DesiHub

अध्याय 21 / 26 पढ़ने में 14 मिनट

आर या पार

साया बनके द्वारा Avni Oberoi

उस बंद प्रेस में सुबह उतरी, पर उजाला नहीं। पाँच लोग, एक ही मक़सद, और अब उनके बीच शक की एक अदृश्य दीवार। कोई किसी की आँख में नहीं देख रहा था। और सुहाना जानती थी कि अगर उसने ये ज़हर अभी न रोका, तो बत्रा को उन्हें मारने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, वो एक-दूसरे को ख़ुद ख़त्म कर देंगे।

"आज से कोई किसी से खुल कर बात नहीं करेगा। सिर्फ़ मेरे ज़रिए। ... मैं हर एक को अलग-अलग एक बात बताऊँगी, एक योजना। और हर एक को अलग बात। ... अगर जासूस इनमें से कोई है, तो जो बात लीक होगी, वो मुझे सीधे उस तक ले जाएगी। ये फ़ौज की सबसे पुरानी चाल है। ज़हर को उसी की परछाई से पकड़ो।"

और उसने ठीक वैसा ही किया। एक-एक को अलग कोने में ले जा कर, उसने हर किसी को एक अलग झूठ बताया। एक को एक झूठा बैंक लॉकर, दूसरे को एक झूठा गवाह, तीसरे को एक झूठी तारीख़। पाँच अलग झूठ, पाँच अलग होंठों तक। अब बस इंतज़ार था, ये देखने का कि इनमें से कौन सा झूठ बत्रा के कान तक पहुँचता है।

"मुझे ये अच्छा नहीं लग रहा, सुहाना। ... ये लोग मेरे अपने हैं। नैरा नौ साल से लड़ रही है, मिहिर ने अपनी जान दाँव पर लगाई, इक़बाल साहब... मैं इनमें से किसी को ग़द्दार कैसे मान लूँ? ... एक-एक को शक की नज़र से देखना, ये मुझे अंदर से खा रहा है।"

"भरोसा एक ऐयाशी है, आर्यन, जो हमारे पास अभी नहीं है। ... मैं भी नहीं चाहती कि इनमें से कोई ग़द्दार हो। पर चाहना और होना दो अलग चीज़ें हैं। ... और अगर मुझे तुम्हें ज़िंदा रखना है, तो मुझे उस एक ज़हरीले होंठ को ढूँढना होगा, चाहे वो किसी का भी हो। ... अब चुप रहो, और इंतज़ार करो।"

"तो अब हम बस इंतज़ार करें? ... कि हम में से कौन सा अपना झूठा निकलता है? ... ये सबसे बुरी सज़ा है, सुहाना। अपने ही लोगों को शक की नज़र से देखना।"

कुछ ही घंटों में जवाब आया, पर उसने सुहाना को चौंका दिया। नैरा के सूत्र ने ख़बर दी कि बत्रा के आदमी एक जगह पहुँचे थे। पर वो जगह उन पाँच अलग झूठों में से कोई नहीं थी। वो एक ऐसी बात थी जो सुहाना ने किसी एक को नहीं, पूरे कमरे में, सबके सामने, ऊँची आवाज़ में कही थी।

"जो लीक हुआ, वो किसी एक को बताया गया झूठ नहीं था। ... वो वो बात थी जो मैंने कल रात इसी कमरे में, ज़ोर से बोली थी। ... इसका मतलब, आर्यन, जासूस इनमें से कोई इंसान नहीं है। ... जासूस एक कान है। इस कमरे में कहीं छुपा हुआ। ... हम में से किसी ने हमें नहीं बेचा। किसी ने इस कमरे में एक यंत्र लगा दिया है।"

और अगले कुछ मिनट सुहाना एक शिकारी बन गई। उसने कमरे का चप्पा-चप्पा छाना, हर कोने, हर तार, हर सामान। और आख़िरकार उसकी उँगलियाँ रुक गईं, आर्यन के उस चमड़े के बैग की तह पर, जिसे प्रोडक्शन ने उसे शूटिंग के दौरान 'तोहफ़े' के तौर पर दिया था। एक महीन, माचिस की तीली जितना छोटा यंत्र, जो हर आवाज़ बत्रा तक पहुँचा रहा था।

"ये देखो। ... ये यंत्र प्रोडक्शन के दिए बैग में था। तुम्हारे बैग में, आर्यन। ... जो भी इसे लगाया, उसकी पहुँच सेट पर थी, तुम्हारे सामान तक थी, और वो बत्रा का आदमी था। ... अब सवाल एक ही है। सेट पर वो कौन है जो तुम्हारे इतने क़रीब है कि तुम्हारे बैग में एक कान लगा सके, और किसी को शक भी न हो?"

"बैग... वो बैग मुझे राजवीर ने दिया था। ... डायरेक्टर राजवीर खन्ना। उसने कहा था, 'सर, फ़िल्म का पहला तोहफ़ा।' ... राजवीर? ... नहीं, वो तो हर वक़्त बत्रा को कोसता रहता है, उसके दबाव की शिकायत करता रहता है। ... क्या वो पूरे वक़्त..."

जग्गी को भेजा गया, और घंटे भर बाद, राजवीर खन्ना उस बंद प्रेस में खड़ा था, पसीने से तर, आँखें इधर-उधर भागती हुईं। वही डायरेक्टर जो सेट पर शेर की तरह दहाड़ता था, अब एक कोने में दुबका खरगोश था। सुहाना ने वो नन्हा यंत्र मेज़ पर रख दिया, बिना एक लफ़्ज़ कहे।

"ये... ये क्या है? तुम लोग मुझे यहाँ क्यों लाए हो? मेरी फ़िल्म का प्रीमियर दो दिन बाद है, मेरे पास इन बकवास बातों का वक़्त नहीं है। ... ये यंत्र? मैंने कभी नहीं देखा इसे। मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं।"

"मैंने अभी कहा भी नहीं कि ये क्या है, राजवीर। ... पर तुमने कहा कि तुम्हारा इससे कोई लेना-देना नहीं। ... ये यंत्र आर्यन के उस बैग से निकला है जो तुमने उसे दिया था। इसकी तरंगें एक ही नंबर तक जाती हैं, और वो नंबर मिहिर के दिए बत्रा के खातों से मिलता है। ... झूठ बोलने से पहले सोच लो। मेरे पास वक़्त कम है, और सब्र उससे भी कम।"

"तुम्हें नहीं पता वो आदमी क्या है! ... उसने मेरे सिर पर एक क़र्ज़ रखा, फिर मेरी बेटी के स्कूल की तस्वीरें भेजीं। बिना एक लफ़्ज़ धमकी के। ... मैंने कहा नहीं किया, तो उसने बस मुस्कुरा कर कहा, 'राजवीर, फ़िल्में बनाना ख़तरनाक काम है, एक हादसा कभी भी हो सकता है।' ... मैं कठपुतली बन गया। मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।"

"वो मुझसे तुम्हारी हर चाल पूछता था, आर्यन। तुम कहाँ जाते हो, किससे मिलते हो, ये बॉडीगार्ड क्या ढूँढ रही है। ... मैंने वो यंत्र तुम्हारे बैग में लगाया, तुम्हारे ट्रेलर में, तुम्हारी गाड़ी में। ... मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं था, आर्यन। मैं बस एक बाप था जो डरा हुआ था। ... और बत्रा को ये पता है कि डरे हुए बाप सबसे वफ़ादार ग़ुलाम होते हैं।"

"मुझे तुम पर चीख़ना चाहिए, राजवीर। तुमने मेरे हर राज़ को बेचा। ... पर मैं ख़ुद नौ साल उसी डर का ग़ुलाम रहा हूँ जिसका तुम आज हो। ... बत्रा यही करता है, हमें हमारे अपने डर की ज़ंजीर से बाँधता है, और फिर हमें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा कर देता है। ... मैं तुमसे नफ़रत नहीं कर सकता। तुम मेरा ही एक पुराना चेहरा हो।"

और वहीं, उस टूटे हुए आदमी को देख कर, सुहाना के दिमाग़ में एक चाल जन्मी। राजवीर ग़द्दार था, पर अब वो एक हथियार भी था। एक ऐसा चैनल जिस पर बत्रा को पूरा भरोसा था। और जिस चैनल पर दुश्मन भरोसा करे, उसी से उसे सबसे गहरा ज़ख़्म दिया जा सकता है।

"राजवीर, तुम्हारे पास एक आख़िरी मौक़ा है अपनी बेटी को बचाने का। ... तुम बत्रा को वही बताते रहोगे जो हम तुम्हें बताएँगे। हर झूठ, हर ग़लत जगह, हर ग़लत वक़्त। ... वो सोचेगा कि उसका जासूस अब भी उसके लिए काम कर रहा है। और जब वो हमारी दी हुई ग़लत दिशा में तैयारी करेगा, तब हम असली वार करेंगे। ... आज से तुम्हारा कान हमारा है।"

"मैं करूँगा। जो कहोगे, बत्रा को वही बताऊँगा। ... पर एक बात जान लो, क़ानून के रास्ते उससे लड़ने की सोचना भी मत। ... पुलिस कमिश्नर उसके साथ खाना खाता है, दो जज उसके फ़ार्महाउस पर छुट्टियाँ मनाते हैं। जिस दिन तुम शिकायत लिखवाओगे, उसी रात वो शिकायत, और तुम, दोनों ग़ायब हो जाओगे।"

राजवीर ने काँपते हाथों से बत्रा को पहला झूठा पैग़ाम भेजा, एक ग़लत जगह, एक ग़लत वक़्त। और आधे घंटे में नैरा के सूत्र ने पुष्टि कर दी, बत्रा के आदमी उस ग़लत ठिकाने की तरफ़ बढ़ चले थे। जाल पलट चुका था। पहली बार, बत्रा को वही दिख रहा था जो ये उसे दिखाना चाहते थे।

जासूस पकड़ा गया, चैनल पलट गया। पर उसी के साथ, एक बड़ा सवाल कमरे के बीचोंबीच आ खड़ा हुआ। उनके पास अब मिहिर की गवाही थी, नैरा का सबूत था, राजवीर का चैनल था। पर इस सबका करें क्या? इसे कहाँ ले जाएँ? और यहीं आ कर हर रास्ता एक दीवार से टकरा जाता था।

"पुलिस के पास जाएँ? ... सुहाना, आधा पुलिस महकमा बत्रा की जेब में है। जिस दिन हम थाने में क़दम रखेंगे, उसी दिन ये सारे सबूत 'ग़ायब' हो जाएँगे, और हम तीनों किसी झूठे मुक़दमे में अंदर होंगे। अदालत में सालों लग जाएँगे, और बत्रा हर जज को ख़रीद लेगा। ... क़ानून के रास्ते हम उसे नहीं हरा सकते। वो ख़ुद क़ानून का मालिक है।"

"तुम सही कह रहे हो। ... एक ताक़तवर आदमी को उसी की बनाई व्यवस्था में हराना नामुमकिन है। पुलिस, अदालत, अख़बार, सब उसके हाथ में हैं। ... एक ही जगह है जहाँ बत्रा की पहुँच नहीं। एक ही अदालत जिसे वो ख़रीद नहीं सकता।"

और सुहाना ने वो बात अधूरी छोड़ दी, क्योंकि उसे ख़ुद उसका अंजाम डरा रहा था। पर आर्यन के चेहरे पर कुछ बदल रहा था। नौ साल की वो झुकी हुई नज़र धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थी। उसने खिड़की से बाहर, दूर, अपने प्रीमियर के उन विशाल होर्डिंग्स को देखा, जिन पर उसका अपना चमकता चेहरा टँगा था।

"एक ही अदालत जिसे बत्रा ख़रीद नहीं सकता। ... पूरा देश। ... परसों रात, मेरे प्रीमियर पर, देश के सबसे बड़े मंच पर, सौ कैमरे मुझ पर होंगे, करोड़ों लोग लाइव देख रहे होंगे। ... मैं उस मंच पर खड़ा हो कर पूरा सच कहूँगा, सुहाना। कि 'परछाईं' मेरी नहीं, आकाश की चुराई हुई 'साया' थी। कि आकाश ने ख़ुदकुशी नहीं की। कि योहान बत्रा एक क़ातिल है।"

"नहीं। ... आर्यन, ये ख़ुदकुशी है। ... बत्रा को पहले से पता है कि तुम ख़तरा हो। उसने तुम्हें पहले ही उस मंच पर, नौ बजकर चालीस मिनट पर मारने की धमकी दी थी। तुम ख़ुद चल कर उसके निशाने के सामने खड़े हो जाओगे, हज़ारों लोगों के बीच, जहाँ मैं तुम्हें बचा भी नहीं पाऊँगी। ... ये बहादुरी नहीं, ये मौत को दावत है।"

"हो सकता है। ... पर एक बात सोचो, सुहाना। बत्रा मुझे किसी अँधेरे कोने में मार सकता है, और कल अख़बार 'हादसा' छाप देंगे। पर वो मुझे लाखों लोगों के सामने, लाइव कैमरे पर, बोलते हुए नहीं मार सकता। ... क्योंकि जिस पल मैं बोलूँगा, सच बाहर आ जाएगा। बोलता हुआ आर्यन, अगर मर भी जाए, तो सच बन जाता है।"

और सुहाना समझ गई कि वो क्या कह रहा था। वो सिर्फ़ अपनी जान दाँव पर नहीं लगा रहा था। वो अपना सब कुछ जला रहा था। अपनी शोहरत, अपना सितारा, वो चमकता झूठ जिसके लिए उसने नौ साल पहले सब कुछ बेचा था। एक ही मंच पर, वो या तो आकाश का नाम साफ़ कर देगा, या ख़ुद राख हो जाएगा। शायद दोनों।

"और अगर तुम मंच पर एक लफ़्ज़ बोलने से पहले ही मारे गए? ... अगर बत्रा तुम्हें बोलने का एक पल भी न दे? तुम्हारा सच तुम्हारे साथ ही दफ़न हो जाएगा, और आकाश दूसरी बार मरेगा। ... मैं ये ख़तरा कैसे उठाऊँ, आर्यन?"

"नौ साल पहले मैं बोल सकता था, और नहीं बोला। मैंने अपनी चुप्पी से एक दोस्त की क़ब्र खोदी, और तुम्हें भी खो दिया। ... मुझे मेरा सितारा नहीं चाहिए, सुहाना, अगर उसकी नींव एक झूठ है। ... मैं वो आदमी बनना चाहता हूँ जिसे तुम नौ साल पहले जानती थीं। जिस पर तुम्हें यक़ीन था। ... आख़िरी बार सही, पर मैं सीधा खड़ा होना चाहता हूँ।"

और वहाँ, उस धूल भरे कमरे में, सुहाना ने वो देखा जिसका उसे नौ साल से इंतज़ार था। वो बुज़दिल जिससे वो नफ़रत करती आई थी, और वो आदमी जिससे वो प्यार करती थी, आज पहली बार एक ही चेहरे में मिल गए। आर्यन डरा हुआ था, वो साफ़ दिख रहा था। पर वो अपने डर के आगे खड़ा था। और यही, यही सच्ची बहादुरी थी।

"नौ साल मैंने ख़ुद को समझाया कि मुझे तुमसे नफ़रत है। ... और आज, जब तुम आख़िरकार वो बन रहे हो जिस पर मुझे हमेशा यक़ीन था, तो मैं तुम्हें खोने से डर रही हूँ। ... तुम्हें पता है इससे बुरा मज़ाक़ क़िस्मत कोई कर ही नहीं सकती थी, आर्यन?"

और वो, नौ साल में पहली बार, ख़ुद उसकी तरफ़ बढ़ी। इस बार कोई फ़ौजी दीवार नहीं थी, कोई एहतियात नहीं। उसने आर्यन का चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में लिया, उसकी घबराई हुई साँस को अपनी साँस के पास खींचा, और सबसे पहली बार, ये पहरेदार अपने फ़र्ज़ से नहीं, अपने दिल से चल रही थी।

"नौ साल से मैं दूसरों को बचाती आई हूँ, आर्यन। अपने आप को कभी किसी के हवाले नहीं किया। ... और आज, जब मैं तुम्हें बचाना चाहती हूँ, तो तुम मुझसे कह रहे हो कि तुम्हें मरने दूँ, सच के लिए। ... तुम्हें अंदाज़ा है ना, तुम मुझसे क्या माँग रहे हो?"

और फिर उसने उसे चूमा। इस बार डर से नहीं, दबाव से नहीं, बल्कि एक ऐसे फ़ैसले से जो नौ साल में सबसे मुश्किल था। वो चुम्बन एक इक़रार था, और एक अलविदा का डर भी। राख, नमक, और उस उम्मीद का स्वाद जिसे उन्होंने अभी-अभी वापस पाया था। दुनिया एक पल को थम गई, और फिर, बहुत धीरे, वो अलग हुए, माथे से माथा टिकाए।

"अगर परसों रात मैं न बचूँ, सुहाना, तो कम से कम मैं तुम्हारी नज़रों में एक बुज़दिल बन कर नहीं मरूँगा। ... और ये, तुम्हारे इस चुम्बन के बाद, मौत भी सस्ती लगती है। ... मुझे बोलने दो। ये मेरी ज़िंदगी का पहला सच्चा किरदार होगा।"

पर सुहाना पीछे हटी, और उसकी आँखों में प्यार के साथ-साथ एक फ़ौजी की भयानक उलझन थी। क्योंकि उसका फ़र्ज़ और उसका दिल, आज पहली बार, एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े थे, बंदूक ताने हुए। और दोनों में से किसी एक को हारना ही था।

"मेरा काम एक ही है, आर्यन। तुम्हें ज़िंदा रखना। और ज़िंदा रखने का मतलब है, तुम्हें उस मंच से दूर रखना, तुम्हें ख़ामोश रखना, तुम्हें बचा कर छुपा देना। ... पर अगर मैं ऐसा करती हूँ, तो मैं उस आदमी को मार दूँगी जो तुम अभी-अभी बने हो। मैं आकाश का इंसाफ़ मार दूँगी। ... और अगर मैं तुम्हें बोलने देती हूँ..."

और वो वाक्य उसने पूरा नहीं किया। क्योंकि उसका अंजाम बहुत साफ़ था। फ़ैसला हो चुका था, पर आर्यन का नहीं। आर्यन ने अपना फ़ैसला कर लिया था। अब फ़ैसला सुहाना को करना था। अपना फ़र्ज़ निभाए, और उस आदमी को ज़िंदा और ख़ामोश रखे जिससे वो प्यार करती है। या फिर, अपने ही हाथों से उसे उस मंच तक पहुँचाए, सीधे योहान बत्रा की तनी हुई गोली के सामने, सच के लिए। ... परसों रात, नौ बजकर चालीस मिनट पर।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।

साया बनके