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अध्याय 20 / 26 पढ़ने में 14 मिनट

घर का जासूस

साया बनके द्वारा Avni Oberoi

सुबह की पहली रोशनी से पहले वो तीनों उस सेफ़ हाउस से भी निकल चुके थे। जग्गी की गाड़ी अब मुंबई के एक पुराने, भीड़-भाड़ वाले इलाक़े में एक बंद प्रिंटिंग प्रेस के पीछे खड़ी थी। सुहाना ने नैरा का दिया सबूत अपने जिस्म से बाँध रखा था, और उसका दिमाग़ अब एक ही चीज़ पर टिका था, इस काग़ज़ को बत्रा की पहुँच से बाहर, किसी ऐसी जगह पहुँचाना जहाँ से वो कभी ग़ायब न हो सके।

"एक सबूत जो सिर्फ़ हमारे पास हो, वो सबूत नहीं, एक निशाना है। हमें इसकी कई नक़लें बनानी होंगी, और हर नक़ल अलग-अलग हाथों में, अलग-अलग शहरों में। ... इसके लिए मुझे दो चीज़ें चाहिए, नैरा। एक, कोई ऐसा जो बत्रा के पैसे के जाल को अंदर से जानता हो। और दो, कोई ऐसा जिसकी गवाही अदालत में टिके। ... और वो दोनों एक ही आदमी हैं। मिहिर।"

"मिहिर? ... सुहाना, इसी आदमी ने नौ साल मेरा पैसा चुराया। इसी ने बत्रा के लिए मुझ पर नज़र रखी। मैं इस पर भरोसा कैसे करूँ? ... जिस दिन इसका फ़ायदा बदलेगा, ये हमें भी बेच देगा।"

"मैं उस पर भरोसा नहीं कर रही, आर्यन। मैं उसके डर पर भरोसा कर रही हूँ। ... मिहिर लालची है, बुज़दिल है, पर बेवक़ूफ़ नहीं। और एक बुज़दिल तब सबसे सच्चा होता है जब उसे अपनी जान का ख़तरा हो। ... बत्रा ने कल उसे भी उसी आग में जलाना चाहा था। अब मिहिर के पास खोने को बस एक ही चीज़ है, और वो हमारे साथ है।"

मिहिर चौहान जब उस अँधेरी प्रेस में दाख़िल हुआ, तो वो आधा आदमी लग रहा था। नौ साल की ब्लैकमेल, आर्यन का चुराया हुआ पैसा, क़र्ज़, और अब बत्रा की आग, सब उसके झुके कंधों पर एक साथ बैठे थे। उसने कमरे में तीनों को एक साथ देखा, सितारा, बहन, और बॉडीगार्ड, और उसकी टाँगें काँप गईं।

"तुम लोग पागल हो गए हो। ... बत्रा ने कल रात एक पूरा ऑडिटोरियम जला दिया, सिर्फ़ इस बात को दबाने के लिए। और तुम चाहते हो कि मैं उसके ख़िलाफ़ गवाही दूँ? ... मेरे पास एक बीवी है, एक बच्ची है, आर्यन। मैं मर जाऊँगा। हम सब मर जाएँगे। ये लड़ाई हम जीत नहीं सकते।"

"तुम पहले से मरे हुए हो, मिहिर। ... जिस दिन तुमने आर्यन का पैसा चुराया, उसी दिन तुम बत्रा के हाथ की कठपुतली बन गए, और कठपुतलियों के धागे मालिक जब चाहे काट देता है। ... तुम्हारे पास दो रास्ते हैं। या तो चुप रहो और उसके अगले फ़ोन का इंतज़ार करो। या बोलो, और शायद अपनी बच्ची को ज़िंदा देखो। ... फ़ैसला अभी करो।"

"तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है वो कैसा आदमी है। ... वो मुस्कुरा कर तुम्हारे कंधे पर हाथ रखता है, तुम्हें 'बेटा' कहता है, और उसी वक़्त तुम्हारी क़ब्र का नाप ले रहा होता है। नौ साल से मैं उसे हर महीने आर्यन का पैसा भेजता रहा, इस डर से कि अगर मैंने मुँह खोला, तो..."

"तो क्या, मिहिर? ... जो मेरे भाई के साथ हुआ, वो तुम्हारे साथ भी होगा? ... मेरा भाई तेईस साल का था जब उसने मुँह खोला। उसने बत्रा के आगे झुकने से इनकार किया। और उसकी क़ीमत उसने अपनी जान से चुकाई। ... तुम अपनी बच्ची के लिए डरते हो। मेरे भाई की भी एक बहन थी। उसका क्या हुआ, ये तुम मेरी शक्ल में देख सकते हो।"

और उस लड़की की आँखों में जो नौ साल का ग़म था, उसने मिहिर के डर को तोड़ दिया। उसके कंधे झुके, और फिर, धीरे-धीरे, बरसों का ज़हर बहने लगा। बत्रा के फ़र्ज़ी खातों के नाम, वो कंपनियाँ जिनसे पैसा घूमता था, वो लोग जो उसके इशारे पर चलते थे। मिहिर सरकारी गवाह बन गया था, और उसके साथ बत्रा के साम्राज्य का नक़्शा खुलने लगा।

"बत्रा का पैसा तीन फ़र्ज़ी कंपनियों से घूमता है, दुबई, सिंगापुर, और यहीं अंधेरी में एक प्रोडक्शन हाउस। हर महीने आर्यन की फ़ीस का एक हिस्सा इन्हीं से गुज़रता है। ... और असली सबूत, वो पुरानी रिकॉर्डिंग जिससे आकाश की मौत साबित होती है, वो बत्रा की अपनी तिजोरी में है, उसी ऑडिटोरियम की ऊपरी मंज़िल पर, जहाँ तीन दिन बाद आर्यन का प्रीमियर है।"

"पर एक रास्ता है। इक़बाल साहब। ... उन्होंने आकाश का सारा पुराना सामान सँभाल कर रखा है, और वो पुराने थिएटर के लोग जो उस मुहूर्त पर मौजूद थे, वो सब अब भी ज़िंदा हैं, बस डरे हुए हैं। अगर इक़बाल अपने पुराने दरवाज़े एक-एक कर के खोलें, तो कई ज़ुबानें खुल सकती हैं। बत्रा के ख़िलाफ़ एक अकेली आवाज़ नहीं, कई आवाज़ें।"

"नौ साल, मिहिर। ... नौ साल तुम मेरे साथ बैठ कर खाना खाते रहे, मेरी तारीफ़ें करते रहे, और उसी वक़्त मेरा पैसा उस आदमी को भेजते रहे जिसने मेरी ज़िंदगी को ज़ंजीर बना दिया। ... मुझे तुम पर ग़ुस्सा आना चाहिए। पर आज, अजीब बात है, मुझे सिर्फ़ तरस आ रहा है। क्योंकि हम दोनों एक ही आदमी के ग़ुलाम थे, बस मेरी ज़ंजीर सोने की थी और तुम्हारी लोहे की।"

"ठीक है। इक़बाल पुराने गवाहों तक पहुँचेंगे, चुपचाप, एक-एक कर के। मिहिर, तुम पैसे के काग़ज़ात की नक़लें बनाओगे। नैरा, तुम अपने सूत्रों से बत्रा की हर हरकत पर नज़र रखोगी। ... और मैं इस सबूत की तीन नक़लें बना कर तीन अलग शहरों में भेजूँगी। अगर बत्रा एक को जला दे, तो बाक़ी दो उसे ज़िंदा दफ़न कर दें।"

काम बँट गया, और एक पल को कमरे में सुस्ती उतरी। आर्यन और मिहिर काग़ज़ों में डूब गए, और इक़बाल का पहला फ़ोन एक पुराने थिएटर वाले के पास चला गया। और उस बंद प्रेस के एक कोने में, धूल भरी रोशनी में, सुहाना और नैरा अकेली रह गईं, दो औरतें जिन्हें एक ही आदमी ने, एक ही रात में, हमेशा के लिए बदल दिया था।

"दीदी, तुम्हें वो याद है? ... आकाश जब 'साया' का आख़िरी सीन लिखता था, तो वो पूरी रात नहीं सोता था। और सुबह-सुबह तुम्हें फ़ोन करता था, आधी नींद में, और तुम्हें वो लाइनें सुनाता था। ... वो कहता था, सुहाना अकेली है जो बताएगी कि ये सच्चा है या सिर्फ़ शोर।"

"मुझे सब याद है, नैरा। ... वो आख़िरी लाइन जो उसने मुझे सुनाई थी। 'साया रोशनी का ग़ुलाम नहीं होता, वो उसका गवाह होता है।' ... मैंने उससे कहा था कि ये उसकी सबसे अच्छी लाइन है। और तीन दिन बाद वो चला गया। ... नौ साल मैंने वो लाइन किसी को नहीं सुनाई। क्योंकि जिसे सुनानी थी, वो अब नहीं था।"

और उन दो औरतों के बीच, उस मरे हुए लड़के की याद एक पुल की तरह तन गई। नैरा, जो नौ साल से अकेली अपने भाई का बोझ उठा रही थी, को पहली बार कोई ऐसा मिला था जो उसके साथ रो सकता था। और सुहाना को वो नन्ही लड़की वापस मिली थी, जो कभी उसे अपनी होने वाली भाभी मानती थी।

"तुम्हें पता है, बचपन में मैं भगवान से एक ही चीज़ माँगती थी। कि तुम मेरी भाभी बन जाओ। ... फिर आकाश चला गया, तुम फ़ौज में चली गईं, और मैंने भगवान से माँगना ही छोड़ दिया। ... पर आज, इतने साल बाद, तुम्हें यहाँ देख कर लगता है, शायद वो एक दुआ अभी पूरी तरह मरी नहीं है। ... भले वो जिससे जुड़ी है, उससे मेरी लड़ाई अभी बाक़ी है।"

"एक-एक लड़ाई अपने वक़्त पर, नैरा। ... पहले बत्रा। बाक़ी सब बाद में। ... और जो भी हो, अब तुम अकेली नहीं हो। नौ साल तुमने ये बोझ अकेले उठाया। आज से नहीं। आज से मैं भी हूँ।"

नैरा की आँखें भर आईं, और उसने पहली बार सुहाना का हाथ थाम लिया। रात होते-होते, नक़लें तैयार थीं, और जब सब अपने-अपने कोनों में थके पड़े थे, तो आर्यन एक कप चाय ले कर सुहाना के पास आया, वैसे ही जैसे कभी नौ साल पहले, कॉलेज के दिनों में लाया करता था।

"बिना शक्कर के, थोड़ी सी अदरक के साथ। ... तुम्हें अब भी ऐसी ही पसंद है ना? ... नौ साल में बहुत कुछ बदल गया, सुहाना। पर मुझे ख़ुशी है कि कुछ चीज़ें नहीं बदलीं। तुम्हारी चाय, तुम्हारी ज़िद, और वो तरीक़ा जिससे तुम मुसीबत के बीच भी सबका ख़याल रखती हो।"

"आदतें आसानी से नहीं मरतीं, आर्यन। ... न चाय की, न लोगों की। ... मेरा काम है तुम्हें ज़िंदा रखना, पर आज पहली बार मैं उस काम और अपनी मर्ज़ी में फ़र्क़ नहीं कर पा रही। ... और ये मेरे लिए सबसे ख़तरनाक बात है, क्योंकि जिस पल एक पहरेदार अपने फ़र्ज़ और अपने दिल में उलझ जाए, उसी पल कोई गोली उसे चूक जाती है।"

"तो फिर तुम अपने दिल को एक तरफ़ रखो, और मुझे अपना फ़र्ज़ निभाने दो। ... नौ साल मैं तुम्हारे पीछे छुपा रहा, अपने डर के पीछे। इस बार नहीं। इस बार, अगर किसी को आगे खड़ा होना है, तो वो मैं हूँगा। ... तुम मुझे बचाती रही हो, सुहाना। अब वक़्त है कि मैं कुछ बचाने लायक़ बनूँ।"

सुहाना ने नौ साल में पहली बार, बिना किसी दीवार के, उसकी तरफ़ देखा। दो इंच की दूरी, पर वो दूरी अब दुश्मनी की नहीं, एहतियात की थी। पर उस नरम पल को टूटने में देर नहीं लगी। नैरा दौड़ती हुई आई, उसका फ़ोन हाथ में, और उसका चेहरा फिर पीला था।

"दीदी, दिल्ली वाली नक़ल। ... जिस पत्रकार को हमें वो भेजनी थी, उसके पास आज सुबह बत्रा का एक आदमी पहुँच गया। उसे ख़रीद लिया गया, या डरा दिया गया। वो अब हमारी बात सुनने को तैयार नहीं। ... हमने अभी दो घंटे पहले ये तय किया था, और बत्रा को पहले से पता था।"

"दो घंटे पहले। ... और वो नाम इस कमरे के बाहर किसी को नहीं पता था। ... नैरा, दूसरे शहर वाली नक़ल और उस बैंक लॉकर के बारे में, किस-किस को पता था?"

सुहाना ने एक आख़िरी दाँव खेलने का फ़ैसला किया। उसका एक पुराना फ़ौजी साथी अब मुंबई से बाहर एक भरोसेमंद पत्रकार था, बत्रा की पहुँच से कोसों दूर। उसने जग्गी के ज़रिए एक अनजान नंबर से उसे एक कोडेड पैग़ाम भिजवाया, सिर्फ़ एक जगह और एक वक़्त। उस नाम का किसी को पता नहीं था, सिवाय इसी बंद कमरे के।

"दीदी... आपके उस पत्रकार दोस्त का दफ़्तर। ... अभी दस मिनट पहले वहाँ एक 'टैक्स रेड' पड़ी है। पूरा दफ़्तर सील, उसका फ़ोन बंद। ... आपने वो नाम अभी आधे घंटे पहले लिया था, इसी कमरे में, धीरे से। और बत्रा उस तक हमसे पहले पहुँच गया।"

"आधे घंटे में एक टैक्स रेड नहीं होती, नैरा। इसकी तैयारी में घंटे लगते हैं। ... इसका मतलब है बत्रा को उस नाम का पता उसी वक़्त चल जाता है जिस वक़्त मैं उसे इस कमरे में बोलती हूँ। ... हम एक दीवार से लड़ रहे हैं जिसके पीछे वो हमारी हर फुसफुसाहट सुन रहा है।"

"तो हम जो भी सोचें, जहाँ भी जाएँ, वो पहले से वहाँ होगा। ... सुहाना, हम एक भूत से लड़ रहे हैं जो हमारे ही कमरे में हमारे साथ बैठा साँस ले रहा है।"

और अगले कुछ घंटों में, वो पैटर्न एक ठंडी बर्फ़ की तरह साफ़ होता गया। जिस वकील तक वो पहुँचना चाहते थे, उसका दफ़्तर सुबह अचानक बंद हो गया। जिस बैंक लॉकर में वो सबूत रखने वाले थे, उस पर रात-रात में एक झूठे मुक़दमे में सील लग गई। इक़बाल जिस पुराने गवाह से मिलने गए, वो एक रात पहले ही शहर छोड़ कर जा चुका था। हर चाल, हर पैंतरा, बत्रा उनसे एक क़दम पहले पहुँच रहा था।

"ये नामुमकिन है। ये सब बातें सिर्फ़ हम लोगों को पता थीं। मैंने किसी को नहीं बताया, मैं क़सम खाता हूँ! ... वो हर चीज़ जानता है। जैसे... जैसे वो इसी कमरे में बैठा हमें सुन रहा हो। मैं कहता था ना, इस आदमी से नहीं जीता जा सकता!"

"नहीं। ये हो नहीं सकता। इस लड़ाई में जो लोग हैं, उनमें से कोई बत्रा के लिए काम नहीं करता। नैरा नौ साल से उससे लड़ रही है, सुहाना उसे मारना चाहती है, मिहिर की जान ख़तरे में है, इक़बाल साहब ने आकाश को बेटे की तरह पाला। ... तो फिर बत्रा को हमारी हर बात कैसे पता चल रही है?"

और सुहाना, जो अब तक चुप खड़ी हर टुकड़े को तौल रही थी, ने आँखें बंद कीं। एक फ़ौजी की तरह उसने पीछे मुड़ कर देखा। जिस पल उन्होंने ये गठजोड़ बनाया था, जिस पल उन्होंने अपनी पहली चाल सोची थी, बत्रा वहीं मौजूद था। न दीवार में कोई सूराख़ था, न फ़ोन में कोई तार। जासूस बाहर नहीं था।

"बत्रा की ताक़त सिर्फ़ नौ साल पुराना वो गुनाह नहीं है। ... वो हमारी हर चाल इसलिए तोड़ रहा है क्योंकि हमारी हर चाल उस तक पहुँच रही है, हमारे बोलने से पहले। ... इसका सिर्फ़ एक मतलब है। हमारे इस घेरे के अंदर, हमारे इसी भरोसे के अंदर, बत्रा का एक जासूस बैठा है। ... और वो पहली घड़ी से हमारे साथ है।"

"पहली घड़ी से? ... दीदी, इसका मतलब है हमारा ये पूरा छुपा हुआ गठजोड़, जिसे हमने इतनी एहतियात से बनाया, वो कभी छुपा था ही नहीं। बत्रा उसी पल से हमें देख रहा था, हमें सुन रहा था। हर वादा जो हमने एक-दूसरे से किया, वो उसने भी सुना।"

"पर हम में से कौन? ... कौन बत्रा के लिए काम करेगा, जब बत्रा हम सब को मारना चाहता है? ... जब तक हमें ये नहीं पता, तब तक हम एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। हर बात जो हम यहाँ बोलेंगे, वो सीधे उस शैतान के कान में जाएगी।"

और उस बंद प्रेस के अँधेरे में, वो पाँच लोग एक-दूसरे को देखने लगे, और पहली बार, उन आँखों में भरोसा नहीं, शक तैरने लगा। जिस गठजोड़ को उन्होंने राख में खड़ा किया था, वो शुरू से ही ज़हरीला था। उनमें से कोई एक, इसी कमरे में, इसी लड़ाई में, बत्रा की आँख और कान था। और सबसे बुरा ये था कि उस जासूस ने अभी-अभी सुहाना को भी यही सब कहते सुना था।

"हम में से एक झूठ बोल रहा है। ... और मैं जब तक ये नहीं जान लेती कि वो कौन है, तब तक मैं इस कमरे में किसी पर भरोसा नहीं कर सकती। न मिहिर पर, न इक़बाल पर, ... न आर्यन पर, न नैरा, तुम पर। ... क्योंकि जिस पल हमने हाथ मिलाया, उसी पल हम में से किसी ने हमें बेच दिया था। और वो अब भी, इसी वक़्त, इसी कमरे में, हमें सुन रहा है।"

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साया बनके