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Chapter 26 of 26 12 min read

साया बनके

साया बनके by Avni Oberoi

सबसे लंबी रात आख़िरकार टूटी। खिड़की के परदे की झिरी से भोर की पहली, धुली हुई रोशनी अंदर आई, और एक अस्पताल के कमरे में एक मशीन की धीमी, थकी हुई बीप के साथ मिल गई। और उस बिस्तर पर, पट्टियों और तारों के बीच, एक सीना धीरे-धीरे उठ रहा था, और गिर रहा था। आर्यन साहनी साँस ले रहा था। बड़ी मुश्किल से, पर ले रहा था।

रात भर डॉक्टर उस गोली से लड़ते रहे थे जो उसके दिल से बस एक साँस की दूरी पर रुकी थी। और उस पूरी रात, उस कमरे के बाहर वाली कुर्सी से कोई नहीं हिला था। सुहाना बेदी, जिसकी वर्दी अब भी उस रात के धुएँ और ख़ून से सनी थी, वहीं बैठी रही थी, उसी तरह जैसे नौ साल पहले एक दरवाज़े के सामने बैठी रह गई थी। पर इस बार दरवाज़ा खुला था।

और फिर, भोर के साथ, आर्यन की पलकें काँपीं, और धीरे से खुल गईं। कुछ पल उसे समझ ही नहीं आया कि वो कहाँ है। फिर उसकी नज़र उस थकी हुई, जागती हुई औरत पर पड़ी, और उसके सूखे होंठों पर एक कमज़ोर सी मुस्कान तैर गई।

"अगर... ये जन्नत है... ... तो यहाँ भी तुम मेरी पहरेदारी कर रही हो, कैप्टन? ... लगता है... मरने के बाद भी... मेरा पीछा नहीं छूटेगा।"

"जन्नत नहीं, आर्यन। अस्पताल है। ... और हाँ, मैं अब भी पहरे पर हूँ। ... तुमने मेरा सीधा हुक्म तोड़ा। मैंने कहा था ज़िंदा रहना, और तुम मरने चले गए थे। ... एक फ़ौजी के लिए इससे बड़ी बदतमीज़ी और कोई नहीं होती।"

"माफ़ कर दो, कैप्टन। ... पर उस पल... एक ही चीज़ मेरे दिमाग़ में थी। ... कि गोली तुम तक नहीं पहुँचनी चाहिए। ... और नौ साल में... वो पहला फ़ैसला था... जिस पर मुझे ज़रा भी शर्म नहीं आई।"

और उस छोटे से कमरे में, भोर की उस साफ़ रोशनी में, नौ साल की सारी दीवारें काग़ज़ से भी पतली रह गई थीं। कोई बत्रा नहीं। कोई धमकी नहीं। कोई फ़र्ज़ जो उनके बीच खड़ा हो। पहली बार, बचाने को कोई जान नहीं थी, सिवाय उस चीज़ के जो वो ख़ुद नौ साल से मार रहे थे।

"आर्यन। ... कल रात, उस फ़र्श पर, मैंने तुमसे एक बात कही थी। ... मैं चाहती हूँ तुम उसे दोबारा सुनो, अब, जब कोई बंदूक नहीं है, कोई मौत नहीं। ... ताकि तुम्हें पता चले कि वो मरते हुए आदमी को दी गई तसल्ली नहीं थी। ... मैं तुमसे प्यार करती हूँ। नौ साल पहले भी करती थी, और आज भी करती हूँ। ... और इस बार, मैं भाग नहीं रही।"

"और मैं भी नहीं भागूँगा, सुहाना। ... कभी नहीं। ... मैंने भागने में नौ साल गँवा दिए। ... अब जो भी बचा है, वो सिर्फ़ रुकने में लगाऊँगा।"

और सुहाना झुकी, धीरे से, और उसका माथा आर्यन के माथे से छू गया, जैसे कल रात। पर इस बार वो वहाँ नहीं रुकी। इस बार उसके होंठ आर्यन के होंठों तक पहुँचे, और नौ साल का वो अधूरा चुम्बन, जो हर बार दहलीज़ पर थम जाता था, आख़िरकार पूरा हुआ। कोई जंग नहीं थी उसके नीचे, कोई कगार नहीं। सिर्फ़ दो लोग, जिन्होंने आख़िरकार, अपनी मर्ज़ी से, एक-दूसरे को चुन लिया था।

चुम्बन दहलीज़ पर जल कर, बहुत नरमी से, वहीं ठहर गया, जहाँ सारी अच्छी चीज़ें एक-दूसरे की साँसों में ठहर जाती हैं। और ठीक उसी पल, जैसा कि हमेशा होता है, दरवाज़ा एक धमाके से खुला।

"कैप्टन, बत्रा की ज़मानत ख़ारिज हो गई, पूरा देश... ओहो! ... अरे! ... मैं... मैं बाद में आता हूँ। ... नहीं नहीं, तुम दोनों... तुम दोनों जारी रखो। ... मैं बस ये ख़ुशख़बरी दरवाज़े के बाहर से चिल्ला देता हूँ, हाँ?"

"अंदर आ जाओ, जग्गी। ... और अगली बार दरवाज़ा खटखटाना सीख लो, वरना मैं तुम्हें दोबारा फ़ौज की परेड में भेज दूँगी। ... बोलो, क्या हुआ बत्रा का?"

"सब कुछ हुआ, कैप्टन! ... बत्रा अंदर है, और अब बाहर नहीं आ रहा। उसकी पूरी कंपनी बिखर रही है। ... वो डायरेक्टर राजवीर और वो मैनेजर मिहिर, दोनों सरकारी गवाह बन गए, अपनी जान बचाने के लिए एक-दूसरे से पहले बत्रा के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं। ... और वो नक़ली फ़िल्म जो उसने चलाई थी? हर चैनल ने उसे कूड़े में फेंक दिया। ... आज पूरा देश सिर्फ़ एक नाम ले रहा है, कैप्टन। आकाश माथुर।"

और वो सच था। जिस देश ने कुछ घंटे पहले आर्यन को एक हत्यारा समझा था, उसी देश ने भोर होते-होते एक मरे हुए लड़के को अपना हीरो मान लिया था। एसीपी नायक की टीम बत्रा के हर खाते, हर सौदे, हर दबे हुए राज़ की परतें खोल रही थी। नौ साल का एक साम्राज्य, एक ही रात में, ताश के पत्तों की तरह गिर रहा था।

"जग्गी, एक काम करो। ... मीडिया को एक बयान भिजवाओ, मेरी तरफ़ से। ... 'परछाईं', वो फ़िल्म जिसने मुझे सितारा बनाया, वो कभी मेरी थी ही नहीं। ... उसका असली नाम 'साया' है, और उसका असली लेखक आकाश माथुर। ... हर पोस्टर से मेरा नाम हटा कर उसका नाम लगाओ। ... आज से, वो फ़िल्म उसकी है। हमेशा से उसकी थी।"

"तुम्हें पता है इसका क्या मतलब है, आर्यन? ... तुम्हारी सबसे बड़ी फ़िल्म, तुम्हारा सबसे बड़ा नाम, ... तुम अपने ही हाथों उसे किसी और को दे रहे हो। ... तुम्हारे पास बचेगा क्या?"

"पहली बार, एक साफ़ ज़मीर। ... और शायद, अगर मेरी क़िस्मत अच्छी रही, ... एक पहरेदार जो अब भी मेरे साथ रुकना चाहे। ... बाक़ी सब, सुहाना, ... बाक़ी सब तो सिर्फ़ एक झूठे महल की ईंटें थीं। उन्हें गिरने दो।"

कुछ दिन बाद। शहर के शोर से दूर, एक छोटे से क़ब्रिस्तान में, जहाँ नौ साल से एक पत्थर पर सिर्फ़ एक तारीख़ लिखी थी, और कोई नाम नहीं। आज उस पत्थर के आगे दो औरतें खड़ी थीं। और आज, आख़िरकार, उस पर एक नया नाम खुदवाया गया था। आकाश माथुर। लेखक।

"देख लिया, भैया? ... तेरा नाम वापस आ गया। पत्थर पर भी, और पूरे देश की ज़ुबान पर भी। ... मुझे अब झूठ में जीना नहीं पड़ेगा। ... मैं अब 'नैरा सूद' नहीं हूँ। ... मैं फिर से नैरा माथुर हूँ। तेरी छोटी बहन।"

"उसे तुम पर नाज़ होता, नैरा। ... एक सत्रह साल की लड़की ने नौ साल एक झूठ पहन कर, अकेले, एक पूरे साम्राज्य को गिरा दिया। ... किसी बंदूक से नहीं, सिर्फ़ अपने सब्र से। ... आकाश एक बहादुर बहन छोड़ गया था। ... और मुझे ख़ुशी है कि आज वो बहन अकेली नहीं है।"

"तुम्हें पता है, सुहाना, ... शुरू में मैं तुमसे भी नाराज़ थी। ... तुम आर्यन से प्यार करती थीं, और वो आर्यन... मेरे भाई के गुनाह में शामिल था। ... मैंने तुम्हें इस घर में इसीलिए बुलाया था, एक मोहरे की तरह। ... और आज? ... आज तुम मेरी बची हुई इकलौती फ़ैमिली हो।"

"मोहरा नहीं, नैरा। ... तुमने मुझे इस घर में बुला कर, अनजाने में, मुझे मेरी ज़िंदगी वापस दे दी। ... मेरा खोया प्यार, और एक खोई हुई बहन, दोनों। ... आकाश ने हम दोनों को जोड़ दिया, जाते-जाते। ... अब हम उसे ऐसे याद करेंगे जैसे वो चाहता, हँस कर, ना कि रो कर।"

"मैं 'साया' को दोबारा मंच पर लाना चाहती हूँ, सुहाना। ... वैसे ही जैसे भैया ने लिखा था। असली शब्द, असली नाम। ... नौ साल मैंने एक क़ातिल का पीछा किया। ... अब मैं अपने भाई की ज़िंदगी का पीछा करूँगी, उसके शब्दों का। ... बदला मेरा रास्ता था। पर मेरी मंज़िल हमेशा वो थी।"

और उस भोर, उस क़ब्र के आगे, नैरा माथुर ने नौ साल का वो साया अपने कंधों से उतार दिया, जो एक बहन ने अपने भाई के इंसाफ़ के लिए ओढ़ा था। अब वो किसी की परछाई नहीं थी। अब वो सिर्फ़ नैरा थी, अपनी ज़िंदगी की मालिक।

हफ़्ते बीते। आर्यन का वो समंदर किनारे वाला बंगला, जो कभी एक सोने का पिंजरा था, अब एक घर की तरह साँस लेने लगा था। दीवारों से नक़ली मुस्कानों वाली तस्वीरें उतर गई थीं, और उनकी जगह एक अजीब सी, नई शांति आ बैठी थी। और उस शांति के बीचोंबीच, रसोई से एक जानी-पहचानी आवाज़ गूँज रही थी।

"कमला बाई, कसम से, आपके हाथ के परांठे के आगे बत्रा का पूरा साम्राज्य कुछ भी नहीं! ... अरे नहीं नहीं, मैं मक्खन नहीं लगा रहा, ... ठीक है, थोड़ा लगा रहा हूँ, एक और परांठा मिल जाए तो? ... और सुनिए, कैप्टन और साहब को भी बुला लीजिए, आज पूरा घर साथ खाएगा। ... इस घर में कितने बरस बाद कोई हँसी की आवाज़ आई है।"

और वो सच था। कमला बाई की रसोई फिर महकने लगी थी, जग्गी की ठहाकों से भरी आवाज़ फिर गूँजने लगी थी, और सेट का वो पुराना परिवार, जो बरसों डर के साये में जीता था, अब एक नए, ईमानदार आग़ाज़ के लिए लौट आया था। डर की जगह, अब उस घर में गर्माहट रहती थी।

और उसी शाम, बंगले की छत पर, समंदर के ऊपर सूरज ढल रहा था, और आर्यन उस मुँडेर के सहारे खड़ा था, अब भी थोड़ा कमज़ोर, पर पहली बार पूरी तरह अपना। सुहाना उसके पास आ कर खड़ी हो गई, वैसे ही जैसे नौ महीने से हर ख़तरे में उसके पास खड़ी होती आई थी। पर आज कोई ख़तरा नहीं था।

"सुहाना, मैं तुमसे एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ। ... मैं तुमसे ये नहीं कहूँगा कि मेरे माज़ी को माफ़ कर दो। ... जो मैंने किया, बुज़दिली, चुप्पी, तुम्हें छोड़ना, ... वो माफ़ी के लायक़ है ही नहीं। ... मैं बस इतना कहूँगा कि जो आदमी आज तुम्हारे सामने खड़ा है, वो वो बुज़दिल नहीं है। ... और अगर तुम इजाज़त दो, ... तो वो बाक़ी उम्र, हर रोज़, ये साबित करना चाहता है।"

"मुझे तुम्हारा माज़ी माफ़ नहीं करना, आर्यन। ... मुझे उसे साथ ले कर आगे बढ़ना है। ... मैं यहाँ नौ महीने एक क्लाइंट की पहरेदारी करने आई थी। ... पर आज मैं किसी क्लाइंट के पास नहीं रुक रही। ... मैं एक बराबर के इंसान के पास रुक रही हूँ। ... एक ऐसे आदमी के पास, जिसने आख़िर में, मेरे लिए एक गोली अपने सीने पर ले ली।"

और वहाँ, ढलते सूरज के नीचे, उन दोनों के बीच जो बचा था वो कोई पहरेदार और कोई सितारा नहीं था। कोई बचाने वाला और कोई बचाया जाने वाला नहीं। बस दो बराबर लोग, दो टूटे और फिर जुड़े हुए लोग, जिन्होंने एक-दूसरे को किसी मजबूरी में नहीं, पूरी आज़ादी से चुना था।

"तो अब, कैप्टन बेदी, ... जब कोई धमकी नहीं, कोई बत्रा नहीं, कोई मिशन नहीं, ... तुम्हारी अगली पोस्टिंग क्या है?"

"एक ही आदमी की, आर्यन साहनी। ... चौबीसों घंटे। ... पर इस बार वर्दी में नहीं। ... और इस बार, ... फ़र्ज़ की वजह से नहीं।"

और ठीक उसी पल, जब आर्यन उसे अपनी बाँहों में खींच रहा था, सुहाना के फ़ोन पर एक अनजान नंबर से एक संदेश आया। उसने एक पल को उसे देखा। एक पुराने फ़ौजी सूत्र का पैग़ाम। छोटा सा, पर उसकी रीढ़ में एक ठंडी लकीर खींच गया।

"'बत्रा हर महीने आर्यन का पैसा किसी और को भेजता था। पर बत्रा ख़ुद भी हर महीने किसी और को पैसे भेज रहा था। बहुत ऊपर। ... बत्रा आख़िरी नाम नहीं था, कैप्टन। ... वो सिर्फ़ एक परछाई थी।'"

सुहाना ने उस संदेश को कुछ पल देखा, और उसके भीतर की फ़ौजी एक पल को जागी। एक और नाम। एक और परछाई। एक ऐसी सड़ांध जो एक मरे हुए प्रोड्यूसर से कहीं आगे तक जाती थी। पर फिर उसने आर्यन की तरफ़ देखा, उन आँखों में जो नौ साल बाद पहली बार डर से ख़ाली थीं, और उसने वो फ़ोन जेब में डाल दिया।

"वो कहानी किसी और रात की है। ... आज की रात नहीं। ... आज की रात सिर्फ़ हमारी है।"

"क्या था वो? ... कोई नई पोस्टिंग?"

"कुछ नहीं जो आज तुम्हारे और मेरे बीच आ सके। ... नौ साल तक एक साये ने हमें बाँटा, आर्यन। ... अब कोई साया हमें नहीं बाँटेगा। ... आज की रात, बस तुम, मैं, और ये समंदर।"

और वहाँ, ढलते सूरज और चढ़ती रात के बीच, उस छत पर, वो दोनों एक-दूसरे में सिमट गए। सुहाना बेदी उसकी जान बचाने आई थी, एक साये की तरह, चुपचाप, चौबीसों घंटे उसके पीछे। पर एक साया सिर्फ़ रोशनी में जीता है। और वो रोशनी, जिसमें खड़े होने का हौसला आर्यन ने आख़िरकार, नौ साल बाद, अपनी मर्ज़ी से चुना था, वही आज उन दोनों को अपनी बाँहों में समेटे थी।

वो उसका साया बन कर आई थी। और आज, पहली बार, वो साया अकेला नहीं था, क्योंकि जिस आदमी की परछाई वो थी, वो आख़िरकार अंधेरे से निकल कर रोशनी में आ खड़ा हुआ था। और रोशनी में, दो साये कभी अलग नहीं होते। वो एक हो जाते हैं।

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