Chapter 25 of 26 13 min read
गोली की गूँज
धुएँ के पार वो गोली आर्यन के सीने में उतरती है, जो एक ही पल में सुहाना और मौत के बीच आ खड़ा हुआ था, और ठीक उसी पल आकाश की अपनी आवाज़ पूरे देश की करोड़ों स्क्रीन पर गूँज उठती है, जिसमें ख़ुद बत्रा का हुक्म क़ैद है। सुहाना बत्रा को पल भर में गिरा देती है, नायक उसे हथकड़ी पहना देता है, आर्यन का नाम मुजरिम से हीरो बन जाता है, पर आर्यन नीचे पड़ा ख़ून बहाता जा रहा है, और आख़िरी चीज़ जो सुनाई देती है वो है सुहाना की चीख उसके नाम की और क़रीब आती सायरनों की आवाज़।
धुआँ। चिंगारियाँ। और कानों में वो गूँज जो एक गोली के बाद पूरी दुनिया को पल भर के लिए बहरा कर देती है। पर उस गूँज के पार, उस बंद कमरे में और उन करोड़ों स्क्रीन पर, एक और आवाज़ उठ रही थी। एक ऐसी आवाज़ जो नौ साल पहले एक क़ब्र में दफ़न कर दी गई थी। आकाश की आवाज़। और वो ज़िंदा थी।
धुआँ छँटा, और सच सामने आया। सुहाना घुटनों के बल गिरी हुई थी, ज़िंदा। उसने छलांग लगाई थी, और बत्रा की बंदूक की नाल आख़िरी पल में उसी की तरफ़ मुड़ी थी। पर वो गोली उस तक कभी नहीं पहुँची। क्योंकि उससे एक पल पहले, एक जिस्म बीच में आ गिरा था। आर्यन। फ़र्श पर। और उसकी बेदाग़ सफ़ेद क़मीज़ पर, सीने के ठीक बाईं तरफ़, एक लाल फूल तेज़ी से खिल रहा था।
"आर्यन। ... नहीं, नहीं, नहीं। ... आँखें खोलो, आर्यन। मेरी तरफ़ देखो। ... तुमने ये क्या किया? ... मैंने तुमसे कहा था, नीचे रहना, ज़मीन पर रहना। ... तुमसे किसने कहा था बीच में आने को?"
"तुमने... कहा था न... कि तुम मुझे गिरने नहीं दोगी। ... आज मेरी बारी थी, कैप्टन। ... नौ साल पहले... मैं तुम्हारे लिए खड़ा नहीं हो पाया था। ... आज... हो गया। ... और पता है? ... आज मुझे बिल्कुल डर नहीं लगा।"
सुहाना ने अपनी दोनों हथेलियाँ उस ज़ख़्म पर दबा दीं, पूरी ताक़त से। पर ख़ून उसकी उँगलियों के बीच से यूँ बह रहा था जैसे नौ साल का सारा दबा हुआ वक़्त एक साथ बह जाना चाहता हो। उसकी वो वर्दी, जो कभी नहीं काँपती थी, आज लाल हो रही थी, और उसके साथ काँप रहे थे उसके हाथ, पहली बार।
और ठीक उसी पल, उस कंसोल से, इमारत के हर स्पीकर से, और देश की हर स्क्रीन से, आकाश की आवाज़ फूट पड़ी। नौ साल पुरानी, पर इतनी साफ़ जैसे वो अभी उसी कमरे में साँस ले रहा हो। एक डरे हुए, पर अड़े हुए लड़के की आवाज़, जिसने मरने से चंद घंटे पहले, अपने ही फ़ोन पर, वो पूरी रात क़ैद कर ली थी।
"मेरा नाम आकाश माथुर है," वो आवाज़ पूरे देश से कह रही थी, "और अगर आप ये सुन रहे हैं, तो शायद मैं अब इस दुनिया में नहीं हूँ। 'साया' मैंने लिखा है, अपने ख़ून से, अपनी रातों से। और आज योहान बत्रा साहब मुझसे कह रहे हैं कि मैं अपने ही नाटक से मिट जाऊँ, हमेशा के लिए। वरना..." और फिर उस रिकॉर्डिंग में एक दूसरी आवाज़ उभरी। मख़मली। ठंडी। पहचानी हुई।
रिकॉर्डिंग में बत्रा की आवाज़ गूँजी, नौ साल पुरानी, पर आज अपने ही मालिक की क़ब्र खोदती हुई। "नाम मिट जाएगा, लड़के, या तू ख़ुद मिट जाएगा। फ़ैसला तेरा है। इस इंडस्ट्री में सितारे मैं बनाता हूँ, और जो मेरे रास्ते में आता है, उसके साथ... हादसे हो जाते हैं।" और पूरे देश ने, एक ही पल में, एक मरे हुए लड़के की अपनी आवाज़ में, उसके क़ातिल का नाम सुन लिया।
"बंद करो! ... बंद करो ये आवाज़! ... कोई इसे रोको! ... वो तार काटो, वो कंसोल जला दो, वो फ़ीड काट दो, कुछ भी करो! ... पर ये आवाज़ अभी बंद करो!"
पर बत्रा नहीं समझ रहा था। वो आवाज़ अब उस कमरे में नहीं थी। वो अब उन तारों में भी नहीं थी। वो अब करोड़ों घरों में थी, करोड़ों कानों में, चौराहों पर लगी स्क्रीनों पर, हर हथेली में थमे फ़ोन में। हमेशा के लिए। उसका आदमी लौ को कंसोल के तारों पर ले गया, पर सच को अब जलाया नहीं जा सकता था। सच पहले ही आज़ाद हो चुका था।
"अब कुछ बंद नहीं होगा, बत्रा। ... तुमने आग को अपनी सबसे पुरानी दोस्त कहा था न? ... देखो, आज उसी आग ने तुम्हारा नाम पूरे देश के सामने रोशन कर दिया। ... आकाश की आवाज़ अब हर घर में है। ... तुम एक आदमी को मार सकते थे, बत्रा। एक आवाज़ को नहीं।"
और कंसोल पर, नैरा जम गई थी। उसकी उँगली अब भी उस बटन पर टिकी थी जिसने अभी-अभी उसके भाई को पूरे देश के सामने ज़िंदा कर दिया था। नौ साल की उसकी पूरी ज़िंदगी, हर झूठ, हर नक़ली मुस्कान, हर रात का इंतज़ार, इसी एक पल में आ कर सिमट गया था। और उसकी आँखों से आँसू बह निकले, चुपचाप।
"भैया... ... ये तुम्हारी आवाज़ है। ... नौ साल मैंने इसे अपने सीने से लगा कर रखा, सिर्फ़ इस एक पल के लिए। ... सुनो, भैया, पूरा देश तुम्हें सुन रहा है। ... तुम्हारा नाम... तुम्हारा नाम वापस आ गया। ... तुम अब कभी मिटाए नहीं जाओगे।"
और उधर, उस आदमी की लौ कंसोल के तारों से लिपटने लगी, एक पीली, भूखी जीभ। सुहाना एक ही पल में दो जगह होना चाहती थी, आर्यन के ज़ख़्म पर, और उस आग पर। उसने अपनी आवाज़ को फ़ौलाद बना कर नैरा की तरफ़ फेंका।
"नैरा! ... वो लौ, कंसोल से हटाओ उसे, अभी! अपनी जैकेट से दबाओ! ... रिकॉर्डिंग चल चुकी है, अब वो कंसोल जल भी जाए तो सच बाहर है, पूरे देश में है! ... और वो फ़ोन, नायक वाली खुली लाइन, उसे मत छोड़ना! उसे सब सुनने दो, हर लफ़्ज़!"
नैरा हरकत में आई। उसने अपनी जैकेट खींची और उस लौ पर दे मारी, एक बार, दो बार, जब तक वो भूखी जीभ बुझ कर सिर्फ़ धुआँ न रह गई। और उस मेज़ पर पड़ा फ़ोन अब भी खुला था, और उसके उस पार, कहीं बाहर, एसीपी नायक हर एक शब्द सुन रहा था, हर एक साँस।
"तुम्हें लगता है ये ख़त्म हो गया? ... मैं योहान बत्रा हूँ। मैंने इस शहर के आधे लोगों को बनाया है, और आधों को दफ़नाया है। ... एक रिकॉर्डिंग? एक मरे हुए लड़के की आवाज़? ... मैं इसे भी झूठा साबित कर दूँगा, जैसे मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में हर सच को झूठ बना दिया। ... मेरे पास वक़्त है, पैसा है, वकील हैं, और... ये बंदूक।"
और बत्रा ने अपनी बंदूक उठाई, धुएँ के पार, सीधे सुहाना की तरफ़, जो अब भी आर्यन के ज़ख़्म पर झुकी हुई थी। पर सुहाना ने वो नाल घूमते देख ली। और नौ साल की फ़ौज उसके भीतर जाग उठी।
"तुम्हारे पास बंदूक है, बत्रा। ... और मेरे पास नौ साल का ग़ुस्सा, और एक फ़ौज की तपी हुई ट्रेनिंग। ... तुमने अभी-अभी उस आदमी को गोली मारी है जिसे बचाने के लिए ये पूरा देश मुझे यहाँ लाया था। ... मेरा फ़र्ज़ अभी ख़त्म नहीं हुआ। ... एक इंच, और मैं तुम्हें दिखाऊँगी कि एक फ़ौजी की आँख में देख कर बंदूक उठाना क्या होता है।"
बत्रा ने घोड़ा दबाया। पर सुहाना उससे तेज़ थी, हमेशा से रही थी। उसका हाथ बिजली की तरह उठा, बत्रा की कलाई को एक झटके में मोड़ा, गोली छत में जा धँसी, प्लास्टर की एक बौछार गिरी, और अगले ही पल वो मख़मली आवाज़ वाला आदमी, वो पूरे साम्राज्य का मालिक, अपने ही ऑडिटोरियम के फ़र्श पर औंधे मुँह पड़ा था, उसकी बाँह सुहाना के घुटने के नीचे मुड़ी हुई।
"छोड़ो मुझे! ... तुम्हें पता है मैं कौन हूँ? ... तुम एक मामूली पहरेदार हो, एक नौकरानी, जिसे पैसे दे कर रखा जाता है! ... मैं इस देश के सबसे बड़े लोगों को जानता हूँ! तुम मुझे छू भी नहीं सकतीं!"
"मुझे पता है तुम कौन हो, बत्रा। ... और अब पूरे देश को पता है तुम कौन हो। ... एक क़ातिल, जिसने नौ साल एक बाप का नक़ाब पहन रखा था। ... और रही बात नौकरानी की, ... तो हाँ, मैं एक पहरेदार हूँ। और आज मैंने वो पहरा दिया जो नौ साल से अधूरा था।"
और तभी, पीछे वाला वो सर्विस दरवाज़ा, जिसे जग्गी अपनी जान पर खेल कर खुला रखे था, एक धमाके से पूरा खुल गया। भारी बूटों की आवाज़, टॉर्चों की रोशनी, और एक गरजती हुई पुकार। एसीपी नायक, अपनी पूरी फ़ोर्स के साथ, उस बंद क़िले में उतर आया, जिसकी हर दीवार अभी-अभी सच की आवाज़ से गूँजी थी।
नायक बत्रा के पास पहुँचा। उसने उसके कंधे पर हाथ रखा, और वो शब्द कहे जो बत्रा ने अपनी पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए लिखे थे। "योहान बत्रा, आकाश माथुर के क़त्ल, और आज रात आर्यन साहनी पर गोली चलाने के जुर्म में, तुम गिरफ़्तार हो।" और हथकड़ी की वो ठंडी आवाज़ उस संगमरमर पर गूँजी, ठीक वैसे जैसे किसी और की कलाई पर, किसी और लॉबी में, कभी गूँजी होगी। पर आज पलड़ा पलट चुका था।
और बाहर, ऑडिटोरियम में, और देश के हर कोने में, वही भीड़ जो कुछ पल पहले आर्यन को एक हत्यारा समझ बैठी थी, अब साँस रोके खड़ी थी। परदों पर अब बत्रा का गढ़ा हुआ झूठ नहीं चल रहा था। अब वहाँ एक मरे हुए लड़के का नाम था, और उसके साथ एक और नाम, जो आज मुजरिम से हीरो बन गया था। आर्यन साहनी। जिसका इक़बाल अब जुर्म नहीं, हिम्मत कहलाता था।
"हो गया, सुहाना। ... नौ साल... और आज हो गया। ... भैया का नाम साफ़ है। बत्रा हथकड़ी में है। ... मैंने जो चाहा था, वो सब हो गया। ... फिर मेरा दिल इतना ख़ाली क्यों लग रहा है?"
"क्योंकि बदला ख़ाली जगह नहीं भरता, नैरा। ... वो सिर्फ़ हिसाब बराबर करता है। ... आकाश वापस नहीं आएगा। पर आज उसका नाम वापस आ गया। ... और तुम, ... तुम आज नौ साल बाद पहली बार साँस ले सकती हो। ... पर अभी नहीं। अभी मेरे साथ आओ, ... आर्यन के पास।"
और सुहाना पलटी, और उस पूरे टूटते हुए साम्राज्य, उन बूटों, उन कैमरों, उस गूँजती आवाज़ को पीछे छोड़ कर, वापस फ़र्श पर गिर पड़ी, उस आदमी के पास जो अब बहुत शांत पड़ा था। बहुत ज़्यादा शांत। आर्यन की सफ़ेद क़मीज़ अब पूरी लाल हो चुकी थी, और उसका रंग तेज़ी से उतर रहा था।
"आर्यन। ... मेरी तरफ़ देखो। ... हो गया, सुनते हो? ... आकाश का नाम साफ़ है। बत्रा पकड़ा गया। तुमने जीत लिया। ... तुमने वो कर दिखाया जो नौ साल से कोई नहीं कर पाया था। ... अब तुम्हें बस एक काम और करना है। ... मेरे साथ रुकना है। ... आँखें मत बंद करना।"
"सुहाना... ... तुमने एक वादा किया था... याद है? ... कि अगर हम दोनों... ज़िंदा बचे... तो तुम मुझे वो जवाब दोगी... जो नौ साल से... तुम्हारे सीने में बंद है। ... मैं... मैं अब ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकता, कैप्टन। ... वो जवाब... अभी दे दो।"
और सुहाना ने, उसकी काँपती हथेली को अपने दोनों हाथों में भर कर, उसे अपने सीने से लगा लिया, वहाँ जहाँ नौ साल से एक दरवाज़ा बंद पड़ा था। और उस दरवाज़े को, आज, इस ख़ून और धुएँ के बीच, उसने खोल दिया।
"सुनो। ... नौ साल पहले जिस दिन तुम गए थे, मैं टूटी नहीं थी, आर्यन। ... मैं मर गई थी। ... और जो औरत फ़ौज में गई, वो मैं नहीं थी, वो मेरी राख थी। ... मैंने तुमसे नफ़रत करने की हर कोशिश की, और हर बार नाकाम रही। ... क्योंकि सच ये है, तुम बुज़दिल, ... मैंने भी तुम्हें एक पल के लिए नहीं छोड़ा। ... मैं तुमसे अब भी उतना ही प्यार करती हूँ जितना उस पहली रात करती थी।"
"नौ साल... ... मैं यही एक जुमला सुनने के लिए... ज़िंदा था, सुहाना। ... हर फ़िल्म, हर तमाशा, हर झूठी मुस्कान... सिर्फ़ इसलिए, ताकि किसी दिन... तुम मुझे ये कह सको। ... और आज... जब तुमने कहा... मुझे नींद आ रही है। ... कैसी बुरी क़िस्मत है न, कैप्टन?"
"नहीं। नहीं, आर्यन, नींद नहीं। ... आँखें खुली रखो, मेरी तरफ़ देखो, मुझसे बात करते रहो! ... तुमने अभी-अभी मुझसे प्यार वापस पाया है, तुम्हें अभी इसे जीना है! ... तुम मुझसे ये जुमला छीन कर यूँ नहीं जा सकते! ... आर्यन! रुको मेरे साथ! ... ये एक हुक्म है, समझे? तुम्हारी कैप्टन का हुक्म!"
और सुहाना उसके ऊपर झुकी, इतना क़रीब कि उसकी साँस आर्यन के होंठों को छू गई, वो चुम्बन जो नौ साल से अधूरा था, जो हर बार दहलीज़ पर थम गया था, आज फिर उन दोनों के बीच काँप रहा था। पर इस बार उसे किसी फ़र्ज़ ने नहीं रोका, किसी दीवार ने नहीं। इस बार उसे रोका, आर्यन की बंद होती आँखों ने।
"साया बन कर... तुम मेरी जान बचाने आई थी, कैप्टन। ... और देखो... आख़िर में... तुमने बचा ही ली। ... सिर्फ़ मेरी जान नहीं... मुझे भी। ... शुक्रिया... मेरे साये।"
और फिर, उसकी वो हथेली, जो सुहाना के सीने से लिपटी थी, धीरे से ढीली पड़ गई। उसकी आँखें, जो अभी तक सुहाना पर टिकी थीं, आधी बंद हो गईं। और उसका सीना, जो नौ साल की हर साँस भारी ढोता रहा था, एक पल को थम सा गया।
"आर्यन! ... नहीं! ... आर्यन, मेरी तरफ़ देखो! ... तुमने वादा किया था, ज़िंदा बचने का! ... किसी को बुलाओ! डॉक्टर! एम्बुलेंस! कोई तो मदद करो! ... आर्यन, प्लीज़! ... तुम मुझे अभी छोड़ कर नहीं जा सकते, अभी नहीं, ऐसे नहीं!"
और उस बंद ऑडिटोरियम में, जिसकी हर दीवार अभी-अभी एक मरे हुए लड़के के इंसाफ़ से गूँजी थी, अब सिर्फ़ एक ही आवाज़ बची थी, एक औरत की चीख, जो नौ साल की सारी बर्फ़ पिघला कर बाहर आ रही थी, अपने खोए हुए प्यार का नाम पुकारती हुई।
और उस चीख के नीचे, बहुत दूर से, एक और आवाज़ क़रीब आ रही थी। सायरन। एक, फिर दो, फिर कई, रात के अँधेरे को चीरते हुए, उस बुझे हुए महल की तरफ़ दौड़ते हुए। नौ साल का झूठ आज मर चुका था। एक क़ातिल हथकड़ी में था। एक मरे हुए लड़के का नाम साफ़ हो चुका था। पर उस लाल फ़र्श पर, सुहाना की बाँहों में, वो आदमी बहुत शांत पड़ा था। और उन क़रीब आते सायरनों में, किसी के पास इस एक सवाल का जवाब नहीं था, कि आर्यन साहनी की आँखें फिर कभी खुलेंगी, या नहीं।
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