हुआ ग़ुरूर था, जो अब इस नई औरत को अपनी जगह पर खड़ा देख कर और चुभ रहा था। "कैप्टन, एक सलाह दूँ? आर्यन के बहुत क़रीब मत जाना। ये आदमी लोगों को इस्तेमाल करता है, फिर छोड़ देता है। मुझसे बेहतर कौन जानेगा?"
"मैं जानती हूँ, मिस सभरवाल। शायद आपसे भी बेहतर।"
रिया की आँखें ज़रा सिकुड़ीं। उस जवाब में कुछ था जो एक अजनबी की ज़ुबान से नहीं आना चाहिए था। "मिस सभरवाल, आप और आर्यन साहब, आपकी नज़दीकी कब तक चली?"
"नज़दीकी? आर्यन की ज़िंदगी में नज़दीकी नहीं होती, कैप्टन। सिर्फ़ ज़रूरत होती है। जब तक आप काम के हैं, आप सब कुछ हैं। फिर एक सुबह, बिना एक लफ़्ज़ कहे, आप ग़ायब कर दिए जाते हैं।"
बिना एक लफ़्ज़ कहे ग़ायब कर दिए जाते हैं। सुहाना के भीतर कुछ कसा। रिया अपनी कहानी कह रही थी, पर वही लफ़्ज़ नौ साल पहले किसी और के साथ भी सच हुए थे। ठीक उसके साथ। "और इस ग़ायब कर दिए जाने का बदला? वो आप कैसे लेतीं, मिस सभरवाल?"
"बदला? आप पूछ रही हैं क्या मैं आर्यन को मार डालूँगी? हुह। मैं उसे तड़पाना चाहती हूँ, कैप्टन, मारना नहीं। मरा हुआ आर्यन किसी काम का नहीं। ज़िंदा आर्यन, जो मुझे देखे और तरसे, वही असली मज़ा है।"
एक ठंडा, बेहद ईमानदार जवाब। सुहाना ने रिया को अपनी सूची में रखा, पर एक हल्के से धागे पर। नफ़रत थी, पर वो नफ़रत ख़ून नहीं, तमाशा चाहती थी। और उसके ग़ुरूर के नीचे, कहीं गहरे, बस एक टूटी हुई औरत थी।
इससे पहले कि सुहाना और कुछ पूछती, राजवीर की आवाज़ गरजी। "पोज़िशन्स! आर्यन सर, ऊपर वाले प्लेटफ़ॉर्म पर। लाइट्स! और... एक्शन के लिए तैयार!"
आर्यन एक ऊँचे लोहे के प्लेटफ़ॉर्म पर चढ़ गया, जहाँ से उसे एक स्टंट करना था। ऊपर, तीस फ़ुट की ऊँचाई पर, एक भारी लाइट-रिग लटकी थी, स्टील की ज़ंजीरों से बँधी।
और सुहाना की फ़ौजी नज़र, जो हर चीज़ को ख़तरे की तरह पढ़ती थी, उस रिग पर टिक गई। कुछ ठीक नहीं था। एक ज़ंजीर की कड़ी दूसरों से अलग चमक रही थी। नई। हाल में बदली हुई। "वो कड़ी... वो ओरिजिनल नहीं है। किसी ने उसे खोला है।"
"एंड... एक्शन!"
आर्यन ने अपना डायलॉग शुरू किया। और ठीक उसी पल, ऊपर, वो नई कड़ी एक हल्की सी 'कट' की आवाज़ के साथ खुली। तीस फ़ुट ऊपर, आठ सौ किलो की लाइट-रिग एक तरफ़ झूल गई, सीधे आर्यन के सिर की तरफ़। "आर्यन! हटो!"
कोई सोचने का वक़्त नहीं था। सुहाना प्लेटफ़ॉर्म की सीढ़ियाँ दो-दो लाँघती ऊपर पहुँची और आर्यन को पूरी ताक़त से धक्का दिया। दोनों एक तरफ़ गिरे, और ठीक उसी जगह, जहाँ एक सेकंड पहले आर्यन खड़ा था, वो भारी रिग लोहे के फ़र्श से टकराई।
एक कान फाड़ देने वाला धमाका। चिंगारियाँ। काँच की बौछार। पूरा स्टूडियो चीख उठा। और उस धमाके के बीच, ज़मीन पर, आर्यन और सुहाना एक दूसरे में उलझे पड़े थे।
नौ साल बाद। पहली बार, इतने पास। उसकी साँस आर्यन के गले पर, आर्यन का हाथ उसकी कमर पर, दोनों के दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहे थे कि पता ही नहीं चल रहा था किसका कौन सा। "तुमने... तुमने मुझे बचा लिया।"
"ये मेरा काम है।"
"नौ साल पहले भी तुमने मुझे गिरने से बचाया था। थिएटर की उस टूटी सीढ़ी पर। याद है?"
"याद है। फ़र्क़ बस इतना है कि उस बार गिरने के बाद तुमने मेरा हाथ नहीं छोड़ा था। ... इस बार छोड़ दीजिए, मिस्टर साहनी।"
आर्यन की उँगलियाँ धीरे-धीरे उसकी कमर से हटीं, जैसे उनके साथ बहुत कुछ और भी छूट रहा हो।
पर एक पल को, दोनों में से कोई नहीं हिला। नौ साल का ग़ुस्सा, नौ साल की चोट, और उसके नीचे कहीं, नौ साल पुरानी वो आग जो कभी पूरी तरह बुझी ही नहीं थी।
फिर सुहाना ने ख़ुद को झटके से अलग किया और खड़ी हो गई, जैसे उस छुअन से जल गई हो। और भीड़ में से रिया की आवाज़ आई, तीखी, जलती हुई। "वाह! क्या टाइमिंग है। हीरो गिरा, और हीरोइन नहीं, बॉडीगार्ड उसके ऊपर। अख़बार वाले ख़ुश हो जाएँगे।"
"कोई इस सेट से बाहर नहीं जाएगा! ये हादसा नहीं था। ये रिग किसी ने जान-बूझ कर खोली है। जग्गी, दरवाज़े सील करो!"
एक पल में सेट की सारी चमक ग़ायब हो गई। तीन सौ चेहरे, और हर चेहरे पर अब एक ही सवाल, और एक ही डर। किसी ने ये किया था। और वो अभी भी इसी कमरे में था। "सब एक लाइन में! कोई फ़ोन नहीं छुएगा, कोई हिलेगा नहीं! कैप्टन का हुक्म है।"
तीन सौ लोग, एक क़तार में, डरे हुए। सुहाना एक-एक के सामने से गुज़री, हर आँख पढ़ती हुई। और उसकी नज़र उस नए कैटरिंग वाले लड़के पर रुकी, जो पसीने में नहाया था, जिसकी आँखें दरवाज़े ढूँढ रही थीं। "तुम। कल से आए हो। रात को स्टूडियो में कौन-कौन था, तुमने देखा?"
लड़का काँप उठा और फूट पड़ा। वो चोरी से रात को सेट पर सोता था, क्योंकि उसके पास मुंबई में रहने की कोई जगह नहीं थी। उसने कुछ नहीं किया था, बस डर के मारे भागना चाहता था। एक और झूठा सुराग़, एक और टूटा धागा।
और रिया? हादसे के वक़्त वो कैमरे के ठीक सामने, तीस लोगों के बीच खड़ी थी। वो रिग किसी और ने खोली थी। कोई ऐसा, जो इस भीड़ में इतना आम था कि किसी की नज़र में ही न आए। कोई, जो हर रोज़ यहाँ होता था।
सुहाना ने ऊपर चढ़ कर वो खुली कड़ी जाँची। किसी ने उसे रात में, या सुबह सबके आने से पहले, बड़ी सफ़ाई से आधा काटा था, ताकि वो ठीक 'एक्शन' के दबाव में खुले। "इसे किसी बाहरी ने नहीं किया। इसे उसने किया जिसे पता था कि आज कौन सा सीन है, कौन से प्लेटफ़ॉर्म पर, और किस वक़्त। ये शेड्यूल सिर्फ़ चंद लोगों के पास था।"
"शेड्यूल... वो तो सिर्फ़ राजवीर, मिहिर, और... और नैरा के पास होता है। नैरा ही सबका कैलेंडर बनाती है।"
नैरा। वही नाम, फिर। जिसकी पहचान झूठी थी, जिसके हाथ से घर की हर जानकारी गुज़रती थी, और जिसके पास आज के हर सीन का हर पल दर्ज था।
सुहाना का जी चाहा कि अभी, इसी वक़्त, नैरा को पकड़ ले। पर उसने ख़ुद को रोका। झूठी पहचान जुर्म नहीं, सुराग़ है। और शक, सबूत नहीं होता। उसे इंतज़ार करना था, और नज़र रखनी थी। "अभी नहीं। तुम्हें अभी नहीं पता चलेगा कि मैं जान गई हूँ। खेल तुमने शुरू किया, नैरा। ख़त्म मैं करूँगी।"
जाँच में शाम ढल गई। एक-एक करके स्टाफ़ को छोड़ा गया। स्टूडियो ख़ाली होने लगा। बड़ी-बड़ी लाइटें बुझ गईं, और सेट पर सिर्फ़ लम्बी परछाइयाँ रह गईं।
आर्यन थका हुआ अपनी कुर्सी पर बैठा था, और सुहाना दरवाज़े के पास खड़ी, आख़िरी लोगों को जाते देख रही थी। सेट अब बंद था। सील। सिर्फ़ भरोसे के चंद लोग बचे थे।
और तभी, उस बंद, सील किए हुए सेट के दूर वाले दरवाज़े से, एक बूढ़ा आदमी अंदर आया।
धीमे क़दम, झुकी हुई कमर, हाथ में एक पुरानी छड़ी। किसी ने उसे रोका नहीं, जैसे वो कोई साया हो। सुहाना की रीढ़ सीधी हो गई। इस आदमी को उसने क्लियर नहीं किया था। इस आदमी को वो जानती तक नहीं थी। "रुकिए! ये बंद सेट है। आप कौन हैं? यहाँ कैसे आए?"
बूढ़ा आदमी रुका। उसने अपनी थकी हुई आँखें उठाईं, पहले सुहाना पर, फिर उसके पीछे बैठे आर्यन पर। और उसके चेहरे पर एक अजीब, दर्द भरी मुस्कान आई। "मैं इस लड़के को तब से जानता हूँ, बेटी, जब ये किसी का 'सर' नहीं, सिर्फ़ एक भूखा एक्टर था। और एक नाटक था, जिसका नाम था 'साया'।"
और आर्यन साहनी की कुर्सी पीछे गिर पड़ी। वो खड़ा हो गया, चेहरा राख जैसा सफ़ेद, जैसे उसने कोई ज़िंदा भूत देख लिया हो। जैसे नौ साल पुरानी एक क़ब्र अभी उसके सामने खुल गई हो। "आर्यन, ये कौन है? तुम इसे जानते हो?"
पर आर्यन जवाब नहीं दे पाया। उसकी ज़ुबान तालू से चिपक गई थी। वो बस उस बूढ़े आदमी को देखता रहा, जैसे कोई गुनहगार बच्चा अपनी सज़ा के सामने खड़ा हो। "उस्ताद... इक़बाल साहब... आप... आप यहाँ... "
"नौ साल हो गए, आर्यन। मैं सोचता था कभी तेरे पास आऊँगा, तेरी आँखों में देखूँगा, और पूछूँगा, तुझे रात को नींद कैसे आती है। ... पर आज मैं इसलिए नहीं आया।" "आज मैं इसलिए आया, क्योंकि जो 'साया' तूने अपने हाथों दफ़नाया था, वो क़ब्र से बाहर निकल आया है। और अब वो तुझसे हिसाब माँग रहा है।"
जिस अतीत को आर्यन ने नौ साल पहले ज़मीन में गाड़ दिया था, वो अतीत अभी-अभी, एक छड़ी टेकता हुआ, उसके बंद सेट के दरवाज़े से चल कर अंदर आ गया था। और सुहाना समझ गई, इस आदमी के पास वो सारे जवाब थे, जो आर्यन उसे कभी नहीं देता।
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