Chapter 23 of 26 12 min read
घेरा कसता है
सबसे काली घड़ी, आर्यन पूरे देश के सामने आकाश का हत्यारा ठहराया जा चुका है और बत्रा जीत रहा है, पर मंच पर आर्यन भागने से इनकार कर देता है और माइक बंद होने के बाद भी सच चिल्लाता रहता है। इधर सुहाना बंदूक छीन कर आज़ाद होती है और नैरा को नियंत्रण-कक्ष तक खींच लाती है, जहाँ नैरा नौ साल का राज़ खोलती है, कि मरने से पहले आकाश ने अपनी ही आवाज़ में उस रात की पूरी रिकॉर्डिंग बना कर इक़बाल को सौंप दी थी, यानी असली सबूत आज भी ज़िंदा है। और तभी बत्रा अपना पितातुल्य नक़ाब उतार कर नंगा हुक्म देता है और अपने आदमियों से पूरा ऑडिटोरियम सील करा देता है।
सबसे काली घड़ी। बत्रा के उस विशाल ऑडिटोरियम में हज़ार वॉट की रोशनी अब भी जल रही थी, पर उसके नीचे सच दफ़न हो रहा था। परदों पर बत्रा का गढ़ा हुआ 'सबूत' बार-बार चल रहा था, और पूरा देश, करोड़ों आँखें, एक हीरो को एक हत्यारे में बदलते देख रहा था। बैकस्टेज के अँधेरे में सुहाना की कनपटी पर अब भी एक ठंडी धातु टिकी थी, और उसके पीछे नैरा, फ़ोन थामे, काँपती हुई।
और उस रोशनी के बीचोंबीच, आर्यन अकेला खड़ा था। दो भारी-भरकम आदमी उसकी बाँहें थामे उसे मंच से खींचने की कोशिश कर रहे थे। माइक बंद था, सबूत झूठा था, भीड़ ग़ुस्से में थी। हर वो चीज़ जिसके लिए वो नौ साल जिया था, उसकी आँखों के सामने राख हो रही थी। और फिर भी, वो अपने पैर जमाए खड़ा रहा।
"हाथ हटाओ मुझ से! ... मैं नहीं भागूँगा! नौ साल भागा हूँ, आज नहीं! ... तुमने मेरा माइक बंद किया है, मेरी आवाज़ नहीं बंद कर सकते! ... सुन लो सब! ये फ़िल्म झूठी है! आकाश को इस आदमी ने मरवाया, योहान बत्रा ने! और मैं आज मर भी गया, तो एक सच बन कर मरूँगा!"
उसकी आवाज़ माइक के बिना भी उस विशाल हॉल में गूँजी। लोग साफ़ सुन नहीं पा रहे थे कि वो क्या कह रहा है, पर वो ये देख रहे थे कि एक आदमी, जिसे पागल कहा जा रहा था, टूटने के बजाय और सीधा खड़ा हो रहा था। और बैकस्टेज, मॉनिटर पर, सुहाना ने वो देखा, और उसकी जमी हुई साँस में एक चिंगारी लौट आई।
"बोलते रहो, आर्यन। ... जो मैंने कहा था, वही करो। रुको मत। ... तुम मंच पर मेरे लिए लड़ रहे हो। ... अब मेरी बारी है।"
और जिस पल बत्रा का सुरक्षा-प्रमुख एक पल को मॉनिटर की तरफ़ मुड़ा, अपने मालिक की जीत देखने, सुहाना नौ साल की फ़ौज बन गई। एक कोहनी उसकी कलाई पर, एक तेज़ मोड़, और बंदूक हवा में उछल गई। एक ठोकर, और वो आदमी पीछे की दीवार से जा टकराया।
"तुम्हारी सबसे बड़ी ग़लती, ... एक फ़ौजी की कनपटी पर बंदूक रख कर उसे मरा हुआ समझ लेना। ... नैरा, मेरे साथ। अभी। फ़ोन मत छोड़ना।"
दो और आदमी झपटे। सुहाना ने पहले को घुटने पर गिराया, दूसरे को एक लोहे के दरवाज़े से टकराया, और नैरा का हाथ थाम कर बैकस्टेज के अँधेरे गलियारों में खींच लिया, उस शोर से दूर, एक छोटे से नियंत्रण-कक्ष में, जहाँ मॉनिटरों की नीली रोशनी काँप रही थी।
"कोई फ़ायदा नहीं, सुहाना... ... मास्टर रिकॉर्डिंग जल गई। उस रात की असली रिकॉर्डिंग, बत्रा की तिजोरी में, आग में राख हो गई। ... हमारे पास सिर्फ़ काग़ज़ हैं, दलीलें हैं। और बत्रा के पास एक चलती-फिरती, बोलती फ़िल्म। ... आर्यन हार रहा है, और मैं फिर से अपने भाई को मरते देख रही हूँ।"
"नहीं। ... एक झूठी फ़िल्म को सिर्फ़ एक ही चीज़ हरा सकती है, नैरा। एक सच्ची आवाज़। ... बत्रा ने आकाश की आवाज़ को चुरा कर, काट कर, एक झूठ बनाया है। ... तो हमें आकाश की असली आवाज़ चाहिए। बिना कटी, बिना गढ़ी। ... सोचो। उस रात की कोई और रिकॉर्डिंग? कुछ भी?"
और नैरा एक पल को जम गई। सुहाना ने वो झिझक देखी, वो चीज़ जो नैरा नौ साल से अपने सीने में दबाए बैठी थी। सुहाना ने उसके दोनों कंधे थाम लिए, और उसकी आँखों में सीधे देखा। वक़्त रेत की तरह फिसल रहा था।
"नैरा, अगर कुछ है, तो वक़्त अभी है। ... आर्यन के पास मिनट नहीं, सेकंड बचे हैं। ... अगर तुम्हारे पास कुछ है, तो अपने भाई के नाम पर, अभी बोलो।"
"एक और रिकॉर्डिंग है। ... उस रात, बत्रा की धमकी के बाद, आकाश डरा हुआ था। उसने अपने ही फ़ोन पर, चुपके से, सब रिकॉर्ड कर लिया था। बत्रा का हुक्म, वो पूरी बातचीत, अपनी आख़िरी बात। ... और मरने से पहले उसने वो रिकॉर्डिंग इक़बाल सर को भेज दी, अपने उस्ताद को, ये कह कर, 'अगर मुझे कुछ हो जाए, तो इसे सँभाल कर रखना।' ... और एक नक़ल मैंने नौ साल से छुपा कर रखी है।"
"तुम्हारे पास नौ साल से ये थी? ... आकाश की अपनी आवाज़ में, बत्रा का हुक्म? ... और तुमने इसे कभी इस्तेमाल क्यों नहीं किया, नैरा?"
"क्योंकि एक चुराई हुई रिकॉर्डिंग अदालत में सिर्फ़ एक बहस बन जाती। बत्रा उसे भी झूठा साबित कर देता, जैसे आज उसने आर्यन की आवाज़ को कर दिया। ... पर अगर देश का सबसे बड़ा सितारा ख़ुद, अपनी मर्ज़ी से, इक़बाल करे, तो उसे कोई नहीं झुठला सकता था। ... मेरा पूरा नौ साल का खेल इसी एक पल के लिए था। आज आर्यन बोल भी दिया, और फिर भी बत्रा जीत रहा है। ... इसलिए अब वक़्त आ गया है आकाश की अपनी आवाज़ का।"
"तो वो नक़ल कहाँ है, नैरा? इसी वक़्त, वो रिकॉर्डिंग कहाँ है?"
"असली फ़ाइल इक़बाल सर के पास है, हमेशा से। और इस वक़्त वो तैयार बैठे हैं, इसी ऑडिटोरियम से थोड़ी दूर। ... मैंने उन्हें आज ही सब बता दिया था। ... उन्हें बस अंदर आना है, इस जगह के प्रसारण-कक्ष तक। ... अगर आकाश की आवाज़ उसी फ़ीड पर चल जाए जिस पर बत्रा का झूठ चला, तो करोड़ों लोग एक ही पल में दोनों सुन लेंगे।"
सुहाना का दिमाग़ बिजली की तरह दौड़ा। बत्रा ने अपना झूठ इसी ऑडिटोरियम के प्रसारण-तंत्र से पूरे देश तक पहुँचाया था। वही तंत्र, वही तार, वही करोड़ों स्क्रीन। एक झूठ को उसी मंच से हराया जा सकता था जिस मंच पर उसे रचा गया था। उसने रेडियो उठाया।
"जग्गी, सुन रहे हो? ... इक़बाल साहब को फ़ोन करो, अभी। उनके पास एक रिकॉर्डिंग है, आकाश की असली आवाज़। उन्हें ऑडिटोरियम के पीछे वाले गेट तक लाओ, और प्रसारण-कक्ष तक पहुँचाओ। ... और एक और काम, जग्गी। एसीपी नायक को बुलाओ, वो ईमानदार अफ़सर जिसकी मैंने तुम्हें बात बताई थी। उससे कहो, आज रात का सबसे बड़ा मुजरिम इसी ऑडिटोरियम में है, लाइव कैमरे पर।"
और उधर मंच पर, बत्रा अपनी जीत का रस चख रहा था। उसने आर्यन की तरफ़ इशारा किया, जिसे अब भी दो आदमी थामे हुए थे, और भीड़ की तरफ़ मुड़ा, अपनी मख़मली आवाज़ में एक-एक बूँद ज़हर घोलता हुआ।
"देखिए इस बेचारे को। ... मेरे अपने बेटे जैसा। नौ साल मैंने इसका ये बोझ ढोया, इसका गुनाह छुपाया, एक बाप की तरह। ... और आज इसका दिमाग़ जवाब दे गया। ये पागलपन है, दोस्तो, ये एक बीमारी है। ... इसे अस्पताल की ज़रूरत है, सज़ा की नहीं। ले जाओ इसे, नरमी से।"
पर आर्यन टूटा नहीं। उसने एक झटके से अपने आप को उन आदमियों से छुड़ाया, और सीधे बत्रा की आँखों में देखा, पूरे हॉल के सामने। और उसकी आवाज़ में अब वो चीज़ थी जो पागलों में नहीं होती। एक ठहराव। एक यक़ीन।
"आप मुझे पागल कह रहे हैं, बत्रा साहब? ... तो मेरे एक सवाल का जवाब दीजिए, इन सबके सामने। ... अगर आपके पास उस रात का सच्चा सबूत था, तो आपने अपनी ही तिजोरी को आग क्यों लगाई? ... आपने अपनी ही रिकॉर्डिंग क्यों जलाई? ... एक बेगुनाह आदमी सबूत जलाता नहीं, बचाता है।"
और पहली बार, उस हॉल की सरगोशी का रुख़ बदला। कुछ चेहरे एक-दूसरे को देखने लगे। कुछ आँखों में एक सवाल जागा। बत्रा की गढ़ी हुई कहानी की चिकनी सतह पर एक महीन दरार पड़ी, और बत्रा ने उस दरार को अपनी रीढ़ में महसूस किया।
नौ साल में पहली बार, योहान बत्रा को कुछ ऐसा सूझना पड़ रहा था जो उसने पहले से तय नहीं किया था। साज़िश उसका फ़न था, पर अचानक के सवालों का जवाब देना नहीं। और तभी उसके कान में लगे यंत्र में उसके सुरक्षा-प्रमुख की हाँफती हुई आवाज़ आई।
"बेदी छूट गई? ... एक अकेली औरत, और तुम दस आदमी? ... वो और वो लड़की बैकस्टेज कहीं हैं, कुछ कर रही हैं। ... बस। बहुत हुआ। ... अब मैं ये तमाशा अपने तरीक़े से ख़त्म करता हूँ।"
और वहीं, उस चमकते मंच के एक अँधेरे कोने में, योहान बत्रा का वो मख़मली, पितातुल्य नक़ाब उतर गया, जिसे उसने नौ साल पहन रखा था। नीचे जो चेहरा था, वो किसी बाप का नहीं था। वो एक शिकारी का था, ठंडा, नंगा, और भूखा।
"अब कोई कहानी नहीं। ... कोई फ़िल्म नहीं, कोई इक़बालनामा नहीं, कोई नाटक नहीं। ... मैं थक गया हूँ इन तीनों से। ... आर्यन, वो बेदी, और आकाश की वो बहन। ... तीनों। ... सुबह होने से पहले। ख़त्म।"
और उसके एक इशारे पर, वो 'सुरक्षा' जो सितारे की हिफ़ाज़त के नाम पर आई थी, अपना असली चेहरा दिखाने लगी। हर दरवाज़े पर एक आदमी। हर निकास बंद। हर खिड़की पर एक पहरा। लाल कालीन वाला वो महल, एक पल में, एक बंद पिंजरा बन गया।
नियंत्रण-कक्ष में, सुहाना ने मॉनिटरों पर वो सब देखा, एक-एक करके हर दरवाज़ा बंद होता हुआ, हर निकास पर एक काली परछाई खड़ी होती हुई। नौ साल की उसकी फ़ौजी नज़र ने एक पल में पूरा नक़्शा पढ़ लिया। जाल पूरा हो चुका था।
"उसने पूरा ऑडिटोरियम सील कर दिया। ... अब न कोई अंदर आ सकता है, न बाहर जा सकता है। ... इक़बाल साहब बाहर हैं, रिकॉर्डिंग के साथ, और उन्हें अंदर आना है। नायक बाहर है, और उसे अंदर आना है। ... और हम अंदर हैं, और बत्रा हमें ज़िंदा बाहर नहीं जाने देगा।"
"तो हम फँस गए। ... रिकॉर्डिंग बाहर, हम अंदर, और हमारे और सच के बीच, हर दरवाज़े पर, बत्रा का एक आदमी।"
"फँसे नहीं, नैरा। घिरे हुए हैं। ... और एक घिरा हुआ फ़ौजी सबसे ख़तरनाक होता है, क्योंकि अब उसके पास खोने को कुछ नहीं, सिर्फ़ जीतने को सब कुछ है। ... तुम वो फ़ोन थामे रहो। मैं इक़बाल साहब के अंदर आने का रास्ता निकालती हूँ।"
और एक पल को, उस काँपती नीली रोशनी में, सुहाना ने नैरा का काँपता हाथ थाम लिया। दो औरतें, एक ही आदमी को खो कर, नौ साल एक ही ख़ामोशी में जली हुईं। पहली बार, सुहाना की आवाज़ में फ़ौज नहीं, एक बहन थी।
"हम दोनों उसे प्यार करते थे, नैरा। तुम बहन बन कर, मैं दोस्त बन कर। ... आज हम उसे इंसाफ़ देंगे। आज उसकी अपनी आवाज़ इस पूरे देश में गूँजेगी, नौ साल की ख़ामोशी के बाद। ... बस थोड़ी देर और थामे रखो। हम इतने क़रीब पहले कभी नहीं आए।"
मॉनिटर पर, आर्यन को अब घसीट कर मंच से उतारा जा रहा था। पर उसने अपनी नज़र सीधे कैमरे में गड़ा दी, उन करोड़ों आँखों में, जो अभी-अभी उसे मुजरिम समझ बैठी थीं, और आख़िरी साँस तक बोलता रहा।
"मुझे मत मानो, ठीक है। ... पर अपने आप से एक सवाल पूछो। ... एक आदमी अपनी सारी शोहरत, अपनी पूरी ज़िंदगी, एक झूठ के लिए क्यों जला देगा? ... मैं यहाँ खड़ा हूँ, और मैं यहीं रहूँगा, जब तक सच बाहर न आ जाए। ... थोड़ा इंतज़ार करो। सच आ रहा है।"
और बत्रा ने वो सुना, 'सच आ रहा है', और उसकी आँखें सिकुड़ गईं। उसे नहीं पता था कि आर्यन बस एक झाँसा दे रहा था, या सच में कुछ आ रहा था। और यही न-जानना, यही उसे सबसे ज़्यादा डरा रहा था। उसने अपने प्रमुख को अपने पास बुलाया।
"वो कह रहा है सच आ रहा है। ... मुझे नहीं पता वो क्या है, और मुझे परवाह नहीं। ... हर दरवाज़ा बंद रखो। जो भी अंदर आने की कोशिश करे, चाहे पुलिस हो, चाहे कोई बूढ़ा उस्ताद, रोक दो, चाहे गोली से। ... और उन तीनों को ढूँढो। ... मैं आज इस ऑडिटोरियम से जीत कर निकलूँगा, या ये सबकी क़ब्र बनेगा।"
और सुबह होने में अभी कई घंटे बाक़ी थे। बाहर, एक बूढ़ा उस्ताद एक छोटी सी रिकॉर्डिंग थामे बंद गेट पर खड़ा था, वो आवाज़ जो सच को अंदर ला सकती थी। अंदर, आर्यन रोशनी में अकेला, वो सच थामे। और उन दोनों के बीच, हर दरवाज़े पर, योहान बत्रा के आदमी, अपने मालिक के उस नंगे हुक्म के साथ, कि आज रात, सुबह से पहले, ये कहानी तीन लाशों के साथ ख़त्म होगी। घड़ी की हर टिक अब एक गिनती थी, और वो गिनती उलटी चल रही थी।
"ठीक है, बत्रा। ... तुमने हर दरवाज़ा बंद कर दिया। ... पर तुम एक बात भूल गए। मैं दरवाज़ों से नहीं आती, फ़र्ज़ से आती हूँ। ... आज रात, इस बंद ऑडिटोरियम में, या तो तुम्हारा नौ साल पुराना झूठ मरेगा, ... या मैं। ... और कैप्टन सुहाना बेदी इतनी आसानी से नहीं मरती।"
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts.