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अध्याय 11 / 26 पढ़ने में 14 मिनट

पुरानी तस्वीर

साया बनके द्वारा Avni Oberoi

रात भर कोई नहीं सोया था। भोर की पहली रौशनी जब समंदर पर गिरी, तो बंगले की हर खिड़की उस रात के बोझ से थकी हुई लग रही थी। मिहिर एक कमरे में क़ैद था, आर्यन एक सोफ़े पर जागता पड़ा था, और सुहाना, वो अपनी स्क्रीन के सामने वैसी ही बैठी थी जैसे नौ घंटे पहले बैठी थी, बिना पलक झपकाए, एक ही धागे को खींचती हुई। पैसे का धागा।

मिहिर ने नाम नहीं लिया था, पर उसने एक रास्ता दे दिया था। हर महीने की वो एक तयशुदा पेमेंट। और सुहाना उस रक़म के पीछे रात भर एक शिकारी की तरह चलती रही थी, एक फ़र्ज़ी कंपनी से दूसरी, दूसरी से तीसरी, जैसे कोई अंधेरे जंगल में एक के बाद एक झूठे दरवाज़े खोलता जाए।

"छह परतें, आर्यन। तुम्हारा पैसा छह झूठी कंपनियों से हो कर गुज़रता है, इससे पहले कि वो कहीं ठहरे। हर कंपनी का पता एक ख़ाली दुकान है, हर मालिक एक ऐसा आदमी जो कभी था ही नहीं। कोई आम चोर इतनी परतें नहीं बुनता। ये किसी ऐसे का काम है जो जानता है कि परतें ही सबसे अच्छी दीवार होती हैं।"

"और सबसे नीचे? आख़िरी परत के पीछे कौन है?"

"एक प्रोडक्शन हाउस। बहुत पुराना, बहुत बड़ा। सारी झूठी कंपनियाँ आख़िर में उसी की छाँव में जा कर मिल जाती हैं। और उस पूरे प्रोडक्शन हाउस के सबसे ऊपर, आर्यन, एक ही नाम बैठा है। सिर्फ़ एक।"

उसने लैपटॉप घुमा कर आर्यन की तरफ़ किया। और जैसे ही आर्यन की नज़र उस स्क्रीन पर पड़ी, उसके चेहरे का बचा-खुचा रंग भी उतर गया। वो नाम उसने पहले भी देखा था। हर पोस्टर पर, हर अवॉर्ड की रात में, और हर उस सपने में जो उसे नींद से चीखता हुआ जगा देता था।

"योहान बत्रा।"

कमरे की हवा जैसे जम गई। बत्रा। वही नाम जो सुहाना ने कुछ रातें पहले आर्यन की नींद की बड़बड़ाहट में सुना था, आकाश और आग के साथ गुँथा हुआ। अब वो नाम एक सपने से निकल कर एक बैंक के खाते में आ खड़ा हुआ था, ठोस, ठंडा, और असली।

"योहान बत्रा। वही जिसने तुम्हें सितारा बनाया।"

"वही। नौ साल पहले एक अनजान लड़के को उठा कर उसने रातों-रात हीरो बना दिया। मेरी पहली फ़िल्म, 'परछाईं', उसी ने बनाई थी। इस पूरी इंडस्ट्री में एक ही आदमी है जिसे लोग भगवान भी कहते हैं और शैतान भी, एक ही साँस में। जब किसी का कोई ऐसा मसला हो जो पैसे या पुलिस से हल न हो, तो लोग धीरे से कहते हैं, बत्रा साहब को बता दो। वो सब सँभाल लेते हैं।"

"सब सँभाल लेते हैं। और तुम, नौ साल से, हर महीने, अपने ही हाथों से उसी आदमी को पैसे भेजते आए हो जिसने तुम्हें बनाया। तुम इसे शुक्राना समझते रहे, आर्यन। पर ये शुक्राना नहीं था। ये किराया था। एक क़ब्र का किराया, जो तुम अपनी ही जेब से भरते आए हो।"

"मैं समझता था वो कोई पुरानी देनदारी है... लॉन्च का हिसाब, कोई कमीशन। मिहिर हर महीने काग़ज़ मेरे सामने रखता था और मैं आँख मूँद कर दस्तख़त कर देता था। मुझे कभी सोचने की हिम्मत ही नहीं हुई कि वो पैसा किसकी जेब में, किस बात के लिए जा रहा है। क्योंकि सोचता, तो शायद जवाब मिल जाता, और मैं जवाब से डरता था।"

तभी दरवाज़े पर एक हल्की, सधी हुई दस्तक हुई। नैरा थी। हाथों में एक पुराना, धूल में अटा कार्डबोर्ड का डिब्बा, और चेहरे पर वही थकी हुई, भरोसेमंद नरमी जो इस घर की हर सुबह का हिस्सा थी।

"कैप्टन, आपने कल रात कहा था कि आपको 'परछाईं' के लॉन्च के ज़माने के सारे पुराने काग़ज़ चाहिए। मैंने रात भर स्टोर रूम खँगाल कर सब निकाल लिया। प्रेस के फ़ोल्डर, पुराने बिल, और... सेट की कुछ तस्वीरें। नौ साल पुरानी हैं, धुँधली हैं, पर शायद आपके काम आ जाएँ।"

नैरा हर काम इसी तरह करती थी, चुपचाप, पूरा, बिना पूछे। पूरा घर उस पर टिका था। कमला बाई कहती थीं कि नैरा के बिना ये बंगला एक दिन भी न चले। और शायद यही सच था। बस किसी को ये नहीं पता था कि नैरा इस घर को चलाती आख़िर क्यों थी।

"शुक्रिया, नैरा। तुमने रात भर जाग कर ये किया? तुम्हें आराम की भी ज़रूरत है। इसे यहीं मेज़ पर रख दो।"

सुहाना ने डिब्बा खोला। अंदर बरसों की धूल थी, और उसके नीचे दबा एक पूरा ज़माना। पीले पड़ चुके पोस्टर, अख़बार की कतरनें, और एक मोटा लिफ़ाफ़ा जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था, 'परछाईं, मुहूर्त, पहला दिन।'

उसने लिफ़ाफ़े से तस्वीरें निकालीं और मेज़ पर फैला दीं। सेट की तस्वीरें। कैमरे, रौशनियाँ, और एक जवान आर्यन, जिसकी आँखों में अभी वो डर नहीं आया था जो अब उसकी पहचान बन चुका था।

"देखो मुझे। कितना बेवक़ूफ़ था मैं। मुझे लगता था मैंने दुनिया जीत ली है। मुझे नहीं पता था कि जिस दिन ये तस्वीरें खिंचीं, उसी दिन मैंने अपनी रूह गिरवी रख दी थी। ये मुस्कान... ये मेरी नहीं है, सुहाना। ये किसी और की चुराई हुई ख़ुशी है, जो मैंने अपने चेहरे पर चिपका ली।"

और तभी सुहाना ने एक बात नोट की। नैरा गई नहीं थी। वो दरवाज़े पर ही ठहरी थी, नज़रें मेज़ पर बिखरी उन तस्वीरों पर जमी हुईं। उसका चेहरा हमेशा की तरह शांत था, पर उसकी उँगलियाँ दरवाज़े की चौखट को कुछ ज़्यादा ही कस कर पकड़े हुए थीं, और उसकी साँस, बस एक पल को, अटक सी गई थी।

"नैरा? तुम ठीक हो?"

"जी, कैप्टन। बस... इतनी पुरानी तस्वीरें देख कर अजीब लगता है ना। इस घर में सब कुछ इतना बदल गया है, और वक़्त कितनी बेरहमी से गुज़र जाता है। ... मैं आप दोनों के लिए चाय भिजवाती हूँ।"

और नैरा चली गई। सुहाना ने एक पल को उसकी जाती हुई पीठ देखी, फिर सोचा, इस घर में तो हर कोई डरा हुआ है, हर चेहरे पर कोई न कोई साया है। और वो वापस तस्वीरों में डूब गई। उसने वो एक पल, जो सबसे ज़्यादा बोलता था, अनजाने में नज़रअंदाज़ कर दिया। पर सुनने वाला उसे नहीं भूला।

फिर आर्यन का हाथ एक तस्वीर पर रुका, और वहीं जम गया। वो पूरे यूनिट की तस्वीर थी, मुहूर्त के दिन की, जिसमें प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, हीरो, सब एक क़तार में खड़े थे, मुस्कुराते हुए, एक नई फ़िल्म की शुरुआत पर।

"यहाँ... यहाँ आकाश खड़ा था। मेरे ठीक बग़ल में। मुझे आज तक याद है, उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा था और कहा था, देख आर्यन, आज से तेरा नाम इतिहास में लिखा जाएगा। ये उसकी कहानी थी, सुहाना। 'परछाईं' उसने लिखी थी, एक-एक लफ़्ज़। पर इस तस्वीर में..."

सुहाना ने तस्वीर अपने हाथ में ली और उसे रौशनी के सामने किया। और उसकी फ़ौजी आँख ने वो देख लिया जो एक आम नज़र से छूट जाता। आर्यन के बग़ल में एक ख़ाली जगह थी, पर वो जगह क़ुदरती नहीं थी। किसी का कंधा, किसी की आधी बाँह, तस्वीर के किनारे पर बहुत सफ़ाई से काट दी गई थी। कोई खड़ा था वहाँ, और उसे मिटा दिया गया था।

"ये तस्वीर काटी गई है, आर्यन। तुम्हारे बग़ल में कोई खड़ा था और उसे बहुत सोच-समझ कर इस फ़्रेम से बाहर कर दिया गया। ये लापरवाही नहीं है। ये मिटाना है। किसी को एक दिन की हर याद से खुरच कर निकाल देना, ताकि लगे कि वो वहाँ कभी था ही नहीं।"

और फिर उसकी नज़र तस्वीर के नीचे वाले हिस्से पर गई, जहाँ फ़िल्म का क्लैपबोर्ड रखा था, वो तख़्ती जिस पर फ़िल्म का नाम और उसके बनाने वालों के नाम लिखे होते हैं। 'परछाईं' लिखा था। डायरेक्टर का नाम था। प्रोड्यूसर, योहान बत्रा। पर जहाँ 'लेखक' लिखा होना चाहिए था, वहाँ सिर्फ़ एक धब्बा था। एक नाम, जिसे रगड़ कर मिटा दिया गया था।

"उन्होंने उसे हर जगह से मिटा दिया, सुहाना। परदे से, पोस्टर से, इस तख़्ती से, इस तस्वीर से। जैसे वो कभी था ही नहीं। दुनिया को बताया गया कि 'परछाईं' मेरी वजह से चली। पर सच ये है कि वो कहानी आकाश की थी, और मैं... मैं उस चोरी का सिर्फ़ एक ख़ूबसूरत चेहरा बन गया।"

और सुहाना के हाथ में वो तस्वीर काँप उठी। नौ साल। नौ साल से वो एक झूठ के साथ जी रही थी, कि आकाश एक नाकाम, टूटा हुआ लड़का था जिसने ख़ुद अपनी जान ले ली। और अब उसे पता चल रहा था कि उसका दोस्त नाकाम नहीं था, उसे नाकाम बना दिया गया था। उसकी सारी कामयाबी किसी और के माथे पर सजा दी गई थी।

"तुम्हें पता है मैं क्या सोचती रही, पूरे नौ साल? कि आकाश कमज़ोर था। कि वो हार गया। मैं एक मरे हुए इंसान से नाराज़ थी, आर्यन, कि वो हम दोनों को छोड़ कर चला गया। और आज पता चला कि वो हारा नहीं था। उससे उसकी जीत छीन ली गई। मैंने नौ साल अपने सबसे अच्छे दोस्त को ग़लत समझा, और अब उससे माफ़ी माँगने के लिए वो ज़िंदा भी नहीं है।"

"और मैंने तुम्हें ग़लत समझने दिया। मैं सच जानता था, और मैं चुप रहा। मैंने तुम्हें उस झूठ के साथ जीने दिया, क्योंकि सच बोलने का मतलब था अपना गुनाह क़ुबूल करना। हर बार जब तुम आकाश को कोसती थीं, तुम्हें नहीं पता था कि जिसे कोसना चाहिए वो ठीक तुम्हारे सामने खड़ा था, तुम्हारी आँखों में देखने से डरता हुआ।"

कमरा छोटा पड़ गया था। दोनों उस एक तस्वीर पर झुके थे, कंधे लगभग छूते हुए, और उनके बीच नौ साल का वो सारा दुख, सारा ग़ुस्सा, सारी अधूरी बातें एक साथ साँस ले रही थीं। सुहाना को आर्यन की साँस अपने गाल पर महसूस हो रही थी, और एक पल को, फ़र्ज़ और ज़ख़्म, दोनों की सरहदें धुँधली पड़ गईं।

"हम एक ही आदमी को रो रहे हैं, आर्यन। तुम अपने गुनाह की तरफ़ से, मैं अपने ज़ख़्म की तरफ़ से। नौ साल हम एक-दूसरे से दूर, अलग-अलग कोनों में उसी एक इंसान को रोते रहे। और आज पहली बार, हम दोनों एक ही तरफ़ खड़े हैं, एक ही क़ब्र के सामने।"

"नौ साल पहले भी हम एक ही तरफ़ खड़े थे, सुहाना। मैं ही था जो दूसरी तरफ़ भाग गया। ... अगर मैं उस रात नहीं भागा होता, अगर मैंने डर के बजाय तुम्हें चुना होता, तो शायद आज आकाश ज़िंदा होता, और तुम मेरी परछाईं नहीं होतीं, मेरा साया नहीं होतीं, तुम मेरी..."

सुहाना ने उसे रोक दिया। पर इस बार उसकी आवाज़ में वो बर्फ़ नहीं थी जो पिछले दस दिनों से उसकी ढाल बनी हुई थी। बस एक थकी हुई, काँपती हुई नरमी थी, जो उस बर्फ़ से भी ज़्यादा ख़तरनाक थी, क्योंकि नरमी पिघलने की तरफ़ पहला क़दम होती है।

"वो लाइन मत पूरी करो, आर्यन। ... अभी नहीं। पहले हमें उस आदमी तक पहुँचना है जिसने आकाश को मिटाया, जिसने उसकी क़ब्र पर बैठ कर तुम्हारा ख़ून चूसा। पहले इंसाफ़। बाक़ी सब का कोई हक़ नहीं बनता, जब तक वो एक क़ब्र बंद पड़ी है।"

दोनों एक क़दम पीछे हटे, हाँफते हुए, जैसे किसी आग के बहुत क़रीब जा कर लौटे हों। आर्यन खिड़की की तरफ़ मुड़ गया, और सुहाना ने अपना ध्यान ज़बरदस्ती वापस उस तस्वीर पर लगाया, क्योंकि उसमें अभी एक और राज़ दबा था, जिसे उसकी फ़ौजी नज़र ने अभी तक छुआ नहीं था।

सुहाना ने वो तस्वीर स्कैन कर के अपनी स्क्रीन पर डाली और उसे बड़ा करना शुरू किया, इंच-दर-इंच, जैसे वो किसी अपराध-स्थल को पढ़ रही हो। कटा हुआ कंधा, मिटाया गया नाम, हर मुस्कुराता चेहरा। वो कुछ ढूँढ रही थी, पर उसे ख़ुद नहीं पता था क्या।

और फिर, तस्वीर के सबसे पीछे, यूनिट की भीड़ से भी परे, जहाँ रौशनियों की तारें और ख़ाली कुर्सियाँ थीं, उसकी नज़र एक और आकृति पर पड़ी। एक लड़की। बहुत छोटी, शायद पंद्रह-सोलह साल की, हाथ में एक क्लैपबोर्ड थामे, किसी छोटे स्पॉट-ब्वॉय की तरह किनारे पर खड़ी।

"ये कौन है? इतनी छोटी लड़की, सेट के इस सबसे पिछले कोने में, अकेली..."

"कोई स्पॉट-ब्वॉय होगी, या किसी टेक्नीशियन की बहन। मुझे नहीं पता, सुहाना। उस दिन सेट पर सौ लोग थे, और मैं तो अपने ही नशे में डूबा था। मुझे तो अपने बग़ल में खड़े आकाश का चेहरा तक ठीक से याद नहीं, इस बच्ची की तो बात ही छोड़ो।"

पर सुहाना रुकी नहीं। उसने उस छोटी सी आकृति को और बड़ा किया, और बड़ा, जब तक कि वो धुँधला चेहरा पूरी स्क्रीन को भर न गया। और वो लड़की, वो पूरे सेट में इकलौती थी जो कैमरे की तरफ़ नहीं देख रही थी। वो आर्यन की तरफ़ देख रही थी। सिर्फ़ आर्यन की तरफ़। एक ऐसी नज़र से, जो एक पंद्रह साल की बच्ची की नहीं होनी चाहिए थी।

"ये लड़की कैमरे को नहीं देख रही, आर्यन। ये तुम्हें देख रही है। पूरे जश्न में, जब सब हँस रहे थे, तालियाँ बजा रहे थे, ये बच्ची एक कोने में खड़ी, क्लैपबोर्ड थामे, सिर्फ़ तुम्हें घूर रही थी। और उसकी आँखों में जश्न नहीं है। कुछ और है। जैसे वो कोई ऐसी बात जानती हो, जो बाक़ी किसी को नहीं पता।"

और तभी सुहाना के भीतर टुकड़े जुड़ने लगे। आकाश की एक छोटी बहन थी, जो नौ साल पहले हर काग़ज़ से ग़ायब हो गई थी। और अगर वो बहन उस दिन, उस सेट पर मौजूद थी, अपने भाई की चुराई हुई कहानी के मुहूर्त पर, तो हो सकता है उसने वो देखा हो जो किसी और ने नहीं देखा। शायद वो अकेली गवाह थी, एक बच्ची जो कोने में खड़ी सब कुछ देख रही थी।

"अगर आकाश की मौत के पीछे कोई सच है, आर्यन, तो हो सकता है इस बच्ची ने उसकी शुरुआत अपनी आँखों से देखी हो। और जिसने इतना बड़ा गुनाह अपनी आँखों से देखा हो, वो नौ साल चुप कैसे बैठ सकता है? नहीं। वो चुप नहीं बैठी होगी। वो कहीं न कहीं, इसी दुनिया में, आज भी इसी को देख रही होगी। तुम्हें। तुम्हारे हर क़दम को।"

सुहाना ने उस धुँधली, ज़िद्दी नज़र को स्क्रीन पर और क़रीब खींचा, उस लड़की की आँखों तक। और जैसे ही वो आँखें साफ़ हुईं, सुहाना की अपनी साँस एक पल को रुक गई। क्योंकि वो आँखें अजनबी नहीं थीं। वो आँखें उसने पहले देखी थीं। हाल ही में। बहुत पास से। इसी घर की किसी दहलीज़ पर।

"मैं इन आँखों को जानती हूँ, आर्यन। ... ये आँखें मैंने कहीं देखी हैं, इसी शहर में, इन्हीं दिनों में। पर कहाँ? ... ये लड़की अब कोई बच्ची नहीं रही। ये अब एक पूरी औरत होगी। और वो औरत, मुझे यक़ीन है, आज भी तुम्हें बिल्कुल उसी तरह देख रही है, जैसे उस दिन इस तस्वीर में देख रही थी। बस अब वो कोने में नहीं, बहुत क़रीब खड़ी होगी।"

सुहाना उन आँखों को घूरती रही, अपनी याद को खँगालती हुई, एक ऐसी पहचान जो ज़ुबान की नोक पर आ कर फिसल जाती थी। उसे नहीं पता था कि वो जिन आँखों को पहचानने की जान लगा रही थी, वो अभी-अभी उसके लिए चाय भिजवा कर, इसी गलियारे के उस पार, बहुत इत्मीनान से बैठी थीं। इतनी क़रीब, कि साँस तक सुनाई दे।

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साया बनके