अध्याय 12 / 26 पढ़ने में 14 मिनट
आख़िरी चेतावनी
साया बनके द्वारा Avni Oberoi
सच के बेहद क़रीब पहुँच चुकी सुहाना के लिए दस दिन की ख़ामोशी के बाद धमकी देने वाला एक अल्टीमेटम छोड़ता है, आर्यन प्रीमियर की रात मंच पर 'परछाईं' की चोरी और उस रात का सच सरेआम क़ुबूल करे, वरना उसी रात मारा जाएगा। नोट आर्यन की नींद की बड़बड़ाहट, कंधे के निशान और पैनिक रूम तक की ऐसी अंदरूनी बातों से भरा है जो सिर्फ़ इस घर के भीतर का कोई जान सकता है, और सेट पर को-स्टार रिया की जलन एक सरेआम तमाशे में फूट पड़ती है। घेराबंदी आर्यन और सुहाना को उस चुम्बन की कगार तक ले आती है जिसे वो बार-बार टालते आए हैं, हर दीवार अब काग़ज़ की रह गई है। आख़िर में नोट का सबसे निचला हिस्सा खुलता है, जो आर्यन की मौत की ठीक
दो दिन बाद, फ़िल्मसिटी का स्टूडियो नंबर सात। 'आग़ाज़' का सेट फिर से जगमगा उठा था, बड़ी-बड़ी रौशनियाँ, दर्जनों टेक्नीशियन, और हवा में वो जल्दबाज़ी जो तब आती है जब किसी फ़िल्म की रिलीज़ की तारीख़ पत्थर पर खुद जाती है। प्रीमियर सिर्फ़ दस दिन दूर था, और पूरी मशीन उसी एक रात की तरफ़ भाग रही थी।
सुहाना सेट के किनारे खड़ी थी, काले लिबास में, नज़र भीड़ के हर चेहरे पर घूमती हुई। पिछले दस दिनों से आर्यन को कोई नई धमकी नहीं मिली थी, और यही ख़ामोशी उसे सबसे ज़्यादा डरा रही थी। शिकारी तभी सबसे ज़्यादा चुप होता है, जब वो अपने आख़िरी वार की तैयारी कर रहा हो।
"मुझे ये ख़ामोशी पसंद नहीं आ रही, आर्यन। दस दिन से कुछ नहीं। जिस आदमी ने तुम्हारी दीवारों से एक मरे हुए इंसान की आवाज़ निकाल दी थी, वो अचानक इतना शांत क्यों है? या तो उसने हार मान ली, जो मुमकिन नहीं। या फिर वो अपने आख़िरी दाँव पर काम कर रहा है, इत्मीनान से, जैसे शतरंज का आख़िरी मोहरा चला जाता है।"
"शायद वो भी थक गया हो। मैं तो थक गया हूँ, सुहाना। जानती हो, नौ साल में पहली बार, मुझे लाइट, कैमरा, एक्शन सुन कर भी कुछ महसूस नहीं होता। मैं शॉट दे रहा हूँ, हँस रहा हूँ, नाच रहा हूँ, और अंदर से एक लाश हूँ, जो अपना ही अंतिम संस्कार दूर खड़ी देख रही है।"
और सुहाना ने उसकी तरफ़ देखा, बस एक पल को। वो जानती थी कि आर्यन सिर्फ़ उस धमकी की बात नहीं कर रहा था। पर उसने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी नज़र वापस भीड़ पर लगा दी, क्योंकि उसका काम आर्यन के दिल की हिफ़ाज़त नहीं, उसकी जान की हिफ़ाज़त थी। कम से कम, यही उसने अपने आप से कह रखा था।
तभी सेट के दूसरे कोने से एक तूफ़ान उठा। रिया सभरवाल, 'आग़ाज़' की हीरोइन, आर्यन की पुरानी दोस्त और उससे भी पुरानी हसरत, अपनी वैनिटी वैन से निकल कर सीधे उनकी तरफ़ बढ़ी। पीछे उसका पूरा अमला, और उसके चेहरे पर वो चमकीली, नकली मुस्कान, जिसके नीचे एक धधकता ज्वालामुखी छिपा था।
"आर्यन, डार्लिंग! तीन घंटे से तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ अपने रोमांटिक सीन के लिए, और तुम यहाँ अपनी... बॉडीगार्ड के साथ खुसुर-पुसुर में लगे हो। बताओ तो, आजकल हीरो का रोमांस कैमरे के सामने कम, और कैमरे के पीछे ज़्यादा चल रहा है क्या?"
पूरे सेट पर एक पल को सन्नाटा छा गया। स्पॉट-ब्वॉय रुक गए, मेकअप वाले रुक गए। सब जानते थे कि रिया जब सबसे मीठा बोलती है, तभी सबसे ज़्यादा ज़हर उगलती है।
"रिया, ऐसी कोई बात नहीं है। कैप्टन बेदी मेरी सुरक्षा के लिए हैं, और तुम जानती हो हालात कैसे हैं। चलो, सीन कर लेते हैं, वक़्त निकला जा रहा है।"
"मैं कैप्टन बेदी से बात कर रही हूँ। सुनिए, मिस बॉडीगार्ड, आपको शायद इस दुनिया की समझ नहीं। यहाँ हीरो पर सबका हक़ होता है, ख़ास तौर पर उसकी हीरोइन का। तो अच्छा हो अगर आप उससे इतना चिपक कर खड़ी होना बंद करें कि लोगों को ग़लतफ़हमी हो जाए। थोड़ा पीछे रहिए, एक नौकर की तरह, जहाँ आपकी असल जगह है।"
सेट की हवा तन गई। रिया एक थप्पड़ मारने को तैयार खड़ी थी, ज़ुबान से। और सब सुहाना का चेहरा देख रहे थे, इस उम्मीद में कि वो या तो टूटेगी, या भड़केगी। दोनों में से कुछ भी हुआ, तो एक अच्छा तमाशा बनता।
पर सुहाना ने न आँख झपकाई, न आवाज़ ऊँची की। वो एक क़दम आगे बढ़ी, बिल्कुल शांत, और उसकी आवाज़ इतनी ठंडी और सधी हुई थी कि रिया की चमक एक पल को फीकी पड़ गई।
"मिस सभरवाल, मेरी जगह वहाँ है जहाँ से मैं आर्यन सर पर आने वाले हर ख़तरे को रोक सकूँ। और इस वक़्त, इस सेट पर, सबसे बड़ा ख़तरा एक नक़ाबपोश क़ातिल है, न कि आपकी नाराज़गी। आप चाहें तो मुझे नौकर समझ लें। पर याद रखिए, जिस दिन इस सेट पर कोई गोली चलेगी, आपके और उस गोली के बीच जो खड़ी होगी, वो यही नौकर होगी। अब, अगर आपकी बात ख़त्म हो गई हो, तो शॉट लीजिए। वक़्त कम है।"
रिया का मुँह खुला का खुला रह गया। उसने पलट कर कुछ कहना चाहा, पर लफ़्ज़ नहीं मिले। पीछे खड़े एक स्पॉट-ब्वॉय ने दबी ज़ुबान में अपने साथी से कहा कि आज तो मैडम का पत्ता उन्हीं की भाषा में कट गया, और एक हल्की, दबी हुई हँसी सेट पर तैर कर रह गई।
"ठीक है। जिस दिन इसकी वजह से तुम्हारा करियर डूबेगा, आर्यन, उस दिन मत कहना कि रिया ने आगाह नहीं किया था। मैं अपने वैन में हूँ। जब तुम्हें अपनी असली हीरोइन की याद आए, तो बुला लेना, अगर तब तक ये तुम्हें साँस लेने देती है।"
रिया धमक कर चली गई, और आर्यन ने एक गहरी साँस ली। सुहाना जानती थी कि रिया की उस तल्ख़ी के नीचे भी एक ज़ख़्म था, एक औरत का, जिसे कभी इस्तेमाल कर के छोड़ दिया गया था, ठीक जैसे... सुहाना ने वो ख़याल वहीं रोक दिया। इस घर में हर किसी को आर्यन ने कोई न कोई ज़ख़्म दिया था। ये कोई नई बात नहीं थी।
शॉट ख़त्म होने के बाद जब आर्यन अपनी वैनिटी वैन में लौटा, तो सुहाना पहले अंदर गई, हर कोने की जाँच करने। और वहीं, मेकअप के शीशे के ठीक सामने, तह किया हुआ एक सफ़ेद काग़ज़ रखा था। बिल्कुल वहीं, जहाँ नौ साल पहले एक और शीशे पर ख़ून से एक लाइन लिखी गई थी।
सुहाना का हाथ बिजली की तरह हथियार पर चला गया। उसने पूरी वैन छान मारी। कोई नहीं था। दरवाज़े बंद थे, ताला सलामत था, बाहर उसके अपने गार्ड तैनात थे। फिर भी, किसी ने उस बंद वैन के अंदर, ठीक शीशे के सामने, ये काग़ज़ रख दिया था। जैसे हवा में से उतर कर।
"फिर से? उसी शीशे के सामने? सुहाना, ये आदमी दीवारों के आर-पार चलता है क्या? मेरे अपने घर में, मेरे अपने कमरे में, मेरे अपने शीशे में, कोई है जिसे मैं देख तक नहीं सकता।"
"नहीं, आर्यन। ये आदमी दीवारों के आर-पार नहीं चलता। ये आदमी दीवारों के अंदर रहता है। हमारे बीच। हमारी हर साँस के साथ। और आज उसने वो लिखा है, जो साबित करता है कि वो हमें हमसे भी बेहतर जानता है।"
उसने काग़ज़ खोला। और जो लिखा था, वो सिर्फ़ एक धमकी नहीं थी। वो एक ऐसे इंसान की लिखावट थी, जो इस घर के, इन दोनों के, हर लम्हे को, हर दरार को, हर राज़ को जानता था। सुहाना ने पढ़ना शुरू किया, और उसकी आवाज़ हर लाइन के साथ भारी होती गई।
"'तुम सच के बहुत क़रीब पहुँच गई हो, कैप्टन। मुझे पता है तुमने वो पुरानी तस्वीर देख ली। शाबाश। पर बहुत देर हो चुकी है। और आर्यन, तुम्हें लगता है कैप्टन बेदी के साये में तुम महफ़ूज़ हो? वो तुम्हें पैनिक रूम में सीने से लगा कर भी नहीं बचा पाएगी।'"
"'मैं तुम्हारी नींद की हर बड़बड़ाहट जानता हूँ, आर्यन। मैं जानता हूँ तुम सपने में किसका नाम ले कर चीखते हो। मैं जानता हूँ तुम्हारे बाएँ कंधे पर वो निशान कहाँ से आया, किसने दिया, और किस रात दिया। मैं नौ साल से तुम्हारे इतने क़रीब हूँ, कि तुम्हारी परछाईं भी मुझसे उतनी क़रीब नहीं।'"
हर लाइन सुहाना की रीढ़ में एक कील की तरह उतरती जा रही थी। पैनिक रूम। नींद की बड़बड़ाहट। कंधे का वो निशान, जो आर्यन ने ख़ुद उसे कभी नहीं दिखाया था। ये सब वो बातें थीं जो इस घर की सबसे बंद, सबसे गहरी परतों में दफ़न थीं। ये किसी बाहर वाले की बात नहीं थी। ये किसी ऐसे की बात थी, जो इस घर के साथ ही साँस लेता था।
"ये सिर्फ़ वही जान सकता है जो हर वक़्त यहीं, हमारे बीच होता है। जो मुझे सोते हुए, जागते हुए, टूटते हुए देखता है। सुहाना, ये मेरे अपने घर का कोई है। मेरे अपने भरोसे के लोगों में से कोई। कोई ऐसा, जिसका चेहरा मैं रोज़ देखता हूँ और पहचान नहीं पाता।"
और सुहाना, जो हफ़्तों से इसी नतीजे की तरफ़ बढ़ रही थी, फिर भी उसे पूरी तरह मानने से हिचक रही थी। क्योंकि इस घर में जिन चेहरों पर वो शक कर सकती थी, उनमें एक ही चेहरा इतना क़रीब था कि इन तमाम राज़ों तक पहुँच सके। और वो चेहरा इतना भोला, इतना भरोसेमंद था कि उस पर उँगली उठाना, सुहाना को अपने ही होश पर शक करने जैसा लगता था। सबसे भरोसेमंद चेहरे पर शक करना, हमेशा सबसे मुश्किल होता है।
उस रात, बंगले में, दोनों उस काग़ज़ को बार-बार पढ़ते रहे। बाहर समंदर गरज रहा था, बिजली कड़क रही थी, और अंदर, दो लोग एक कमरे में, एक ऐसे दुश्मन के साये में बैठे थे जो उन्हें उनसे भी बेहतर जानता था। दहशत ने दोनों को एक-दूसरे की तरफ़ धकेल दिया था।
"पता है सबसे बुरी बात क्या है, सुहाना? ये नहीं कि कोई मुझे मारना चाहता है। मैं तो नौ साल से आधा मरा हुआ हूँ। सबसे बुरी बात ये है कि इन दस दिनों में, तुम्हारे साथ, मुझे पहली बार लगा जैसे मैं ज़िंदा रहना चाहता हूँ। और ठीक उसी वक़्त, कोई मेरी ज़िंदगी की उलटी गिनती शुरू कर रहा है।"
सुहाना ने उसकी तरफ़ देखा, और इस बार उसने नज़र नहीं हटाई। उनके बीच की वो दीवार, जो कभी फ़ौलाद की थी, अब काग़ज़ की एक झीनी परत रह गई थी। एक साँस भी उसे फाड़ सकती थी। और आज, नौ साल में पहली बार, सुहाना का उसे फाड़ने का मन कर रहा था।
"ज़िंदा रहना चाहते हो? तो जीना सीखो, आर्यन। भागना नहीं। नौ साल पहले तुमने ज़िंदगी इसलिए खोई, क्योंकि तुम एक मुश्किल पल में भाग गए। इस बार अगर भागे, तो मैं तुम्हारी जान तो बचा लूँगी, पर तुम फिर भी मर जाओगे। थोड़ा-थोड़ा। हर रोज़। जैसे अब तक मरते आए हो।"
वो एक-दूसरे के इतने क़रीब थे कि सुहाना आर्यन की आँखों में अपना अक्स देख सकती थी, और उन आँखों की गहराई में वो नौ साल पुरानी लड़की, जिसे उसने अपने हाथों दफ़ना दिया था। आर्यन का हाथ उठा, बहुत धीरे, उसके चेहरे की तरफ़। सुहाना हिली नहीं। उसकी साँस रुक गई। कमरा, तूफ़ान, धमकी, सब एक पल को धुँधला पड़ गया।
"सुहाना... मैं नौ साल से हर रात यही सोचता हूँ, कि अगर उस एक रात को लौटा सकता..."
और ठीक उसी पल, सुहाना के फ़ोन ने चीख़ मारी। जग्गी की कॉल, एक अलार्म की तरह तेज़। दोनों बिजली की रफ़्तार से अलग हो गए, जैसे किसी ने आग को छू लिया हो। सुहाना ने काँपते हाथ से फ़ोन उठाया, और उस एक पल में, जो कुछ होने वाला था, वो फिर से, नौ साल की तरह, अधूरा रह गया। शायद तक़दीर उन्हें इस मोड़ पर हर बार यूँ ही रोक देती थी।
फ़ोन पर जग्गी था। उसकी आवाज़ में मज़ाक की वो हमेशा वाली परत आज नहीं थी। उसने बताया कि उसने वैन के बाहर लगे कैमरे की फ़ुटेज खंगाली, और उस पूरे वक़्त फ़ुटेज में कोई नहीं दिखा। कैमरा ठीक दो मिनट के लिए बंद कर दिया गया था, और उन्हीं दो मिनटों में वो काग़ज़ अंदर पहुँचा। जो भी था, वो कैमरे बंद करना जानता था, और ये भी जानता था कि कब बंद करने हैं।
"यानी उसके पास कैमरों का एक्सेस भी है। सिक्योरिटी सिस्टम, ऑडियो सिस्टम, कैमरे, आर्यन की नींद, मेरी हर बात। ये आदमी इस घर का असली मालिक है, आर्यन। बस उसका नाम किसी और के दरवाज़े पर लिखा है। और मैं वादा करती हूँ, प्रीमियर से पहले, मैं वो नाम ढूँढ निकालूँगी।"
उस अधूरे लम्हे को कमरे के एक कोने में धकेल कर, सुहाना ने वो काग़ज़ फिर उठाया। उसने अब तक सिर्फ़ ऊपर का हिस्सा पढ़ा था, धमकी वाला हिस्सा। पर काग़ज़ नीचे से एक बार और तह किया हुआ था, एक आख़िरी परत, जो उसने अभी खोली नहीं थी। उसने वो आख़िरी तह भी खोल दी।
और वहाँ, काग़ज़ के सबसे नीचे, एक अलग, ठंडी, बेहद साफ़ लिखावट में, तीन लाइनें लिखी थीं। नौ साल में पहली बार, धमकी सिर्फ़ डरा नहीं रही थी। वो एक तारीख़, एक जगह, और एक घड़ी माँग रही थी।
"'आर्यन को दस दिन देता हूँ। प्रीमियर की रात तक। उस रात, उस मंच पर, पूरी दुनिया के सामने, वो सच क़ुबूल करेगा कि नौ साल पहले परछाईं किसने लिखी थी, और उस रात असल में क्या हुआ था। अगर उसने क़ुबूल कर लिया, तो वो जी जाएगा।'"
"'और अगर नहीं... तो उसी प्रीमियर की रात, ठीक नौ बजकर चालीस मिनट पर, जब वो उस मंच पर अपनी उसी झूठी मुस्कान के साथ खड़ा होगा, मैं उसे वहीं, उसी भीड़ के सामने ख़त्म कर दूँगा। ठीक उसी पल, ठीक उसी घड़ी, जिस घड़ी नौ साल पहले वो लड़का मरा था।'"
नौ बजकर चालीस मिनट। एक तारीख़ नहीं, एक पल। इतनी सफ़ाई, इतनी तयशुदा ठंडक, कि सुहाना की हड्डियों तक एक सिहरन दौड़ गई। ये किसी ग़ुस्से में लिखी गई धमकी नहीं थी। ये नौ साल से एक-एक ईंट जोड़ कर बनाई गई किसी योजना की आख़िरी लाइन थी।
"नौ बजकर चालीस मिनट... सुहाना, वही वक़्त था। मुझे आज भी हर सेकंड याद है। जब आकाश की... जब वो हुआ, तब घड़ी में यही वक़्त था। नौ चालीस। ये कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। ये सिर्फ़ वही जान सकता है, जो उस रात, उस कमरे में मौजूद था। जिसने वो अपनी आँखों से होते देखा।"
और तभी सुहाना की नज़र काग़ज़ के बिल्कुल आख़िरी कोने पर पड़ी, उस जगह, जहाँ हर धमकी अब तक बेनाम रही थी, जहाँ कभी कोई दस्तख़त नहीं था। पर आज, पहली बार, वहाँ एक नाम लिखा था। एक ऐसा नाम, जिसे लिखने वाला हाथ नौ साल पहले क़ब्र में उतर चुका था।
"इस पर दस्तख़त है, आर्यन। पहली बार, नौ साल में पहली बार, इस धमकी पर एक नाम लिखा है। और ये नाम... ये मुमकिन नहीं है।"
"किसका नाम, सुहाना? बोलो। किसने लिखा है ये?"
सुहाना ने वो नाम पढ़ा, और कमरे की सारी हवा एक पल में जम गई। सिर्फ़ तीन अक्षर। एक मरे हुए इंसान के तीन अक्षर, जो अब एक ज़िंदा क़ातिल के हाथ से लिखे हुए, अंधेरे में से उन दोनों की तरफ़ घूर रहे थे।
"आकाश। ... इस पर आकाश ने दस्तख़त किए हैं। जिसकी मौत का हम इंसाफ़ ढूँढ रहे हैं, वही हमें, उसकी अपनी क़ब्र में से, आर्यन की मौत की तारीख़ दे रहा है।"
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