DesiHub

अध्याय 11 / 27 पढ़ने में 11 मिनट

तक्षक की चाल

नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi

रेत के एक ऊँचे टीले पर, कैंप की रोशनियों से परे, तक्षक खड़ा था, इंसानी शक्ल में, हाथ पीठ पीछे बाँधे, और उसकी आँखें उस अकेली परछाईं का पीछा कर रही थीं जो हर रात तहख़ाने के आस-पास चुपके से खूँटे उखाड़ती फिरती थी।

"धीमे, और धीमे, और धीमे। तुम मुझे बेवक़ूफ़ समझती हो, किआरा। तुम्हारी हर झूठी ख़बर, हर टूटा फ़ावड़ा, मुझे दिखता है। तुम खुदाई को आगे नहीं, पीछे धकेल रही हो। तुम वक़्त ख़रीद रही हो। पर वक़्त, मेरी रानी, अब मैं ख़रीदूँगा।"

और यही तक्षक की चाल की ख़ूबसूरती थी। वो किआरा की तोड़-फोड़ से लड़ेगा ही नहीं। वो उसके इर्द-गिर्द से निकल जाएगा। एक नागिन एक इंसान की खुदाई को धीमा कर सकती थी। पर एक इंसान के लालच को कोई नागिन नहीं रोक सकती। और लालच, तक्षक जानता था, इस रेगिस्तान में कहाँ सबसे मोटा बहता है।

उधर कैंप में, किआरा ने वो किया था जो उसे कभी नहीं करना था। शिवांश के उस सवाल के सामने, तुम कौन हो, वो न पूरा झूठ बोल पाई थी, न पूरा सच। उसने बीच का रास्ता चुना था। आधा सच, जो सबसे महँगा पड़ता है।

"हाँ। मैं वही हूँ जो तुम्हारे सपने में है। तुम्हारा दिल ग़लत नहीं है, शिवांश। पर बाक़ी सच, अगर मैंने आज बता दिया, तो वो तुम्हारी जान ले लेगा। बस इतना मानो, और खुदाई कुछ दिन के लिए रोक दो। मुझ पर भरोसा करो, जैसे तुम्हारी रूह करना चाहती है।"

और शिवांश ने, उस औरत की आँखों में डूबे, हामी भर दी थी। कुछ दिन के लिए। उसने भरोसा चुना था, समझ के बदले। किआरा ने थोड़ा-सा वक़्त ख़रीद लिया था। पर उसे नहीं पता था कि ठीक उसी रात, उसका दुश्मन वो वक़्त उससे चुराने निकल चुका था।

ठाकुर करमवीर सिंह की हवेली में, आधी रात को, एक मेहमान बिना बुलाए आया। दरबान ने रोका, फिर न जाने क्यों, उसके हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद दरवाज़ा खोल गए। करमवीर अपने दीवानख़ाने में अकेला बैठा शराब के गिलास में अपना लालच घोल रहा था, जब वो अजनबी अंदर आया, रेशमी अचकन, बेदाग़ जूते, और एक मुस्कान जो कमरे का तापमान गिरा गई।

"कौन हो तुम? इस वक़्त, मेरी हवेली में? दरबान! अरे कोई है वहाँ..."

"बुलाइए मत, ठाकुर साहब। वो सो गए हैं, बहुत गहरी नींद। मैं आपका दुश्मन नहीं हूँ। मैं वो हूँ, जो आपको वो दिला सकता है, जिसके पीछे आपका ख़ानदान तीन पीढ़ियों से पागल है। उस मंदिर का ख़ज़ाना।"

और करमवीर का हाथ घंटी से हट गया। कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो लालची आदमी के कान में शहद घोल देते हैं। मंदिर का ख़ज़ाना, उन सबमें सबसे मीठा।

"तुम्हें क्या पता उस मंदिर में क्या है? और तुम हो कौन? नाम तो बताओ।"

"मुझे लोग नागेश कहते हैं। एक पुराना जौहरी हूँ, ठाकुर। दुर्लभ पत्थरों का पारखी। और उस मंदिर के बारे में मुझे वो पता है, जो उस शहरी पुरातत्ववाले को उसकी सारी मशीनें कभी नहीं बताएँगी।"

"उसके तहख़ाने में एक पत्थर है, ठाकुर। नागमणि। कोई मामूली हीरा नहीं। ऐसा रत्न, जिसकी एक झलक तक़दीरें पलट दे। जो उसे पा ले, उसके लिए राजा और भिखारी में बस एक ख़्वाहिश का फ़र्क़ रह जाता है।"

"कहानियाँ। मेरी दादी भी यही सुनाती थी। तक़दीर बदलने वाला पत्थर। अगर ऐसा कोई पत्थर सच में होता, तो अब तक किसी न किसी ने निकाल लिया होता। तीन पीढ़ी से मेरा ख़ानदान उस मिट्टी को खोद रहा है, और हाथ ख़ाली हैं।"

"निकालने की कोशिश में जो-जो मरे, उनकी गिनती है आपके पास, ठाकुर? उस मणि की पहरेदारी होती है। सदियों से। पर एक रात आती है, हर सौ बरस में सिर्फ़ एक बार, जब वो पहरा सबसे कमज़ोर पड़ता है। और वो रात, इत्तिफ़ाक़ से, अब कुछ ही दिन दूर है।"

"मेरे परदादा ने इस मंदिर को खोदते हुए जान दी। मेरे दादा ने इसमें अपनी आधी ज़मीन फूँक दी। मेरे बाप ने मरते वक़्त मेरा हाथ पकड़ कर कहा था, बेटा, वो पत्थर हमारी क़िस्मत में लिखा है, बस निकालने वाला नहीं मिला। और तुम कह रहे हो कि तुम वो निकालने वाला ला सकते हो?"

"सोचिए, ठाकुर। एक ऐसा पत्थर जो आपकी हर ख़्वाहिश के आगे सिर झुका दे। दुश्मन मिट्टी हो जाएँ, तिजोरियाँ भर जाएँ, और आपका नाम इस रेगिस्तान में सदियों तक गूँजे। आपके परदादा, दादा, बाप, सब उस दहलीज़ पर आ कर लौट गए। आप वो पहले ठाकुर हैं जिसे कोई रास्ता दिखाने आया है। ठुकरा देंगे?"

और करमवीर ने उस अजनबी की आँखों में देखा, और एक पल को उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। इस आदमी को वो सब पता था जो किसी इंसान को नहीं पता होना चाहिए, और उसकी पुतलियों में, रोशनी पड़ते ही, कुछ खड़ा-सा, कुछ साँप-सा तैर जाता था। पर लालच, जब गहरा हो, तो डर को भी निगल जाता है। और करमवीर का लालच समंदर था।

"मान लो मैं तुम पर यक़ीन कर लूँ। तो तुम मुझसे चाहते क्या हो? हर सौदे की एक क़ीमत होती है, नागेश। मुफ़्त में तो कोई आधी रात हवेली नहीं आता।"

"मुझे मणि नहीं चाहिए, ठाकुर।"

और ये उसका सबसे बड़ा झूठ था। क्योंकि मणि ही तो वो चाहता था, इस दुनिया की हर चीज़ से ज़्यादा। पर एक शिकारी अपना असली जाल कभी नहीं दिखाता।

"मुझे बस उस मंदिर को खुलते देखना है। सदियों का एक हिसाब है मेरा उससे। आप मणि रखिए। उसकी दौलत, उसकी ताक़त, सब आपकी। मैं आपको बस वो जगह बताऊँगा जहाँ वो दबी है, ठीक-ठीक, और वो रात, जब वो हाथ लग सकती है। बाक़ी... आपके आदमी, आपकी ज़मीन, आपका हक़।"

"और वो खुदाई वाला? शिवांश? वो अपनी जगह से टस से मस नहीं होता। परमिट उसके नाम है, सरकारी काग़ज़।"

"परमिट बस काग़ज़ है, ठाकुर। और ज़मीन आपकी है। एक ज़मींदार जिस पर चाहे, अपनी शर्तें थोप सकता है। उसकी खुदाई तेज़ करवाइए, अपने तरीक़े से, अपने आदमियों से। उसे तहख़ाने की उस आख़िरी दीवार तक धकेल दीजिए, उस रात से पहले। बाक़ी, वो रात ख़ुद सँभाल लेगी।"

और यूँ, तक्षक ने वो हथियार बना लिया जिसे किआरा कभी नहीं रोक सकती थी। एक नागिन एक इंसान की मशीन को धीमा कर सकती थी। पर एक इंसान के लालच को, उसकी हवस को, कोई फुफकार नहीं डरा सकती। तक्षक अँधेरे में घुल गया, अपना ज़हर करमवीर की रगों में छोड़ कर।

और अगली सुबह, कैंप में एक तूफ़ान उतर आया। ठाकुर करमवीर सिंह, अपने बीसियों आदमियों के साथ, जीपों का काफ़िला ले कर खुदाई की जगह पर आ धमका, और इस बार उसकी मुस्कान के नीचे से पंजे बाहर थे।

"बहुत हो गई ये सुस्त खुदाई, साहब। महीना बीत गया, और आपने अभी तक मुझे कुछ नहीं दिखाया। ये ज़मीन मेरी है। परमिट सरकार का होगा, पर मिट्टी मेरी। या तो खुदाई आज से तेज़ होगी, दिन-रात, मेरे आदमियों के साथ, या मैं कल ही ऊपर बात कर के आपका परमिट रुकवा दूँगा। फिर देखता हूँ आप कौन-सा पत्थर उठाते हैं।"

किआरा भीड़ में से आगे बढ़ी, अपनी गाइड वाली दीनता ओढ़े, पर उसकी आँखों में वो बर्फ़ थी जो सिर्फ़ करमवीर के लिए थी। वो जानती थी ये अचानक की तेज़ी कहाँ से आई है। उस पर तक्षक की उँगलियों के निशान उसे साफ़ दिख रहे थे।

"ठाकुर साहब, ये ज़मीन बरसों से सोई है। इसे जगाने में जल्दबाज़ी ठीक नहीं। यहाँ की मिट्टी भुरभुरी है, सुरंगें कमज़ोर हैं। जल्दी खोदेंगे तो किसी की जान जाएगी। और उस मौत का इल्ज़ाम आप पर आएगा, ठाकुर, किसी परमिट पर नहीं।"

"तू! एक गाइड, मुझे सिखाएगी? इस लड़की को इतनी छूट क्यों दे रखी है यहाँ? गाँव की एक मामूली छोरी, और साहब के फ़ैसलों में बोलती है। कोई और चक्कर तो नहीं, साहब? नहीं तो एक गाइड की इतनी क्या पूछ?"

और किआरा चुप हो गई, क्योंकि वो जानती थी कि वो जितना बोलेगी, करमवीर का शक उतना गहरा होगा, वही शक जो नव्या पहले ही इस ठाकुर के कान में डाल चुकी थी। दो जाल, एक साथ, उसके गिर्द कस रहे थे। और बीच में शिवांश खड़ा था, उसके भरोसे और ठाकुर के दबाव के बीच फँसा हुआ।

शिवांश ने किआरा की तरफ़ देखा। उसने वादा किया था कि वो खुदाई कुछ दिन के लिए रोकेगा। पर अब, परमिट के इस खुले तौर पर छिन जाने के ख़तरे के सामने, उसकी पूरी ज़िंदगी की मेहनत दाँव पर थी। और उसने, आधे-अधूरे मन से, आधे टूटे हुए दिल से, हथियार डाल दिए। खुदाई तेज़ हो गई।

और अब किआरा की तोड़-फोड़ बेकार पड़ गई। एक टूटा फ़ावड़ा, एक ढीली टेक, ये चालें दस मज़दूरों के लिए थीं। पर अब बीस आदमी थे, दिन-रात, ठाकुर के चाबुक के नीचे। वो एक-दो को धीमा करती, तो बाक़ी अठारह खोदते रहते। सदी की पहरेदार, पहली बार, बेबस खड़ी देख रही थी।

"मैं बीस हाथों को नहीं रोक सकती, माँ। रेत हर घंटे मणि से पर्दा हटा रही है, और मेरे हाथ बँधे हैं। अगर मैं अपनी ताक़त दिखाऊँ, तो शिवांश और नव्या, और सब जान जाएँगे। और अगर न दिखाऊँ, तो मुहर टूट जाएगी। मुझे कोई और रास्ता चाहिए। और वक़्त... वक़्त मेरी उँगलियों से रेत की तरह फिसल रहा है।"

और फिर, तीसरे दिन की दोपहर, कुदालें एक ऐसी चीज़ से टकराईं जो मिट्टी नहीं थी। तराशा हुआ पत्थर। सलीक़े से जमाया हुआ, सदियों पुराना, जान-बूझ कर रखा हुआ। कोई दीवार। तहख़ाने की बाहरी दीवार। मंदिर के सबसे गहरे भेद की पहली मुहर।

शिवांश का चेहरा दमक उठा, बरसों की मेहनत के फल की तरह। और उसी पल, ठीक उसके बग़ल में खड़ी किआरा का चेहरा राख हो गया। वो जानती थी उस दीवार के पीछे क्या है। वो सौ साल से उसकी पहरेदार थी।

दो घंटे में उन्होंने बाहरी दीवार में सुराख़ कर लिया। उसके पार एक तंग, ठंडा कक्ष था, जहाँ की हवा सौ साल से किसी ने साँस नहीं ली थी, और जिसमें उतरते ही मशालें झुक गईं, जैसे वो जगह जलना नहीं चाहती हो। और उसके सबसे दूर वाले सिरे पर, एक आख़िरी पत्थर, तराशा हुआ, नाग-आकृतियों से ढका, आख़िरी मुहर। उसके पीछे नागमणि थी। किआरा का सौ साल पुराना फ़र्ज़, अब एक इंसान की मशाल की रोशनी में नंगा खड़ा था।

"साहब, रुको। इस कक्ष की हवा ज़हरीली है, सौ साल पुरानी। और ये आख़िरी पत्थर, इस पर जो लिखा है, वो एक चेतावनी है। जो इसे छुएगा, वो अकेला नहीं मरेगा। एक रात रुक जाओ। सिर्फ़ एक रात। मेरी बात मानो।"

पर इस बार शिवांश के कानों में किआरा की आवाज़ नहीं, अपने ख़ून की धड़कन गूँज रही थी। बरसों की खोज, ज़िंदगी भर का सपना, उस आख़िरी पत्थर के पीछे साँस ले रहा था। उसने रडार उठाया, ठाकुर के आदमी पीछे खड़े साँस रोके देखते रहे, और उसने उसे उस आख़िरी मुहर पर घुमाया।

वो पत्थर के पार बस और पत्थर देखने की उम्मीद कर रहा था, या शायद कोई ख़ाली जगह। पर मशीन ने वो किया जो उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं किया था। उसकी स्क्रीन पहले काँपी, फिर लकीरें पागल हो गईं, और फिर बिलकुल शांत हो गई, एक अजीब, ठहरी हुई चमक पर आ कर रुक गई।

पत्थर नहीं। धातु नहीं। पानी नहीं। स्क्रीन पर एक रोशनी उभरी, उस आख़िरी मुहर के ठीक पीछे। और वो रोशनी स्थिर नहीं थी। उसमें एक लय थी। एक ताल। धीमी, गहरी, सब्र भरी। एक धड़कन।

"नहीं... अभी नहीं। ये धड़कन... मैं इसे जानती हूँ। ये जाग रही है।"

उस आख़िरी पत्थर के पीछे, किसी भी इंसानी यंत्र की समझ से परे, एक चमक थी, जिसमें दिल की तरह एक धड़कन थी। धीमी। गहरी। जैसे कोई चीज़, जो सौ साल से सोई थी, अभी-अभी, पहली बार, करवट ले रही हो।

नागमणि जाग रही थी। और अब उस उलटी गिनती में सिर्फ़ दिन नहीं बचे थे। अब उसमें एक धड़कन थी। और उस धड़कन की हर ताल पूरी दुनिया को खींच रही थी, उस एक रात की तरफ़, जो अब बस पत्थर की एक आख़िरी परत, और कुछ ही साँसों की दूरी पर थी।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।

नागमणि की रात