अध्याय 26 / 27 पढ़ने में 11 मिनट
साथ या कुछ नहीं
नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi
करमवीर का काँपता हाथ शिवांश के कंधे पर पड़ता है, पर आख़िरी पल में वो अपनी पूरी उम्र का लालच झटककर शिवांश को वेदी की तरफ़ धकेल देता है और ख़ुद तक्षक पर टूट पड़ता है, बस एक साँस ख़रीदने के लिए, और उसकी क़ीमत अपने लहू से चुकाता है। तभी भैरवी अपने असली रूप में, रेगिस्तान के हर साँप को साथ लिए तहख़ाने में उतरती है और उस रिसती भूख को थामे रखती है, जबकि किआरा और शिवांश आख़िरकार वो करते हैं जो सौ साल की अलग-अलग क़ुर्बानी कभी न कर सकी, पहरेदार का लहू और नागिन की जान, दोनों एक साथ, प्यार के नाम पर, एक ही मुहर पर। और वही बंधन, जिसे तोड़ने में तक्षक ने सौ साल लगाए, उसी को नई करता है, तक्षक अपनी चुराई बूँद
ठाकुर करमवीर का काँपता हाथ शिवांश के कंधे पर आ पड़ा, और उसे वेदी से पीछे की ओर खींचने लगा। शिवांश ने ख़ुद को धोखे के लिए तैयार कर लिया। और तक्षक की आवाज़ में एक जीत का ज़हर घुल गया।
"शाबाश, ठाकुर। यही समझदारी है। अब उस लड़के को वेदी से दूर खींच, और मैं तुझे इस भूख से बचा लूँगा। तेरा ख़ानदान आख़िरकार सही पलड़े पर खड़ा हो गया।"
पर करमवीर का हाथ रुक गया। उसकी नज़र नीचे गई, उस मरती हुई नागिन पर, जो कभी उसकी कुछ नहीं लगती थी, जिसने कभी उससे कुछ नहीं माँगा था, और जो अभी भी, बुझते हुए, एक अजनबी लड़की नव्या को बचाने की बात कर रही थी। और सौ साल के लालच और दो दिन की एक नेकी के बीच, उस बूढ़े आदमी के अंदर एक जंग छिड़ गई।
"नहीं! मैं... मैं हथौड़ा नहीं हूँ, तक्षक! तूने ही कहा था ना, हथौड़ा तोड़ कर फेंक दिया जाता है! पर मैं हथौड़ा नहीं, ठाकुर करमवीर सिंह हूँ! और आज, पहली बार, मैं अपने नाम के लायक़ बनूँगा!"
और शिवांश को पीछे खींचने के बजाय, करमवीर ने उसे पूरी ताक़त से वेदी की तरफ़ धकेल दिया, और ख़ुद घूमकर, अपनी जंग लगी तलवार और जलती मशाल के साथ, उस विशाल नाग पर टूट पड़ा। एक टूटा हुआ बूढ़ा, एक अमर नाग पर। जीतने के लिए नहीं। बस एक साँस ख़रीदने के लिए।
"मूर्ख! बूढ़े मूर्ख! तूने जीने का आख़िरी मौक़ा भी गँवा दिया!"
और तक्षक की कुंडली ने एक झटके में करमवीर को हवा में उछालकर पत्थर की दीवार से दे मारा। बूढ़ा ठाकुर वहीं ढेर हो गया, उसकी तलवार दूर जा गिरी। पर उसकी आँखों में, अपनी पूरी ज़िंदगी में पहली बार, कोई डर नहीं था। बस एक अजीब सा चैन था।
"जाओ... बेटा... मैंने ज़िंदगी भर सिर्फ़ लिया... छीना... आज एक बार दे दिया... जाओ, उस लड़की को बचाओ, ये दुनिया बचाओ... मेरी परवाह मत करो... एक लालची बूढ़े की सबसे अच्छी मौत यही है..."
और ठीक उसी पल, सुरंग के मुँह से एक नई रोशनी उतरी, ठंडी, चाँदी जैसी, और बहुत, बहुत पुरानी। भैरवी। अपने असली रूप में, और उसके पीछे, रेगिस्तान का हर साँप एक बहती हुई नदी की तरह। ऊपर नागपाल के आदमी भाग चुके थे, नव्या के बंधन मनोहर ने अपनी काँपती उँगलियों से खोल दिए थे, और अब वो आख़िरी माँ, वो सबसे पुरानी पहरेदार, ख़ुद उस सेहन में उतर आई थी।
"पीछे हट, तक्षक। तू अपने मालिक का हरकारा है, तो मैं उस पहरे की आख़िरी माँ हूँ। सौ साल तूने इस रात को बुना, पर एक बात भूल गया। ये मुहर तेरे चुराए हुए लहू के बूते बंद नहीं होगी। ये इनके प्यार के बूते बंद होगी।"
"तुम सब मिलकर भी उस भूख को नहीं रोक सकते, बुढ़िया। वो जाग चुकी है। उसने इस दुनिया की हवा चख ली है। अब वो वापस नहीं जाएगी।"
"किआरा, पृथ्वी, सुनो मुझे। जल्दी। दोनों, वेदी पर। साथ। किआरा, तेरी क़ुर्बानी, और पृथ्वी, तेरा लहू, एक ही पल में, एक ही मुहर पर। पर याद रखना, इसे फ़र्ज़ समझकर मत देना। प्यार समझकर देना। क्योंकि तक्षक के पास सब कुछ है, बस वो एक चीज़ नहीं जो तुम दोनों के बीच है। और वही इस ताले की आख़िरी चाबी है।"
और भैरवी ने अपने हाथ ऊपर उठाए, और रेगिस्तान के सारे साँप उस रिसती हुई दरार के आगे एक जीवित दीवार बनकर उठ खड़े हुए। सबसे पुरानी नागिन उस भूखी सीवन को अपने पूरे ज़ोर से थामे खड़ी रही, ताकि दो प्रेमी वो कर सकें जो सिर्फ़ वही कर सकते थे।
और शिवांश किआरा को उस वेदी तक ले गया, उसी वेदी तक, जहाँ सौ साल पहले पृथ्वी ने अपनी आख़िरी साँस ली थी। वही पत्थर, वही ताख़, वही चाँद उस सुराख़ में। बस इस बार, पृथ्वी अकेला मरने नहीं आया था। इस बार वो अपने प्यार के साथ, जीने की एक आख़िरी कोशिश करने आया था।
"किआरा। मेरी तरफ़ देखो। बस मेरी तरफ़। तैयार हो?"
"सौ साल से तैयार हूँ, शिवांश। पर आज पहली बार, कोई डर नहीं है। क्योंकि आज मैं अकेली उस वेदी पर नहीं चढ़ रही। आज तुम मेरे साथ हो। बस इतना ही तो मैंने सौ साल माँगा था।"
और वहाँ, उस मरती वेदी पर, पहरेदार का लहू और नागिन की चाँदी एक हो गए। शिवांश ने अपना निशान वाला कलाई किआरा के घाव पर रखा, और किआरा ने अपना काँपता हाथ शिवांश की उस कलाई पर, और दोनों ने अपने जुड़े हुए हाथ उस चटकी हुई मुहर पर दबा दिए।
"मैं, पृथ्वी, इस मंदिर के पहरेदार का लहू, अपनी पूरी मर्ज़ी से देता हूँ। किसी डर से नहीं, किसी फ़र्ज़ से नहीं। इस औरत के लिए, जिससे मैं दो जनम से प्यार करता हूँ।"
"और मैं, किआरा, इस वंश की आख़िरी नागिन, अपनी जान, अपनी ख़ुशी से देती हूँ। किसी सज़ा के तौर पर नहीं। इस आदमी के लिए, इस दुनिया के लिए, इस प्यार के लिए, जो सौ साल में कभी नहीं मरा।"
और जैसे ही उनकी आवाज़ें मिलीं, वो हुआ जो सौ साल में कभी नहीं हुआ था। एक आत्मा के वो दो टुकड़े, जिन्हें एक सदी ने अलग कर रखा था, एक सुर में बोले। और नागमणि, जो टूटने के लिए सफ़ेद दहकने वाली थी, अचानक एक गर्म, सुनहरी रोशनी से भर गई। एक धड़कन, जो भूख की नहीं थी। अपनेपन की थी।
और उस सुनहरी रोशनी में, एक पल के लिए, वो दोनों फिर सौ साल पहले उसी रात में पहुँच गए। पर इस बार वो याद जलाती नहीं थी। इस बार पृथ्वी की मौत, किआरा का बढ़ा हुआ हाथ, वो सारा अधूरापन, उस गर्म रोशनी में घुलकर धीरे-धीरे पूरा हो रहा था।
"देख रहे हो, शिवांश? यही, बिल्कुल यही जगह। यहीं तुमने सौ साल पहले मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया था, और मैं थाम नहीं पाई थी। सौ साल मैं इसी एक पल पर अटकी रही, इसी एक चूक पर। पर आज देखो... आज मैंने थाम लिया। बहुत देर से सही, पर थाम लिया।"
"और इस बार मैं तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ रहा, किआरा। जो सौ साल पहले इसी वेदी पर अधूरा रह गया था, आज वो पूरा हो रहा है। तुम, मैं, और ये आख़िरी काम, साथ। ठीक वैसे, जैसे शुरू से होना चाहिए था।"
"नहीं! ये नहीं हो सकता! मेरी बूँद! मेरे पास पृथ्वी के लहू की बूँद है! मैंने सौ दिन से ये मुहर तोड़ी है! तोड़ी है मैंने!"
और तक्षक ने अपनी वो चुराई हुई बूँद उस मुहर पर फेंकी, उसे तोड़ने के लिए जिसे वो दोनों फिर से गढ़ रहे थे। पर अँधेरे में, एक देह से चुराई गई एक सूखी बूँद, एक मरी हुई चीज़ थी। और जो लहू ये दोनों दे रहे थे, अपनी मर्ज़ी से, प्यार से बँधा हुआ, वो ज़िंदा था। और ज़िंदा चाबी ने मरी हुई चाबी को हरा दिया।
"सुन ले, तक्षक! सौ साल तू इसी बंधन को तोड़ता रहा, क्योंकि तू जानता था, यही तेरी हार है। जिन पहरेदारों को तू कमज़ोर समझता रहा, जिनके प्यार को तू बेवक़ूफ़ी कहता रहा, आज उसी प्यार ने तेरे मालिक को वापस उसकी क़ब्र में धकेल दिया!"
और वो गर्म सुनहरी रोशनी वेदी पर फैलती गई, और मुहर की एक-एक दरार भरती गई, एक-एक करके। और नीचे वो विशाल, भूखी चीज़, जो सौ साल बाद बस एक साँस के लिए इस दुनिया की हवा चख पाई थी, गुस्से में एक भयानक चीख़ के साथ, वापस अपनी सदी-गहरी क़ैद में खिंच गई।
"मालिक! मुझे मत छोड़! मैं तेरा हरकारा हूँ, तेरा वारिस, तेरा पहला निवाला! मुझे भी ले चल! मुझे अपने साथ ले चल!"
और जिस मालिक की उसने सौ साल पूजा की थी, उसने तक्षक को सच में ले लिया, पर निवाले की तरह नहीं। एक साथी क़ैदी की तरह। वो सीवन तक्षक के ऊपर बंद हो गई, और उसकी वो मख़मली आवाज़ पत्थर में दबकर हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई। सौ साल का सब्र, एक ऐसे प्यार की एक ही धड़कन में ख़त्म, जिसे वो कभी समझ ही नहीं पाया।
"सौ साल पहले पृथ्वी ने अकेले इस मुहर को थामने की कोशिश की थी, और तक्षक ने उसे इसीलिए मारा था। आज पृथ्वी ने वो अधूरा काम पूरा कर दिया, अकेले नहीं, अपनी नागिन के साथ। जो एक जनम में अधूरा रहा, वो दूसरे जनम में पूरा हुआ। नाग देवता आख़िरकार अपने पहरेदारों पर मुस्कुराए।"
और ऊपर, सुरंग के मुँह पर, मनोहर अपनी घायल हड्डियों के बावजूद नव्या को थामे खड़ा था, और दोनों काँपती साँसों से उस अँधेरे में झाँक रहे थे, जिसमें उनकी बिटिया उतरी थी। जब नीचे की वो भयानक सफ़ेद रोशनी बुझी और एक नरम सुनहरी चमक बची, तो मनोहर ने भर्राई आवाज़ में बस इतना कहा, मेरी बिटिया ने कर दिया। मुझे पता था। ज़रूर कर दिया।
और फिर, ख़ामोशी। नागमणि की रोशनी धीमी होकर एक नरम, सोई हुई चमक बन गई। पत्थरों पर जमा पाला पिघल गया। साँप वापस अँधेरे में उतर गए। भैरवी के हाथ नीचे आ गए। हो गया। मुहर बंद थी। दुनिया महफ़ूज़ थी। और किआरा और शिवांश, ज़िंदा, साथ, वेदी के सहारे ढह गए, उनके जुड़े हुए हाथ अब भी उस गर्म पत्थर पर टिके हुए।
"हमने... हमने कर दिया, किआरा। साथ। हमने कर दिया। तक्षक चला गया। भूख वापस बंद हो गई। तुम ज़िंदा हो, मैं ज़िंदा हूँ, ये दुनिया ज़िंदा है। वो तराज़ू, जिसने हमें सौ साल तोड़ा, वो आज टूट गया। हम दोनों जीत गए।"
"हाँ... हमने कर दिया... साथ..."
पर भैरवी का चेहरा नरम नहीं पड़ा। क्योंकि उस बूढ़ी नागिन को सबसे पुराना क़ानून पता था। नई की हुई मुहर भी अपनी क़ीमत माँगती है। साझा क़ुर्बानी ने उस क़ीमत को आधा ज़रूर कर दिया था। पर आधा, कुछ नहीं नहीं होता। और वो पत्थर, हमेशा, अपना हिसाब पूरा वसूलता है।
"किआरा। बेटी। तेरी रोशनी... तेरी चाँदी... वो रुक क्यों नहीं रही... पृथ्वी, उसे देख! उसे देख!"
और शिवांश ने नीचे देखा, और उसकी सारी राहत बर्फ़ बन गई। क्योंकि किआरा के लहू की वो चाँदी रुक नहीं रही थी। उसका रूप टिमटिमा रहा था, सोने और चाँदी के बीच काँपता हुआ, पतला होता हुआ, जैसे कोई दीया जिसका तेल ख़त्म हो रहा हो। नई की हुई मुहर ने आख़िरकार अपनी क़ीमत माँग ली थी। और वो क़ीमत किआरा थी।
"नहीं। नहीं, ये नहीं। हमने साथ किया था, भैरवी! क़ीमत बँटनी थी! वो कहा था तुमने! फिर ये क्यों... किआरा, रुको, मेरे साथ रहो! तुम कहीं नहीं जा रही!"
"पृथ्वी, वो पत्थर अब भी एक जान का भूखा है। तुम दोनों ने मिलकर उस क़ीमत को आधा तो कर दिया, पर आधा भी एक क़ीमत है। किआरा की चाँदी बुझ रही है, उसकी सदियों की उमर बूँद-बूँद उस पत्थर में उतर रही है। इसके आगे राख बचेगी या एक साँस, ये अब न मेरे हाथ में है, न इस मुहर के। ये अब सिर्फ़ उस बंधन के हाथ में है जो तुम दोनों ने अभी गढ़ा है।"
"शायद... शायद बँटी हुई क़ीमत भी एक क़ीमत ही होती है, शिवांश। पर इस बार देखो... इस बार मैं मुस्कुरा रही हूँ। इस बार मैं तुम्हारी बाँहों में हूँ, किसी ठंडी वेदी पर अकेली नहीं। इस बार तुम मेरे साथ हो। और ये... ये मेरे लिए काफ़ी है।"
और वहीं वो सबसे ज़ालिम पल आ खड़ा हुआ। उन्होंने तक्षक को हरा दिया था। उन्होंने उस अनादि भूख को फिर क़ैद कर दिया था। उन्होंने साथ मिलकर वो कर दिखाया था जो सौ साल की अलग-अलग क़ुर्बानी कभी न कर सकी। मुहर बंद थी, दुनिया बची थी, और हर पुराने क़ानून के ख़िलाफ़, वो दोनों उस काले तहख़ाने से ज़िंदा निकल आए थे। और अब, जीत अभी उनके हाथों में गरम ही थी, कि शिवांश की बाँहों में किआरा बुझने लगी, और वो पत्थर, चुपचाप, अपना आख़िरी बक़ाया वसूलने लगा, एक जान। ऊपर, सरपगढ़ के आसमान पर एक नई सुबह फूट रही थी। पर उस सुबह की पहली किरण किस पर पड़ेगी, दोनों पर, या सिर्फ़ एक पर, ये न वो पहरेदार जानता था, न वो बूढ़ी माँ, न वो लड़का जो अपने प्यार को दूसरी बार अपनी बाँहों में बुझते देख रहा था।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।