अध्याय 7 / 26 पढ़ने में 12 मिनट
पुरानी परछाई
साया बनके द्वारा Avni Oberoi
रात के हमले में गिरी पुरानी तस्वीर हमलावर को सीधे आकाश से जोड़ देती है, और इक़बाल उसे 'साया' के पहले शो की तस्वीर पहचान लेता है। सुहाना धागा खींचती है और सच खुलता है, आर्यन को सितारा बनाने वाली फ़िल्म 'परछाईं' दरअसल आकाश की चुराई हुई 'साया' थी, जिससे आकाश का नाम मिटा दिया गया। सुहाना आर्यन को घेरती है और वो चोरी और उसे छोड़ने का इक़रार तो करता है, पर मौत का सच अब भी दबा जाता है, और दोनों के बीच का ज़ख़्म पूरी तरह खुल जाता है। इक़बाल के पास रखे आकाश के सामान में सुहाना को पता चलता है कि आकाश की एक छोटी बहन थी जो नौ साल पहले हर काग़ज़ से ग़ायब हो गई, और उस लड़की की आख़िरी तस्वीर में वही आँखें है
भोर का धुँधला उजाला बंगले की खिड़कियों में उतर रहा था, पर सुहाना बेदी सोई नहीं थी। रात के हमले को कुछ ही घंटे हुए थे, होंठ पर सूखे ख़ून की एक लकीर अब भी थी, और उसके सामने, नक़्शे वाली दीवार पर, एक नई चीज़ टँगी थी।
वो पुरानी, पीली पड़ चुकी तस्वीर, जो कल रात एक भागती हुई औरत की जेब से गिरी थी। सुहाना उसे घंटों से घूर रही थी, जैसे उसमें से कोई अपना उठ कर बात करने वाला हो।
एक छोटा सा थिएटर। पीछे टँगा एक फटा-पुराना बैनर, जिस पर लिखा था, 'साया'। और सामने तीन नौजवान चेहरे। बीच में एक हँसता हुआ लड़का, आर्यन, अब से नौ साल पहले वाला, बिना किसी रुतबे के, बिना किसी मुखौटे के। एक तरफ़ एक बेख़ौफ़ लड़की, वो ख़ुद। और दूसरी तरफ़, मोटे चश्मे वाला एक दुबला लड़का, हाथ में काग़ज़, चेहरे पर शर्मीली मुस्कान।
आकाश। सुहाना की उँगली उस चेहरे पर ठहर गई। नौ साल में पहली बार उसकी शक्ल इतनी साफ़ सामने थी, और नौ साल में पहली बार वो जान चुकी थी कि उस चेहरे ने ख़ुदकुशी नहीं की थी। उसे किसी ने छीन लिया था।
ठीक उसी वक़्त दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने भोर होने से पहले ही इक़बाल को फ़ोन कर के बुला लिया था। बूढ़ा उस्ताद, छड़ी टेकता, थका हुआ, भीतर आया।
"तूने रात के अंधेरे में बुलाया, बेटी। नींद तो तेरी वैसे भी दुश्मन है, पर आज तेरी आँखों में सिर्फ़ जागरण नहीं, कोई तूफ़ान है।"
सुहाना ने बिना एक लफ़्ज़ कहे वो तस्वीर इक़बाल के हाथ में रख दी। और बूढ़े आदमी के हाथ, जो छड़ी पर भी नहीं काँपते थे, उस काग़ज़ के टुकड़े को छूते ही थरथरा गए।
"ये... ये उस रात की है। जिस रात 'साया' पहली बार स्टेज पर उतरा था। ये तस्वीर मेरी अलमारी में सजी है, बेटी, आज भी। पर इसकी नक़ल सिर्फ़ चंद हाथों में थी। तीन बच्चों के, और मेरे।"
"यानी कल रात जो औरत मेरी दीवार फाँद कर आर्यन का गला काटने आई थी, उसका ताल्लुक़ सीधे आकाश से है। शीशे पर आकाश के नाटक की लाइन। वैनिटी में आकाश का सूखा गुलाब। और अब आकाश के पहले शो की तस्वीर। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं है, इक़बाल साहब। ये एक सिलसिला है।"
"सिलसिला। ... हाँ। जैसे कोई नौ साल से एक-एक मनका पिरो रहा हो, और अब माला पूरी होने को आई हो।"
पर सुहाना ने रात सिर्फ़ ग़म में नहीं काटी थी। उसने वो किया था जो एक कैप्टन करती है, उसने फ़ाइल बनाई थी। उसने वो फ़िल्म निकाली थी जिसने आर्यन को सितारा बनाया, और वो स्क्रिप्ट पढ़ी थी जो आर्यन की वैनिटी में रखी गई थी।
"मैंने रात भर 'परछाईं' देखी, इक़बाल साहब। पूरी फ़िल्म। और फिर 'साया' की वो स्क्रिप्ट, शब्द दर शब्द। एक ही किरदार, एक ही मोड़, वही आख़िरी लाइन। दो नामों के सिवा वो एक ही चीज़ हैं। एक फ़िल्म, एक नाटक, एक ही रूह।"
"बस फ़र्क़ सिर्फ़ एक नाम का है।"
"नाम। 'परछाईं' के हर पोस्टर पर, हर क्रेडिट में, कहानी और पटकथा किसी और के नाम है। आकाश मैथुर का नाम कहीं नहीं। पूरी फ़िल्म में एक जगह नहीं। जैसे वो कहानी किसी ने लिखी ही न हो। जैसे वो आसमान से टपकी हो।"
"उन्होंने उस लड़के की पूरी ज़िंदगी की मेहनत उठा ली, बेटी, और उस पर से उसका नाम ऐसे घिस दिया, जैसे किसी पीतल की पट्टी से घिसा जाता है। पहले उसका काम चुराया, फिर उसकी जान, और आख़िर में उसकी याद भी। उसे एक नाकाम लेखक बना कर दफ़ना दिया, जो अपनी नाकामी से हार गया।"
और सुहाना के भीतर, नौ साल पुराना वो ग़म, जो अब तक आँसुओं का था, धीरे-धीरे लोहे में बदलने लगा। आकाश सिर्फ़ मरा नहीं था। उसे लूटा गया था। उसकी मौत के बाद भी लूटा गया था।
"तुझे याद है, बेटी, वो कैसे हँसता था? किसी बड़े आदमी की नक़ल उतारता, और ख़ुद ही सबसे पहले हँस पड़ता। कहता था, इक़बाल साहब, एक दिन मेरा नाम इतना बड़ा होगा कि लोग मेरी ग़लतियाँ भी छाप देंगे। ... उसका नाम बड़ा तो हुआ। पर किसी और के चेहरे पर चिपका हुआ।"
सुहाना के होंठ एक पल को काँपे। वो हँसी उसे भी याद थी। बारिश में भीगा वो थिएटर, उधार के कपड़े, और एक लड़का जो सपने इतने ज़ोर से देखता था कि बाक़ी दोनों भी उसके सपनों में जीने लगते थे। नौ साल बाद वो हँसी लौटी, तो सिर्फ़ चुभने के लिए।
और तभी, गलियारे से आती आवाज़ों की तरफ़ खिंचा हुआ, आर्यन दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ। उसकी नज़र इक़बाल के हाथ में उस तस्वीर पर पड़ी, और उसका चेहरा एक पल में राख हो गया।
"वो तस्वीर... वो तुम्हारे पास कहाँ से आई?"
"अंदर आओ, आर्यन। और दरवाज़ा बंद कर लो। इस बार मैं सवाल नहीं पूछूँगी। इस बार मैं बताऊँगी, और तुम सिर्फ़ हाँ या ना कहोगे। बस इतना कर सकते हो, तुम्हारी बुज़दिली को भी उतनी हिम्मत तो होगी।"
आर्यन भीतर आया और दरवाज़ा बंद कर लिया। वो जो देश के करोड़ों दिलों पर राज करता था, इस पल एक कठघरे में खड़ा एक मुजरिम था, दो लोगों के सामने जो उसका सबसे पुराना सच जानते थे।
"'परछाईं' आकाश की 'साया' थी। तुमने उसकी लिखी कहानी अपने चेहरे पर पहन ली, और सितारा बन गए। हाँ या ना?"
एक लम्बी, भारी ख़ामोशी छा गई। समंदर की लहरें दीवार से टकराती रहीं। आर्यन ने आँखें बंद कीं, जैसे नौ साल की एक चट्टान अपने सीने से लुढ़का रहा हो।
"...हाँ।"
वो एक लफ़्ज़, इतना छोटा, पर उसके गिरते ही कमरे की हवा बदल गई। नौ साल का झूठ पहली बार एक 'हाँ' में टूटा। इक़बाल ने मुँह फेर लिया। और सुहाना, जो ये सुनने आई थी, फिर भी एक पल को काँप गई।
"तुमने अपने सबसे अच्छे दोस्त की ज़िंदगी भर की मेहनत पर अपना नाम लिखवाया, और फिर उसे एक नाकाम, टूटा हुआ लेखक बन कर मरने दिया। दुनिया की नज़र में मिटने दिया। हाँ या ना?"
"हाँ। ... पर सुहाना, ये इतना सीधा नहीं था जितना तुम समझ रही हो। मेरे सिर पर एक ऐसी तलवार थी जो..."
"और मुझे? मुझे तुमने इसलिए छोड़ा, क्योंकि तुम्हें डर था कि मैं तुम्हारी आँखें पढ़ लूँगी। कि दुनिया को भले धोखा दे दो, पर मुझे नहीं दे पाओगे। हाँ या ना, आर्यन?"
और यही वो सवाल था जिससे आर्यन नौ साल भागता रहा था। उसने सुहाना की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो सब उतर आया जो उसने कभी किसी को नहीं कहा था।
"हाँ! ... तुम्हारी आँखें, सुहाना। पूरी दुनिया को मैं मुस्कुरा कर धोखा दे सकता था, हर कैमरे को, हर मेहमान को। पर तुम्हें नहीं। तुम एक झलक में मेरे अंदर तक पढ़ लेतीं। तुम जान जातीं कि मैंने क्या बेचा है, और किस दाम पर। इसलिए मैं भाग गया। तुमसे नहीं। अपने आप से, जो तुम्हारी आँखों में दिखता था।"
और नौ साल की दीवार, जो अब तक बर्फ़ थी, अचानक आग बन गई। दोनों एक-दूसरे के इतने पास खड़े थे कि उनकी साँसें टकरा रही थीं, पर इस बार बीच में चाहत नहीं, नौ साल का लुटा हुआ ग़म खड़ा था।
"तो तुमने अपनी बुज़दिली बचाने के लिए मेरी मोहब्बत क़ुर्बान कर दी। और आकाश की ज़िंदगी को एक ख़बर बना कर, उसकी क़ब्र पर अपना महल खड़ा कर लिया। और नौ साल तुम उस महल में रात-रात भर चीख़ते रहे, फिर भी नीचे उतर कर सच नहीं कहा।"
"मैंने आकाश को नहीं... सुहाना, उसकी कहानी ली, उसका नाम लिया, ये सच है, ये मेरा गुनाह है। पर उसकी मौत के बारे में तुम जो सोच रही हो, वो... वो..."
और यहीं, इस मोड़ पर, आर्यन की ज़ुबान जम गई। वो सबसे बड़ा सच, वो जो इक़बाल पहले ही सुहाना के कान में डाल चुका था, आर्यन के गले में एक काँटे की तरह अटक गया। उसने तीन गुनाह क़ुबूल किए थे। पर चौथे का नाम लेते ही उसका पूरा बदन डर से पत्थर हो गया।
"तुमने आज तीन गुनाह क़ुबूल किए, आर्यन। चोरी, बुज़दिली, और मुझे छोड़ना। पर तुम्हारी आँखें एक चौथे के बोझ से झुकी हैं। और वो चौथा, वो जो तुम अब भी नहीं कह पा रहे, वही तुम्हें हर रात नींद में चीख़ने पर मजबूर करता है। है ना?"
आर्यन ने कोई जवाब नहीं दिया। पर उसकी ख़ामोशी हर 'हाँ' से ज़्यादा ज़ोर से बोली। सुहाना समझ गई, इस आदमी ने आज बहुत कुछ कहा था, पर सबसे बड़ा सच अब भी उसकी क़ैद में था।
और उसने फ़ैसला कर लिया कि इस टूटे हुए आदमी के अधूरे टुकड़ों से वो अपनी तस्वीर नहीं बनाएगी। वो पीछे हटी, और इक़बाल की तरफ़ मुड़ी, उस आदमी की तरफ़ जिसने अपना पूरा सच पहले ही उसके हवाले कर दिया था।
"आपने कहा था आपके पास आकाश की चीज़ें हैं। मुझे वो सब चाहिए, इक़बाल साहब। हर काग़ज़, हर तस्वीर। अभी।"
"मैं जानता था तू माँगेगी, बेटी। इसीलिए साथ ले आया।"
इक़बाल ने अपनी झोली से एक छोटा, पुराना टिन का बक्सा निकाला, जिस पर बरसों की धूल थी। नौ साल से ये उसके बिस्तर के नीचे रखा था, किसी क़ब्र की तरह, जिसे वो हर रात देखता था पर खोल नहीं पाता था।
"आकाश का जो कुछ इस दुनिया में बचा, इसी बक्से में है। पुलिस ने उसका कमरा ख़ाली कर दिया था, उसका सामान फेंक दिया गया था। बस जो मैं बचा सका, वो ये है। एक पूरी ज़िंदगी, एक टिन के डिब्बे में।"
सुहाना ने बक्सा खोला। अंदर, बरसों पुरानी काग़ज़ों की महक थी। 'साया' के कई मसौदे, आकाश के हाथ के लिखे, कटे-पिटे। एक पुराना प्ले-बिल। और एक कोने में, सूखे हुए गुलाबों का एक गुच्छा, ठीक वैसा, जैसा वैनिटी में रखा गया था।
सूखे गुलाब। सुहाना की रीढ़ में एक ठंडक दौड़ी। जिसने वो गुलाब आर्यन की वैनिटी में रखा था, उसके पास आकाश का ये असली गुच्छा था, या कम से कम इस आदत की गहरी, निजी जानकारी। ये सामान किसी अजनबी के हाथ नहीं लगा था।
और सबसे नीचे, काग़ज़ों की परतों के नीचे, कुछ और था। पारिवारिक तस्वीरों का एक पतला बंडल। सुहाना ने उन्हें बाहर निकाला, और उलटने लगी।
और हर तस्वीर में, आकाश के साथ, एक छोटी लड़की थी। कहीं उसकी उँगली थामे, कहीं उसके कंधे पर सिर रखे, कहीं उसकी साइकिल के पीछे बैठी। एक ही लड़की, हर उम्र में, हमेशा आकाश के साथ।
"ये लड़की। हर तस्वीर में आकाश के साथ। ये कौन है, इक़बाल साहब?"
"आकाश की छोटी बहन। उसकी पूरी दुनिया। माँ-बाप बचपन में गुज़र गए थे, तो आकाश ने उसे भाई भी बन कर पाला, और माँ-बाप भी। वो लड़की उसके लिए साँस थी। और जिस दिन आकाश गया, वो लड़की पंद्रह-सोलह बरस की रही होगी। बस।"
"वो अभी कहाँ है? उसका पूरा नाम, पता, कुछ भी?"
"कोई नहीं जानता, बेटी। आकाश के जाने के बाद वो जैसे हवा में घुल गई। न कोई स्कूल का रिकॉर्ड, न कोई रिश्तेदार, न कोई पता। मैंने बहुत ढूँढा, बरसों। ऐसा लगा जैसे किसी ने जान-बूझ कर उस लड़की का पूरा वजूद ही काग़ज़ों से मिटा दिया हो। जैसे वो कभी थी ही नहीं।"
पूरा वजूद मिटा दिया। जैसे वो कभी थी ही नहीं। सुहाना ने ये लफ़्ज़ पहले भी सुने थे, चंद रोज़ पहले, अपनी ही ज़ुबान से, इसी घर के एक और चेहरे के बारे में। पर इस थकी हुई, ग़म में डूबी रात में, उसका दिमाग़ उन दोनों धागों को आपस में नहीं जोड़ पाया। अभी नहीं।
उसकी उँगलियों ने बंडल की आख़िरी तस्वीर निकाली। सबसे नई। पीछे एक तारीख़ लिखी थी, आज से क़रीब नौ साल पुरानी। उस लड़की की आख़िरी तस्वीर, जो इस दुनिया में मौजूद थी।
उसमें वो लड़की आधी मुड़ी हुई थी, चेहरे पर बालों की एक लट गिरी हुई, आधा चेहरा परछाईं में। पर उसकी आँखें, वो साफ़ थीं। सीधी कैमरे में देखती हुई, गहरी, और एक अजीब सी ठहरी हुई चमक लिए।
और उन आँखों को देखते ही, सुहाना के भीतर कुछ ठंडा और बेआवाज़ सरक गया। ये आँखें। उसने ये आँखें देखी थीं। किसी पुरानी याद में नहीं, नौ साल पहले नहीं। हाल ही में। यहीं। इसी घर में।
"मैंने ये आँखें देखी हैं। ... रोज़ देखती हूँ। पर कहाँ... कहाँ देखी हैं?"
जवाब उससे बस एक साँस की दूरी पर था। उसी गलियारे के उस पार सोता हुआ। हर भोर उसके लिए बिना चीनी वाली कड़क कॉफ़ी ला कर रखता हुआ। पूरे घर का सबसे भरोसेमंद, सबसे भला चेहरा। पर उस थकी हुई रात में, सुहाना का हाथ उस जवाब तक नहीं पहुँचा।
कल रात उसकी दीवार फाँद कर भागा साया किसी अजनबी का नहीं था। उसका एक भाई था कभी, जो चुरा लिया गया। एक नाम था, जो मिटा दिया गया। और एक जोड़ी आँखें थीं, जिनके सामने से सुहाना हर रोज़ 'गुड मॉर्निंग' कहती हुई गुज़रती थी, ये जाने बिना कि वो जिस भूत को ढूँढ रही है, वो रोज़ उसकी कॉफ़ी में मुस्कुराता है।
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