अध्याय 17 / 26 पढ़ने में 13 मिनट
आग की लपटें
साया बनके द्वारा Avni Oberoi
प्रीमियर से दो रात पहले सुहाना आर्यन और नैरा के साथ बत्रा के उसी ऑडिटोरियम की रिहर्सल में जाती है, जहाँ ऊपरी मंज़िल पर वो तिजोरी बंद है, और चुपके से वहाँ तक का रास्ता नापती है। तभी योहान अपनी चाल चलता है, एक ऐसी आग जो देखने में साये का आख़िरी हमला लगे, पर असल में एक ही झटके में सितारे, बहन और बॉडीगार्ड, तीनों को राख कर दे। सुहाना अपनी ट्रेनिंग के दम पर जलते ऑडिटोरियम को एक बचाव-अभियान में बदल देती है, धुएँ में एक नक़ाबपोश साये के साथ एक-दूसरे की जान बचाती है बिना उसका चेहरा देखे, और आर्यन को लपटों से खींच कर बाहर निकालती है। पर बाहर आ कर, धुआँ छँटते ही उसे एहसास होता है कि एक इंसान अब भी अंदर
प्रीमियर में सिर्फ़ दो रातें बची थीं। और आर्यन की फ़िल्म 'आग़ाज़' का वो विशाल ऑडिटोरियम अब एक होटल नहीं, एक क़िला था। हर दरवाज़े पर योहान बत्रा के आदमी, हर सीढ़ी पर उनकी नज़र। सुहाना रिहर्सल के बहाने अंदर आई थी, पर उसकी आँखें रिहर्सल नहीं देख रही थीं। वो एक रास्ता ढूँढ रही थीं, उस ऊपरी मंज़िल तक, जहाँ बत्रा के दफ़्तर की दीवार में वो तिजोरी बंद थी।
"मैडम, मैंने युद्ध के मोर्चे देखे हैं, पर इतनी सुरक्षा तो सरहद पर भी नहीं होती। हर दस क़दम पर एक पहलवान। और सब के कान में तार, सब की आँखों में वही सवाल, कि तू यहाँ क्यों घूम रहा है। ... ये आदमी सितारे की हिफ़ाज़त नहीं कर रहा, ये तो पूरी दुनिया को अंदर आने से रोक रहा है।"
और उन सब के बीच, हाथ में एक फ़ाइल थामे, हर इंतज़ाम की धुरी बनी, नैरा घूम रही थी। लाइट कहाँ लगेगी, आर्यन किस मार्क पर खड़ा होगा, मेहमान किस दरवाज़े से आएँगे, हर चीज़ उसकी उँगलियों पर थी। सुनने वाला जानता था कि इस पूरे ऑडिटोरियम का नक़्शा जिस औरत के दिमाग़ में सबसे साफ़ था, वो कोई और नहीं, ख़ुद वो साया थी जिसे सुहाना ढूँढ रही थी।
"कैप्टन, आपके लिए मैंने सब निशान लगा दिए हैं। स्टेज पर आर्यन सर का मार्क, बैकस्टेज के तीन निकास, और मेहमानों की जाँच वाली चौकी। बस एक बात, ऊपर की दोनों मंज़िलें बत्रा साहब की अपनी हैं। वहाँ जाने की इजाज़त किसी को नहीं, हमें भी नहीं। उनके अपने आदमी ही वहाँ रहते हैं।"
"किसी को नहीं? पर सुरक्षा के लिहाज़ से मुझे पूरी इमारत का नक़्शा चाहिए, नैरा। ऊपर क्या है? दफ़्तर, स्टोर, क्या? अगर कोई ख़तरा ऊपर से आया, तो मुझे पहले से पता होना चाहिए कि वहाँ क्या छिपा है।"
"नहीं पता, कैप्टन। सच कहूँ तो नौ साल इस दुनिया में गुज़ार कर मैंने एक बात सीखी है। कुछ दरवाज़े ऐसे होते हैं जिन्हें बड़े लोग बंद रखते हैं, और उन्हें बंद ही रहने देना बेहतर होता है। जो उन्हें खोलने की कोशिश करता है, वो अक्सर उन्हीं दरवाज़ों के पीछे गुम हो जाता है।"
सुहाना ने बात को हँस कर टाल दिया, पर उसकी नज़र एक पल में उस साये में लगे लोहे के एक दरवाज़े पर टिक गई, जिस पर लिखा था, सिर्फ़ स्टाफ़। एक सर्विस सीढ़ी। वहीं से रास्ता जाता था, ऊपर, उस तिजोरी तक। उसने उस दरवाज़े को अपने ज़हन में एक निशान की तरह गाड़ लिया। बाक़ी सब बाद में। पहले, आज की रिहर्सल।
"जग्गी, वो लोहे वाला दरवाज़ा देख रहे हो? 'सिर्फ़ स्टाफ़' वाला। उसके पीछे सर्विस सीढ़ी है, और वो सीधे बत्रा के दफ़्तर तक जाती है। प्रीमियर की रात, जब हर आँख मंच पर होगी, मुझे उसी सीढ़ी तक पहुँचना है। तुम उस ताले की बनावट, उस पर खड़े आदमियों की गिनती, और उनके बदलने की घड़ी, सब चुपके से नोट करो।"
"और उन दस पहलवानों को क्या मैं समोसे बाँटूँगा जो उस सीढ़ी पर तैनात हैं? ... मज़ाक कर रहा हूँ, मैडम, नोट कर लूँगा। पर एक बात कहूँ। ये पूरी इमारत मुझे एक सोते हुए शेर के जबड़े जैसी लगती है। अंदर आना आसान था। असली कमाल तो साबुत बाहर निकलने में है।"
और तभी सुहाना ने देखा कि नैरा उस मंच के निशान को एक अजीब सी नज़र से देख रही थी, जहाँ आर्यन को खड़ा होना था। उसकी उँगलियाँ फ़ाइल पर एक पल को थम गईं, जैसे उस ख़ाली मंच पर उसे कोई और दिखाई दे रहा हो, कोई, जो वहाँ नौ साल पहले खड़ा होना चाहता था और कभी खड़ा नहीं हो पाया। फिर वो पल गुज़र गया, और नैरा फिर मुस्कुरा दी।
रिहर्सल के लिए ऑडिटोरियम ख़ाली कराया गया। आर्यन उस विशाल, ख़ाली मंच के बीचोंबीच, उस निशान पर जा कर खड़ा हुआ, जहाँ प्रीमियर की रात उसे खड़ा होना था। नौ बजकर चालीस मिनट पर। ठीक उसी जगह, जहाँ धमकी के मुताबिक़ उसे मरना था। सुहाना नीचे, अँधेरी क़तारों में खड़ी उसे देख रही थी।
"अजीब बात है ना, सुहाना। पूरी ज़िंदगी मैं इसी रोशनी के लिए तरसता रहा। इसी मंच के लिए। और अब मैं यहाँ खड़ा हूँ, और ये सोच रहा हूँ कि दो रात बाद, ठीक इसी दाग़ पर, शायद मेरी आख़िरी साँस निकले। ... रोशनी वही है, बस अब उसमें से आग की बू आती है।"
"जब तक मैं इन क़तारों में खड़ी हूँ, उस दाग़ पर तुम्हारी आख़िरी साँस नहीं निकलेगी, आर्यन। मैं तुम्हें रोशनी में मरने नहीं दूँगी। ... नौ साल पहले मैंने तुम्हें अँधेरे में जाते देखा था, और रोक नहीं पाई थी। इस बार, तुम मेरी नज़र के सामने से कहीं नहीं जाओगे।"
और उस ख़ाली ऑडिटोरियम में, उन दोनों के बीच नौ साल की वो दूरी फिर काँपी, जो अब काग़ज़ भर की रह गई थी। आर्यन मंच से नीचे उतरा, सुहाना की तरफ़, और एक पल को दोनों इतने पास थे कि सुहाना उसकी साँस की गर्मी महसूस कर सकती थी। फिर उसने अपने भीतर के फ़ौजी को झिंझोड़ा, और एक क़दम पीछे हट गई।
"तुम हर बार पीछे हट जाती हो, सुहाना। पर तुम्हारी आँखें पीछे नहीं हटतीं। ... कोई बात नहीं। दो रात बाद, अगर मैं ज़िंदा बचा, तो मैं तुमसे एक चीज़ माँगूँगा। सिर्फ़ पाँच मिनट। बिना कैप्टन के, बिना नौकर के। सिर्फ़ आर्यन और सुहाना।"
और तभी सुहाना रुक गई। बात के बीच में। उसकी नाक ने कुछ पकड़ा। बहुत हल्की, बहुत महीन, पर उसकी फ़ौजी हिस्स ने उसे तुरंत पहचान लिया। धुएँ की बू नहीं। इससे पहले वाली बू। किसी रासायनिक चीज़ की, किसी ऐसे मादे की जो आग को भड़काने के लिए बिछाया जाता है।
"जग्गी! निकास पर पोज़िशन बताओ। बत्रा के आदमी कहाँ हैं? ... जग्गी, जवाब दो! मुख्य दरवाज़े पर कितने आदमी खड़े हैं अभी?"
"यही तो अजीब है, मैडम! अभी दस मिनट पहले हर दरवाज़े पर दो-दो आदमी थे। और अब... अब एक भी नहीं। सब ग़ायब। जैसे किसी ने सबको एक साथ अंदर बुला लिया हो। और मैडम, पिछले वाले लोहे के दरवाज़े में बाहर से ताला लगा है। ये तो..."
जग्गी की बात पूरी नहीं हो पाई। क्योंकि उसी पल, ऑडिटोरियम के चारों कोनों से, एक साथ, आग की लपटें दहाड़ती हुई उठीं। परदे, कालीन, लकड़ी का मंच, सब कुछ जैसे पहले से बारूद में भीगा हो। एक पल में वो विशाल हॉल एक धधकते नरक में बदल गया। और हर निकास, बत्रा के आदमियों की तरफ़ से, पहले ही बंद किया जा चुका था।
"ऊपर! ऊपर वाली गैलरी में अभी भी कुछ लोग हैं, कैप्टन, कुछ क्रू के लड़के! मैं उन्हें निकालती हूँ! आप आर्यन सर को सँभालिए, वो सबसे ज़रूरी है! जाइए!"
"नैरा, रुको! अकेली ऊपर मत जाओ! ... नैरा!"
पर नैरा उस धुएँ के परदे में ग़ायब हो चुकी थी, ऊपर की तरफ़, उसी सर्विस सीढ़ी की तरफ़ जो तिजोरी तक जाती थी। और सुहाना के पास सोचने का वक़्त नहीं था। आर्यन खाँसते हुए मंच पर लड़खड़ा रहा था, लपटें उसकी तरफ़ बढ़ रही थीं, और वो 'दाग़' अब सच में आग में बदल चुका था।
"आर्यन! नीचे झुको! मुँह पर कपड़ा रखो और मेरे पीछे-पीछे रेंगो! ऊपर मत देखो, बस मेरी आवाज़ सुनो! धुआँ ऊपर है, साँस नीचे है! एक... दो... चलो, मेरे साथ!"
नौ साल की फ़ौज, जंगल, ऊँचाइयाँ, आग के अभ्यास, सब कुछ उस एक पल में सुहाना के जिस्म में जाग उठा। उसने अपनी जैकेट उतार कर आर्यन के सिर पर डाली, उसे फ़र्श से लगा कर, दीवार के सहारे, धुएँ की सबसे पतली परत को पकड़ते हुए, निकास की तरफ़ रेंगना शुरू किया। हर साँस में आग थी। हर क़दम पर छत का एक टुकड़ा गिर रहा था।
"सुहाना... मुझे छोड़ दो... तुम निकल जाओ... मैं वैसे भी एक क़ब्र हूँ... तुम क्यों मेरे साथ जलोगी..."
"चुप रहो और साँस बचाओ, आर्यन! नौ साल पहले तुमने मुझे छोड़ा था। आज मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगी। ये मेरी ड्यूटी नहीं है, ये मेरी ज़िद है। अब रेंगो! उस दरवाज़े तक, बस उस दरवाज़े तक!"
और तभी, धुएँ की उस काली दीवार में, एक और आकृति उभरी। एक नक़ाबपोश साया, चेहरा एक गीले कपड़े से ढका, जो उसी आग के बीच से गुज़र रहा था। सुहाना का हाथ एक पल को अपनी पिस्तौल पर गया, पर उस साये ने वार नहीं किया। उसने एक जलती हुई भारी बीम की तरफ़ इशारा किया, जो ठीक सुहाना के रास्ते पर गिरने वाली थी।
उस साये ने आगे बढ़ कर, अपने कंधे से, उस गिरती बीम को एक पल के लिए रोका, बस उतनी देर, जितनी में सुहाना आर्यन को खींच कर उसके नीचे से निकाल ले गई। और जब वही साया लपटों में लड़खड़ाया, तो सुहाना ने बिना सोचे, एक हाथ बढ़ा कर उसे भी धक्का दे कर आग की दीवार से परे कर दिया। दो दुश्मन, एक ही आग में, एक-दूसरे की जान बचाते हुए। और धुएँ ने उस साये का चेहरा सुहाना से छुपाए रखा।
"कौन हो तुम?! रुको! ... तुमने मुझे बचाया क्यों? तुम कौन हो?!"
एक पल को, धुएँ की एक झिरी से, उस साये की आँखें सुहाना की आँखों से टकराईं। और सुहाना के भीतर कुछ हिला। एक अजीब सी जान-पहचान। जैसे वो आँखें उसने कहीं देखी हों, रोज़, इसी ज़िंदगी में, किसी और चेहरे पर, किसी और नाम के नीचे। उसका ज़हन उस पहचान को पकड़ने के लिए झपटा। पर धुआँ फिर घना हो गया, और वो नाम, उस आग की तरह, हाथ आते-आते फिसल गया।
पर जवाब नहीं आया। एक और छत का हिस्सा गिरा, आग की एक दीवार दोनों के बीच खड़ी हो गई, और वो नक़ाबपोश साया उसी धुएँ में घुल गया जिससे वो निकला था, ऊपर की तरफ़, उसी सर्विस सीढ़ी की तरफ़। और सुहाना के पास एक ही पल था। आर्यन उसकी बाँहों में बेदम हो रहा था। उसने फ़ैसला किया। पहले आर्यन।
सुहाना ने आर्यन को घसीटा, अपनी सारी ताक़त लगा कर, जलते मलबे के ऊपर से, धुएँ की उस आख़िरी परत को चीरते हुए। उसके अपने हाथ झुलस रहे थे, उसकी साँस टूट रही थी, पर उसने रुकना नहीं सीखा था। और आख़िरकार, एक टूटे हुए किनारे वाले शीशे के दरवाज़े को अपने कंधे से तोड़ कर, वो दोनों बाहर, खुली रात में, गिर पड़े।
बाहर की हवा किसी दुआ की तरह उसके फेफड़ों में भरी। जग्गी दौड़ता हुआ आया, आर्यन को थामा, पानी, कंबल, अफ़रा-तफ़री। दमकल की गाड़ियाँ दूर से चीखती आ रही थीं। आर्यन ज़िंदा था। खाँसता हुआ, काला पड़ा हुआ, पर ज़िंदा। सुहाना घुटनों के बल बैठी, हाँफती हुई, और उसने पलट कर उस जलती इमारत को देखा।
"मैडम, आर्यन सर ठीक हैं। क्रू के लड़के पिछले रास्ते से निकल गए थे, सब सलामत हैं। ... पर मैडम, एक बात। बत्रा के सारे आदमी? वो आग लगने से पहले ही बाहर थे। सब के सब। जैसे उन्हें पता था। और... और नैरा। नैरा कहाँ है? वो अभी तक बाहर नहीं आई।"
"आग चार कोनों से एक साथ उठी, जग्गी। एक साथ। कोई अकेला पागल चार जगह एक पल में आग नहीं लगा सकता। और वो बू, वो रासायनिक मादा, वो घंटों पहले बिछाया गया था। ऊपर की गैलरी के निकास? मैंने रेंगते हुए देखे, उन पर बाहर से ज़ंजीरें पड़ी थीं। ये तोड़फोड़ नहीं थी। ये एक क़त्ल था, बड़ी तमीज़ से रचा हुआ।"
और सुहाना का दिमाग़, थका हुआ, झुलसा हुआ, अचानक बर्फ़ की तरह ठंडा हो गया। बत्रा के आदमी आग लगने से पहले ही बाहर थे। हर निकास पहले से बंद था। और आग चारों कोनों से एक साथ उठी थी, बड़ी तरतीब से, किसी हमले की तरह नहीं, किसी योजना की तरह। ये किसी पागल स्टॉकर का काम नहीं था। ये एक ठंडे दिमाग़ का जाल था।
"ये आग साये ने नहीं लगाई, जग्गी। ... ये आग बत्रा ने लगाई। इसे ऐसा दिखना था जैसे साये ने प्रीमियर से पहले आर्यन को ख़त्म करने की कोशिश की हो। एक ही आग में सितारा, वो साया, और मैं, तीनों राख। दुनिया कहती कि पागल स्टॉकर ने आख़िरी हमला किया और ख़ुद भी जल मरा। सफ़ाई से मसला ख़त्म।"
और तभी वो एहसास, जिसने उसकी रीढ़ को सीधा कर दिया। वो नक़ाबपोश साया, जिसने उसकी जान बचाई थी, वो अब भी अंदर था। ऊपर की उसी मंज़िल पर, जहाँ बत्रा के आदमियों ने आग लगा कर हर दरवाज़ा बंद कर दिया था। और ये आग आर्यन को मारने के लिए उतनी नहीं थी, जितनी उस साये को ज़िंदा जलाने के लिए। बत्रा उस गवाह को हमेशा के लिए ख़ामोश करना चाहता था।
"सुहाना, तुम्हारा मतलब है वो लड़की, वो साया, अभी भी उस आग में है? ... वो जो नौ साल से मुझे धमकियाँ दे रही थी? वो आकाश की बहन? ... और बत्रा उसे जला रहा है? नहीं। नहीं, सुहाना, उसे वहीं मरने नहीं देना। वो आकाश की आख़िरी निशानी है।"
सुहाना उठ खड़ी हुई। सामने वो इमारत आग का एक पहाड़ बनी दहाड़ रही थी। पीछे आर्यन, बचा हुआ, सुरक्षित। और उस जलते हुए नरक के भीतर, कहीं ऊपर, एक नक़ाबपोश लड़की फँसी थी, वही, जिसने अभी-अभी अपने कंधे पर एक जलती बीम रोक कर उसकी जान बचाई थी। वही, जिसे सुहाना नौ महीने से पकड़ना चाहती थी, ताकि वो बोले, गवाही दे, ज़िंदा रहे। और अब वो सबूत की तरह जल रही थी। दमकल दूर था। वक़्त नहीं था। सुहाना ने अपनी झुलसी जैकेट को फिर से सिर पर खींचा, एक गहरी साँस ली, और वापस, सीधे उस आग की तरफ़ दौड़ पड़ी।
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