DesiHub

Chapter 10 of 26 12 min read

पीठ में छुरा

साया बनके by Avni Oberoi

सुहाना ने दरवाज़े की मूठ घुमाई और स्टडी का दरवाज़ा एक झटके से खोल दिया, कमर पर रखा हाथ हथियार पर तैयार। और भीतर का नज़ारा उसे एक पल को जमा गया।

कमरे में कोई इंसान नहीं था। पर एक कोने में, घर के ऑडियो सिस्टम का कंसोल जल रहा था, उसकी नीली रौशनी अंधेरे में तैर रही थी, और उसी में से आकाश की आवाज़ की वो आख़िरी लाइन बार-बार लौट रही थी, तेरा वक़्त आ गया, तेरा वक़्त आ गया।

सुहाना ने आगे बढ़ कर वो सिस्टम बंद कर दिया। और अचानक छाई ख़ामोशी किसी थप्पड़ की तरह पूरे घर पर गिरी। पर वो आवाज़ जा कर भी नहीं गई थी, वो अब हर कान में, हर दीवार में बस चुकी थी।

"वो चला गया... पर मुझे अब भी सुनाई दे रहा है, सुहाना। नौ साल से मैं ये आवाज़ अपने सपनों में सुनता हूँ, और आज किसी ने उसे मेरी दीवारों से बाहर निकाल दिया।"

भोर होते-होते पूरा बंगला जाग गया था, और एक मरे हुए आदमी की आवाज़ से थर्रा उठा था। नौकर बरामदे में झुंड बना कर खड़े थे, डरे हुए, कानाफूसी करते हुए। किसी ने भूत कहा, किसी ने साया। दहशत हर चेहरे पर पुती थी।

"किसी इंसान ने इस कमरे में बैठ कर ये नहीं चलाया, आर्यन। ये पूरे घर के ऑडियो सिस्टम से चली है, यहीं इसी कंसोल से। और इस सिस्टम को कोई दूर बैठ कर भी चला सकता है, बशर्ते उसके पास इसका लॉगिन हो। भूत लॉगिन नहीं करते। इंसान करते हैं।"

उसने जग्गी को इशारा किया कि नौकरों को शांत करे, चाय बँटवाए, और किसी को भी घर से बाहर फ़ोन न करने दे। दहशत सबसे तेज़ फैलने वाली आग है, और सुहाना जानती थी कि दुश्मन इसी दहशत के धुएँ में छिपना चाहता है। पहले घबराहट को क़ाबू करो, फिर मुजरिम को।

फिर उसने जग्गी की तकनीकी मदद से सिस्टम के पिछले हिस्से में उतर कर उन रिकॉर्ड्स को खोदा जो बताते हैं कि किसने, कब, किस बटन को छुआ। और घंटे भर की खुदाई के बाद, एक लॉगिन उभरा, जिसने आधी रात को वो रिकॉर्डिंग पूरे घर में चलाई थी।

रात के दो बज कर सत्रह मिनट। ठीक उसी वक़्त, जब सुहाना और आर्यन पैनिक रूम में बंद थे, और पूरा घर बिजली के लौटने-जाने में उलझा था, किसी ने दूर बैठ कर इस कंसोल को जगाया, वो आवाज़ चलाई, और उतनी ही ख़ामोशी से उसे वहीं छोड़ दिया। जग्गी ने स्क्रीन पर वो लाइन देखी और धीरे से सीटी बजाई, कैप्टन, ये चोर तो कीबोर्ड पर भी उतना ही साफ़ है जितना दीवार फाँदने में।

"ये लॉगिन उस अकाउंट का है जो इस पूरे घर को चलाता है। बिजली, पैसा, ऑडियो, हर चीज़। इस घर का हर तार जिसकी उँगलियों से गुज़रता है।"

"वो तो... वो तो सिर्फ़ मिहिर के पास है। मेरा मैनेजर। पंद्रह साल से मेरा हर हिसाब, हर काम उसी के ज़िम्मे है।"

पर सुहाना उस एक रिकॉर्डिंग पर नहीं रुकी। मिहिर के उसी लॉगिन के रास्ते वो और गहरे उतरी, और एक दूसरे, कहीं ज़्यादा बदसूरत कमरे में जा पहुँची। पैसों के कमरे में।

झूठे बिल। ऐसी कंपनियों के नाम जो कभी थीं ही नहीं। एक धीमा, बरसों पुराना रिसाव, जो आर्यन की तिजोरी से बूँद-बूँद पैसा किसी और जेब में ले जा रहा था। कमला बाई की वो पुरानी बात, मिहिर की रात-रात भर की स्टडी वाली गश्तें, अब सब एक तस्वीर में जुड़ रही थीं।

और उस पूरे रिसाव में एक चीज़ अलग थी, अजीब थी। हर महीने की एक तयशुदा तारीख़ को, एक बड़ी रक़म, एक ही खाते में जाती थी, बरसों से, बिना नागा। मिहिर की बाक़ी चोरी बेतरतीब थी, हड़बड़ी में की हुई, डूबते आदमी के हाथ-पाँव। पर ये एक पेमेंट अलग थी, ठंडी, सधी हुई, नियमित। जैसे चोरी नहीं, कोई किराया चुकाया जा रहा हो।

"आर्यन, तुम्हारा ये सबसे भरोसेमंद आदमी सालों से तुम्हें लूट रहा है। घर की तंगी नहीं, ये आदमी ख़ुद कर्ज़ में डूबा है, गले तक। और जो आदमी क़र्ज़ में डूबा हो, और जिसके हाथ में सारा हिसाब हो, उसके लिए एक मरा हुआ सितारा एक ज़िंदा सितारे से कहीं ज़्यादा फ़ायदे का हो सकता है। मरा हुआ आदमी अपने खाते नहीं जँचवाता।"

"मिहिर मुझे मरवाना चाहेगा? नहीं... नहीं, वो नहीं कर सकता। वो मेरे साथ पंद्रह साल से है, सुहाना।"

"पंद्रह साल पास रहने वाले लोग ही पीठ में छुरा घोंप सकते हैं, आर्यन। अजनबी तो सामने से वार करते हैं। बुलाओ उसे। अभी।"

कुछ ही देर में मिहिर स्टडी में दाख़िल हुआ, माथे पर पसीने की बूँदें, आँखें कमरे में बिखरे काग़ज़ों और खुले कंसोल को नाप रही थीं। एक शिकारी की तरह नहीं, एक फँसे हुए चूहे की तरह।

"क्या हुआ? इतनी सुबह-सुबह सब यहाँ? कोई नई धमकी आई है क्या? आर्यन सर, मैंने कहा था ना, इस औरत को इतनी छूट मत दो, अब ये घर के काग़ज़ात तक टटोल रही है..."

"बैठिए, मिस्टर मिहिर। और नाटक बंद कीजिए। रात दो बजे, इसी कमरे से, आपके लॉगिन से, आकाश मैथुर की आवाज़ पूरे घर में चलाई गई। और उसी लॉगिन के पीछे, नौ साल की चोरी का पूरा हिसाब खुला पड़ा है। दोनों एक साथ मत झुठलाइए। साँस उखड़ जाएगी।"

"चोरी? ये... ये बेबुनियाद इल्ज़ाम है! वो सिस्टम... वो लॉगिन तो कई लोगों के पास... और वो बिल, वो सब तो टैक्स की प्लानिंग है, आप समझती नहीं..."

"मैं फ़ौज में रही हूँ, मिस्टर मिहिर, चार्टर्ड अकाउंटेंट के दफ़्तर में नहीं। पर झूठ की बू मैं दोनों जगह पहचानती हूँ। ये टैक्स प्लानिंग नहीं, सीधी-सादी चोरी है। तीन करोड़ से ऊपर, पिछले छह साल में। और आपकी अपनी घड़ी तक गिरवी पड़ी है।"

और मिहिर की सारी हेकड़ी एक पल में बह गई। उसके घुटने काँपे, और वो एक कुर्सी पर, बल्कि उस पर गिर सा गया। बरसों का बोझ अचानक उसके कंधों पर दिखने लगा।

"हाँ। ... हाँ, मैंने पैसे लिए। लिए मैंने। पर सुनिए तो सही, मैं कर्ज़ में ऐसा फँसा कि... एक गड्ढा भरता, तो दूसरा खुल जाता। मैंने सोचा था लौटा दूँगा, आर्यन सर को पता भी नहीं चलेगा। मैं... मैं कमज़ोर पड़ गया।"

"तुम? मिहिर, तुम? मैंने तुम्हारे हाथ में अपनी पूरी ज़िंदगी रखी थी। अपना पैसा, अपना नाम, अपने सारे राज़। और तुम... तुम पंद्रह साल मेरी जेब काटते रहे, मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुस्कुराते हुए?"

"आर्यन सर, मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं आपके पैर पड़ता हूँ। पर एक बात ख़ुदा की क़सम सच है, मैं चोर हूँ, बेईमान हूँ, पर मैं क़ातिल नहीं हूँ! मैंने आपको कभी कोई धमकी नहीं दी, कभी कोई पुर्ज़ा नहीं लिखा!"

"तो फिर वो रिकॉर्डिंग तुम्हारे लॉगिन से क्यों चली, मिहिर? एक मरे हुए आदमी की आवाज़, तुमने पूरे घर में क्यों गूँजाई? पैसा चुराना एक बात है। पर एक भूत को ज़िंदा करना, ये तो सीधे उस खेल का हिस्सा है।"

"मैंने नहीं चलाई! कैप्टन, अपनी माँ की क़सम, मैंने वो रिकॉर्डिंग कभी सुनी तक नहीं! मेरा लॉगिन किसी ने चुराया होगा, इस्तेमाल किया होगा! मैं चोर हूँ, कैप्टन, क़ातिल नहीं! मैं... मैं ख़ुद इस घर में सबसे ज़्यादा डरा हुआ इंसान हूँ!"

और सुहाना ने उसे ग़ौर से पढ़ा। एक चोर का डर, और एक क़ातिल का ठंडापन, दोनों अलग होते हैं। मिहिर की आँखों में क़ातिल की वो शांति नहीं थी। उसमें एक ऐसे आदमी की दहशत थी, जो ख़ुद किसी और के जाल में फँसा हो। वो सच कह रहा था, कम से कम इस बात में।

और उसी पल, आर्यन, जो अपने सबसे भरोसेमंद आदमी के धोखे से अंदर तक टूट चुका था, अनजाने में कमरे में उस इकलौते इंसान की तरफ़ मुड़ा, जिसने उससे कभी झूठ नहीं बोला था। सुहाना की तरफ़।

"देखा, कैप्टन? जिस-जिस पर मैंने भरोसा किया, सबने कुछ न कुछ चुराया। मेरा दोस्त, मेरा मैनेजर, मेरा प्रोड्यूसर। और इस पूरी दुनिया में बस एक तुम हो, जो मुझसे मेरा पैसा नहीं, मेरे छुरे लेने आई हो। मुझे बचाने आई हो, लूटने नहीं।"

और सुहाना के भीतर, बरसों से बंद वो दरवाज़ा एक इंच और सरक गया। ये आदमी उसे अब भी झूठा और बुज़दिल लगता था। पर आज उसने ये भी देखा कि इस झूठे, बुज़दिल आदमी के इर्द-गिर्द भी उतने ही भेड़िये मँडरा रहे थे, जितने कभी उसके अपने इर्द-गिर्द। शायद, कहीं बहुत गहरे, वो दोनों एक ही जंगल में अकेले थे।

"मैं तुम्हें बचाने नहीं, सच को बचाने आई हूँ, आर्यन। पर हाँ, आज की रात, वो दोनों एक ही दिशा में हैं।"

एक पल को दोनों की नज़रें मिलीं, और उस बदसूरत, टूटे हुए कमरे में भी, एक महीन सी गर्माहट तैर गई। फिर सुहाना ने अपना ध्यान वापस उस काँपते हुए आदमी पर लगाया, क्योंकि सबसे बड़ा सच अभी बाहर आना बाक़ी था।

"मिहिर। तुमने कहा तुम इस घर के सबसे डरे हुए इंसान हो। पैसा पकड़े जाने का डर अलग होता है, मैंने देखा है। वो शर्म का डर होता है। तुम्हारी आँखों में शर्म नहीं, मौत का डर है। कोई तुम्हें डरा रहा है। कौन?"

"मैं... मैं नहीं कह सकता। अगर मैंने कहा, तो वो मुझे मार डालेगा। जैसे उसने... "

मिहिर की आवाज़ बीच में ही कट गई, जैसे किसी अनदेखे हाथ ने उसका गला दबा दिया हो। उसने डर के मारे दरवाज़े की तरफ़ देखा, फिर खिड़की की तरफ़, जैसे दीवारों के भी कान हों।

"जैसे उसने किसे मारा, मिहिर? पूरी बात कहो। कौन तुम्हें ब्लैकमेल कर रहा है, और किस बात पर?"

"उस लड़के पर! नौ साल पहले, उस रात, जो कुछ हुआ! मुझे उस बारे में हमेशा के लिए ख़ामोश रहने के लिए ख़रीदा गया है, कैप्टन। बरसों से। और मैं उनका बस एक मोहरा हूँ, एक डाकिया, जिसे उन्होंने अपने जाल में इतना कस कर बाँधा कि मैं चाह कर भी निकल नहीं सकता।"

"किस लड़के, मिहिर? ... आकाश? तुम आकाश की बात कर रहे हो?"

"हाँ, सर। आकाश। उस रात जो सच था, वो किसी ने दफ़ना दिया, और उस दफ़नाने की एक क़ीमत है, जो हर महीने चुकाई जाती है। नौ साल से। बिना नागा।"

"मैं उस हादसे के बाद के हफ़्तों में उनके पास हिसाब ले कर गया था, सर। और मैंने कुछ ऐसा देख लिया जो मुझे कभी नहीं देखना चाहिए था। कुछ काग़ज़, कुछ पेमेंट, एक ऐसी बात जो उस रात की सच्चाई की तरफ़ इशारा करती थी। और उसी दिन से मैं उनका हो गया। पहले उन्होंने मुझे डराया, फिर ख़रीदा, और फिर मुझी से आपका पैसा घुमा-फिरा कर अपनी जेब में पहुँचवाना शुरू किया। मैं फँसता गया, गड्ढा गहरा होता गया, और मैं और गहरे चोरी करता गया।"

"कौन चुकाता है ये क़ीमत? कौन है वो आदमी?"

"आप, सर। ... आप चुकाते हैं। नौ साल से, हर महीने, अपने ही खाते से। आप उसे कोई पुरानी देनदारी समझते हैं, कोई कंसल्टेंसी फ़ीस, कोई सलाहकार का हिसाब। पर वो पैसा सीधे उस इंसान के पास जाता है, जिसने उस रात आकाश को... और मैं बस उसका डाकिया हूँ। मैंने अपनी चोरी का एक बड़ा हिस्सा उसी छेद को भरने में गँवाया है।"

आर्यन का पूरा बदन एक बर्फ़ के खंभे में बदल गया। नौ साल। हर महीने। अपने ही हाथों से। वो अपने दोस्त की क़ब्र दफ़नाने वाले को, हर महीने, अपनी ही जेब से, उस क़ब्र का किराया भरता आ रहा था, और उसे भनक तक नहीं थी।

"रुको। ... तो जो इस घर को धमकियों से डरा रहा है, वो एक तरफ़ है। और जो नौ साल से आर्यन का ख़ून चूस रहा है, आकाश का सच दबा कर, वो कोई और है। दो अलग हाथ, एक ही रात के दो अलग शिकारी। और आर्यन, तुम एक को ख़ुद, अपने हाथों, पैसे भेजते आए हो।"

"नाम बताओ, मिहिर। जिसे मैं पैसे भेजता हूँ, उसका नाम बताओ। अभी।"

"नहीं, सर। वो नाम मत पुछवाइए। ... जिस दिन मैंने वो नाम अपनी ज़ुबान पर लाया, उस दिन मेरी लाश भी नहीं मिलेगी, जैसे आकाश की सच्चाई नहीं मिली। मैं बस इतना कह सकता हूँ, वो इस पूरे शहर का सबसे बड़ा, और सबसे ख़तरनाक आदमी है। और उसके हाथ आपकी सोच से कहीं ज़्यादा दूर तक पहुँचते हैं।"

"ठीक है, मिहिर। तुमने उसका नाम नहीं लिया। पर तुमने एक रास्ता दे दिया, और मेरे लिए वो नाम से ज़्यादा क़ीमती है। पैसा झूठ नहीं बोलता। हर महीने की वो एक तयशुदा पेमेंट, वो मुझे सीधे उस आदमी के दरवाज़े तक ले जाएगी। और जिस दिन मैं उस दरवाज़े पर दस्तक दूँगी, नौ साल से बंद कोई क़ब्र, खुली रह जाएगी।"

मिहिर की आवाज़ काँप कर बुझ गई, और वो नाम, जो सबकी ज़िंदगी बदल सकता था, उसके गले में एक काँटे की तरह अटका रह गया। पर सुहाना और आर्यन दोनों समझ चुके थे। जिस दुश्मन को वो ढूँढ रहे थे, वो एक नहीं, दो थे। एक साया, जो अंदर से वार करता था। और एक आक़ा, जो बाहर से, नौ साल से, आर्यन के अपने पैसों पर पल रहा था, आकाश की क़ब्र पर बैठा, मुस्कुराता हुआ।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.