अध्याय 18 / 26 पढ़ने में 13 मिनट
साया बेनक़ाब
साया बनके द्वारा Avni Oberoi
सुहाना दोबारा जलते ऑडिटोरियम में घुस कर उस फँसे हुए नक़ाबपोश साये को मलबे से खींच निकालती है और खुली रात में उसका जला हुआ नक़ाब उतारती है, और उस चेहरे को देख कर उसकी और आर्यन की साँस रुक जाती है, क्योंकि वो कोई अजनबी नहीं, वो नैरा है, आर्यन की सबसे भरोसेमंद सेक्रेटरी, आकाश की छोटी बहन, वही जो सुहाना को इस घर तक लाई थी। नौ साल का पूरा खेल एक पल में उलट जाता है। नैरा इक़बाल करती है कि वो बरसों से इस घर में सिर्फ़ इसलिए घुसी बैठी थी ताकि आर्यन से उसके भाई की चोरी और मौत का सरेआम इक़बाल करवा सके, न कि उसे मारने के लिए, कि उसकी धमकियाँ दबाव थीं और हमले नाटक, और आज की आग उसकी नहीं, ख़ुद उसे ज़िंदा ज
सुहाना दोबारा उस आग में घुसी तो पहली बार उसे लगा कि शायद वो लौट कर बाहर न आए। छत टूट कर गिर रही थी, हवा में साँस नहीं, सिर्फ़ आग थी। पर उसका फ़ौजी दिमाग़ धुएँ को भी पढ़ रहा था, और उसने वो रास्ता पकड़ा जिससे वो नक़ाबपोश साया ऊपर गया था, उसी सर्विस सीढ़ी की तरफ़, जो तिजोरी तक जाती थी।
"कहाँ हो तुम?! ... जवाब दो! तुमने मेरी जान बचाई थी, अब मैं तुम्हें वहाँ मरने नहीं दूँगी! ... आवाज़ दो, कहीं भी हो, बस एक आवाज़!"
और तभी उसे वो दिखी। सीढ़ी के आख़िरी मोड़ पर, एक गिरी हुई जलती बीम के नीचे, वही नक़ाबपोश आकृति दबी पड़ी थी, वही जिसने कुछ देर पहले अपने कंधे से एक बीम रोक कर सुहाना को बचाया था। अब वही बीम उसकी अपनी टाँग पर गिरी थी, और वो हिल नहीं पा रही थी।
"मत आओ... कैप्टन, वापस जाओ... मैं इसी लायक़ हूँ... तुम्हें मेरे लिए मरने की ज़रूरत नहीं... तुम आर्यन को बचा चुकी हो, बस इतना काफ़ी है..."
"बकवास बंद करो! जो भी हो तुम, आज कोई नहीं मरेगा, न वो, न तुम! ... तीन गिनूँगी, और तुम अपनी पूरी ताक़त से ख़ुद को खींचोगी। एक... दो... अब!"
सुहाना ने एक टूटे लोहे के डंडे को लीवर बना कर बीम को एक बित्ता उठाया, बस एक बित्ता, और उसी पल में उस लड़की को उसके नीचे से घसीट लिया। दोनों लुढ़कती हुई सीढ़ियों से नीचे गिरीं, धुएँ की उस आख़िरी परत में, और सुहाना ने उसे अपनी बाँहों में समेट कर उस टूटे शीशे के दरवाज़े की तरफ़ धकेला, जहाँ से थोड़ी देर पहले वो आर्यन को निकाल कर लाई थी।
और फिर वो दोनों बाहर, खुली रात में गिर पड़ीं। ठंडी, नमकीन समंदर की हवा उनके झुलसे फेफड़ों में किसी माफ़ी की तरह भरी। दमकल की गाड़ियाँ अब बहुत क़रीब थीं, उनकी लाल रोशनी आग की पीली लपटों से टकरा रही थी। और सुहाना, घुटनों के बल, हाँफती हुई, उस बेदम लड़की के ऊपर झुकी।
लड़की का नक़ाब, वो गीला कपड़ा, अब आधा जल कर उसके चेहरे से चिपक गया था। सुहाना ने काँपते हाथों से उसे पकड़ा। नौ महीने। नौ महीने से वो इसी चेहरे को ढूँढ रही थी। उस हर धमकी के पीछे, उस हर हमले के पीछे, इसी नक़ाब के पीछे। उसने एक झटके से वो जला हुआ कपड़ा खींच दिया।
और आग की रोशनी में वो चेहरा उभरा। धुएँ से काला, आँसुओं से लकीरदार, पर पहचाना हुआ। इतना पहचाना हुआ कि सुहाना का दिमाग़ एक पल को उसे मानने से इनकार कर गया। ये कोई अजनबी नक़ाबपोश नहीं थी। ये वो चेहरा था जिसे वो रोज़ इस घर के हर गलियारे में देखती थी, जो रोज़ मुस्कुरा कर उसे चाय पूछता था।
"नैरा...? ... नहीं। नहीं, ये... ये नैरा नहीं हो सकती। नैरा, तुम... तुम यहाँ, इस नक़ाब में...? ... तुम वो हो? नौ साल से मुझे धमकियाँ देने वाली वो तुम हो?"
सुहाना के हाथ अब भी उस जले नक़ाब को थामे हुए थे, हवा में जमे। उसकी सारी छानबीन, उसकी हर फ़ाइल, उसका हर शक, सब कुछ एक पल में इसी एक चेहरे पर आ कर टूट गया। घर का सबसे भरोसेमंद, सबसे लाडला चेहरा। जिसकी तरफ़ उसका शक हर बार पहुँच कर फिसल जाता था। क्योंकि दिल मानने को तैयार ही नहीं था।
"तुम... नैरा सूद। मेरी हर फ़ाइल तुमसे होकर गुज़री। तुमने ख़ुद मुझे इस घर के सारे रिकॉर्ड दिए। तुमने शक की सुई भास्कर की तरफ़ मोड़ी। ... और ये पूरा वक़्त, वो साया, वो नक़ाबपोश, वो तुम थी। मेरे अपने घेरे के अंदर। मेरी आँखों के सामने।"
"नैरा सूद कभी थी ही नहीं, कैप्टन। ... मेरा नाम नैरा माथुर है। ... आकाश माथुर की छोटी बहन। उस आदमी की बहन, जिसका नाटक इस आदमी ने चुराया, और जिसकी लाश को इन्होंने एक ख़बर बना कर छोड़ दिया।"
आकाश माथुर। वो नाम उस जलती रात में एक और आग की तरह फैला। सुहाना को वो किशोरी याद आई, नौ साल पुरानी उस सेट की तस्वीर के सबसे पीछे खड़ी, क्लैपबोर्ड थामे, सिर्फ़ आर्यन को घूरती हुई। वही आँखें। वो आँखें जिनसे वो इस घर में रोज़ गुज़रती थी, और कभी पहचान नहीं पाई थी।
"नन्ही... नन्ही नैरा। आकाश की गुड़िया। ... तुम इतनी बड़ी हो गईं, और मैंने पहचाना तक नहीं। तुम मेरे घर में, मेरे साथ, हर रोज़... और मैंने तुम्हारी आँखों में एक बार भी अपने दोस्त को नहीं देखा। ... मैं कितना अंधा हूँ, नैरा। मैं कितना अंधा हूँ।"
"तुमने मुझे नहीं पहचाना, क्योंकि तुमने कभी हमारी तरफ़ देखा ही नहीं, आर्यन। भाई की तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़ नहीं। तुम्हें सिर्फ़ उस रोशनी की तरफ़ देखना आता है जो तुम पर पड़ती है। ... मैंने नौ साल लगा दिए, ख़ुद को मिटा कर एक नया नाम गढ़ने में, ताकि तुम्हारी सबसे क़रीबी परछाई बन सकूँ। और तुमने कभी शक नहीं किया।"
और सुहाना के सामने नौ साल का पूरा नक़्शा अचानक उलट गया। हर वो लम्हा जब नैरा 'मददगार' बन कर उसके पास आई थी, हर वो फ़ाइल, हर वो इशारा, अब एक नई शक्ल में दिखने लगा। शिकार करने वाली ख़ुद खेल रच रही थी। पर उसकी आँखों में जो था, वो एक क़ातिल की भूख नहीं थी। वो कुछ और था। पुराना, गहरा, टूटा हुआ ग़म।
"तो वो सारी धमकियाँ। शीशे पर ख़ून से लिखी वो लाइन। मेरी जेब में रखा वो पैग़ाम। रात को घर में घुसा वो चाकू वाला हमलावर। ... वो सब तुम थी, नैरा? तुमने इस आदमी को मारने की कोशिश की?"
"मारने की? ... कैप्टन, अगर मुझे इसे मारना होता, तो ये नौ साल पहले मर चुका होता। मैं इसकी चाय बनाती हूँ। इसकी दवाइयाँ मेरे हाथ से जाती हैं। मैं इसके सोने के कमरे तक जाती हूँ। मैं इसे सौ बार मार सकती थी, बिना किसी को पता चले। ... मुझे इसकी जान नहीं चाहिए थी। मुझे इसकी ज़ुबान चाहिए थी।"
और सुहाना के भीतर वो फ़ौजी जानती थी कि नैरा सच कह रही थी। जिसके इतने क़रीब कोई नौ साल रहा हो, उसे मारना दुनिया का सबसे आसान काम होता। पर नैरा ने वो नहीं किया। उसने कुछ ज़्यादा मुश्किल किया था। उसने इंतज़ार किया था।
"धमकियाँ दबाव थीं, कैप्टन। हमले नाटक थे। हर बार मैं इसे उस रात के उतना क़रीब ले जाती, जितने में ये टूट जाए, और भरी दुनिया के सामने सच कह दे। कि 'परछाईं' मेरे भाई की चुराई हुई 'साया' थी। कि मेरा भाई ख़ुदकुशी से नहीं मरा। मुझे इसकी मौत नहीं, इसका इक़बाल चाहिए था। मेरे भाई का नाम वापस चाहिए था।"
"तुम मुझे हर रात डराती रहीं, ताकि मैं बोल दूँ। ... और मैं हर बार और गहरा दफ़न होता गया। नैरा, मैं... मैं इतना डरा हुआ था कि मैंने अपने डर को ही अपनी ज़िंदगी बना लिया। तुम्हारे भाई का नाम मेरी हर तरक़्क़ी के नीचे दबा रहा, और मैं उस पर खड़ा हो कर मुस्कुराता रहा।"
उनके पीछे वो ऑडिटोरियम अब भी जल रहा था, पर सुहाना का ध्यान अब उस आग पर नहीं था। एक और सवाल उसके दिमाग़ में बर्फ़ की तरह जम रहा था। अगर ये सारे हमले नाटक थे, दबाव थे, तो फिर आज की ये आग, जो सच में तीन लोगों को राख कर देती, ये किसका काम थी?
"नैरा। अगर हर हमला तुम्हारा नाटक था, तो आज की ये आग? ... ये असली थी। इसमें तुम ख़ुद जल रही थीं। मैंने तुम्हें अपने कंधे पर बीम रोकते देखा। तुमने मुझे बचाया। ... ये आग तुमने नहीं लगाई, है ना?"
"नहीं, कैप्टन। ... ये आग मेरी नहीं थी। ये उस आदमी की थी जो अभी कुछ घंटे पहले तक ऊपर उस मंज़िल पर, टक्सीडो में, शैम्पेन का गिलास थामे खड़ा था। ... योहान बत्रा ने ये आग लगाई। मुझे ज़िंदा जलाने के लिए। क्योंकि उसे पता चल गया था कि मैं उसकी नौ साल पुरानी ख़ामोशी तोड़ने के बेहद क़रीब हूँ।"
और वहीं, उस जलती इमारत के सामने घुटनों के बल बैठी सुहाना के सामने, आख़िरी परदा गिर गया। जिसे वो नौ महीने से एक क़ातिल समझ कर ढूँढ रही थी, वो एक टूटी हुई बहन थी। और असली क़ातिल, वो जिसने आकाश को मारा, वो जिसने आज तीनों को जलाना चाहा, वो अब भी एक शहंशाह की तरह, कहीं इस भीड़ से बाहर, अपनी गाड़ी में बैठा होगा, बेदाग़, मुस्कुराता हुआ।
"बत्रा को लगा मैं बस एक पागल स्टॉकर हूँ, कोई सिरफिरी लड़की। पर जब मैं सच के क़रीब पहुँची, तो उसने फ़ैसला कर लिया कि गवाह को हमेशा के लिए ख़त्म कर देना बेहतर है। एक ही आग में सितारा, बहन, और बॉडीगार्ड। दुनिया कहती, पागल स्टॉकर ने आख़िरी हमला किया और ख़ुद भी जल मरा। कहानी साफ़, हमेशा के लिए बंद।"
और सुहाना ने पहली बार नैरा को एक शिकार की तरह नहीं, एक इंसान की तरह देखा। एक ऐसी लड़की जिसने किशोरावस्था में अपना भाई खोया, अपना नाम मिटाया, और नौ साल एक क़ातिल के घर में उसकी परछाई बन कर जी, सिर्फ़ इसलिए कि किसी दिन भाई को इंसाफ़ मिले। और उसी लड़की को वो एक मुजरिम की तरह पकड़ने निकली थी।
"मेरी पोस्टिंग। इस घर में मेरी पोस्टिंग। एजेंसी ने कहा था वो एक गुमनाम दरख़्वास्त पर हुई थी। ... वो तुम थी, नैरा। तुमने मुझे यहाँ बुलाया। मुझे। नौ साल बाद, ठीक इस घर में। ... क्यों? तुम जानती थीं मैं कौन हूँ। तुम जानती थीं आर्यन ने मेरे साथ क्या किया। तुमने मुझे जान-बूझ कर उस आदमी की परछाई बना दिया जिसने मुझे तोड़ा था।"
"क्योंकि तुम अकेली थी जो मेरे भाई से मुझ जितना प्यार करती थी, सुहाना दीदी। ... तुम अकेली थी जो इस चमकते झूठ के आगे रुक कर सच पूछती। सारा शहर आर्यन साहनी को पूजता है। तुम पूजती नहीं थी। तुम्हारे पास वो एक चीज़ थी जो मेरे पास कब की ख़त्म हो चुकी थी। ... तुम्हारे पास सच की भूख थी, और आकाश के लिए एक साफ़ दिल।"
दीदी। नौ साल में पहली बार किसी ने उसे उस नाम से पुकारा था। और उस एक शब्द में वो नन्ही लड़की छुपी थी जो कभी आकाश के पीछे-पीछे थिएटर की सीढ़ियाँ चढ़ती थी, जो सुहाना को अपनी होने वाली भाभी मानती थी। सुहाना का गला रुँध गया। उसने अपना हथियार वाला हाथ नीचे कर लिया।
"नैरा। नन्ही। ... मैं जानता हूँ माफ़ी की कोई गुंजाइश नहीं है। मैंने तुम्हारे भाई का नाम अपनी शोहरत की नींव बना दिया। मैंने तुम्हारी पूरी ज़िंदगी छीन ली। ... तुम जो सज़ा दोगी, मैं सिर झुका कर लूँगा। पर पहले, बस एक बार, मुझे कहने दो कि मुझे..."
"अपनी माफ़ी अपने पास रखो, आर्यन। ... मैं नौ साल तुम्हारी माफ़ी सुनने नहीं रुकी। मैं तुम्हारा इक़बाल सुनने रुकी हूँ, भरी दुनिया के सामने। और वो अब भी बाक़ी है। ... पर आज रात, इस आग के बाद, एक चीज़ बदल गई है। आज मेरी और तुम्हारी लड़ाई से बड़ी एक लड़ाई सामने आ गई है।"
और सुहाना ने देखा कि नैरा की आँखों में ग़म के साथ-साथ अब एक और चीज़ जाग रही थी। वही चीज़ जो ख़ुद सुहाना की आँखों में थी। दुश्मन का नाम बदल गया था। नौ महीने तक सुहाना एक साये से लड़ती रही, और नैरा एक बुज़दिल से। पर आज दोनों की उँगली एक ही आदमी की तरफ़ मुड़ गई थी। योहान बत्रा।
"बत्रा ने आज तीनों को मारने की कोशिश की और नाकाम रहा, नैरा। इसका मतलब है अब वो और भी ख़तरनाक होगा। वो जान चुका है कि उसका राज़ ख़तरे में है। ... हमारे पास अब वक़्त कम है। मुझे सच चाहिए, पूरा सच, और उसके ख़िलाफ़ कुछ ऐसा जो अदालत में, या दुनिया के सामने, टिक सके। सिर्फ़ इल्ज़ाम नहीं, सबूत।"
और तब नैरा ने कुछ किया जिसने सुहाना और आर्यन, दोनों को रोक दिया। उसने अपनी झुलसी जैकेट के अंदर, सीने से सटी एक जगह से, प्लास्टिक में कई परतों में लिपटा एक छोटा सा पैकेट निकाला। धुएँ और आग के बीच से भी उसने उसे बचाए रखा था, जैसे वो उसकी अपनी जान से भी ज़्यादा क़ीमती हो।
"तुम्हें सबूत चाहिए, कैप्टन? ... ये लो। नौ साल। नौ साल मैंने इसी एक चीज़ के लिए ख़ुद को ज़िंदा रखा। ये वो है जिसके लिए बत्रा ने आज मुझे जलाना चाहा। ... इसमें वो सबूत है कि आकाश ने ख़ुदकुशी नहीं की। उसे योहान बत्रा के हुक्म पर मारा गया।"
सुहाना ने काँपते हाथ से वो पैकेट लिया। नौ साल की उसकी पूरी खोज, आकाश की मौत का पूरा सच, इस एक मुट्ठी में सिमटा था। पर नैरा ने अभी बात ख़त्म नहीं की थी। उसकी नज़र आर्यन पर टिकी थी, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी, बरसों दबी हुई थरथराहट थी।
"और इसमें एक और चीज़ है, कैप्टन। ऐसी चीज़ जो मैंने नौ साल किसी को नहीं बताई। जिसे बताने में मुझे ख़ुद से नफ़रत हुई। ... उस रात, जब मेरे भाई को मारा जा रहा था, आर्यन वहाँ था। ... पर आर्यन चुपचाप खड़ा नहीं रहा। इसने उसे रोकने की कोशिश की। इसने बत्रा के आदमियों से भिड़ने की कोशिश की। ... और इसी की सज़ा में, उस रात, आधा मरने तक इसे पीटा गया।"
सुहाना का सिर एक झटके से आर्यन की तरफ़ घूमा। नौ साल। नौ साल से उसके दिल में एक ही तस्वीर गड़ी थी, एक बुज़दिल की, जो चुपचाप खड़ा रहा जब उसका दोस्त मारा गया, जो सच बेच कर सितारा बन गया। और अब नैरा, वो लड़की जिसके पास इस आदमी से नफ़रत की सबसे बड़ी वजह थी, कह रही थी कि वो तस्वीर झूठी है।
"तुम इसे बुज़दिल समझती हो, दीदी। ... मैं भी नौ साल यही समझती रही। पर मेरे पास सबूत है। उस रात आर्यन बिका नहीं था, आर्यन को तोड़ा गया था। ... ये वो आदमी नहीं है जो तुम सोचती हो। ... और अब फ़ैसला तुम्हें करना है। इस सच के साथ हम बत्रा को गिरा सकते हैं। पर उसके लिए, तुम्हें उस आदमी पर भरोसा करना होगा जिससे तुम सबसे ज़्यादा नफ़रत करती हो।"
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