Chapter 14 of 26 14 min read
बढ़ती दूरियाँ
उस छिपे कमरे से बदल कर निकली सुहाना के लिए बीती रात का चुम्बन अब आकाश की याद से ग़द्दारी और अपने फ़र्ज़ से समझौता बन चुका है, क्योंकि अब वो जानती है कि धमकी देने वाला आकाश की बहन है और उसे ख़ुद एक मोहरे की तरह इस घर तक लाया गया था। वो आर्यन से बेरहमी से पीछे हट जाती है, जिसे नौ साल बाद पहली बार जगी उम्मीद चूर-चूर हो जाती है, और सुहाना ख़ुद को दोबारा जोड़ती है, पर अब एक आशिक़ या पहरेदार नहीं, एक शिकारी की तरह, जो घर के किसी चेहरे पर भरोसा नहीं करती। जग्गी के सामने वो पूरा राज़ खोलती है, पर दोनों की शक की सुई घर के सबसे भरोसेमंद, सबसे लाडले चेहरे तक पहुँचते-पहुँचते फिसल जाती है। आख़िर में सुहाना
सुहाना उस छिपे कमरे से भोर होते-होते निकली, पर जो सुहाना अंदर गई थी, वो बाहर नहीं आई। रात भर वो उस कमरे में, अपनी ही तस्वीरों से घिरी, फ़र्श पर बैठी रही, और सुबह की पहली रौशनी के साथ उसने एक फ़ैसला अपने भीतर पत्थर की तरह जमा लिया। आँसू पिछली रात ख़त्म हो चुके थे। अब सिर्फ़ बर्फ़ बची थी।
जो चुम्बन कुछ घंटे पहले उसे नौ साल का इंसाफ़ लगा था, वो अब उसके होंठों पर एक ज़हर की तरह जल रहा था। उसने आर्यन को चूमा था। उसी आर्यन को, जो आकाश की चोरी का चेहरा था, जिसने उसे मिटने दिया। उसने अपने मरे हुए दोस्त की याद के सामने, उसके क़ातिलों में से एक को अपनी बाँहों में लिया था।
"मैंने ये कैसे होने दिया? नौ साल जिस दीवार की हिफ़ाज़त की, वो एक तूफ़ानी रात में गिर गई। और जिस पल मैं सबसे कमज़ोर थी, ठीक उसी पल किसी ने मुझे देखा, मुझ पर हँसा, और मुझे अपने खेल का सबसे प्यारा मोहरा कहा।"
और सबसे गहरी चोट यही थी। वो यहाँ इत्तिफ़ाक़ से नहीं आई थी। उसे बुलाया गया था। किसी ने बहुत सोच-समझ कर उसे आर्यन के इतने पास पहुँचाया था। क्या इसलिए, कि सुहाना ही आर्यन की सबसे बड़ी कमज़ोरी बन सकती थी? क्या उसका दिल भी किसी और की बिसात का एक चला हुआ चाल था? एक सिपाही के लिए इससे बड़ी तौहीन कोई नहीं, कि उसकी अपनी भावनाएँ भी किसी और का हथियार निकलें।
"बस। अब और नहीं। आज से न कोई अतीत, न कोई आर्यन, न कोई सुहाना। सिर्फ़ एक शिकारी और एक शिकार। और इस बार, शिकारी मैं बनूँगी।"
उधर आर्यन उस सुबह नौ साल में सबसे हल्का उठा था। बीती रात का वो चुम्बन उसके सीने में एक दीये की तरह जल रहा था। नाश्ते की मेज़ पर उसने सुहाना को ढूँढा, उसके क़दमों में एक ऐसी फुर्ती थी जो बरसों से ग़ायब थी, और उसकी आँखों में एक ऐसी उम्मीद, जिसे उसने ख़ुद को रखने की इजाज़त तक नहीं दी थी।
"सुहाना। ... सुबह से तुम्हें ढूँढ रहा हूँ। कल रात... मैं जानता हूँ तुमने कहा था बाक़ी सब बाद में। पर मैं बस ये कहना चाहता था कि नौ साल में पहली बार, मुझे लगा जैसे मैं वाक़ई ज़िंदा हूँ। जैसे इस अंधेरे में भी एक दरवाज़ा है, जिसके पीछे रौशनी हो सकती है।"
और सुहाना ने उसकी तरफ़ देखा, और उसकी नज़र में वो कुछ भी नहीं था जो कल रात था। न नरमी, न आँसू, न वो टूटी हुई लड़की। सिर्फ़ एक अफ़सर की ठंडी, नापी हुई दूरी। उसकी आवाज़ जब निकली, तो वो किसी अजनबी की तरह पेश आई।
"कल रात एक ग़लती थी, आर्यन सर। मेरी ग़लती। मैं एक ड्यूटी पर हूँ, और मैंने एक पल के लिए अपना फ़र्ज़ भुला दिया। ऐसा दोबारा नहीं होगा। आज से मेरा और आपका रिश्ता बस इतना है, एक क्लाइंट और उसकी सुरक्षा अधिकारी का। बाक़ी सब कल रात, उसी कमरे में, दफ़न हो गया।"
"ग़लती? सुहाना, कल रात तुमने मुझसे कहा था कि तुमने नफ़रत करने की कोशिश की और नाकाम रही। वो ग़लती नहीं थी। वो नौ साल का सच था। क्या हुआ है? कुछ तो हुआ है। कल रात तुम कमरे से गई थीं एक तरह, और आज सुबह लौटी हो बिल्कुल दूसरी।"
"कुछ नहीं हुआ, सर। बस मुझे मेरा काम याद आ गया। आपकी जान का ख़तरा असली है, और उसे बचाने के लिए मुझे साफ़ दिमाग़ चाहिए, धड़कता हुआ दिल नहीं। एक बॉडीगार्ड जो अपने क्लाइंट से मोहब्बत करने लगे, वो उसे बचा नहीं सकती। वो उसके साथ मरती है। और मैं आपको मरने नहीं दूँगी। इसलिए, मैं आपसे मोहब्बत करने का हक़ अपने आप से छीन रही हूँ।"
और सुहाना ने देखा कि किस तरह आर्यन की आँखों में जलता वो दीया, एक-एक लफ़्ज़ के साथ बुझता गया। उम्मीद की जगह वही पुरानी वीरानी लौट आई। और सबसे बुरी बात ये थी कि सुहाना जानती थी, वो ये सब इसलिए नहीं कर रही थी कि उसे परवाह नहीं थी। वो ये सब इसीलिए कर रही थी, क्योंकि उसे बहुत ज़्यादा परवाह थी। और यही सबसे बड़ी क़ीमत थी।
"एक आख़िरी बात बता दो, सुहाना, फिर मैं ज़िंदगी में कभी नहीं पूछूँगा। कल रात, जब तुमने मुझे चूमा, क्या वो भी झूठ था? क्या वो भी सिर्फ़ ड्यूटी थी? बस एक बार मेरी आँखों में देख कर कह दो कि वो झूठ था, और मैं आज ही, इसी पल, तुमसे अपनी हर उम्मीद वापस छीन लूँगा।"
"... हाँ, आर्यन। वो एक कमज़ोर पल था। और कमज़ोरी हमेशा झूठ बोलती है। जो कल रात हुआ, उसका इस सच से कोई लेना-देना नहीं कि मैं क्या हूँ और मुझे क्या करना है। अब मुझसे ये सवाल दोबारा मत पूछना।"
और ये उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झूठ था, इतना भारी कि उसे कहते हुए सुहाना की अपनी आवाज़ ने बीच में उसका साथ छोड़ दिया, और उसे हर लफ़्ज़ अपने ही गले से खींच कर निकालना पड़ा। पर वो जानती थी, अगर आर्यन के दिल में ज़रा भी उम्मीद बची रह गई, तो वो प्रीमियर की रात उसे बचाने के बजाय, उसके पास रुकने की ग़लती कर बैठेगा। और वो एक ग़लती उसकी जान ले सकती थी।
"तुम्हें पता है, नौ साल पहले मैंने तुमसे एक लफ़्ज़ कहे बिना दूरी बना ली थी। और आज तुम मुझसे सौ लफ़्ज़ कह कर वही कर रही हो। शायद हम दोनों एक जैसे हैं, सुहाना। हम दोनों को जो चीज़ सबसे ज़्यादा चाहिए होती है, हम उसी से सबसे तेज़ भागते हैं।"
"हम एक जैसे नहीं हैं, आर्यन। तुम अपनी जान बचाने के लिए भागे थे। मैं तुम्हारी जान बचाने के लिए रुक रही हूँ। यही फ़र्क़ है हम दोनों में। और आज से, ये फ़र्क़ ही हम दोनों के बीच की एकमात्र चीज़ रहेगा।"
वो पलटी और चल दी, और उसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा, क्योंकि उसे पता था कि अगर उसने एक बार भी उस टूटे हुए चेहरे को देख लिया, तो उसकी सारी बर्फ़ फिर पिघल जाएगी। हर क़दम उसे किसी काँच पर चलने जैसा लगा। पर एक शिकारी को दिल नहीं, निशाना चाहिए होता है। और उसका निशाना अब साफ़ था।
सुबह की उस मुर्दा सी हवा में, सुहाना ने बंगले के पिछवाड़े जग्गी को अलग बुलाया। जग्गी, उसका नंबर दो, वो फ़ौजी जो इस चमक-दमक की दुनिया में भी उसकी अपनी मिट्टी की ख़ुशबू था। इस पूरे घर में एक वही था जिसका दामन इस घर के अतीत से बिल्कुल साफ़ था, और इसलिए एक वही था जिस पर वो भरोसा कर सकती थी।
"कैप्टन, चेहरा देख के लग रहा है रात भर सोई नहीं। और मैंने कहा था ना, इस बंगले में भूत नहीं, बस भरे पेट वाले लोग और ख़ाली दिमाग़ वाली साज़िशें हैं। बोलो, आज कौन सी नई मुसीबत हमारे सिर पर नाच रही है?"
"जग्गी, मज़ाक छोड़। मैंने कल रात कुछ ऐसा देखा है जो सब कुछ बदल देता है। इस बंगले में एक छिपा हुआ कमरा है, नौकर-क्वार्टर के पीछे। और उस कमरे की दीवारें आर्यन की, आकाश की, और मेरी अपनी तस्वीरों से भरी हैं। नौ साल की निगरानी। धमकी देने वाला कोई बाहरी आदमी नहीं है। वो आकाश की छोटी बहन है, और वो इसी घर में, हमारे बीच, बरसों से है।"
जग्गी के चेहरे से हँसी उतर गई। उसने अपनी टोपी उतार कर हाथ में ले ली, जैसे किसी बड़ी बात के सामने अदब से खड़ा हो। एक फ़ौजी दूसरे फ़ौजी की आवाज़ में डर की वो परत पहचानता है, जो लफ़्ज़ों में नहीं होती।
"आकाश की बहन? वही लड़का, जिसकी बात आर्यन सर नींद में करते हैं? कैप्टन, अगर वो नौ साल से इस घर में है, हमारे बीच है, तो वो कोई नौकर, कोई माली, कोई ऐसा चेहरा है जिसे हम रोज़ देखते हैं और कभी दो बार नहीं देखते। पर वो कौन हो सकती है? यहाँ तो हर औरत या तो बीस साल से है या दो दिन से।"
"पता है कैप्टन, फ़ौज में हम भूतों से नहीं डरते थे, बारूदी सुरंगों से डरते थे। पर ये जगह उन सुरंगों से भी बदतर है। यहाँ हर मुस्कुराता चेहरा एक सुरंग है, और आदमी को पता ही नहीं चलता कि कौन सा क़दम उसका आख़िरी होगा। मुझे तो अब कमला बाई के आलू के परांठे में भी शक होने लगा है, इतने अच्छे बनाती हैं, ज़रूर कोई साज़िश है।"
सुहाना के होंठों पर, इतने बोझ के बावजूद, एक पल को एक हल्की सी मुस्कान तैर गई। जग्गी का यही हुनर था, वो सबसे गहरे अंधेरे में भी एक दियासलाई जला देता था। और शायद इसीलिए, इस पूरी झूठी, चमकीली दुनिया में, वो अकेला था जिसके कंधे पर वो अपनी थकी हुई जान रख सकती थी, बिना ये डरे कि वो कंधा किसी और का मोहरा निकलेगा।
"यही तो पहेली है। उसे आर्यन के हर राज़ तक पहुँच है। घर के हर सिस्टम तक। कैमरे, ऑडियो, बिजली, ताले। ये कोई मामूली नौकर नहीं कर सकता। ये सिर्फ़ वो कर सकता है जिसके हाथ में इस घर की हर चाबी हो। जिस पर आर्यन आँख मूँद कर भरोसा करता हो।"
"हर चाबी जिसके पास हो... कैप्टन, वो तो बस एक ही इंसान है। नैरा। पर... ना ना, नैरा नहीं हो सकती। वो तो इस घर की जान है। कमला बाई कहती हैं नैरा के बिना ये बंगला एक दिन न चले। बेचारी ने आर्यन सर के लिए अपनी पूरी जवानी लगा दी। इतनी सीधी, इतनी मददगार लड़की भला किसी की जान क्यों लेना चाहेगी? नहीं, वो नहीं।"
और सुहाना, जिसकी फ़ौजी नज़र किसी भी झूठ को चीर सकती थी, एक पल को रुकी। नैरा का नाम उसके भी दिमाग़ में कौंधा था। पर हर बार, नैरा का वो थका हुआ, भरोसेमंद, हर वक़्त मदद को तैयार चेहरा उसके सामने आ जाता, और शक की सुई फिसल जाती। जो इंसान पूरे घर को थामे हो, उसी पर उँगली उठाना, अपने ही पैरों के नीचे की ज़मीन पर शक करने जैसा लगता है।
"नैरा ने कल रात ख़ुद जाग कर मुझे 'परछाईं' के सारे पुराने काग़ज़ ढूँढ कर दिए, जग्गी। वो हर बार मेरी मदद करती है, बिना पूछे, बिना थके। नहीं, वो इस लिस्ट में सबसे नीचे है। हमारे पास वक़्त कम है, और मैं उस चेहरे पर वक़्त बर्बाद नहीं कर सकती जो इस घर का इकलौता सहारा है। हमें किसी और तरीक़े से सोचना होगा।"
और यही उस साये की सबसे बड़ी जीत थी। वो नौ साल से सबकी आँखों के सामने खड़ी थी, और आँखों के सामने खड़ी चीज़ें ही सबसे आख़िर में दिखती हैं। सुहाना ने उसका नाम लिया, और उसी साँस में उसे बरी भी कर दिया। शिकारी ने अपने शिकार को देखा, और उसे पहचान न सका।
"चेहरे पर वक़्त बर्बाद करना बंद, जग्गी। अगर हम उसे ढूँढ नहीं सकते, तो हम उसे बाहर आने पर मजबूर करेंगे। उसने ख़ुद एक तारीख़ दी है। प्रीमियर की रात, नौ बजकर चालीस मिनट। वो उस पल आर्यन पर वार करेगी, चाहे कुछ हो जाए। तो हम उसी पल का इस्तेमाल करेंगे।"
"इस्तेमाल? कैप्टन, आम तौर पर तो हम क्लाइंट को ऐसी रात घर में बंद कर देते हैं, दस तालों के पीछे। तुम आर्यन सर को उस भीड़ में, उस मंच पर, ठीक उसी वक़्त खड़ा करना चाहती हो जब क़ातिल ने वार करने की क़सम खाई है?"
"हाँ। क्योंकि अगर हम उसे छुपाएँगे, तो वो आज बच जाएगा और कल फिर निशाने पर होगा। ये साया तब तक पीछा नहीं छोड़ेगा, जब तक हम इसे पकड़ न लें। और ये तभी सामने आएगी, जब उसे लगेगा कि उसका शिकार खुले में, बिल्कुल असुरक्षित खड़ा है। हम आर्यन को चारा बनाएँगे, जग्गी। मुझे और आर्यन को। और ठीक उसी वक़्त, जब वो वार करने आएगी, हम उसे पकड़ लेंगे।"
"और अगर कुछ ग़लत हुआ? अगर हम एक सेकंड चूक गए? कैप्टन, वो भीड़, वो रौशनियाँ, हज़ार मेहमान, और उनके बीच एक क़ातिल जो सब कुछ हमसे बेहतर जानता है। ये जाल हम पर भी बंद हो सकता है।"
"इसीलिए इस जाल के बारे में घर में किसी को पता नहीं चलेगा। किसी को नहीं, जग्गी। ना आर्यन को पूरी बात, ना किसी नौकर को, ना किसी दोस्त को। सिर्फ़ तुम और मैं जानेंगे कि असली खेल क्या है। क्योंकि इस घर का हर चेहरा एक मुखौटा हो सकता है, और मुखौटों को कभी अपनी असली चाल नहीं दिखाई जाती।"
और इस तरह, उस सुबह, पिछवाड़े की उस मुर्दा हवा में, एक फ़ैसला जन्म ले चुका था। प्रीमियर की रात, सुहाना ख़ुद को और आर्यन को उस साये के सामने चारे की तरह रखेगी, उसी की दी हुई घड़ी पर, और उसी पल उसे बेनक़ाब करेगी। ये उसकी ज़िंदगी का सबसे ख़तरनाक ऑपरेशन था। और उसमें एक ही झोल था, जिसे वो अभी देख नहीं पा रही थी।
"पर एक मुश्किल है, जग्गी। इतने बड़े प्रीमियर की सुरक्षा को अंदर से सँभालना, हर पास, हर टाइमिंग, स्टेज का हर मिनट, मेहमानों की हर सीट, ये सब बिना किसी को शक हुए करना, ये मेरे या तुम्हारे बस का नहीं। ये सिर्फ़ वो कर सकता है जो इस पूरे घर की मशीन को उँगलियों पर नचाता हो, जिसके हुक्म पर पूरा स्टाफ़ चलता हो।"
"और वो तो इस घर में सिर्फ़ एक ही इंसान है, कैप्टन। जो एक फ़ोन पर पूरा प्रीमियर खड़ा कर दे। जिस पर आर्यन सर और तुम, दोनों आँख मूँद कर भरोसा करते हो।"
"हाँ। नैरा। इस पूरे घर में एक वही है जो ये सब सँभाल सकती है, बिना किसी को भनक लगे। जिसे मैं इस पूरे जाल का इंतज़ाम सौंप सकती हूँ, इस भरोसे के साथ कि वो एक भी कड़ी टूटने नहीं देगी। शुक्र है, इतने शक और अंधेरे के बीच, इस घर में कम से कम एक चेहरा तो ऐसा है जिस पर मैं आँख बंद कर के यक़ीन कर सकती हूँ।"
और सुहाना ने अपने कमरे का इंटरकॉम उठाया। जग्गी उसे जाते देखता रहा, और उसे नहीं पता था, सुहाना को भी नहीं पता था, कि वो अभी-अभी अपने पूरे जाल का नक़्शा, अपने ही हाथों, उस शिकार के हवाले करने जा रही थी, जिसे पकड़ने के लिए उसने ये जाल बुना था।
"नैरा। ... हाँ, मैं कैप्टन बेदी बोल रही हूँ। तुम अभी, इसी वक़्त, मेरे कमरे में आ सकती हो? हमें प्रीमियर की सुरक्षा की पूरी तैयारी करनी है, और मैं ये ज़िम्मेदारी इस घर में सिर्फ़ एक इंसान पर छोड़ सकती हूँ। तुम पर। जल्दी आओ। हमारे पास वक़्त बहुत कम है।"
इंटरकॉम के उस पार, कुछ पलों की ख़ामोशी रही। बस एक हल्की, गहरी साँस। फिर वो नरम, भरोसेमंद आवाज़, जो हर सुबह इस घर को सँभालती थी, धीरे से बोली, आ रही हूँ, कैप्टन। और गलियारे के उस पार, अपने कमरे में, आकाश की बहन मुस्कुराई। शिकारी ने अभी-अभी अपने शिकार को, अपना ही जाल तेज़ करने के लिए, ख़ुद बुला लिया था।
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