DesiHub

Chapter 1 of 26 11 min read

नौ साल बाद

साया बनके by Avni Oberoi

कुछ लोग रौशनी में इसलिए जीते हैं ताकि उनका अंधेरा किसी को दिखाई न दे।

आर्यन साहनी उन्हीं में से एक था। देश का सबसे बड़ा सितारा, और सबसे गहरा राज़ छुपाने वाला आदमी। पर आज उस राज़ ने दस्तक दे दी थी।

मुंबई का फ़िल्म सिटी। आर्यन की नई फ़िल्म 'आग़ाज़' का सबसे बड़ा सीन। पाँच सौ लोग, तीस कैमरे, और बीच में खड़ा एक चेहरा जिसे पूरा हिंदुस्तान पूजता था।

सीन ख़त्म हुआ, तालियाँ गूँजीं। आर्यन ने हाथ हिलाया, वो मुस्कान बिखेरी जो लाखों दिलों की धड़कन थी, और अपने वैनिटी रूम की तरफ़ बढ़ा। उस कमरे की चाबी सिर्फ़ उसके पास थी।

उसने दरवाज़ा खोला। अंदर क़दम रखा। और ठिठक गया।

सामने शीशे पर, बड़े बड़े लाल हर्फ़ों में, कुछ लिखा था। ताज़ा। अभी भी नीचे की तरफ़ बहता हुआ। "तेरा... वक़्त... आ गया, आर्यन।"

लिपस्टिक नहीं थी वो। पेंट नहीं था। खून जैसा कुछ था, गाढ़ा, और उसकी लोहे जैसी महक पूरे कमरे में भरी थी।

और आर्यन की टाँगें काँप गईं। इस धमकी में कुछ और भी था। कुछ जाना-पहचाना। जैसे कोई पुरानी आवाज़ राख के नीचे से बोल उठी हो, और उसका गला दबाने लगी हो। "मिहिर! ... मिहिर, जल्दी अंदर आ!"

मिहिर चौहान भागता हुआ आया। आर्यन का मैनेजर, पंद्रह साल से उसकी परछाईं, पैसे और इमेज दोनों का रखवाला। "क्या हुआ बॉस, शॉट अच्छा नहीं लगा क्या... " ... "ये... ये बला क्या है?"

"तू बता ये क्या है। मेरे बंद कमरे में। मेरे शीशे पे। जिसकी चाबी सिर्फ़ मेरे पास है।"

"ठंडा रह, ठंडा रह। कोई सिरफिरा फ़ैन होगा। तुझे पता है ना, ये स्टारडम की क़ीमत है। कल कोई शीशे पे 'आई लव यू आर्यन' लिख जाएगा, परसों ये।"

"आई लव यू खून से नहीं लिखते, मिहिर।"

"अरे टमाटर की चटनी भी हो सकती है। या स्पेशल इफ़ेक्ट वालों की कोई शरारत। मैं अभी हरीश से पूछता हूँ, आर्ट डिपार्टमेंट को... "

"मिहिर। चटनी की महक ऐसी नहीं होती।"

एक पल को दोनों चुप रहे। बाहर सेट पर हँसी थी, गाना बज रहा था, स्पॉट बॉय चाय बाँट रहे थे। दुनिया को कुछ नहीं पता था। "सुन मेरी बात। पुलिस नहीं। मीडिया को भनक लगी ना, तो कल हर चैनल पे यही चलेगा, आर्यन साहनी की जान को ख़तरा। शेयर गिरेंगे, इंश्योरेंस अटकेगा, ब्रांड वाले भाग जाएँगे। सौ करोड़ लगा है इस फ़िल्म में, बॉस। और आधा पैसा बत्रा साहब का है।"

"बत्रा का नाम मत ले।"

मिहिर एक पल को रुका। उसने ग़ौर किया कि उस नाम पर आर्यन का चेहरा कैसे कड़ा हो गया। पर उसने कुछ नहीं कहा। मिहिर को पता था कुछ दरवाज़े नहीं खोलने होते। "तो तेरी असल फ़िक्र मेरी जान नहीं, मेरी फ़िल्म है।"

"मैं दोनों की फ़िक्र कर रहा हूँ। इसीलिए पुलिस नहीं, प्राइवेट प्रोटेक्शन। सबसे बड़ी एजेंसी, 'प्रहरी'। चुपचाप। एक ऑफ़िसर आएगा, चौबीस घंटे तेरे साथ रहेगा, और किसी को कानों-कान ख़बर नहीं होगी।"

"कौन आएगा?"

"उनका सबसे बेहतरीन ऑफ़िसर। ऑफ़िस से रिक्वेस्ट गई थी, हमने बेस्ट माँगा था। बस थोड़ी देर में पहुँचता होगा। तू बस शांत रह, और इस शीशे को हाथ मत लगा।"

ऑफ़िस से रिक्वेस्ट गई थी। आर्यन ने ध्यान नहीं दिया कि उसका ऑफ़िस, उसका सारा शेड्यूल, उसका हर दरवाज़ा, एक ही इंसान चलाता था। और वो इंसान अभी वहाँ नहीं था।

मिहिर बाहर चला गया। आर्यन शीशे के सामने अकेला रह गया। उन लाल हर्फ़ों को देखता हुआ। और उसका मन, जिसे वो नौ साल से एक ताले में बंद रखे था, फिसल कर पीछे चला गया।

नौ साल पहले। एक छोटा सा थिएटर, टूटी कुर्सियाँ, पीली रौशनी। तीन दोस्त, जिनके पास सपनों के सिवा कुछ नहीं था।

एक था आर्यन, जो हीरो बनना चाहता था। एक था आकाश, जो लिखता था, चुपचाप, जैसे लफ़्ज़ उसकी साँसें हों। और एक थी वो लड़की, जो आर्यन की पूरी दुनिया थी। "आर्यन साहनी, एक दिन तुम बहुत बड़े आदमी बनोगे। मुझे आज ही डर लगने लगा है।"

"डर किस बात का, कैप्टन साहिबा?"

"कि बड़ा आदमी बन के तुम मुझे और आकाश को भूल न जाओ। हम तीनों का वादा है, याद है? जो भी बनेंगे, साथ बनेंगे।"

"सुहाना, दुनिया की हर चीज़ भूल जाऊँ, तुझे नहीं। ये वादा है। तेरा और मेरा।"

वादा। कितना सस्ता लफ़्ज़ था वो, आर्यन के मुँह में।

क्योंकि ठीक उसी साल शोहरत ने पहली बार दरवाज़ा खटखटाया। एक बड़े प्रोड्यूसर की नज़र आर्यन पर पड़ी। और आकाश का लिखा एक नाटक, 'साया', अचानक बहुत क़ीमती हो गया।

उस साल आकाश मर गया। ख़ुदकुशी, अख़बारों ने लिखा। एक नाकाम, सनकी लेखक। और उसी साल, एक रात, आर्यन बिना एक लफ़्ज़ कहे, बिना एक चिट्ठी छोड़े, सुहाना को और उस पूरी पुरानी ज़िंदगी को छोड़ कर चला गया।

क्योंकि वो सुहाना की आँखों में देखने से डरता था। वो आँखें उसका झूठ पढ़ लेतीं। और आर्यन एक सितारा बन गया, जिसने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। ... देखने की हिम्मत ही नहीं थी।

दरवाज़े पर आहट हुई। आर्यन ने चौंक कर पलट कर देखा। "आर्यन, ये हैं प्रहरी की तरफ़ से, तेरी नई सिक्योरिटी हेड। कैप्टन... "

दरवाज़े में एक औरत खड़ी थी। काली वर्दी, सीधी पीठ, कस कर बँधे बाल, और एक चेहरा जिस पर कोई भाव नहीं था। फ़ौज की तपी हुई। पत्थर जैसी अटल। "कैप्टन सुहाना बेदी।"

और आर्यन साहनी की साँस रुक गई।

देश का सबसे बड़ा सितारा, जिसे हज़ारों कैमरों ने कभी हिलते नहीं देखा था, एक पल को पत्थर बन गया। वो चेहरा नौ साल पुराना था। वो आवाज़ नौ साल पुरानी थी। सिर्फ़ आँखें बदल गई थीं। उनमें अब गर्मी नहीं, बर्फ़ थी। "सुहाना... "

सुहाना ने उसकी आँखों में देखा। एक पल। सिर्फ़ एक पल। उस एक पल में नौ साल की चुप्पी, नौ साल का ग़ुस्सा, नौ साल का दफ़नाया हुआ ज़ख़्म तैर गया।

फिर उसने पलक झपकाई, और वो सब ग़ायब हो गया। जैसे कभी था ही नहीं। जैसे आर्यन साहनी उसके लिए एक अजनबी हो, एक नाम, एक फ़ाइल, एक क्लाइंट। "मिस्टर साहनी। आज से आपकी हिफ़ाज़त मेरी ज़िम्मेदारी है। मैं आपको साहब नहीं, क्लाइंट कहूँगी। और आप मुझे सिर्फ़ कैप्टन।"

"अरे कैप्टन, आप शायद जानती नहीं, ये देश के सबसे बड़े स्टार हैं। इनसे थोड़ा तमीज़ से, प्यार से... "

"मैं जानती हूँ ये कौन हैं, मिस्टर चौहान।"

उसने कहा, और उन लफ़्ज़ों के नीचे एक ऐसी बर्फ़ थी जो सिर्फ़ आर्यन महसूस कर सका। मैं जानती हूँ ये कौन हैं। हाँ, वो जानती थी। दुनिया से कहीं ज़्यादा जानती थी। "मेरा एक ही उसूल है। मुझे मेरा काम करने दीजिए, बिना सवाल के। मैं जो कहूँगी, आप करेंगे। जहाँ मैं खड़े होने को कहूँगी, वहाँ खड़े होंगे। और जो मैं नहीं पूछूँगी, वो आप ख़ुद नहीं बताएँगे।"

जो मैं नहीं पूछूँगी, वो आप नहीं बताएँगे। आर्यन ने सिर झुका लिया। जैसे किसी ने उसकी छाती में एक कील ठोक दी हो। ये सिर्फ़ हिफ़ाज़त की शर्त नहीं थी। ये नौ साल की चुप्पी की शर्त थी। "जैसा आप कहें, कैप्टन।"

और उस पल आर्यन साहनी ने एक फ़ैसला किया। एक बुज़दिली भरा फ़ैसला, जैसे वो हमेशा करता आया था।

उसे पता था कि उसे इस औरत को यहीं रोक देना चाहिए। किसी और को माँग लेना चाहिए। क्योंकि ये औरत उसके सारे झूठ पढ़ लेगी, परत दर परत। पर वो ये भी जानता था कि इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक ही इंसान था जिसके हाथों में वो आँख मूँद कर अपनी जान सौंप सकता था। ... और वो यही थी। "मिहिर, इन्हें रख लो। यही रहेंगी। बाक़ी किसी को मत बुलाओ।"

"इतनी जल्दी फ़ैसला? ... चलो अच्छा है। कैप्टन, आप अपनी टीम बुला लीजिए। मैं कॉन्ट्रैक्ट के पेपर्स भिजवाता हूँ ऑफ़िस से।"

सुहाना ने आर्यन की तरफ़ देखना बंद कर दिया, जैसे उसका काम ख़त्म हो गया हो। वो अंदर आई और कमरे को एक पेशेवर नज़र से नापने लगी। दरवाज़े का ताला, खिड़की, वेंटिलेशन का जाल, कैमरे के अंधे कोने। "इस कमरे की चाबी किस किस के पास है?"

"सिर्फ़ आर्यन के पास। और... एक स्पेयर ऑफ़िस में रहती है, इमरजेंसी के लिए।"

"ऑफ़िस मतलब? कितने लोग उस चाबी तक पहुँच सकते हैं?"

"बस भरोसे के लोग। मैनेजमेंट, सेक्रेटरी। ये सब अपने ही लोग हैं, कैप्टन। बरसों पुराने।"

"मिस्टर चौहान, ये धमकी बाहर से नहीं आई। बंद कमरा, अपनी चाबी, ताज़ा खून। जिसने ये लिखा, वो अंदर का आदमी है। आपके 'अपने ही लोगों' में से एक।"

मिहिर का चेहरा उतर गया। आर्यन ने घूँट भरा। घर के भीतर का दुश्मन। ये ख़याल ही रीढ़ में ठंडक भर देता था।

आर्यन का रंग पूरी तरह उड़ चुका था। वो हल्का सा लड़खड़ाया, दीवार का सहारा लिया। और बरसों की ट्रेनिंग सुहाना के जिस्म में उससे पहले हरकत कर गई, जितना उसका दिमाग़ उसे रोक पाता।

वो एक क़दम आगे बढ़ी। उसका हाथ आर्यन की कलाई पर पड़ा, नब्ज़ नापने के लिए। नौ साल में पहली बार उन दोनों की साँसें इतनी क़रीब आईं, उन दोनों की त्वचा छुई।

आर्यन ने उस छुअन पर आँखें उठाईं। सुहाना की उँगलियाँ एक पल को, बस एक पल को, उसकी कलाई पर ठहर गईं। "नब्ज़ तेज़ है। बैठ जाइए। ... क्लाइंट का होश में रहना ज़रूरी है।"

"तुम्हारे हाथ... अब भी ठंडे हैं।"

सुहाना ने झट से हाथ खींच लिया, जैसे किसी ने आग छुआ दी हो। "मेरे हाथ मेरा मसला हैं, मिस्टर साहनी। आपकी जान मेरा काम। दोनों को अलग रखिएगा।"

आर्यन चुप हो गया। यही तो उसकी सज़ा थी। वो औरत, जो कभी उसके एक इशारे पर पिघल जाती थी, अब उसे छू कर भी अजनबी बनी रह सकती थी।

सुहाना शीशे के पास गई। खून अभी पूरी तरह सूखा नहीं था। उसने हर्फ़ों को ग़ौर से देखा, बनावट, दबाव, हाथ की चाल। ये किसी हड़बड़ाए हुए पागल का काम नहीं था। ये किसी ठहरे हुए, सोचे-समझे हाथ का काम था। जिसे जल्दी नहीं थी। "किसी ने इसे छुआ तो नहीं?"

"नहीं, नहीं। जैसा मिला वैसा ही है।"

सुहाना ने लफ़्ज़ों को पढ़ा। पूरा पढ़ा। तेरा वक़्त आ गया, आर्यन। और उसके ठीक नीचे, छोटे हर्फ़ों में, एक और लाइन थी, जो आर्यन की नज़र अब तक नहीं पड़ी थी। "जो साया तूने मिटाया... वो अब लौट आया।"

और सुहाना बेदी, जो फ़ौज में गोलियों की बौछार में नहीं हिली थी, जिसे नौ साल में किसी ने काँपते नहीं देखा था, एक पल को जम गई।

क्योंकि वो लफ़्ज़ उसने पहले सुने थे। ठीक यही लफ़्ज़। एक छोटे से थिएटर में, पीली रौशनी के नीचे, एक नाटक में, जिसका नाम था 'साया'।

वो नाटक जो कभी छपा नहीं, कभी किसी बड़े मंच पर नहीं गया। सिर्फ़ तीन लोगों ने कभी वो लाइन सुनी थी। आर्यन। सुहाना। और वो, जिसने उसे अपने हाथों से लिखा था। "ये लाइन... ये आकाश की लिखी है। तुम्हें भी याद है ना, आर्यन।"

नौ साल बाद उसके मुँह से पहली बार आर्यन का नाम निकला था। और उसके साथ, आकाश का भी।

आर्यन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली। "ये... ये मुमकिन नहीं। आकाश... आकाश तो... "

"मर चुका है। हाँ। तो फिर ये लाइन किसने लिखी, आर्यन? तुमने? ... या उसने, जो अब लौट आया?"

उन तीन लोगों में से एक, जिसने ये लाइन अपने ख़ून की तरह रची थी, नौ साल पहले मर चुका था। एक ज़िंदा था, पर काँप रहा था। और एक अभी अभी उसी कमरे में, बरसों बाद, उसके सामने खड़ी थी।

तो फिर, उस बंद कमरे के शीशे पर, ये तीसरी परछाईं किसकी थी?

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.