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Chapter 13 of 26 14 min read

क़रीब आकर

साया बनके by Avni Oberoi

आकाश के दस्तख़त वाले उस काग़ज़ को सुहाना ने एक सबूत के लिफ़ाफ़े में बंद कर दिया, पर उसकी हर लाइन कमरे में तैरती रही। नौ बजकर चालीस मिनट। दस दिन। एक मरे हुए आदमी के दस्तख़त। दोनों जानते थे कि आज की रात नींद उनके पास फटकने भी नहीं आएगी।

बाहर तूफ़ान अपने चरम पर था, और हर कुछ पलों में बिजली समंदर को चाँदी कर देती थी। उस बड़े, ख़ाली कमरे में सिर्फ़ दो लोग थे, और उनके बीच नौ साल का वो फ़ासला, जो अब सिमट कर बस दो क़दम रह गया था। और आज की रात, वो दो क़दम पहाड़ जैसे लग रहे थे, और काँच जैसे भी।

"अगर सच में दस दिन बचे हैं, सुहाना, तो मैं एक झूठ के साथ नहीं मरना चाहता। इस झूठ के साथ, कि मुझे तुम्हारी परवाह नहीं थी। कि मैं शोहरत के नशे में तुम्हें भूल गया था। ये सबसे बड़ा झूठ था जो मैंने जिया, और मैं इसे अपने साथ क़ब्र में नहीं ले जाना चाहता।"

"मत करो ये, आर्यन। हम दोनों जानते हैं कि ये सिर्फ़ डर है। मौत जब सामने खड़ी हो, तो हर आदमी को अचानक मोहब्बत याद आ जाती है। ये मोहब्बत नहीं है। ये वो सन्नाटा है जो मौत से ठीक पहले आता है, और आदमी को कमज़ोर कर देता है।"

"नहीं। ये डर नहीं है। डर तो मैं नौ साल से जी रहा हूँ, और डर ने मुझे कभी सच बोलने की हिम्मत नहीं दी। ये कुछ और है। जिस रात तुम उस दरवाज़े से अंदर आई थीं, नौ साल बाद, तब मेरी जान को ख़तरा था, और फिर भी मेरे दिल ने पहली बात ये कही थी, शुक्र है। शुक्र है कि वो लौट आई।"

और सुहाना की वो फ़ौलादी दीवार, जिसे उसने नौ साल एक-एक ईंट रख कर बनाया था, उस एक लफ़्ज़ पर हिल गई। शुक्र है। क्योंकि उसने भी तो, उस पहली रात, इस आदमी को देख कर, अपनी सारी नफ़रत के बीच, कहीं बहुत गहरे यही महसूस किया था। और उस एक एहसास के लिए उसने अपने आप को महीनों सज़ा दी थी।

"तुम्हें पता है तुमने मेरे साथ क्या किया, आर्यन? तुम एक सुबह उठे और ग़ायब हो गए। कोई चिट्ठी नहीं, कोई फ़ोन नहीं, एक लफ़्ज़ नहीं। मैंने महीनों ख़ुद को नोचा ये समझने में कि मुझमें क्या कमी थी। और तुम परदे पर मुस्कुरा रहे थे, जबकि मैं तुम्हें ढूँढते-ढूँढते अपने आप को खो रही थी।"

"तुममें कोई कमी नहीं थी, सुहाना। कमी मुझमें थी। मैं जानता था कि अगर मैं तुम्हारे सामने एक पल भी और खड़ा रहा, तो तुम मेरी आँखों में वो पढ़ लोगी जो मैंने किया था। तुम आकाश का क़ातिल मुझमें देख लोगी। इसलिए मैं भागा। तुमसे नहीं, तुम्हारी उन आँखों से, जो हमेशा मेरा सच सबसे पहले पढ़ लेती थीं।"

"तुम्हें पता है मैंने उस लड़की का क्या किया जिससे तुमने मोहब्बत की थी? मैंने उसे मार डाला, आर्यन। उसे फ़ौज की वर्दी के नीचे दफ़ना दिया। मैंने पत्थर बनना सीखा, ताकि कोई मुझे फिर कभी उस तरह न तोड़ सके, जैसे तुमने तोड़ा था। और नौ साल बाद, तुम फिर लौट आए, और वो पत्थर, वो मेरी सारी मेहनत, दरकने लगी है।"

"वो लड़की मरी नहीं है, सुहाना। वो अभी भी इन्हीं आँखों में कहीं है। मैं उसे देख सकता हूँ, इसी पल। और अगर मुझे दस दिन में मरना ही है, तो मैं उस लड़की को एक बार, सिर्फ़ एक बार, ये बता कर मरना चाहता हूँ कि मैं कभी उस पर नहीं, अपने आप पर शर्मिंदा था।"

और वो दो क़दम का फ़ासला, नौ साल का वो पूरा फ़ासला, अचानक ख़त्म हो गया। सुहाना को ख़ुद पता नहीं चला कि वो कब उठी, कब उसने वो दूरी पार की। बस अगले पल, उसके हाथ आर्यन के चेहरे पर थे, और नौ साल के दबाए हुए आँसू, बरसों की क़ैद तोड़ कर, उसकी आँखों से बह निकले।

"मैंने तुमसे नफ़रत करने की इतनी कोशिश की, आर्यन। हर दिन। हर रात। इतनी कोशिश। ... और आज तक, हर बार, नाकाम रही।"

और फिर, नौ साल और एक पूरी त्रासदी की मार खा कर, वो आख़िरी दीवार भी टूट गई। आर्यन ने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया, और उन दोनों के होंठ उस एक चुम्बन में मिल गए, जो नौ साल से हवा में अधूरा लटका हुआ था। बाहर तूफ़ान गरजता रहा, और अंदर, दो टूटे हुए इंसान, एक-दूसरे के बिखरे टुकड़े समेटते रहे।

उस चुम्बन में मोहब्बत कम, और एक-दूसरे को ज़िंदा महसूस करने की भूख ज़्यादा थी। मौत की उलटी गिनती, आकाश का साया, फ़र्ज़ की सारी सरहदें, सब उस एक पल में पिघल गईं। पर जब साँसें उखड़ीं, जब दहलीज़ बिल्कुल सामने आ गई, तो सुहाना ने अपना माथा उसके माथे से टिका कर, आँखें भींच कर, ख़ुद को रोक लिया।

"नहीं, आर्यन। ... इससे आगे नहीं। इससे आगे गई, तो मैं वो नहीं रहूँगी जो तुम्हारी जान बचा सके। और अभी, इस घड़ी, तुम्हें एक आशिक़ से ज़्यादा एक पहरेदार की ज़रूरत है। आज की रात मुझे तुम्हें बचाने दो। बाक़ी सब उस रात के लिए बचा रहने दो, जब हम दोनों ज़िंदा होंगे और ये साया हमारे सिर से उतर चुका होगा।"

"ठीक है। नौ साल में पहली बार, मैं किसी चीज़ को पकड़ने के बजाय जाने दे रहा हूँ, क्योंकि तुमने कहा। बस एक वादा करो, सुहाना। जब ये सब ख़त्म हो, तो तुम भागोगी नहीं। जो मैंने नौ साल पहले किया, वो तुम मुझसे मत करना।"

सुहाना ने कोई वादा नहीं किया। उसने बस उसका हाथ एक पल को अपने हाथ में लिया, और फिर छोड़ दिया। उठ कर उसने अपनी वर्दी की तरह अपनी ख़ामोशी फिर से ओढ़ ली, और कमरे से बाहर निकल गई, इस बात से पूरी तरह बेख़बर कि ये रात, दरअसल, अभी शुरू ही हुई थी।

नींद उसे भी नहीं आई। रात के तीसरे पहर, जब पूरा बंगला सो चुका था और सिर्फ़ तूफ़ान जाग रहा था, सुहाना गलियारों में गश्त कर रही थी, अपने भीतर उठे उस तूफ़ान को थामने की कोशिश में। और तभी उसने वो आवाज़ सुनी।

बहुत हल्की, बहुत महीन। कोई धातु किसी धातु पर। एक दबी हुई खट-खट, जो घर की उस दिशा से आ रही थी, जिधर कुछ होना ही नहीं चाहिए था। पुराने नौकर-क्वार्टर के पीछे का वो हिस्सा, जो सालों से बंद और बेकार पड़ा था, और जिसे नक़्शे में सिर्फ़ एक लफ़्ज़ लिखा था, बंद।

"इस तरफ़ तो कुछ है ही नहीं। न कोई कमरा, न कोई रास्ता, न कोई एक्सेस। पूरे नक़्शे में ये हिस्सा मुर्दा है। फिर इस मुर्दा हिस्से में, इस वक़्त, साँस कौन ले रहा है?"

पर सुहाना जानती थी कि जो दुश्मन कैमरे बंद कर सकता है, दीवारों से आवाज़ें निकाल सकता है, बंद वैन में काग़ज़ रख सकता है, वो नक़्शों पर यक़ीन नहीं रखता। उसने अपनी टॉर्च की रौशनी मद्धम की, हथियार निकाला, और उस आवाज़ के पीछे, उस अंधेरे गलियारे में उतरती चली गई, जिससे पूरा घर बचता था।

गलियारे के आख़िर में एक पुरानी अलमारी थी, धूल में अटी, जिसे देख कर लगता था सालों से किसी ने छुई नहीं। पर उसके नीचे, फ़र्श की धूल पर, ताज़ा क़दमों के हल्के निशान थे। सुहाना ने अलमारी को धक्का दिया, और वो किसी दरवाज़े की तरह एक तरफ़ सरक गई। पीछे एक संकरा रास्ता था, और उस रास्ते के आख़िर में एक कमरा, जिसमें से एक मद्धम, नीली रौशनी छन रही थी।

सुहाना उस कमरे में दाख़िल हुई, और जो उसने देखा, उसने एक पल को उसकी फ़ौजी हिम्मत को भी हिला दिया। कमरे की हर दीवार, ज़मीन से छत तक, तस्वीरों से ढकी थी। सैकड़ों तस्वीरें, लाल धागों से एक-दूसरे से बँधी हुईं, जैसे किसी ने एक पूरी ज़िंदगी दीवार पर टाँग दी हो, और फिर बरसों उसे घूरता रहा हो।

एक पूरी दीवार आकाश की थी। आकाश हँसते हुए, आकाश मंच पर, आकाश की अपनी लिखावट में 'साया' के पन्ने, उसका चश्मा, उसकी एक पुरानी क़मीज़, और उन सबके बीच एक बड़ी तस्वीर, जिसमें आकाश एक छोटी लड़की के कंधे पर हाथ रखे मुस्कुरा रहा था। वही लड़की, जो सुहाना ने कल उस मुहूर्त की तस्वीर के सबसे पिछले कोने में देखी थी।

"आकाश... किसी ने तुम्हारा पूरा वजूद, तुम्हारी हर याद, इस अंधेरे कमरे में, इतने बरसों तक, इस तरह सँभाल कर रखा। जैसे कोई किसी मज़ार की हिफ़ाज़त करता है। इतनी मोहब्बत, और इतनी नफ़रत, एक ही दीवार पर।"

और उस दीवार के नीचे, एक छोटी सी मेज़ पर, वो चीज़ रखी थी जिसने कुछ रातें पहले पूरे घर को दहला दिया था। एक पुराना रिकॉर्डर, जिसमें आकाश की आवाज़ कैद थी, 'साया' की वो आख़िरी लाइनें पढ़ती हुई। यहीं से वो आवाज़ पूरे घर में गूँजी थी। दुश्मन कोई भूत नहीं था। दुश्मन इसी कमरे में बैठ कर, एक मरे हुए भाई की आवाज़, अपने ही घर में बजाता था।

फिर सुहाना की टॉर्च दूसरी दीवार पर घूमी। वो आर्यन की थी। पर ये मोहब्बत की दीवार नहीं थी। ये निगरानी की दीवार थी। आर्यन की सैकड़ों तस्वीरें, हर सेट से, हर पार्टी से, हर उस पल से जब उसे लगता था कोई नहीं देख रहा। और उनके बीच, काग़ज़ों पर, उसकी हर दिन की दिनचर्या दर्ज थी। कब उठता है, कब सोता है, किस बात से डरता है। नौ साल की एक-एक साँस का हिसाब।

"ये मोहब्बत नहीं है, ये नौ साल का शिकार है। किसी ने आर्यन को एक शिकारी की तरह पढ़ा, उसकी हर कमज़ोरी को नोट किया, एक-एक दिन, नौ साल तक। और सिर्फ़ इंतज़ार करता रहा। सही वक़्त का इंतज़ार। और अब, प्रीमियर की रात, वो इंतज़ार ख़त्म होने वाला है।"

और फिर सुहाना की टॉर्च तीसरी दीवार की तरफ़ मुड़ी, और उसका दिल एक पल को धड़कना भूल गया। क्योंकि उस दीवार पर न आकाश था, न आर्यन। उस तीसरी दीवार पर वो ख़ुद थी। कैप्टन सुहाना बेदी।

"मैं? ... मैं इस दीवार पर क्यों हूँ? मैं तो इस कहानी में दस दिन पहले आई हूँ। मेरी तस्वीरें यहाँ, इस बरसों पुराने कमरे में, क्यों टँगी हैं?"

उसकी अपनी तस्वीरें। फ़ौज की वर्दी में। उसकी पोस्टिंग के काग़ज़, उसकी ट्रेनिंग का रिकॉर्ड, उसके मेडल, उसके पुराने पते, यहाँ तक कि नौ साल पहले की, आकाश और आर्यन के साथ की उसकी तस्वीरें भी। एक पूरी फ़ाइल, इतनी मुकम्मल कि किसी एजेंसी के पास भी न हो। जिस दुश्मन को वो पढ़ने आई थी, वो दुश्मन नौ साल से उसे पढ़ रहा था।

और उन काग़ज़ों के बीच एक पुराना, पीला पड़ चुका दस्तावेज़ था। एक स्कूल का रिकॉर्ड। एक बच्ची का नाम, और उसके नीचे लिखा, पिता का नाम, माँ का नाम, और भाई का नाम, आकाश मैथुर। सुहाना ने वो नाम पढ़ा, और नौ साल से हर काग़ज़ से ग़ायब एक गुमशुदा लड़की, आकाश की छोटी बहन, आख़िरकार एक चेहरे और एक हक़ीक़त में बदल गई।

"तो ये सच है। धमकी देने वाला आकाश की बहन है। वो लड़का, जिसे दुनिया एक नाकाम, टूटा हुआ इंसान समझ कर भूल गई, उसकी छोटी बहन नौ साल से ज़िंदा है, इसी शहर में, और उसने अपनी पूरी ज़िंदगी एक ही चीज़ के लिए गिरवी रख दी। अपने भाई के इंसाफ़ के लिए। एक बच्ची, जो एक साये में बदल गई।"

पर सबसे बुरा अभी बाक़ी था। उस फ़ाइल में, सबसे ऊपर, एक ताज़ा काग़ज़ रखा था, इतना नया कि उस पर अभी धूल भी नहीं जमी थी। वो एक ई-मेल का प्रिंट था, सुरक्षा एजेंसी को भेजा गया, जिसमें बड़ी सफ़ाई से, बड़ी होशियारी से, ये सुझाव दिया गया था कि आर्यन साहनी की सुरक्षा के लिए एक ही अफ़सर सबसे मुनासिब रहेगी। और उस पर एक ही नाम था। कैप्टन सुहाना बेदी।

"ये काग़ज़ मुझे यहाँ लाया। इस घर में मेरी पोस्टिंग कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं थी। किसी ने, बहुत सोच-समझ कर, मुझे चुना, मुझे इस घर तक पहुँचाया। मैं यहाँ भेजी नहीं गई, मुझे यहाँ बुलाया गया है। नौ साल से जो ये खेल खेल रहा है, उसने मुझे भी अपनी बिसात पर एक मोहरे की तरह बिठाया है, और मुझे भनक तक नहीं लगी।"

और सुहाना का पूरा वजूद एक पल में बिखर गया। चंद घंटे पहले जो चुम्बन उसे नौ साल का इंसाफ़ लगा था, वो अब किसी बिछाए हुए जाल का एक हिस्सा लगने लगा। क्या वो आर्यन के पास ख़ुद पहुँची थी, या किसी अनदेखे हाथ ने उसे वहाँ पहुँचाया था? उसकी मोहब्बत, उसका फ़र्ज़, उसका इंसाफ़, सब कुछ अचानक किसी और की बुनी हुई कहानी लगने लगा।

"मैं ज़िंदगी में पहली बार नहीं जानती कि मैं किस तरफ़ हूँ। मैं शिकारी हूँ या शिकार? मैंने आज रात जो महसूस किया, वो मेरा अपना था, या किसी ने मुझसे महसूस करवाया? ... इस पूरे घर में, इस पूरे खेल में, अकेली मैं ही थी जो अब तक अंधेरे में खड़ी थी।"

और तभी, उसकी पीठ के पीछे, उस अंधेरे कमरे के दरवाज़े की तरफ़ से, एक आवाज़ आई। बहुत धीमी, लगभग एक फुसफुसाहट, जान-बूझ कर दबाई हुई। पर उस फुसफुसाहट में कहीं कुछ जाना-पहचाना था, कोई ऐसी परत, जो सुहाना की याद के दरवाज़े पर दस्तक तो देती थी, पर उस दरवाज़े को खोलती नहीं थी।

सुहाना का पूरा बदन बर्फ़ हो गया। और फिर वो आवाज़, बहुत नरमी से, लगभग एक अफ़सोस के साथ, अंधेरे में से बोली। "कैप्टन बेदी... मुझे माफ़ कीजिए कि आपको ये सब इस तरह पता चला। मैं आपको ख़ुद बताना चाहती थी, अपने तरीक़े से। पर एक बात जान लीजिए। आप इस घर में इत्तिफ़ाक़ से नहीं आईं। इस घर तक आपको लाने वाली मैं थी। आप शुरू से मेरे खेल का हिस्सा थीं, और अब तक की सबसे प्यारी।"

सुहाना बिजली की रफ़्तार से मुड़ी, टॉर्च और हथियार एक साथ उठाते हुए, ठीक उस आवाज़ की तरफ़। पर वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ खुला हुआ अंधेरा, और उस अंधेरे में गुम होते चंद क़दमों की एक हल्की आहट। जो भी था, वो इस अंधेरे को सुहाना से कहीं बेहतर जानता था। उसका नाम ले कर, उसका सबसे बड़ा राज़ खोल कर, उसे छू सकने की दूरी पर खड़ा हो कर, वो फिर से एक साये की तरह घुल गया था।

सुहाना वहीं जमी रह गई, एक ऐसे कमरे में जहाँ उसका अपना अतीत, आर्यन की जान, और आकाश की मौत, तीनों एक ही अंधेरी दीवार पर टँगे थे। दुश्मन कोई अजनबी नहीं था। दुश्मन इसी घर की कोई परछाईं थी, जिसकी आवाज़ उसने अभी-अभी सुनी थी, जिसे वो जानती भी थी और नहीं भी। और सबसे भयानक बात ये थी, कि वो साया चाहता तो आज उसे यहीं ख़त्म कर सकता था। पर उसने नहीं किया। क्योंकि सुहाना, अभी, उसके खेल में मरने से ज़्यादा, ज़िंदा काम की थी।

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