Chapter 3 of 26 11 min read
घर के भेदी
अपनी जेब में मिले पैग़ाम के बाद सुहाना पूरे घर को शक की नज़र से नापती है और एक-एक चेहरे की फ़ाइल बनाती है, जबकि आर्यन की सबसे भरोसेमंद सेक्रेटरी नैरा हर क़दम पर मददगार और अपरिहार्य बनती जाती है। सुनहरे पिंजरे की सच्चाई खुलती है, आर्यन की तन्हाई, उसके इर्द-गिर्द की चापलूसी, और रात को एक भयानक सपने में टूटता हुआ वो इंसान जिसे सुहाना पुराने तरीक़े से शांत करती है, जहाँ दबी हुई नज़दीकी एक पल को जाग कर बुझ जाती है। पर जब सुहाना स्टाफ़ के काग़ज़ात अपने सूत्रों से मिलाती है, तो पता चलता है कि आर्यन के सबसे क़रीब वाला शख़्स एक गढ़ी हुई पहचान के नीचे जी रहा है।
सुबह के चार बजे। समंदर अभी काला था। और सुहाना बेदी सोई नहीं थी।
बराबर वाले कमरे की एक पूरी दीवार अब उसका नक़्शा थी। स्टाफ़ की तस्वीरें, धागे, नाम, और बीच में वो दो पुर्ज़े। लाल स्याही में लिखी दो धमकियाँ।
एक आर्यन के लिए। एक उसके अपने नाम। और दूसरा उसकी अपनी जेब में डाला गया था, इतने पास से, कि उसे यक़ीन हो गया था, दुश्मन बाहर नहीं, इसी छत के नीचे साँस ले रहा है।
दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। एक नर्म, गर्मजोश आवाज़। "कैप्टन? मुझे पता था आप जागी होंगी। कॉफ़ी लाई हूँ, बिना चीनी, ज़रा कड़क। और वो सारी फ़ाइलें जो आपने माँगी थीं, पंद्रह साल के स्टाफ़ रिकॉर्ड, सब निकाल दिए हैं।"
दरवाज़े पर एक नौजवान औरत खड़ी थी। खुली मुस्कान, साफ़ आँखें, हाथ में फ़ाइलों का पुलिंदा। पूरे घर की धड़कन। नैरा सूद। आर्यन की सेक्रेटरी। "तुमने कैसे जाना कि मैं क्या माँगूँगी?"
"नौ साल से इस घर को चला रही हूँ, कैप्टन। यहाँ किसे क्या चाहिए, ये पूछने से पहले पता चल जाता है। आपको जानकारी चाहिए। और इस घर की सारी जानकारी मेरे पास से गुज़रती है।"
इस घर की सारी जानकारी मेरे पास से गुज़रती है। नैरा ने ये बात एक मासूम मदद की तरह कही थी। पर सुहाना के कान में वो किसी और तरह पड़ी। "तुम्हारे पास सबकी फ़ाइल है। तुम्हारी अपनी कहाँ है, नैरा?"
"मेरी? मेरी कहानी बड़ी बोरिंग है, कैप्टन। न कोई घर, न परिवार। बस ये घर। आर्यन सर ने मुझे तब काम दिया जब मेरे पास कुछ नहीं था। तो अब ये घर ही मेरा सब कुछ है।"
बहुत सही जवाब। बहुत सधा हुआ। ऐसा जवाब जो हर सवाल बंद कर दे और कोई दरवाज़ा न खोले। सुहाना ने अपनी नोटबुक में एक छोटा सा निशान लगाया। नैरा सूद। कोई अतीत नहीं। "कैप्टन, एक बात कहूँ? मेरी जगह होती तो मैं भास्कर राणा पर नज़र रखती। पंद्रह साल की अकड़ थी उसमें, और आपके आते ही उसका रुतबा मिट्टी में मिल गया। ऐसे आदमी बहुत कुछ कर सकते हैं। मैं कब से महसूस कर रही थी, उसकी नज़रें ठीक नहीं।"
नैरा ने बड़ी नरमी से एक नाम सुहाना की तरफ़ सरका दिया। भास्कर। और सुहाना ने उसे नोट किया, पर साथ में ये भी कि नैरा किसी और की तरफ़ इशारा करने में बहुत तत्पर थी। "शुक्रिया। पर मैं किसी एक चेहरे पर नज़र नहीं रखती, नैरा। मैं हर चेहरे पर रखती हूँ। बिना किसी को छोड़े।"
"बिलकुल सही, कैप्टन। इसीलिए तो आर्यन सर आपके हाथ में महफ़ूज़ हैं। जो चीज़ मुझसे न हो सकी, शायद वो आप कर दिखाएँ।"
जो मुझसे न हो सकी। सुहाना ने सोचा, ये अपनी नाकामी की बात कर रही है। पर नैरा किसी और नाकामी की बात कर रही थी, एक ऐसी, जिसका बोझ वो नौ साल से ढो रही थी। "जो धमकियाँ आ रही हैं, उनमें एक पुरानी बात का ज़िक्र है। एक नाटक का। बहुत साल पुराना। तुमने कभी सुना, आर्यन के किसी पुराने थिएटर के दिनों के बारे में?"
और एक पल के लिए, बस एक पल के लिए, नैरा की मुस्कान जम गई। उसकी उँगलियाँ फ़ाइल पर ज़रा सी कस गईं। फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया, इतनी जल्दी कि कोई और होता तो देख भी न पाता। "आर्यन सर अपने पुराने दिनों की बात कभी नहीं करते, कैप्टन। जैसे उनकी ज़िंदगी नौ साल पहले, पहली फ़िल्म से शुरू हुई हो। उससे पहले का सब... जैसे किसी और की ज़िंदगी हो।"
जैसे किसी और की ज़िंदगी हो। सुहाना ने ग़ौर नहीं किया, पर वो जो ये कह रही थी, उसके लिए वो 'किसी और की ज़िंदगी' उसके अपने ख़ून से जुड़ी थी।
दिन चढ़ा, और सुहाना ने आर्यन साहनी की असली दुनिया देखी। रौशनी के पीछे का सुनहरा पिंजरा।
सुबह से शाम तक चेहरों का एक ताँता। हर कोई हँसता हुआ, हर कोई तारीफ़ करता हुआ, हर कोई कुछ न कुछ माँगता हुआ। और उन सबके बीच आर्यन, एक ऐसी मुस्कान पहने जो उसकी अपनी नहीं थी। "जी बत्रा साहब, बिलकुल। शेड्यूल टाइम पे रहेगा। कोई दिक़्क़त नहीं। ... जी। आपका ही तो आशीर्वाद है।"
फ़ोन रखते ही उसकी मुस्कान गिर गई, जैसे किसी ने मुखौटा उतार दिया हो। सुहाना ने देखा, बत्रा का नाम आते ही आर्यन के हाथ काँपते थे। "आप इस बत्रा से डरते हैं।"
"वो मेरे प्रोड्यूसर हैं, कैप्टन। सबसे बड़े। जिसने मुझे आसमान पर बिठाया। उनसे डरता नहीं, इज़्ज़त करता हूँ।"
"इज़्ज़त में लोग हाथ नहीं मिलाते हुए काँपते, मिस्टर साहनी। मैं फ़र्क़ जानती हूँ। फ़ौज में दोनों देखे हैं।"
आर्यन ने कुछ नहीं कहा। पर उस चुप्पी में सुहाना ने अपनी फ़ाइल में एक और नाम जोड़ लिया। बत्रा। वो आदमी जिसका ज़िक्र होते ही देश का सबसे बहादुर दिखने वाला हीरो एक डरे हुए बच्चे में बदल जाता था।
शाम तक वो ताँता लगा रहा। एक फ़ैशन ब्रांड वाले, एक पीआर टीम, एक चापलूस डायरेक्टर, हर कोई आर्यन को 'सर', 'बॉस', 'लीजेंड' कहता, और हर कोई कुछ न कुछ ले कर जाता। "देखा, कैप्टन? चालीस नौकर, सौ चापलूस, करोड़ों चाहने वाले। और रात को इस कमरे में एक भी आवाज़ नहीं होती। बस मैं और मेरी परछाईं।"
"जो अपनी परछाईं से डरे, उसे तन्हाई नहीं, आईना चुभता है, मिस्टर साहनी।"
आर्यन ने उसकी तरफ़ देखा, चौंक कर, जैसे उस एक फ़िक़रे ने उसकी सबसे गहरी रग छू ली हो। पर सुहाना पहले ही मुड़ चुकी थी, अपनी अगली जाँच की तरफ़।
और घर के सबसे गर्म कोने में, रसोई में, जग्गी अपना मोर्चा सँभाले बैठा था। कमला बाई के हाथ की चाय, और कमला बाई की ज़ुबान, दोनों बराबर की तेज़। "अरे सरदार जी, इस घर में जितनी क्रीम-पाउडर हीरो साहब लगाते हैं ना, उतने में तो मेरे गाँव की दस बहुएँ सज जाएँ। और वो को-स्टार वाली मैडम, रिया सभरवाल, जब आती हैं तो पूरा फ़्रिज ख़ाली करवा देती हैं, खाती कुछ नहीं, बस फेंकवाती हैं।"
"अरे कमला बहन, ये सब तो ठीक है। पर बता, इस घर में सबसे पुराना कौन है? सबसे भरोसे का?"
"नैरा बिटिया। और कौन। भगवान का रूप है वो लड़की। मेरी बीमारी में अस्पताल का सारा ख़र्चा उसने उठाया, चुपचाप। किसी को बताया तक नहीं।"
"और उसका अपना घर? माँ-बाप? कोई तो होगा।"
"यही तो अजीब है, सरदार जी। नौ साल हो गए, कभी किसी को उसके घर नहीं देखा। न कोई भाई, न बहन, न कोई पुरानी तस्वीर। बस एक बार, बहुत पहले, बुख़ार में बड़बड़ा रही थी, किसी 'भैया' को पुकार रही थी। सुबह पूछा तो हँस के टाल गई।"
किसी भैया को पुकार रही थी। जग्गी ने चाय का घूँट रोक लिया। "और ये मिहिर साहब? पैसे वाला मामला क्या है उनका?"
"अरे उनका तो पूछो ही मत। पहले हर महीने नई घड़ी आती थी, नई गाड़ी। अब छह महीने से एक ही घड़ी पहनते हैं, और रात को दबे पाँव आर्यन साहब के स्टडी में जा कर काग़ज़ उलटते-पलटते हैं। कमला बाई सब देखती है, सरदार जी। सब।"
"कमला बहन, तू फ़ौज में होती तो हम सरहद पार का हाल भी तेरी रसोई से जान लेते।"
कमला हँस पड़ी। पर उसकी हर हँसी के नीचे एक-एक सुराग़ था, और वो सारे सुराग़ उसी शाम सुहाना के नक़्शे पर नए धागों की तरह चढ़ गए।
रात गहरी हुई। बंगला सो गया। और फिर, आधी रात के बाद, वो आवाज़ आई जिसने सुहाना को उसकी कुर्सी से उछाल दिया। "नहीं! ... आकाश, मत! ... रुक जा, मैं कह रहा हूँ, रुक जा! ... ये आग... "
सुहाना बीच के खुले दरवाज़े से भीतर लपकी। आर्यन बिस्तर पर तड़प रहा था, पसीने में भीगा, आँखें बंद, किसी अनदेखे भूत से लड़ता हुआ।
और उस एक पल में सुहाना भूल गई कि वो कैप्टन है। वो नौ साल पीछे चली गई, उस लड़की के पास जो इस आदमी की हर बुरी रात को जानती थी। "आर्यन। ... आर्यन, सुनो मेरी आवाज़। साँस लो। मेरे साथ। अंदर... और बाहर। तुम यहाँ हो। कोई आग नहीं है। मैं हूँ।"
उसकी आवाज़ अपने आप उस पुरानी लय में ढल गई, वो लय जिससे वो कभी उसके डर को सुला देती थी। आर्यन की तड़प धीमी पड़ी। उसकी उँगलियों ने सुहाना की कलाई पकड़ ली, जैसे डूबता आदमी किनारा पकड़े। "सुहाना... तुम आ गई... मुझे पता था तुम आओगी... मुझे माफ़... "
और एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, सुहाना का हाथ उसके पसीने से तर माथे पर ठहर गया। नौ साल की बर्फ़ के नीचे कहीं कुछ पिघला। उसका अंगूठा, अपने आप, उसकी कनपटी को सहला गया। "मैं यहीं हूँ। ... कोई आग नहीं है। बताओ, किस आग की बात कर रहे थे तुम?"
"वो जल रहा था... आकाश... और मैं बस खड़ा रहा... कुछ नहीं किया... बत्रा ने कहा चुप रहो, तो मैं चुप रहा... मैं बुज़दिल हूँ, सुहाना... मैंने उसे मरने दिया... "
सुहाना का हाथ जम गया। आकाश। आग। बत्रा। तीन लफ़्ज़, जो अभी तक अलग-अलग पड़े थे, नींद में बड़बड़ाते इस आदमी के मुँह से एक साथ निकले, और उसके भीतर एक ठंडी लहर दौड़ गई।
एक हिस्सा उसे झिंझोड़ कर सब कुछ पूछ लेना चाहता था, अभी, इसी वक़्त। और दूसरा हिस्सा, कैप्टन वाला हिस्सा, जानता था कि नींद में बहका सच अदालत में नहीं टिकता। उसे इंतज़ार करना था। सबूत के साथ।
फिर आर्यन ने आधी नींद में उसका नाम फिर लिया, और वो लफ़्ज़ 'माफ़ी' हवा में तैरा। और सुहाना को याद आया, ये वही आदमी है जिसकी माफ़ी नौ साल देर से आई है। "मैं कैप्टन बेदी हूँ, मिस्टर साहनी। आपकी सिक्योरिटी। ... सो जाइए। सुबह हो रही है।"
उसने अपना हाथ खींच लिया। आर्यन की उँगलियाँ ख़ाली हवा में रह गईं। और दोनों ने रात का बाक़ी हिस्सा जागते हुए काटा, एक ही कमरे में, एक खुले दरवाज़े के दो तरफ़, नौ साल की एक दीवार के आर-पार।
पर उस रात का असली भूचाल अभी बाक़ी था। भोर होते-होते सुहाना अपनी दीवार के सामने लौटी। उसने नैरा की दी हुई फ़ाइलें उठाईं और अपने फ़ौजी सूत्रों से मिलानी शुरू कीं। हर नाम, हर पता, हर जन्म का रिकॉर्ड।
भास्कर राणा, असली। भोंसले ड्राइवर, असली। कमला बाई, असली। एक-एक करके हर चेहरा साफ़ होता गया। जब तक वो एक नाम पर नहीं रुकी। "ये पता... इस मोहल्ले में ऐसा कोई घर है ही नहीं। और ये स्कूल... ये स्कूल तो बारह साल पहले बंद हो गया था। फिर इसका सर्टिफ़िकेट कैसे?"
उसने एक धागा खींचा, फिर दूसरा, फिर तीसरा। और हर धागा हवा में टूट गया। जन्म का रिकॉर्ड, झूठा। पुराना पता, झूठा। पिछली नौकरी, ऐसी कंपनी जो कभी थी ही नहीं। "ये इंसान... इस काग़ज़ के मुताबिक़... नौ साल पहले पैदा ही नहीं हुआ था।"
इस घर में एक शख़्स ऐसा था, जिसका पूरा वजूद झूठ के काग़ज़ों पर खड़ा था। एक नक़ली नाम, एक गढ़ी हुई पहचान, इतनी सफ़ाई से बनाई गई कि नौ साल तक किसी को शक न हुआ।
उसने अपने पुराने फ़ौजी साथी को, जो अब पासपोर्ट दफ़्तर में था, आधी रात को फ़ोन किया। बीस मिनट बाद जवाब आया, और उस जवाब ने उसकी रीढ़ सीधी कर दी। "जग्गी, सुन। ये नाम, ये पहचान, नौ साल पहले एक ही हफ़्ते में गढ़ी गई है। एक साथ। बर्थ सर्टिफ़िकेट, आधार, बैंक, सब। किसी ने बहुत पैसा और बहुत दिमाग़ लगा कर एक पूरा इंसान बनाया है, ज़ीरो से।"
और सुहाना की उँगली उस तस्वीर पर रुक गई। वो चेहरा जो पूरे घर को अपना कहता था। वो चेहरा जो आर्यन साहनी के सबसे क़रीब था। सबकी लाडली।
जिस औरत के हाथों से इस घर की हर जानकारी गुज़रती थी, उस औरत का अपना वजूद ही एक झूठ था। ... और वो सच जानने के लिए, सुहाना को अब उसी 'भगवान के रूप' की परतें उतारनी थीं।
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