Chapter 22 of 26 13 min read
असली गुनहगार
प्रीमियर की वो रात, करोड़ों लोग लाइव देख रहे हैं, और योजना अपनी जगह पर है, जब आर्यन उस विशाल मंच पर चढ़ कर दुनिया को पूरा सच सुनाना शुरू करता है, कि 'परछाईं' आकाश की चुराई हुई 'साया' थी, कि आकाश ने ख़ुदकुशी नहीं की, और कि असली क़ातिल योहान बत्रा है। पर बत्रा घबराता नहीं, वो अपना आख़िरी पत्ता फेंकता है, एक गढ़ा हुआ, गोंद से जोड़ा हुआ इक़बालनामा और नक़ली सबूत जो लाइव कैमरों पर पूरी कहानी पलट देता है और आर्यन को ही आकाश का हत्यारा साबित कर देता है, जबकि उसके आदमी बैकस्टेज सुहाना और नैरा पर घेरा कस देते हैं। भीड़ और पूरा देश आँखों के सामने आर्यन के ख़िलाफ़ मुड़ जाता है, और असली क़ातिल हीरो को फँसा
प्रीमियर की रात। और बत्रा का वही ऑडिटोरियम, जो कुछ रोज़ पहले जला था, अब फिर जगमगा रहा था। जली हुई दीवारें नए परदों के पीछे छुपा दी गई थीं, और अख़बारों में आग 'एक मामूली बिजली का हादसा' बन कर छप चुकी थी। बत्रा ने ज़िद की थी कि शो चलेगा, क्योंकि तमाशा ही उसकी सबसे बड़ी ढाल था। बाहर लाल कालीन, अंदर सौ कैमरे, और देश भर में करोड़ों लोग, सब लाइव।
और उस चमक के नीचे, सुहाना की योजना अपनी-अपनी जगह बिछी थी। सबूत की तीन नक़लें तीन शहरों में सुरक्षित। नैरा बैकस्टेज, एक फ़ोन पर उँगली रखे। राजवीर बत्रा को झूठी दिशा दिखाता हुआ। और सुहाना, काली वर्दी में, हर निकास पर नज़र रखे। घड़ी नौ बजकर पैंतीस मिनट दिखा रही थी। धमकी का वक़्त, नौ बजकर चालीस, पाँच मिनट दूर था।
"जग्गी, मंच के दाएँ निकास पर रहो। नैरा, तुम मेरे साथ बैकस्टेज। ... सब सुनो, नौ बजकर चालीस, यही वो वक़्त है जो धमकी में लिखा था। जिस पल आर्यन उस निशान पर पहुँचे, हर आँख खुली रहे। ... और याद रखो, बत्रा के अपने आदमी आज हर दरवाज़े पर हैं। हम अपने ही जाल के अंदर एक और जाल में खड़े हैं।"
और तभी वो आया। योहान बत्रा। सफ़ेद बालों की लहर, मख़मली आवाज़, और वो पितातुल्य मुस्कान जिसके पीछे नौ साल पहले एक लड़के की क़ब्र खुदी थी। उसने आर्यन को गले लगाया, भरी भीड़ के सामने, और उसके कान में, बहुत धीरे, बहुत नरमी से, कुछ कहा।
"मेरे बेटे। ... आज तेरी सबसे बड़ी रात है। ... मैंने तुझे कीचड़ से उठा कर सितारा बनाया, याद है? ... तो आज, जब तू उस मंच पर जाए, तो कुछ ऐसा मत कहना जो तेरे इस बूढ़े बाप का दिल तोड़ दे। ... क्योंकि जो हाथ बनाता है, बेटा, वो मिटाना भी जानता है। और मिटाने में मुझे कोई मज़ा नहीं आता। पर मैं आता ज़रूर हूँ।"
"मैं जानता हूँ आप क्या कर सकते हैं, बत्रा साहब। ... नौ साल मैंने आपकी हर बात मानी है। ... आज भी, मैं वही कहूँगा जो मुझे कहना है।"
"बस यही सुनना चाहता था। ... 'जो मुझे कहना है।' ... देख, मेरे बेटे, मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है। ... और जिन पर मुझे भरोसा होता है, उनके लिए मैं हमेशा एक इंतज़ाम रखता हूँ। हर हाल के लिए। ... जा, तेरी दुनिया तेरा इंतज़ार कर रही है।"
बत्रा के उस 'इंतज़ाम' वाले लफ़्ज़ ने सुहाना की रीढ़ में एक ठंडक दौड़ा दी, जो बैकस्टेज से सब सुन रही थी। घड़ी नौ बजकर अड़तीस। आर्यन को स्टेज पर बुलाया गया। और जाने से पहले, वो एक पल के लिए सुहाना के पास रुका, परदे की ओट में।
"मेरी नज़र तुम पर है, हर पल। ऊपर, नीचे, हर कोने में मेरे आदमी हैं। ... जो भी हो, तुम बोलते रहना, रुकना मत। मैं तुम्हें गिरने नहीं दूँगी। ... नौ साल पहले मैं तुम्हें अँधेरे में जाते देख कर रुक गई थी। आज मैं तुम्हें रोशनी में जाते देखूँगी, और इस बार भागूँगी नहीं। जाओ।"
"अगर आज के बाद हम न मिलें, सुहाना... तो याद रखना, ये आख़िरी झूठ नहीं था। ये मेरा पहला सच था। ... और वो सच तुम्हारी वजह से है।"
"जाओ, आर्यन। ... और सच बोलो, इतनी ज़ोर से कि नौ साल की वो ख़ामोशी भी सुन ले। ... मैं यहीं हूँ। इस बार, आख़िर तक।"
और आर्यन साहनी उस विशाल मंच पर चढ़ गया। हज़ार वॉट की रोशनी, सौ कैमरे, और उसके सामने बैठी पूरी फ़िल्मी दुनिया। स्क्रीन पर उसका चेहरा, देश के हर घर में, हर फ़ोन में। सामने टेलीप्रॉम्प्टर पर वही सजी-सजाई, सुरक्षित तक़रीर लिखी थी। आर्यन ने उसे एक नज़र देखा। और फिर, उससे नज़र हटा ली।
"दोस्तो। ... आज मुझे 'आग़ाज़' की बात करनी थी। पर मैं आज एक आग़ाज़ नहीं, एक इक़बाल ले कर आया हूँ। ... नौ साल पहले एक फ़िल्म ने मुझे सितारा बनाया। 'परछाईं'। ... पर वो फ़िल्म मेरी नहीं थी। ... वो एक नाटक था, 'साया', जिसे मेरे सबसे अच्छे दोस्त, आकाश माथुर ने लिखा था। और मैंने वो चुरा लिया।"
ऑडिटोरियम में एक सरगोशी दौड़ी। कैमरे झपके। बैठे हुए मेहमान एक-दूसरे को देखने लगे। और देश भर के करोड़ों टीवी और फ़ोन पर, वो लफ़्ज़ लाइव पहुँच रहे थे, बिना किसी सेंसर के, बिना किसी कट के। बत्रा नीचे, पहली क़तार में बैठा, बस मुस्कुरा रहा था।
"और ये चोरी अकेली नहीं थी। ... आकाश ने मिटने से इनकार किया था। और उसकी क़ीमत उसने अपनी जान से चुकाई। ... दुनिया को बताया गया कि उसने ख़ुदकुशी की। ये झूठ है। ... आकाश माथुर को मारा गया, एक साज़िश के तहत, ताकि उसका नाटक और मेरा चेहरा एक आदमी को अरबों कमा कर दे सके। ... और वो आदमी आज इसी हॉल में, पहली क़तार में बैठा है। ... योहान बत्रा।"
और वो नाम पूरे हॉल में एक बम की तरह फटा। कैमरे घूम कर बत्रा पर जा टिके। करोड़ों लोगों ने एक साथ साँस रोकी। एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, ऐसा लगा जैसे सच जीत गया हो, जैसे नौ साल की क़ब्र आख़िरकार खुल गई हो। सुहाना ने बैकस्टेज से मुट्ठी भींची। पर बत्रा... बत्रा ने उठ कर, धीरे से, अपने कोट के बटन ठीक किए।
"आर्यन। ... बेटा। ... रुक जा। ... इससे पहले कि तू और आगे बढ़े, अपने आप को और गहरा दफ़न करे। ... मैं जानता था ये दिन आएगा। ... एक बाप अपने बीमार बेटे को पहचानता है। ... दोस्तो, मुझे बहुत अफ़सोस के साथ आपको कुछ दिखाना है, जो मैं नौ साल से छुपाता आया हूँ, अपने इसी बेटे की इज़्ज़त बचाने के लिए।"
और बत्रा ने घबराने के बजाय, आराम से एक इशारा किया। और उसी पल, वो विशाल परदे, जिन पर अभी तक आर्यन का चेहरा था, अचानक बदल गए। बत्रा के अपने आदमी, अपने कैमरे, अपना इंतज़ाम। जो 'इंतज़ाम' उसने आर्यन के कान में कहा था, वो अब हरकत में आ रहा था।
"ये देखिए। ... नौ साल पहले की रात। आकाश माथुर की मौत की रात। ... मेरे पास इसका सबूत है। ... आकाश और आर्यन में झगड़ा हुआ था, स्क्रिप्ट को ले कर। और उस रात, ग़ुस्से में, मेरे इसी बेटे ने... ... मैं ये कहते हुए मर रहा हूँ, पर सच यही है। आकाश को आर्यन ने मारा। और मैंने, एक बाप की तरह, इसे बचाने के लिए उस मौत को ख़ुदकुशी बना दिया।"
और परदों पर एक फ़िल्म चलने लगी। धुँधली, हिलती हुई, पर काफ़ी साफ़। एक कमरा, एक झगड़ा, और आर्यन जैसी एक आकृति। गढ़ी हुई आवाज़ें, जोड़े हुए टुकड़े, गोंद से बनी एक झूठी रात, जो इतनी असली लग रही थी कि देखने वाले का ख़ून जम जाए। बत्रा ने अपने अरबों रुपये, अपने सबसे अच्छे तकनीकी जादूगर, इसी एक पल के लिए बचा रखे थे।
"देख, बेटा, कितना असली लगता है। ... सच वो नहीं होता जो हुआ। सच वो होता है जो लोग देखते हैं। और आज रात, ये सब यही देख रहे हैं। ... तूने बोलने की हिम्मत की, ये अच्छा था। पर हिम्मत और ताक़त में यही फ़र्क़ है। तेरे पास हिम्मत थी। ... मेरे पास ताक़त है।"
"ये... ये झूठ है! ये मैं नहीं हूँ! ये कभी हुआ ही नहीं! ... ये नक़ली है, ये सब गढ़ा हुआ है! ... दोस्तो, यक़ीन मत कीजिए, इस आदमी ने आकाश को मरवाया, मैंने नहीं! ... मैंने तो उसे बचाने की कोशिश की थी!"
पर जब हज़ार वॉट की रोशनी में एक अकेला आदमी 'ये झूठ है' चिल्लाता है, और उसके पीछे विशाल परदे पर एक 'सबूत' चल रहा हो, तो भीड़ आँखों पर यक़ीन करती है, कानों पर नहीं। हॉल की सरगोशी अब ग़ुस्से में बदल गई। और बाहर, करोड़ों फ़ोन पर, आर्यन का नाम एक पल में हीरो से हत्यारे में बदल गया। जो सच बोलने आया था, वो दुनिया की नज़र में अभी-अभी एक क़ातिल बन गया।
"मेरे पास सबूत है! ... मिहिर चौहान गवाह है, बत्रा के पैसे के काग़ज़ात हैं, आकाश की बहन ज़िंदा है! ... मुझे दो मिनट दो, सिर्फ़ दो मिनट, और मैं साबित कर दूँगा कि ये फ़िल्म नक़ली है! ... कोई तो मेरी बात सुनो!"
पर बत्रा के एक इशारे पर, आर्यन के हाथ का माइक अचानक बंद हो गया। मंच पर 'सुरक्षा' के नाम पर दो भारी-भरकम आदमी चढ़ आए, आर्यन की तरफ़, उसे 'शांत' करने। रोशनी में, वो अकेला आदमी अब सच में अकेला था। न आवाज़, न सबूत, न कोई जो यक़ीन करे।
"देखिए इसे। ... एक बीमार, अपराधबोध से टूटा हुआ लड़का। ... नौ साल इसने ये बोझ ढोया, और आज इसका दिमाग़ जवाब दे गया। ... मैंने इसे बेटे की तरह बचाया, और आज ये मुझ पर ही इल्ज़ाम लगा रहा है। ... ये पागलपन है, दोस्तो, ये किसी मुजरिम की आख़िरी चीख़ है। ... इस बेचारे को इलाज की ज़रूरत है, सज़ा की नहीं।"
"नहीं... ये ऐसे ख़त्म नहीं हो सकता... ... मैं नौ साल बाद सच बोलने की हिम्मत जुटा पाया, और इसने उसे भी एक झूठ में बदल दिया... ... सुहाना, तुम कहाँ हो? ... मैंने तुमसे वादा किया था कि मैं गिरूँगा नहीं..."
और सुहाना ने बैकस्टेज से वो सब देखा, बेबस। ये कोई गोली नहीं थी जिसे वो अपने जिस्म पर रोक लेती। ये कोई हमलावर नहीं था जिसे वो पटक देती। ये एक झूठ था, अरबों में गढ़ा हुआ, करोड़ों तक पहुँचा हुआ, और उसके पास इसे रोकने का कोई हथियार नहीं था। जंग मैदान में नहीं, कैमरों पर हारी जा रही थी।
"बोलते रहो, आर्यन... रुको मत... मैंने तुमसे कहा था, रुको मत... ... पर मैं तुम्हें कैसे बचाऊँ, जब दुश्मन गोली नहीं, एक झूठ चला रहा है? ... मेरी हर ट्रेनिंग यहाँ बेकार है।"
और तभी उसने उन्हें आते देखा। बत्रा के आदमी, बैकस्टेज के अँधेरे में, चारों तरफ़ से। ये सुरक्षा गार्ड नहीं थे। इनकी आँखों में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ पेशेवर क़ातिलों में होती है। नैरा उसके पीछे थी, फ़ोन थामे, और सुहाना ने उसे अपने पीछे कर लिया।
"नैरा, मेरे पीछे रहो। ... और वो फ़ोन मत छोड़ना, चाहे कुछ भी हो जाए। ... तुम लोग एक क़दम और बढ़े, तो मैं भूल जाऊँगी कि मैं वर्दी में हूँ।"
सुहाना ने दो को गिराया, तीसरे की कलाई तोड़ी। पर वो कई थे, और बहुत तैयार। और एक पल में, एक ठंडी धातु उसकी कनपटी पर आ लगी। बत्रा का सुरक्षा-प्रमुख, उसके ठीक पीछे। सुहाना जम गई, हाँफती हुई, और उसकी नज़र बैकस्टेज के मॉनिटर पर टिकी रह गई, जहाँ आर्यन, अकेला, रोशनी में डूबा, एक झूठ के सैलाब में डूब रहा था।
"कैप्टन बेदी। ... इतनी क़ाबिल फ़ौजी, और एक हारी हुई जंग लड़ रही हो। ... तुम एक जिस्म बचा सकती हो, गोली रोक सकती हो, पर एक कहानी नहीं रोक सकतीं। ... और कहानी मैं लिखता हूँ। ... आज रात की कहानी में, आर्यन एक पागल क़ातिल है, और मैं एक टूटा हुआ बाप। ... और तुम? तुम बस एक फ़ुटनोट हो।"
"तुमने एक चीज़ का हिसाब नहीं लगाया, बत्रा। ... सच के पास वक़्त होता है। तुम आज रात जीत सकते हो, पर एक झूठ हमेशा एक दरार छोड़ता है। ... और मैं उस दरार में बैठी हूँ।"
"एक दरार में बैठी हो? ... कैप्टन, मैंने अपनी पूरी उम्र दरारें भरने में गुज़ारी है। ... और जिस सबूत की तुम्हें तलाश है, जो इस रात को पलट सकता था, वो मैंने बहुत पहले, बड़ी सफ़ाई से, राख कर दिया। ... तुम एक ऐसे हथियार को ढूँढ रही हो जो अब इस दुनिया में है ही नहीं। ... घर जाओ, बेटी। जंग ख़त्म हो चुकी है।"
पर उसकी ठंडी आवाज़ के पीछे, उसका फ़ौजी दिमाग़ पागलों की तरह दौड़ रहा था। कैसे? इस झूठ को कैसे तोड़े? उनका सबूत, नैरा का दिया पैकेट, आकाश के क़त्ल का इशारा करता था, पर वो काग़ज़ था, दलील थी। और बत्रा का झूठ एक चलती-फिरती, बोलती फ़िल्म थी, जो आँखों के सामने थी। काग़ज़ इस सैलाब को नहीं रोक सकता था। इसे रोकने के लिए एक ही चीज़ चाहिए थी।
"असली रिकॉर्डिंग। ... उस रात की असली रिकॉर्डिंग, जिसमें आकाश की अपनी आवाज़ है, जिसमें बत्रा का हुक्म है। ... सिर्फ़ वही इस नक़ली फ़िल्म को झूठा साबित कर सकती है। असली आवाज़ ही एक नक़ली आवाज़ को हरा सकती है। ... पर वो रिकॉर्डिंग..."
और तभी वो एहसास, जिसने उसकी कनपटी पर लगी बंदूक से भी ज़्यादा ठंडक उसकी रगों में भर दी। वो असली रिकॉर्डिंग, वो इकलौती मास्टर कॉपी, बत्रा की अपनी तिजोरी में बंद थी। इसी ऑडिटोरियम की उसी ऊपरी मंज़िल पर। और वो मंज़िल... वो मंज़िल तो उस रात आग में जल कर राख हो चुकी थी। बत्रा ने अपनी ही तिजोरी को इसीलिए जलाया था, उस एक सबूत को हमेशा के लिए मिटाने के लिए।
"उसने वो आग सिर्फ़ नैरा को मारने के लिए नहीं लगाई थी। ... उसने वो अपनी ही रिकॉर्डिंग जलाने के लिए लगाई थी। ... जो एक चीज़ आर्यन को इस झूठ से बचा सकती थी, वो उसी आग में राख हो गई, जिसमें से हम बड़ी मुश्किल से ज़िंदा निकले थे। ... हमारे पास उसे बचाने का इकलौता हथियार अब सिर्फ़ राख है।"
और वहीं, उस चमकते हुए ऑडिटोरियम के बैकस्टेज के अँधेरे में, सुहाना अपनी कनपटी पर बंदूक लगाए खड़ी रह गई। सामने के विशाल परदों पर, बत्रा का गढ़ा हुआ सबूत अब भी चल रहा था, आर्यन को पूरे देश के सामने आकाश का हत्यारा साबित करता हुआ। रोशनी में, आर्यन एक क़ातिल की तरह अकेला खड़ा था। और अँधेरे में, उसे बचाने वाली इकलौती चीज़, नौ साल पुराने सच की वो आवाज़, कहीं दूर, ठंडी हो चुकी राख के नीचे दबी, ख़ामोश पड़ी थी।
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