अध्याय 6 / 26 पढ़ने में 12 मिनट
मौत के क़रीब
साया बनके द्वारा Avni Oberoi
इक़बाल के इस राज़ के बाद कि आकाश की मौत क़त्ल थी और आर्यन ये जानता है, सुहाना आधी रात आर्यन को घेरती है, पर वो एक दीवार खड़ी कर देता है। अगली रात धमकी लफ़्ज़ों से निकल कर वार में बदल जाती है, बंगले में एक नक़ाबपोश घुसपैठिया आर्यन की जान लेने आता है, और सुहाना की फ़ौजी तालीम एक क़त्ल को लड़ाई में बदल देती है। हमले के बाद की हाँफती नज़दीकी में नौ साल की आग फिर सुलगती है, और सुहाना समझ जाती है कि हमलावर को आर्यन का एक-एक पल पता था, यानी वो अंदर का कोई है। वो घुसपैठिये को घेर कर नक़ाब खींचती है, और जिस पल वो अंधेरे में ग़ायब होता है, सुहाना देखती है कि वो एक औरत थी, जो अपने पीछे एक पुरानी तस्वीर छ
रात के उस पिछले पहर में, जब समंदर भी थक कर धीमा पड़ जाता है, सुहाना बेदी बंगले के गेट से भीतर लौटी। इक़बाल के आख़िरी लफ़्ज़ अब भी उसके कानों में गूँज रहे थे। आकाश को मारा गया था। और आर्यन ये जानता था।
नौ साल जिस ग़म को उसने ख़ुदकुशी मान कर दफ़नाया था, वो अब एक क़त्ल बन कर उसके सामने खड़ा था। और उस क़त्ल का एक गवाह, ऊपर, उसी छत के नीचे, चादर ओढ़े सो रहा था। सुहाना के क़दम अपने आप सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ गए।
उसने बीच का वो खुला दरवाज़ा पार किया, आर्यन के कमरे में दाख़िल हुई, और बत्ती जला दी। आर्यन हड़बड़ा कर उठा, आँखें मलता हुआ, नींद अभी आधी टूटी।
"सुहाना? क्या हुआ? कोई ख़तरा है? इतनी रात को..."
"एक ही ख़तरा है इस घर में, आर्यन। तुम्हारा झूठ। बैठो। और इस बार जवाब आँखें मेरी आँखों में डाल कर देना।"
आर्यन की नींद एक पल में उड़ गई। उसने सुहाना के चेहरे पर वो ठंडक देखी, जो सवाल पूछने नहीं, फ़ैसला सुनाने आती है। जो बहस नहीं, हिसाब माँगती है।
"आकाश मैथुर। जिस रात वो मरा। तुम कहाँ थे?"
"ये... ये तुमसे किसने कहा? इक़बाल ने, है ना? उस बूढ़े ने तुम्हारे कान भरे हैं। सुहाना, वो सठिया गया है, वो पुरानी बातों को ले कर..."
"मैंने पूछा तुम कहाँ थे। मैं जवाब माँग रही हूँ, आर्यन। किसी का नाम नहीं दे रही।"
और आर्यन ने वही किया जो वो नौ साल से सबसे अच्छा करता आया था। उसने एक दीवार खड़ी कर दी। लफ़्ज़ों की, रटी हुई सफ़ाइयों की, एक ऐसी दीवार जिसके पीछे उसका सच नौ साल से क़ैद था।
"आकाश ने ख़ुदकुशी की थी। पुलिस की फ़ाइल है, पोस्टमार्टम है, अख़बार हैं। पूरी दुनिया यही जानती है। और तुम एक बूढ़े की एक बात पर मुझे कठघरे में खड़ा कर रही हो?"
"पूरी दुनिया। ... पर पूरी दुनिया रात को तुम्हारी नींद में नहीं होती, आर्यन। मैं होती हूँ। और हर रात तुम उसी आकाश का नाम ले कर चीख़ते हो, किसी आग से माफ़ी माँगते हो। ख़ुदकुशी करने वाले लोग गवाहों की तरह नहीं चीख़ते। मुजरिम चीख़ते हैं।"
आर्यन के हाथ चादर को भींच रहे थे। एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, उसके होंठ काँपे, जैसे नौ साल का बाँध बस टूटने ही को हो।
"सुहाना... कुछ दरवाज़े अगर खुल गए, तो उनके पीछे सिर्फ़ मौत है। मेरी नहीं। तुम्हारी। जिस दिन तुम पूरा सच जान लोगी, उस दिन तुम भी उनके निशाने पर आ जाओगी। और मैं तुम्हें दोबारा नहीं खो सकता।"
"तुमने मुझे खोया नहीं था, आर्यन। तुमने मुझे छोड़ा था। ये फ़र्क़ याद रखना। और मौत से मैं रोज़ आँख मिलाती हूँ, ये मेरा पेशा है। सच से तुम रोज़ भागते हो, ये तुम्हारी आदत है। देखते हैं, हम दोनों में से कौन पहले थकता है।"
"तुम मुझसे नफ़रत करती हो, मुझे पता है। पर एक बात मान लो, सुहाना। जिस दिन तुम्हें पूरा सच पता चलेगा, तुम मुझसे नहीं, अपने आप से पूछोगी कि तुम इतने बरस किस बात पर टिकी रहीं।"
"मैं टिकी नहीं रही, आर्यन। मैं बस ज़िंदा रही। और ज़िंदा रहने के लिए मुझे तुम्हारी सफ़ाई की नहीं, आकाश के इंसाफ़ की ज़रूरत है। बस उसी की।"
उसने बत्ती बुझाई और कमरे से निकल गई, आर्यन को उसके अंधेरे और उसके राज़ के साथ अकेला छोड़ कर। पर जाते-जाते वो देख चुकी थी जो देखने आई थी, आर्यन डर से नहीं, अपराध-बोध से काँप रहा था।
अगली रात। बंगला पूरी तरह सील था। हर ताला जाँचा हुआ, हर गश्त गिनी हुई। समंदर की हवा परदों को हौले-हौले हिला रही थी। और सुहाना, बराबर वाले कमरे में, कुर्सी पर सीधी बैठी, आधे अंधेरे में जाग रही थी।
रात के लगभग तीन बजे, उसकी तपी हुई फ़ौजी सुनवाई ने एक आवाज़ पकड़ी। इतनी हल्की कि कोई और सोया ही रह जाता। कपड़े की एक सरसराहट। एक साँस, जो आर्यन की नहीं थी। और वो आ रही थी, आर्यन के कमरे से।
सुहाना बिजली की तरह उठी, बिना ज़रा भी आवाज़ किए। बीच के खुले दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। और अंधेरे में उसने उसे देखा, एक काला साया, आर्यन के बिस्तर पर झुका हुआ, हाथ में कोई चीज़ ठंडी चमक छोड़ती हुई।
"आर्यन! नीचे!"
और सुहाना उस साये पर झपटी। घुसपैठिये का हाथ नीचे आ रहा था, ठीक उस जगह जहाँ आर्यन का गला था। सुहाना ने पूरी ताक़त से उसकी कलाई पकड़ी और उसे हवा में मोड़ दिया। एक धातु की चीज़ फ़र्श पर गिरी और लुढ़क गई।
"क्या... सुहाना! क्या हो रहा है?!"
"बिस्तर से हटो! ज़मीन पर लेटो, दीवार से लग कर! हिलना मत, आर्यन!"
"उसके हाथ में चाकू है, सुहाना! तुम्हारी पीठ की तरफ़ से!"
"जानती हूँ! तुम बस झुके रहो और मेरी नज़र से बाहर मत जाओ!"
घुसपैठिया माहिर था। उसने कोहनी घुमाई, सुहाना के जबड़े पर वार किया, और छूटने के लिए पूरा ज़ोर लगाया। पर सुहाना फ़ौज की तपी हुई थी। ये कोई गली का चोर नहीं था, ये ट्रेंड हाथ थे, और वो जानती थी कि ऐसे हाथ को छोड़ना ख़ुद मौत को छोड़ना है।
जो एक साफ़, ख़ामोश क़त्ल होना था, सुहाना ने उसे एक लड़ाई में बदल दिया। दोनों टकराए, मेज़ गिरी, लैंप चूर-चूर हुआ, परदे रॉड समेत खिंच आए। अंधेरे में दो बदन जान की बाज़ी लगा कर भिड़े रहे।
घुसपैठिये ने एक पल पा कर सुहाना को दीवार से भिड़ा दिया। उसकी पसली में दर्द की एक तेज़ लहर दौड़ी, आँखों के आगे तारे नाचे। पर उसी पल उसने घुटना उठाया, और वार इतना सटीक था कि वो साया दोहरा हो कर टूट गया।
उस एक पल की ढील में घुसपैठिया छूटा और बालकनी के दरवाज़े की तरफ़ लपका। सुहाना पीछे झपटी, पर उसका हाथ सिर्फ़ नक़ाब के कपड़े को छू पाया। साया रेलिंग फाँद कर नीचे बाग़ में कूद गया, अंधेरे में गुम।
"जग्गी! घेरा! कोई गेट से बाहर न जाए! वो बाग़ में है, हर कोना सील करो, अभी!"
एक पल में बंगले की हर बत्ती जल उठी। गार्ड दौड़े, कुत्ते भौंके, और जग्गी अपनी टॉर्च और अपनी तोंद समेत बरामदे में गरजता हुआ पहुँचा।
"कैप्टन! क्या हुआ? ख़ून? आप ठीक हैं? हे रब्बा, कमरे का तो पूरा अखाड़ा बना पड़ा है!"
जग्गी ने टूटे लैंप, गिरी मेज़, और रॉड समेत उखड़े परदों पर एक नज़र डाली, और सिर हिलाया।
"पंद्रह साल फ़ौज में रहा, कैप्टन, दुश्मन के बंकर देखे, गोले खाए, पर हीरो साहब के एक कमरे जितनी तबाही तो हमने पूरी पलटन मिल कर नहीं मचाई। शुक्र है आप जागी थीं, वरना सुबह हर चैनल पर एक ही हेडलाइन होती।"
पर घेरे का हुक्म देने के बाद सुहाना ने सबसे पहले जो किया, वो एक कैप्टन का काम नहीं था। वो पलटी, और आर्यन के पास घुटनों के बल बैठ गई, जो अब भी ज़मीन पर, दीवार से लगा, काँप रहा था।
"कहाँ लगी? दिखाओ। गला, हाथ, कहीं कटा तो नहीं? आर्यन, मेरी तरफ़ देखो। कहाँ लगी तुम्हें?"
"मुझे... मुझे कुछ नहीं हुआ। सुहाना, तुम्हारे होंठ से ख़ून बह रहा है। तुम... तुमने अपने आप को उसके और मेरे बीच फेंक दिया।"
"ये मेरा काम है।"
"नहीं। काम में लोग हिसाब लगाते हैं। तुमने हिसाब नहीं लगाया। तुम बिना एक पल सोचे उसके सामने आ गई। ठीक वैसे, जैसे नौ साल पहले आती थीं।"
और उस एक पल में, हाँफते हुए, एक-दूसरे से चंद इंच की दूरी पर, अड्रेनलिन से काँपते हुए, दोनों को याद आया कि वो कभी क्या थे। सुहाना की कलाई आर्यन की मुट्ठी में थी, उसकी साँस आर्यन के चेहरे पर, और नौ साल की वो आग, जो कभी पूरी तरह बुझी नहीं थी, फिर से सुलगने लगी।
"छोड़ो मेरा हाथ, आर्यन। ... अभी नहीं। दुश्मन अब भी दीवार के अंदर है।"
पर उसकी अपनी धड़कन उसका साथ नहीं दे रही थी। नौ साल उसने इस आदमी को अपने दिल के सबसे दूर वाले कोने में बंद रखा था। और आज रात, एक चाकू और एक अंधेरे ने उस कोने का ताला तोड़ दिया था। वो पीछे हटी, पर उसका बदन आगे झुकना चाहता था, और यही उसे सबसे ज़्यादा डरा रहा था।
जग्गी ने खँखार कर गला साफ़ किया, ठीक उसी नाज़ुक पल पर, जैसे उसे हमेशा सबसे ग़लत वक़्त पर बोलने का ख़ास हुनर हासिल हो।
"कैप्टन, बुरा न मानें, पर ये चोर बड़ा तमीज़दार था। पूरे घर में सीधा सिर्फ़ हीरो साहब के कमरे तक गया, बिना भटके। न रसोई लूटी, न तिजोरी टटोली। जैसे उसकी जेब में इस घर का नक़्शा रखा हो। ... या जैसे वो ख़ुद इसी घर का हो।"
जग्गी ने ये मज़ाक़ में कहा था, पर सुहाना के लिए ये कोई मज़ाक़ नहीं था। वो खड़ी हुई, होंठ का ख़ून पोंछती हुई, और उसका दिमाग़ पहले से हिसाब जोड़ने लगा।
"तुम ठीक कह रहे हो, जग्गी। इसने रौशनदान नहीं तोड़ा, ताला नहीं तोड़ा। ये सीधा उस बीच वाले दरवाज़े से आया, जो सिर्फ़ आज शाम से खुलता है। इसे पता था आर्यन किस कमरे में, किस करवट सोता है। इसे मेरी गश्त का हर वक़्त पता था। ... ये बाहर का आदमी नहीं है।"
"तुम्हारा मतलब... जिसने ये किया, वो कल सुबह इसी घर में, मेरे साथ नाश्ते की मेज़ पर बैठा होगा?"
"बैठा होगा। मुस्कुराता हुआ। और तुम्हें 'गुड मॉर्निंग सर' कहता हुआ।"
सुहाना झुकी और उसने वो धातु की चीज़ उठाई, जो लड़ाई में फ़र्श पर गिरी थी। एक पतला, बेहद तेज़ चाकू, ऐसा नहीं जो किसी बाज़ार में यूँ ही मिल जाए। और उसके दस्ते पर, बारीक अक्षरों में, वही लाल रंग पुता था, जो अब तक उसने सिर्फ़ शीशों और पुर्ज़ों पर देखा था।
"वही लाल... वही धमकी वाला रंग।"
"हाँ। पर आज इस रंग के पीछे लफ़्ज़ नहीं थे, धार थी। खेल बदल गया है, आर्यन। अब ये सिर्फ़ डराना नहीं चाहता। अब ये ख़त्म करना चाहता है। और जो डराने से क़त्ल पर उतर आए, उसके पास खोने को कुछ नहीं बचा होता।"
बाहर, बाग़ में, घेरा कस चुका था। जग्गी के आदमियों ने हर कोना बंद कर दिया था। और सुहाना, टॉर्च थामे, पिछवाड़े की उस नीची दीवार की तरफ़ बढ़ी, जिसकी शिकायत जग्गी पहले ही दिन से करता आ रहा था।
और वहीं, अमरूद के पेड़ों की काली छाँव में, वो साया दुबका था, हाँफता हुआ, एक कंधा दीवार से लगाए, कूदने के लिए ऊँचाई नापता हुआ। सुहाना ने टॉर्च सीधे उस पर मारी, और घेरा और कस दिया।
"खेल ख़त्म। हिलना मत। तुम्हारे और उस दीवार के बीच अब मैं खड़ी हूँ। और मैं उतनी आसान नहीं, जितनी ये दीवार।"
घुसपैठिया एक पल को जमा। फिर, बिजली की तेज़ी से, वो दीवार की तरफ़ पलटा। सुहाना झपटी, उसका हाथ नक़ाब पर पड़ा, और उसने पूरी ताक़त से खींचा। कपड़ा फटा, नक़ाब उतरा।
और उस एक पल में, टॉर्च की काँपती रौशनी में, सुहाना ने वो चेहरा देखा। पूरा नहीं। बस आधा, बालों की एक लट के पीछे से। पर इतना काफ़ी था कि उसकी अपनी साँस एक पल को रुक जाए।
"तुम... तुम एक औरत हो?"
एक फ़ौजी की पूरी तालीम ने उसके दिमाग़ में एक ही सवाल दौड़ा दिया। एक औरत। इतने माहिर हाथ, इतनी ठंडी हिम्मत, और एक ऐसी नफ़रत जो सीधे आर्यन के गले पर उतरना चाहती थी। ये कोई भाड़े का क़ातिल नहीं था। ये किसी का बरसों पुराना ज़ख़्म था, जो अब बदला माँगने आया था।
जवाब में सिर्फ़ एक फुर्तीली छलाँग थी। साया दीवार फाँद गया, दूसरी तरफ़ के अंधेरे में, समंदर की गरजती लहरों की आवाज़ में घुल कर ग़ायब। सुहाना दीवार तक पहुँची, पर उस पार सिर्फ़ रात थी, ख़ाली और काली, और भागते क़दमों की आख़िरी आहट।
वो एक हारी हुई साँस ले कर पलटी। और तभी उसकी टॉर्च की रौशनी ज़मीन पर एक चीज़ पर पड़ी, ठीक वहीं, जहाँ वो औरत दीवार फाँदते हुए एक पल को अटकी थी। कुछ गिरा था। कुछ, जो उसकी जेब से फिसल गया था।
सुहाना घुटनों के बल बैठी और उसे उठाया। एक छोटी सी चीज़, बरसों की उँगलियों से घिसी हुई, किनारों से मुलायम, जैसे किसी ने उसे रोज़ छुआ हो। एक पुरानी, पीली पड़ चुकी तस्वीर।
उसने टॉर्च उस पर सीधी की। और जो चेहरे उस तस्वीर में से उसे देख रहे थे, उन्हें पहचान कर सुहाना बेदी की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई। क्योंकि वो अजनबी नहीं थे। ... वो चेहरे उसके अपने अतीत के थे। और वो अतीत, अभी-अभी, इसी दीवार से कूद कर, रात के अंधेरे में भाग गया था।
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