Chapter 5 of 26 11 min read
झूठ का परदा
बूढ़ा थिएटर उस्ताद इक़बाल आर्यन के सेट पर आ कर नौ साल पुराना अतीत सुहाना और आर्यन के बीच खड़ा कर देता है, तीन दोस्तों की कहानी, नाटक 'साया', पहली फ़िल्म, और वो दोस्त आकाश जो कभी लौट कर नहीं आया। आर्यन आधी-अधूरी बात कह कर अपना हिस्सा छुपाता है, और आकाश के लिए सुहाना का दबा हुआ ग़म फिर जाग उठता है। रात को दोनों एक चुम्बन के इतने क़रीब पहुँच कर पीछे हट जाते हैं, तभी आर्यन की वैनिटी में एक ऐसा तोहफ़ा मिलता है जो सिर्फ़ अंदर का कोई रख सकता था, और जाते-जाते इक़बाल सुहाना के कान में कह देता है कि आकाश ने ख़ुदकुशी नहीं की थी, और आर्यन ये जानता है।
बंद सेट पर वो तीनों खड़े थे। बूढ़ा इक़बाल, राख जैसा सफ़ेद आर्यन, और उन दोनों के बीच, कुछ समझने की कोशिश करती सुहाना। हवा में एक ऐसा बोझ था जो नौ साल से किसी सीने पर रखा था।
आर्यन का पहला ख़याल था, इस आदमी को यहाँ से निकालो, इससे पहले कि ये कुछ कह दे। नौ साल से उसकी पूरी ज़िंदगी इसी एक हुनर पर टिकी थी, सच को कमरे से बाहर रखना। "उस्ताद, आप... आप थक गए होंगे। मैं गाड़ी मँगवाता हूँ। आपको घर छुड़वा देता हूँ। फिर कभी फ़ुरसत से... "
"फ़ुरसत? नौ साल फ़ुरसत में गुज़ार दिए तूने, आर्यन। एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा। अब जब मौत के पैग़ाम शीशों पर आने लगे हैं, तब तुझे मेरी याद आई?"
"नहीं, आप कहीं नहीं जाएँगे, इक़बाल साहब। बैठिए। आपको जो कहना है, कहिए। जिसकी जान ख़तरे में है, उसका अतीत मेरे लिए एक फ़ाइल है। और आप उस फ़ाइल का सबसे पुराना पन्ना हैं।"
आर्यन ने सुहाना की तरफ़ देखा, आँखों में एक बेबस गुज़ारिश, मत सुनो। पर सुहाना की नज़र में सिर्फ़ एक कैप्टन की ठंडक थी। और शायद, उसके नीचे कहीं, एक दोस्त का पुराना ग़म भी। "बैठ जाऊँ? ... ठीक है। पर मैं जो कहूँगा, बेटी, वो तुझे एक अलग आर्यन की कहानी लगेगी। एक ऐसा लड़का, जो कभी सिर्फ़ सपने का भूखा था। रुतबे का नहीं।"
और इक़बाल कहने लगा। और उसकी थकी आवाज़ के साथ, स्टूडियो की दीवारें पिघल गईं, और नौ साल पहले का एक छोटा सा थिएटर उभर आया। "तीन बच्चे थे मेरे पास। आर्यन, जो स्टेज पर आते ही जगमगा उठता था। तू, सुहाना, जो सबसे तेज़, सबसे बेख़ौफ़ थी। और एक तीसरा। आकाश मैथुर। जो बोलता कम था, लिखता ज़्यादा। जिसके लफ़्ज़ों में जादू था।"
आकाश। वो नाम सुनते ही सुहाना की मुट्ठियाँ भिंच गईं। नौ साल में उसने इस नाम को इतनी गहराई में दफ़नाया था कि अब उसे ऊपर आते देख साँस रुक गई। "और आकाश ने एक नाटक लिखा। 'साया'। एक ऐसे आदमी की कहानी, जो अपनी परछाईं से भागता है, और आख़िर में पता चलता है कि परछाईं ही उसका सबसे सच्चा हिस्सा थी। वो नाटक... वो कोई मामूली चीज़ नहीं थी।"
और एक पल को, यादों के परदे पर, एक दुबला-पतला लड़का उभरा, आँखों पर मोटा चश्मा, हाथ में काग़ज़ों का पुलिंदा, चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान। "आर्यन, सुन। इस किरदार में तू अपनी वाली अकड़ मत डालना, यार। ये आदमी हीरो नहीं है। ये डरा हुआ है। जैसे हम सब अंदर से डरे हुए हैं। बस उसे ईमानदारी से डर, बाक़ी मैं सँभाल लूँगा।" "और सुहाना, तू इसका ख़याल रखना। ये बड़ा आदमी बनेगा एक दिन, और बड़े आदमी सबसे पहले अपने आप को भूलते हैं।"
"वो तीनों घंटों उस स्टेज पर बैठे रहते थे। आर्यन डायलॉग बोलता, आकाश उसे ठीक करता, और तू, सुहाना, दोनों को चाय पिलाती और दोनों को डाँटती भी। मैंने अपनी पूरी उम्र में तीन लोगों को इतना एक नहीं देखा।"
और सुहाना को वो रातें याद आईं। बारिश में भीगा वो थिएटर, एक टूटा पंखा, उधार के कपड़े, और तीन बच्चे, जिनके पास एक-दूसरे के सिवा कुछ नहीं था। और फिर भी सब कुछ था। "सुहाना, जिस दिन ये आर्यन तुझे भूल जाए ना, मुझे बता देना। मैं इसकी अगली कहानी में इसे विलेन बना दूँगा। लेखक की यही तो ताक़त है, हिसाब क़लम से चुकाता है।"
तब वो तीनों खिलखिला कर हँसे थे। किसी को नहीं पता था कि वो मज़ाक़ एक दिन इतना सच हो जाएगा। कि आर्यन सच में भूल जाएगा, और आकाश सच में लौट कर हिसाब माँगेगा। पर विलेन बन कर नहीं। एक साये बन कर।
सुहाना ने आँखें मूँद लीं। आकाश की वो हँसी, वो शर्मीली आवाज़, नौ साल बाद इतनी साफ़ लौटी कि सीने में कुछ चटख़ गया। वो सिर्फ़ आर्यन की मोहब्बत नहीं खोई थी उस साल। उसने अपना सबसे प्यारा दोस्त भी खोया था। "फिर एक शो-केस हुआ। बड़े लोग आए। और उनमें एक आदमी था, जिसकी नज़र इस नाटक पर, और आर्यन के चेहरे पर पड़ गई। एक बहुत बड़ा प्रोड्यूसर। और उसी रात, सब कुछ बदल गया।"
और सुहाना ने देखा कि आर्यन का हाथ, जो अब तक कुर्सी के हत्थे पर था, उस 'शो-केस' के ज़िक्र पर सफ़ेद पड़ गया। जैसे उस एक रात में उसकी पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा गुनाह दफ़न हो। "वो प्रोड्यूसर। उसका नाम बत्रा था?"
इक़बाल की आँखें एक पल को सिकुड़ीं। उसने आर्यन की तरफ़ देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया, जैसे कुछ नाम ऊँची आवाज़ में लेना ख़तरनाक हो। "नाम मत पूछ, बेटी। कुछ नाम लेने से पहले आदमी को अपनी क़ब्र तैयार रखनी पड़ती है। बस इतना जान, उस रात के बाद, एक फ़िल्म बनी। 'परछाईं'। जिसने आर्यन को सितारा बना दिया।" "और आकाश? ... आकाश उस फ़िल्म के बनने से पहले ही चला गया। अख़बारों ने लिखा, एक नाकाम लेखक, जो अपनी नाकामी बर्दाश्त नहीं कर सका। ख़ुदकुशी। बस, कहानी ख़त्म।"
और यहाँ, इस मोड़ पर, आर्यन आख़िरकार बोला। पर उसने पूरी बात नहीं कही। उसने बस उतना कहा, जितना उसे नौ साल से रटा हुआ था। "आकाश टूट गया था, सुहाना। वो प्रेशर नहीं ले पाया। फ़िल्म मुझे मिली, उसे नहीं, और वो... वो सह नहीं सका। मैंने बहुत कोशिश की उसे सँभालने की। पर मैं... मैं नाकाम रहा।"
मैंने बहुत कोशिश की। कितनी सफ़ाई से कही गई बात। जिसमें आर्यन एक दुखी दोस्त था, एक बेबस गवाह। और जिसमें से 'साया' की चोरी ग़ायब थी, बत्रा की धमकी ग़ायब थी, और वो रात ग़ायब थी, जिसमें आर्यन ने चुप रहना चुना था। "तुमने कोशिश की। ... तुम्हारी कोशिश का ये नतीजा निकला कि तुम सितारे बन गए और वो एक ख़बर बन कर रह गया। और मैं? मैं दोनों को एक साथ खो बैठी। एक क़ब्र में, एक शोहरत में।"
"सुहाना, तुम नहीं समझोगी उस वक़्त... "
"तो समझाओ! नौ साल से यही तो चाहती हूँ मैं। पर तुम में हिम्मत ही नहीं है, आर्यन। तब भी नहीं थी। अब भी नहीं है।"
"अगर मैं कहूँ कि मेरे न बोलने की एक क़ीमत थी? कि किसी ने मुझे... कि मेरे सिर पर एक... "
"आर्यन।"
इक़बाल का वो एक लफ़्ज़, आर्यन के नाम पर, किसी चाबुक की तरह गिरा। और आर्यन की ज़ुबान बीच में ही कट गई। सुहाना ने दोनों को देखा। इन दोनों के बीच एक ऐसा राज़ था, जिसका नाम लेने से भी दोनों काँपते थे। "एक दिन, आर्यन, ये डर तुम्हारी जान ले लेगा। और उस दिन शायद मैं भी तुम्हें बचा न पाऊँ। क्योंकि जिससे तुम डरते हो, वो बाहर नहीं, तुम्हारे अपने अंदर बैठा है।"
इक़बाल धीरे से खड़ा हुआ। उसने दोनों को देखा, दो टूटे हुए लोग, एक ही ज़ख़्म के दो किनारे, और उसकी आँखों में एक गहरी थकान थी। "मैं चलता हूँ। जो मुझे कहना था, कह दिया। अब आगे का रास्ता तुम दोनों का है।"
रात हुई। इक़बाल जा चुका था, पर उसकी बातें बंगले की हर दीवार पर टँगी रह गई थीं। आर्यन अपने कमरे में, खिड़की के पास खड़ा, समंदर को घूर रहा था। और सुहाना दरवाज़े पर आ खड़ी हुई। "वो नाटक। 'साया'। उसकी वो आख़िरी लाइन जो शीशे पर थी। तुम्हें अब भी पूरी याद है, है ना?"
"मुझे हर लाइन याद है, सुहाना। नौ साल से हर रात मैं वो पूरा नाटक अपने अंदर दोहराता हूँ। ये मेरी सज़ा है।"
वो पलटा। और सुहाना, जो सारा दिन एक कैप्टन बनी रही थी, इस पल में सिर्फ़ एक औरत थी, जिसके सामने उसका खोया हुआ अतीत खड़ा था। दोनों के बीच का फ़ासला अपने आप कम होने लगा। "तुम्हें पता है नौ साल से सबसे ज़्यादा मुझे किस बात ने मारा है? आकाश नहीं। शोहरत नहीं। ये कि जिस रात मैं गया, मैंने तुम्हें सोते हुए देखा, और जगाया तक नहीं। क्योंकि अगर तुम आँखें खोलतीं, तो मैं रुक जाता।"
अब वो इतने क़रीब थे कि सुहाना उसकी साँस अपने होंठों पर महसूस कर सकती थी। नौ साल का ग़ुस्सा और नौ साल की चाहत एक ही धड़कन में उलझ गए। आर्यन का हाथ उठा, उसके चेहरे की तरफ़। "आर्यन... "
उनके होंठ बस एक साँस की दूरी पर थे। एक पल, और नौ साल की दीवार गिर जाती।
पर तभी सुहाना के भीतर के कैप्टन ने आँख खोली। जिसकी बात वो अभी सुन कर आई थी, वो झूठ बोल रहा था। पूरी बात छुपा रहा था। और वो एक झूठे आदमी के होंठों पर अपना नौ साल पुराना ग़म नहीं गँवा सकती थी। "नहीं। ... ये ग़लत है। जब तक तुम मुझे पूरा सच नहीं बताते, आर्यन, तब तक हमारे बीच कुछ नहीं। कुछ भी नहीं।"
"और अगर सच तुम्हें मुझसे और नफ़रत करने पर मजबूर कर दे तो?"
"तो कम से कम वो सच्ची नफ़रत होगी। इस झूठी नज़दीकी से बेहतर।"
और ठीक उसी पल, बाहर से एक आवाज़ आई। सुरक्षा गार्ड की, हड़बड़ाई हुई। आर्यन की वैनिटी वैन में कुछ मिला था।
सुहाना दौड़ी। वैनिटी वैन का दरवाज़ा खुला था, ताला बरक़रार, कोई तोड़-फोड़ नहीं। और अंदर, आर्यन के मेकअप टेबल पर, एक चीज़ रखी थी, जिसे देख कर आर्यन के घुटने काँप गए।
एक पुरानी, पीली पड़ चुकी नाटक की स्क्रिप्ट। 'साया'। और उसके ऊपर रखा था एक सूखा हुआ गुलाब, ठीक वैसा, जैसा नौ साल पहले हर शो के बाद आकाश अपनी टीम को दिया करता था। "ये किसी बाहरी का काम नहीं। ये आकाश की आदत थी, है ना? सूखा गुलाब। ये सिर्फ़ वो जानता होगा, जो उन दिनों में मौजूद था। या जिसे किसी ने वो सब बताया।"
आर्यन उस स्क्रिप्ट को छू भी नहीं पा रहा था। उसका चेहरा पसीने से तर था। वो बार-बार बुदबुदा रहा था, ये मुमकिन नहीं, ये मुमकिन नहीं। "आर्यन, ये गुलाब, ये स्क्रिप्ट। कौन जानता है इन बातों को? कौन था उन दिनों तुम्हारे इतने पास कि उसे आकाश की ये आदत तक पता हो? सोचो!"
"कोई नहीं... वो सब ख़त्म हो गया था... सिर्फ़ मैं, तुम, इक़बाल... और आकाश। और आकाश तो... "
और आकाश तो मर चुका है। ये लफ़्ज़ आर्यन कह नहीं पाया, पर वो हवा में लटक गया। और सुहाना को पहली बार लगा कि इस पूरे खेल में एक चौथा खिलाड़ी था। कोई ऐसा, जो आकाश को उतना ही जानता था, जितना वो तीनों। कोई, जो अभी तक किसी की गिनती में नहीं आया था।
और तभी सुहाना को याद आया, इक़बाल गेट तक पहुँचा ही होगा। वो लपक कर बाहर निकली। बूढ़ा आदमी अपनी गाड़ी के पास खड़ा था, जैसे उसे पता हो कि वो आएगी। "इक़बाल साहब! रुकिए। आपने आज सब कुछ नहीं बताया। मैं जानती हूँ। आपकी आँखें कुछ और कह रही थीं।"
इक़बाल एक पल रुका। रात की हवा में उसकी सफ़ेद दाढ़ी काँपी। उसने इधर-उधर देखा, फिर सुहाना के बहुत क़रीब आ कर, बहुत धीमे से बोला। "बेटी, एक बात अपने दिल में रख, और किसी को मत बता, जब तक तेरे पास सबूत न हो। ... आकाश ने ख़ुदकुशी नहीं की थी।"
सुहाना की दुनिया एक पल को थम गई। नौ साल का वो ग़म, वो जिसे उसने ख़ुदकुशी मान कर रोया था, अचानक एक नए, भयानक रंग में रँग गया। "उसे मारा गया था। और सबसे बुरी बात? ... तेरा आर्यन ये जानता है। उस रात वो वहीं था। ... अब तू ख़ुद तय कर, तू किसकी हिफ़ाज़त कर रही है।"
और गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ। इक़बाल चला गया। और सुहाना बेदी वहीं खड़ी रह गई, उस बंगले के गेट पर, जिसके अंदर वो आदमी सो रहा था, जिसे उसे बचाना था, और जो शायद उसके सबसे प्यारे दोस्त के क़त्ल का गवाह था।
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts.