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अध्याय 9 / 26 पढ़ने में 12 मिनट

रात की आहट

साया बनके द्वारा Avni Oberoi

शाम से ही समंदर बेचैन था। दूर आसमान पर बिजली की लकीरें कौंध रही थीं, और हवा में वो भारी, नमकीन बू थी जो एक बड़े तूफ़ान से पहले आती है। बांद्रा का वो बंगला किसी काँपते हुए जहाज़ की तरह लहरों के सामने तना खड़ा था।

सुहाना अपनी नक़्शे वाली दीवार के सामने खड़ी थी। तीन दिन की वो ख़ामोशी अब भी उसके भीतर एक काँटे की तरह चुभ रही थी। दुश्मन ने बोलना बंद कर दिया था, और उसका मतलब था कि दुश्मन अब कुछ बड़ा सोच रहा था।

दरवाज़े पर एक नर्म दस्तक हुई। और वही जानी-पहचानी, गर्मजोश आवाज़ भीतर आई, हाथ में एक ट्रे और एक मोटी फ़ाइल लिए।

"तूफ़ानी रात है, कैप्टन, तो मसाला चाय बना लाई, ज़रा तेज़। और ये पूरे महीने के एक्सेस लॉग, स्टाफ़ की हर आवाजाही, हर दरवाज़े का रिकॉर्ड। मुझे लगा आपको काम आएँगे। इस घर की हर चीज़ आख़िर मेरे ही हाथों से गुज़रती है ना।"

इस घर की हर चीज़ मेरे हाथों से गुज़रती है। नैरा ने ये बात एक मासूम मदद की तरह कही थी। पर सुहाना जानती थी कि इस घर का सबसे मददगार हाथ, और सबसे झूठे अतीत वाला हाथ, एक ही था।

"शुक्रिया, नैरा। तुम हर बार, बिना पूछे, ठीक वही चीज़ ले आती हो जो मुझे चाहिए होती है। ये या तो बहुत अच्छी याददाश्त है, या बहुत गहरी समझ।"

"नौ साल का तजुर्बा है, कैप्टन। ... और एक बात कहूँ, जो मुझे बहुत दिनों से खटक रही है? भास्कर राणा। मैंने ये लॉग देखे तो चौंक गई। जिस रात आपकी जेब में वो पुर्ज़ा मिला था, उसका कार्ड उस रात दो बार उस गलियारे के दरवाज़े पर लगा है, जहाँ उसका कोई काम नहीं था।"

सुहाना ने वो लॉग देखा। सफ़ाई से रेखांकित, तारीख़, वक़्त, सब साफ़। बहुत साफ़। इतना साफ़ कि किसी ने चाहा हो कि उसकी नज़र सीधे यहीं पड़े। उसने दो चीज़ें एक साथ अपनी फ़ाइल में दर्ज कीं, भास्कर का वो लॉग, और नैरा की ये बेताबी।

"और बाक़ियों की फ़िक्र मत कीजिए, कैप्टन। मैंने जाँच लिया। रिया मैडम उस पूरे हफ़्ते दुबई में थीं, उनके होटल के बिल हैं। और राजवीर सर उस रात एक नाइट शूट पर थे, तीस गवाह हैं। बचता है बस एक ही नाम। भास्कर।"

एक-एक कर के नैरा ने हर तीर को मोड़ दिया, और सारे तीर एक ही आदमी की तरफ़ ताने। रिया साफ़, राजवीर साफ़, और बीच में अकेला खड़ा भास्कर। एक ही हाथ से बुनी हुई एक साफ़-सुथरी तस्वीर।

"तुम मुझे बार-बार एक ही दरवाज़े की तरफ़ ले जाती हो, नैरा। उस दिन भी भास्कर, आज फिर भास्कर। ऐसा क्यों लगता है कि तुम्हें ये पहेली मुझसे पहले ही हल हो चुकी है?"

"नहीं, कैप्टन, ऐसा नहीं है। मैं बस मदद करना चाहती हूँ। इस घर से मुझे... इस घर से मुझे बहुत गहरी मोहब्बत है। जो भी आर्यन सर को नुक़सान पहुँचाना चाहता है, मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकती। बस।"

जो भी आर्यन सर को नुक़सान पहुँचाना चाहता है। ये लफ़्ज़ सुहाना के कानों में वफ़ादारी बन कर पड़े। पर उन्हीं लफ़्ज़ों में एक और सच छिपा था, इतना गहरा कि ख़ुद कहने वाली भी उसे बरसों से ढो रही थी। शिकारी, वफ़ादार का चेहरा पहन कर, अपने ही शिकार के इर्द-गिर्द एक फंदा कस रही थी।

"और कैप्टन, एक बात। आप तीन रातों से सोई नहीं हैं, मैं देखती हूँ। इस पूरे घर में एक आप ही हैं जो आर्यन सर के लिए अपनी नींद तक क़ुर्बान कर रही हैं। ... कभी-कभी लगता है, आप और मैं, हम दोनों एक ही आग में जल रहे हैं।"

सुहाना ने उस नरमी को एक हल्की सी मुस्कान के साथ टाल दिया, ये जाने बिना कि नैरा ने अभी-अभी उससे इस पूरे घर की सबसे सच्ची बात कही थी। वो दोनों सचमुच एक ही आग में जल रही थीं, एक ही मरे हुए आदमी की आग में, बस उसके दो अलग-अलग किनारों पर खड़ी।

"ठीक है। मैं भास्कर को देखूँगी।"

पर जैसे ही नैरा मुस्कुरा कर मुड़ी, सुहाना ने अपनी नोटबुक में सिर्फ़ एक लाइन लिखी। भास्कर का नाम नहीं। बल्कि, 'जो इतनी मेहनत से एक मुजरिम पेश करे, ध्यान उस पर नहीं, पेश करने वाले पर रखो।'

और तभी, जैसे किसी ने आसमान का पेट चीर दिया हो, तूफ़ान पूरे ज़ोर से टूट पड़ा। मूसलाधार बारिश, गरजती बिजली, और समंदर की लहरें दीवार से ऐसे टकराने लगीं जैसे उसे गिरा ही देंगी।

और फिर, एक बड़ी कड़क के साथ, पूरा बंगला एक झटके में डूब गया। हर बत्ती बुझ गई। हर स्क्रीन काली पड़ गई। घुप्प अंधेरा, सिर्फ़ बिजली की कौंध में एक-एक पल को कटता हुआ।

"आर्यन! आवाज़ दो! कहाँ हो तुम?"

"यहाँ! सीढ़ियों के पास! सुहाना, जनरेटर भी नहीं चला, ये तो कभी नहीं हुआ..."

"हिलो मत। मैं आ रही हूँ। मेरी आवाज़ की तरफ़ आओ, धीरे। और मेरा हाथ पकड़ो।"

अंधेरे में उसका हाथ आर्यन की कलाई से टकराया, और उसने उसे कस कर थाम लिया। जनरेटर का न चलना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था, ये सुहाना की फ़ौजी नस-नस जानती थी। पर अभी बहस का वक़्त नहीं था। अभी सिर्फ़ आर्यन को महफ़ूज़ करने का वक़्त था।

"पैनिक रूम। अभी। जब तक बिजली और घेरा बहाल नहीं होता, तुम उस कमरे से बाहर नहीं निकलोगे। और मैं तुम्हारे साथ अंदर ही रहूँगी।"

एक छोटा, बिना खिड़की का कमरा, मोटे दरवाज़े वाला, जिसे सुहाना ने पहले ही दिन तैयार करवाया था। उसने दोनों को अंदर किया और भारी दरवाज़ा बंद कर दिया। एक मद्धम, बैटरी वाली आपात-रौशनी दीवार पर टिमटिमा रही थी, और बाहर तूफ़ान की गरज एक दबी हुई गूँज बन गई।

और अचानक, नौ साल का सारा फ़ासला उस छोटे से कमरे में सिमट आया। दो लोग, एक तंग जगह, एक मद्धम रौशनी, और बाहर एक ऐसा तूफ़ान जिसने बाक़ी पूरी दुनिया को दरवाज़े के उस पार धकेल दिया था।

"तुम्हें पता है, बचपन में मुझे अंधेरे से बहुत डर लगता था। थिएटर के दिनों में भी। और तुम... तुम हमेशा कहती थीं, आर्यन, अंधेरा दुश्मन नहीं है, बस एक परदा है, जिसके पीछे वही होता है जो रौशनी में था।"

"वो सुहाना और बात करती थी, मिस्टर साहनी। इस सुहाना को अंधेरा नहीं, अंधेरे में छिपे लोग चुभते हैं।"

"फिर भी, इस पूरी दुनिया में एक ही जगह है जहाँ मुझे अंधेरे से डर नहीं लगता। और वो तुम्हारे पास है। नौ साल पहले भी यही सच था, और आज भी।"

सुहाना ने कोई जवाब नहीं दिया। पर उस तंग कमरे में उसकी अपनी धड़कन इतनी ज़ोर से बज रही थी कि उसे डर था आर्यन सुन लेगा। आपात-रौशनी की मद्धम लौ में उसका चेहरा, नौ साल पुराना और नया दोनों, बहुत क़रीब था।

"आर्यन, पीछे हटो। ... मैं कह रही हूँ, पीछे हटो।"

पर उसके अपने पैर पीछे नहीं हटे। उसने हुक्म तो दिया, पर वो हुक्म उसके अपने बदन ने नहीं माना। और यही उस पूरी रात की सबसे बड़ी बग़ावत थी, उसका अपना दिल, उसकी अपनी तालीम के, अपने ही हुक्म के ख़िलाफ़।

"सुहाना... इस एक पल में, न तुम कैप्टन हो, न मैं हीरो। यहाँ, इस अंधेरे में, बस वही दो लोग हैं जो बारिश वाले उस थिएटर में हुआ करते थे। बस एक पल के लिए। किसी को पता नहीं चलेगा।"

और वो पल आ खड़ा हुआ, जिससे दोनों नौ साल से भाग रहे थे। उसका माथा उसके माथे से लगभग छू रहा था, उसकी साँस उसके होंठों पर, और नौ साल की वो आग, जो अब तक सुलगती थी, इस बार पूरी लपट बन कर उठी। सुहाना की आँखें अपने आप मुँदने लगीं।

और ठीक उसी पल, दीवार पर लगा वो छोटा सा वायरलेस सेट कड़का, जग्गी की आवाज़ शोर में डूबी हुई, 'कैप्टन, जनरेटर चालू हो गया, घेरा बहाल है, सब ठीक है।' और उस एक आवाज़ ने वो जादू तोड़ दिया।

सुहाना पीछे हटी। पर इस बार कोई बर्फ़ नहीं थी, कोई तीखा फ़िक़रा नहीं था। बस एक गहरी, काँपती हुई साँस। और यही उसे सबसे ज़्यादा डरा रहा था। ग़ुस्सा वो सँभाल सकती थी। पर ये जो नरमी उन दोनों के बीच जाग रही थी, ये किसी भी तूफ़ान से ज़्यादा ख़तरनाक थी।

"ये ग़लत है, आर्यन। तुम अब भी मेरे लिए एक फ़र्ज़ हो, और एक सवाल। और जब तक उस सवाल का जवाब नहीं मिलता, मैं अपने आप को इस नरमी में डूबने नहीं दूँगी। ये मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन सकती है, और तुम्हारी सबसे बड़ी हिफ़ाज़त की ज़रूरत के वक़्त।"

"मैं जानता हूँ। मैं तुम पर ज़ोर नहीं डालूँगा, सुहाना। नौ साल पहले मैंने बिना पूछे तुमसे सब कुछ छीन लिया था। अब मैं कुछ भी बिना तुम्हारी मर्ज़ी के नहीं लूँगा। एक पल भी नहीं।"

और यही, इस पूरी रात में, सबसे ख़तरनाक बात थी। आर्यन का पीछे हटना। उसका सब्र। उसका उसे चुनने का हक़ देना। नफ़रत करना आसान था। पर इस टूटे हुए, बदले हुए आदमी पर भरोसा करना शुरू करना, यही वो जाल था जिससे सुहाना सबसे ज़्यादा डरती थी।

रात गहराती गई। तूफ़ान धीरे-धीरे थका, पर बिजली अब भी रह-रह कर जाती और आती रही, जैसे पूरा घर साँस ले रहा हो। आर्यन थक कर सोफ़े पर ऊँघने लगा। और सुहाना, दरवाज़े के पास, अपनी गश्त पर, जागती रही।

और फिर, रात के उस सबसे सुनसान पहर में, जब पूरा घर सो चुका था, वो आवाज़ आई। इतनी धीमी कि पहले वो हवा लगी। फिर बिजली की एक कौंध, और स्पीकरों में एक हल्की सी खरखराहट। और उस खरखराहट में से, एक आवाज़ उभरी।

एक नौजवान आवाज़। नरम, थोड़ी शर्मीली, और किसी नाटक की लय में डूबी हुई। पूरे घर के स्पीकरों में एक साथ गूँजती हुई, धीमे-धीमे, किसी क़ब्र में से उठती हुई।

"परछाईं कभी पीछा नहीं छोड़ती, मेरे दोस्त। तू जितना भागेगा, वो उतनी क़रीब आएगी। तू उसे दफ़ना देगा, तो वो तेरी नींद में लौटेगी।"

सुहाना की रगों में ख़ून जम गया। वो आवाज़। नौ साल पहले उसने वो आवाज़ सैकड़ों बार सुनी थी, बारिश वाले उस थिएटर में, हँसते हुए, डायलॉग रटते हुए, चाय की चुस्कियों के बीच। उस आवाज़ को वो कभी नहीं भूल सकती थी।

"और एक दिन, जब तू थक कर रुकेगा, वो तेरे ठीक सामने आ खड़ी होगी। तेरी अपनी परछाईं। और तेरी आँखों में देख कर कहेगी, तेरा वक़्त आ गया।"

"ये... ये आवाज़... सुहाना, ये आकाश है! ये आकाश की आवाज़ है! ये मुमकिन नहीं, वो... वो तो..."

"ये रिकॉर्डिंग है, आर्यन। ये उसकी असली आवाज़ है, 'साया' की आख़िरी लाइनें, उसी की ज़ुबान में। किसी ने इसे नौ साल सँभाल कर रखा है। और अब इसे पूरे घर के स्पीकरों पर चला रही है।"

वो पैनिक रूम का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकली, अंधेरे गलियारे में, उस आवाज़ के पीछे। हर स्पीकर से वो लय गूँज रही थी, पर एक जगह वो सबसे तेज़ थी, सबसे साफ़, जैसे वहीं से पूरे घर में बह रही हो।

पूरा बंगला उस मरे हुए लड़के की आवाज़ से भर गया था। बरामदे में, सीढ़ियों पर, रसोई तक, आकाश हर जगह था, और कहीं भी नहीं। सुहाना का हाथ अपनी कमर पर रखे हथियार पर कसा रहा, और उसका दिल आर्यन को पीछे अकेला छोड़ आने पर उसे कोसता रहा। पर आवाज़ के इस काँपते धागे को छोड़ना उससे भी बड़ी ग़लती होती।

सुहाना उस आवाज़ के धागे को पकड़ कर चलती गई, एक गलियारे से दूसरे, जब तक वो एक बंद दरवाज़े के सामने न रुक गई। और उस दरवाज़े को देख कर उसकी साँस रुक गई।

"ये तो आर्यन की स्टडी है। ... इस वक़्त ये कमरा ख़ाली होना चाहिए। बंद। इसमें तो कोई नहीं होता रात को।"

"वो कमरा हमेशा ताले में रहता है, सुहाना। उसकी चाबी सिर्फ़ मेरे पास है। और... और मिहिर के पास। पूरे घर में बस दो चाबियाँ हैं। किसी और के पास नहीं।"

"तो या तो अंदर कोई है, आर्यन। या कोई बहुत दूर बैठ कर इस घर के हर स्पीकर को अपनी उँगलियों पर नचा रहा है। दोनों ही सूरत में, दुश्मन आज सबसे क़रीब है, और सबसे ढीठ। मेरे पीछे रहो। एक क़दम भी आगे मत आना।"

एक मरे हुए आदमी की आवाज़, अपनी ही मौत की लाइन दोहराती हुई, एक ऐसे कमरे के बंद दरवाज़े के पीछे से बह रही थी, जिसमें उस वक़्त किसी का होना नामुमकिन था। सुहाना ने दरवाज़े की मूठ की तरफ़ हाथ बढ़ाया, और भीतर, आकाश की आवाज़ एक बार फिर फुसफुसाई, तेरा वक़्त आ गया।

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