Chapter 2 of 26 11 min read
पहली पहरेदारी
सुहाना आर्यन के समंदर किनारे वाले बंगले में क़दम रखते ही कमान अपने हाथ में ले लेती है और एक ऐसा सख़्त सुरक्षा-नियम लागू कर देती है जो लाड़ला सितारा बर्दाश्त नहीं कर पाता। उसका बड़े दिल वाला फ़ौजी नंबर-दो जग्गी पूरे घर की तलाशी लेता है और नौकरों से गपशप में सुराग़ बटोरता है, जबकि आर्यन बार-बार 'हम दोनों' की बात छेड़ता है और सुहाना हर बार उसे ठंडेपन से काट देती है। रात होते-होते वो घर को पूरी तरह सील मान लेती है, पर उसे उसी के बनाए घेरे के भीतर एक दूसरा पैग़ाम मिलता है, जो सीधे उसके नाम है।
सुबह के सात बजे, बांद्रा के समंदर किनारे वाले उस आलीशान बंगले में, आर्यन साहनी की दुनिया के सारे नियम एक साथ बदल रहे थे। "ये गेट अब चौबीस घंटे बंद रहेगा। हर गाड़ी की तलाशी। हर आने वाले का नाम पहले मुझ तक। और मेन दरवाज़े का पुराना ताला आज ही बदलेगा।"
नौकर एक दूसरे का मुँह देख रहे थे। पंद्रह साल में इस घर ने ऐसी आवाज़ नहीं सुनी थी, जो पूछती न हो, बताती हो। "कैप्टन, ये मेरा घर है या छावनी?"
"आज से दोनों, मिस्टर साहनी। जिस दिन ख़तरा टलेगा, ये फिर से सिर्फ़ घर हो जाएगा। तब तक, छावनी।"
"और मेरी सुबह की समंदर किनारे वाली दौड़? वो नहीं छूटेगी।"
"छूट गई। कोई खुली जगह नहीं, कोई तयशुदा रूटीन नहीं। जो आदमी हर रोज़ एक ही वक़्त एक ही रास्ते पर हो, उसे मारना सबसे आसान है।"
"तो मैं जिऊँ कैसे?"
"ज़िंदा। बस यही मेरा काम है। बाक़ी सब बाद में।"
तभी एक बुलंद आवाज़ पूरे बरामदे में गूँजी, और माहौल की सारी बर्फ़ एक पल को पिघल गई। "कैप्टन साब! ऊपर वाले कमरे की खिड़की की चटख़नी टूटी हुई है, बाथरूम का रौशनदान खुला, और पिछवाड़े की दीवार इतनी नीची कि मेरा भतीजा भी फाँद जाए। ये बंगला नहीं, छलनी है जी, पूरी छलनी।"
जग्गी संधू। सुहाना का नंबर दो। छह फ़ुट का पहाड़, फ़ौज का पुराना साथी, और दिल इतना बड़ा कि इस पूरे बंगले में न समाए। "तो छलनी को दीवार बनाओ, जग्गी। शाम तक। और हर कमरे का नक़्शा मुझे चाहिए।"
"हो जाएगा जी। पर एक बात बताऊँ, इस घर में चालीस लोग काम करते हैं। चालीस! एक हीरो के पीछे इतनी फ़ौज तो हमने सरहद पे नहीं देखी।"
"स्टार का रुतबा है, सरदार जी।"
"रुतबा? जी आपके फ़्रिज में बत्तीस तरह का पानी रखा है। बत्तीस! फ़ौज में तो एक ही मिलता था, जो मिल जाए वही पी लो, वरना प्यासे रहो।"
आर्यन हँस पड़ा, बरसों बाद, दिल से। और सुहाना ने वो हँसी सुनी, और अपना चेहरा और सख़्त कर लिया, जैसे उस हँसी से भी ख़ुद को बचाना ज़रूरी हो। "जग्गी, स्टाफ़ की पूरी लिस्ट चाहिए। कौन कब से है, किसकी सिफ़ारिश पर आया, किसके पास किन कमरों की चाबी है। एक-एक चेहरा।"
"समझ गया कैप्टन। अंदर का आदमी, है ना? जो उस बंद कमरे तक, उस शीशे तक पहुँचा।"
"जब तक हर चेहरा साफ़ न हो जाए, इस घर का हर चेहरा शक के दायरे में है। सिर्फ़ तुम्हारा और मेरा छोड़ कर।"
दोपहर से पहले सुहाना ने पूरे स्टाफ़ को बरामदे में जमा किया। रसोइया, माली, ड्राइवर, हाउसकीपिंग, सब। चालीस चेहरे, चालीस मुमकिन कहानियाँ। "आज से इस घर के कुछ नियम बदल रहे हैं। कोई भी बिना इजाज़त आर्यन साहब के गलियारे में नहीं जाएगा। फ़ोन ड्यूटी के वक़्त गेट पर जमा होंगे। और कोई भी, किसी बाहरी से, इस घर की एक ईंट के बारे में बात नहीं करेगा।"
एक दबी हुई खुसुर-पुसुर उठी। किसी को अपना फ़ोन छोड़ना अच्छा नहीं लगा। "जिसको दिक़्क़त है, वो सामने आए! कैप्टन साब ने सरहद पे गोलियाँ खाई हैं, तुम्हारे फ़ोन की क्या बिसात। चलो, चलो, काम पे लगो सब!"
भीड़ छँट गई। पर सुहाना की नज़र दो-तीन चेहरों पर ठहर गई। एक जो नज़र नहीं मिला रहा था। एक जो ज़रूरत से ज़्यादा मुस्कुरा रहा था। हर घर की तरह, यहाँ भी हर चेहरे के पीछे एक और चेहरा था।
पर हर चेहरा इतनी आसानी से क़ाबू में नहीं आने वाला था। दोपहर तक एक चेहरा सामने आ ही गया, जिसकी आँखों में सुहाना के लिए नफ़रत साफ़ लिखी थी। "तो आप हैं नई कैप्टन। पंद्रह साल मैंने इस घर की रखवाली की, भास्कर राणा। और एक शीशे पे किसी ने लाल रंग पोत दिया, तो मुझे उठा कर फेंक दिया गया, और आपको ले आए।"
"आपको हटाया नहीं गया, मिस्टर राणा। आपको मेरे नीचे रखा गया। फ़र्क़ है।"
"फ़र्क़ वही जानता है जिसकी इज़्ज़त उतरती है। इस घर का कोना-कोना मैं जानता हूँ, कैप्टन। हर चाबी, हर अंधा कोना, हर वो रास्ता जो आपको आज पता चला और मुझे पंद्रह साल से।"
सुहाना ने उसे ग़ौर से देखा। एक हटाया गया आदमी, जिसे घर का हर राज़ पता था, और जिसके दिल में आग थी। सूची में सबसे ऊपर वाला नाम मिल गया था। "आपका तजुर्बा इस घर की ताक़त है, मिस्टर राणा। और शायद इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी। मैं दोनों याद रखूँगी।" भास्कर मुड़ा और चला गया, कंधे तने हुए। जग्गी धीरे से बोला। "इसकी आँखें ठीक नहीं लगतीं कैप्टन। और कमला बाई कहती है, जब से आप आईं, ये रात-रात भर बंगले के इर्द-गिर्द घूमता है।"
"नज़र रखो इस पर। पर सिर्फ़ इस पर नहीं। जो सबसे ग़ुस्से में दिखे, ज़रूरी नहीं वही सबसे ख़तरनाक हो।"
शाम ढली, तो जग्गी दीवार की मरम्मत में जुट गया, और बरामदे में सुहाना और आर्यन अकेले रह गए। पहली बार, नौ साल बाद, बिना किसी गवाह के।
सुहाना अपनी नोटबुक में कुछ लिखती रही, जैसे वो वहाँ हो ही न। आर्यन उसे देखता रहा, उस चेहरे को, जिसे वो कभी बंद आँखों से बना सकता था। "तुम बदल गई हो, सुहाना।"
"लोग बदलते नहीं, मिस्टर साहनी। बस वक़्त उनकी असली शक्ल दिखा देता है।"
"और मेरी असली शक्ल? वो तुमने कब देखी?"
"जिस रात आप बिना कुछ कहे चले गए थे। उस रात। बहुत साफ़ दिखी थी।"
नौ साल में पहली बार दोनों के बीच वो रात आ खड़ी हुई थी, वो रात जिसका ज़िक्र दोनों ने कभी नहीं किया था। "तुम्हें लगता है वो मेरे लिए आसान था?"
"मुझे लगता है वो आपने किया। बाक़ी सब बहाना है। आसान था या मुश्किल, इससे मेरे टूटे हुए हिस्सों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।"
"अगर मैं कहूँ कि उसके पीछे एक वजह थी, एक ऐसी वजह जो... "
"तो मैं कहूँगी, बहुत देर हो गई, मिस्टर साहनी। नौ साल देर। मैं आपको ज़िंदा रखने आई हूँ, आपके बहाने सुनने नहीं।"
"और आकाश? उसके बारे में भी नहीं पूछोगी? वो भी तो तुम्हारा दोस्त था।"
सुहाना की क़लम रुक गई। आकाश का नाम अभी भी उसके भीतर एक ताज़ा घाव था। पर उसने अपनी आवाज़ में एक तिनका भी हिलने नहीं दिया। "आकाश का नाम आप मत लीजिए, मिस्टर साहनी। आप में से नहीं। जिस शीशे पे उसके नाटक की लाइन लिखी थी, उसका जवाब पहले आप ख़ुद को दीजिए।"
आर्यन के पास कोई जवाब नहीं था। सिर्फ़ एक पुरानी बुज़दिली थी, जो अब दीवार बन कर उन दोनों के बीच खड़ी थी।
आर्यन चुप हो गया। हर बार जब वो उस दरवाज़े को खोलने की कोशिश करता, सुहाना उसे उसके मुँह पर बंद कर देती। और आर्यन जानता था, उसे इसका पूरा हक़ था।
रात गहराई। सुहाना ने आर्यन के सोने का इंतज़ाम ख़ुद जाँचा। कमरे की खिड़कियाँ, परदे, बराबर वाला कमरा जहाँ वो रात काटेगी, और बीच का वो दरवाज़ा। "रात को आपके कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं होगा। ये बीच का दरवाज़ा खुला रहेगा। किसी भी हालत में आप मेरी नज़र से बाहर नहीं होंगे।"
"नौ साल पहले भी बीच का दरवाज़ा खुला रहता था, कैप्टन। तब भी तुम मेरी नींद पहरा देती थीं।"
सुहाना उसके कमरे में परदा ठीक करने झुकी थी, और आर्यन का ये फ़िक़रा उसकी पीठ पर एक तीर की तरह लगा। उसके हाथ एक पल को रुक गए। "तब मैं आपकी मोहब्बत थी। अब आपकी नौकरी हूँ। ये फ़र्क़ याद रखिए, मिस्टर साहनी। दोनों की ज़िंदगी आसान रहेगी।"
उसने परदा गिराया, मुड़ी, और आर्यन के इतने पास खड़ी थी कि उसकी साँस आर्यन के चेहरे तक पहुँच रही थी। एक पल, सिर्फ़ एक पल, दोनों वहीं जम गए। नौ साल की दूरी और चंद इंच का फ़ासला।
फिर सुहाना पीछे हट गई, दरवाज़े की तरफ़, अपनी ही धड़कन पर ग़ुस्सा करती हुई।
और आर्यन अकेला लेटा रहा, छत को घूरता हुआ। उसने सोचा, वो उसे सच बता दे। पूरा सच। आकाश का, बत्रा का, उस रात का। पर हर बार जब वो हिम्मत जुटाता, आकाश का चेहरा आँखों के सामने आ जाता, और उसकी बुज़दिली फिर जीत जाती।
देर रात जग्गी आख़िरी गश्त से लौटा, चेहरे पर एक शरारती मुस्कान। "कैप्टन, कमला बाई से पक्की दोस्ती हो गई अपनी। पूरे घर की कुंडली उसके पास है। कहती है, मैनेजर मिहिर साहब पिछले छह महीने से रात-रात भर फ़ोन पर किसी से लड़ते हैं, पैसों के बारे में। और डरे हुए रहते हैं।"
"मिहिर? पैसों की तंगी? नोट कर लो। जिसके पास पैसे की तंगी हो, उसके पास बिकने की वजह भी हो सकती है।"
"और एक और बात, कैप्टन। एक मैडम हैं, नैरा जी, आर्यन साहब की सेक्रेटरी। कमला कहती है, पूरे घर में सबसे भली वही है। नौकरों तक का ख़याल रखती है। सबकी लाडली। बस एक बात अजीब है, उसका कोई घर-परिवार नहीं, कोई पुराना पता नहीं। जैसे नौ साल पहले हवा से आई हो।"
"सबकी लाडली। कोई पुराना पता नहीं। ... कल उससे मिलूँगी। आज रात पहली पूरी पहरेदारी हमारी है, जग्गी। हर दरवाज़ा, हर खिड़की, दो-दो घंटे पे।"
और रात पूरी तरह उतर आई। समंदर की लहरें दीवार से टकराती रहीं। बंगले की हर बत्ती एक-एक कर बुझती गई। सुहाना ने ख़ुद हर ताला जाँचा, हर घेरा दोबारा कसा, हर गश्त गिनी।
आधी रात के बाद वो अपने कमरे में लौटी। बरसों बाद, एक अजीब सी तसल्ली के साथ, उसने सोचा, घर सील है। हर रास्ता बंद। अब कोई परिंदा भी बिना उसकी इजाज़त पर नहीं मार सकता।
उसने अपनी वर्दी की जेब से नोटबुक निकालने के लिए हाथ डाला। और उसकी उँगलियाँ काग़ज़ के एक ऐसे टुकड़े से टकराईं, जो उसका नहीं था।
एक तह किया हुआ पुर्ज़ा। उसकी अपनी जेब में। उस वर्दी की जेब में, जो दिन भर उसके बदन पर रही थी। जिससे वो एक पल को अलग नहीं हुई थी। "ये... ये मेरी जेब में आया कैसे?"
उसने पुर्ज़ा खोला। वही लाल स्याही। वही ठहरा हुआ, सधा हुआ हाथ। पर इस बार लफ़्ज़ आर्यन के लिए नहीं थे। "तुम भी यहाँ। ... दोनों एक साथ। ... कितना अच्छा हुआ, कैप्टन बेदी। खेल अब पूरा होगा।"
कैप्टन बेदी। उसका नाम। उसका पूरा नाम। जो आज सुबह तक इस घर में किसी को मालूम नहीं था।
और जो पुर्ज़ा उसकी अपनी जेब में था, वो किसी ने बाहर से नहीं फेंका था। वो किसी ने आज, इसी दिन, उसके इतने पास आ कर डाला था कि उसे, एक फ़ौज की तपी हुई ऑफ़िसर को, भनक तक न लगी।
एक पल को उसकी रीढ़ में झुरझुरी दौड़ी। फिर वो झुरझुरी लोहे में बदल गई। सुहाना बेदी डरती नहीं थी। सुहाना बेदी हिसाब लगाती थी। "ठीक है। तुम अंदर हो। इतने पास हो। ... तो अब लड़ाई बराबरी की है।"
उसने पुर्ज़ा हथेली में भींचा और बीच के खुले दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहाँ आर्यन बेख़बर सो रहा था। जिसे वो बचाने आई थी। और जिसे वो अभी भी माफ़ नहीं कर सकती थी।
सुहाना ने अपना घेरा सील कर दिया था। पर जिसे वो ढूँढ रही थी, वो उस घेरे के बाहर नहीं था। ... वो घेरे के अंदर था। उसके साथ। शुरू से।
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