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Chapter 17 of 27 11 min read

रेत में ख़ून

नागमणि की रात by Avni Oberoi

अड़तालीस घंटे की मोहलत झूठ थी। करमवीर ने उसका आधा भी इंतज़ार नहीं किया। सूरज ढंग से निकला भी नहीं था कि रेगिस्तान की सुबह गाड़ियों की गड़गड़ाहट से फट पड़ी। इस बार आदमी काग़ज़ नहीं लाए थे। इस बार वो लोहा लाए थे।

तंबू उखड़ने लगे, मज़दूर भागने लगे, बर्तन बिखर गए। करमवीर के आदमी कैंप में ऐसे घुसे जैसे टिड्डियाँ फ़सल में घुसती हैं। और उनके बीच, अपनी छड़ी ठकठकाता, ठाकुर करमवीर खड़ा था, चेहरे पर वो मख़मली मुस्कान, जो अब पूरी तरह लोहे में बदल चुकी थी।

"सबको बाहर निकालो! हर तंबू, हर गड्ढा, ख़ाली करो! जो रोके, उसे हटाओ, चाहे जैसे भी! आज उस तहख़ाने पर मेरा क़ब्ज़ा होगा, और आज ही होगा!"

और उसी शोर के बीच, एक आवाज़ उठी। मनोहर की। वो एक गिरे हुए मज़दूर के आगे, अपनी दुबली-पतली बाँहें फैलाए, खड़ा हो गया था। मनोहर, जिसकी सबसे बड़ी जंग अब तक चाय के पतीले से रही थी, आज एक भीड़ के सामने खड़ा था।

"रुक जाओ! ये गाँव के लोग हैं, ठाकुर! ये मंदिर नाग देवता का है, तुम्हारे बाप का नहीं! जिस मणि के पीछे तुम पागल हुए जा रहे हो ना, वो श्राप है, श्राप! उसे छेड़ोगे तो पूरा सरपगढ़ जल जाएगा!"

"एक बावर्ची मुझे नाग देवता का डर दिखा रहा है। हटाओ इसे रास्ते से।"

"मैं नहीं हटूँगा! मारो मुझे, पर ये लोग मेरे अपने हैं! भागो मत, सरपगढ़ वालो! ये ज़मीन हमारी है, हमारे नागों की है!"

और एक आदमी ने मनोहर को धक्का दिया, ज़ोर से। मनोहर लड़खड़ाया, और उसका सिर एक खुदाई में गड़े पत्थर के किनारे से टकराया। एक धमक। और मनोहर रेत पर गिर पड़ा, बेसुध, और उसके सिर के नीचे रेत धीरे-धीरे गहरी होने लगी। उसी पल, थोड़ी दूर, एक बूढ़ा गाँव वाला भी, विरोध करते हुए, गिरा दिया गया।

"मनोहर काका! नहीं!"

किआरा भीड़ को चीरती हुई उस तक पहुँची, घुटनों के बल गिरी, और उसका सिर अपनी गोद में उठा लिया। उसकी साँस चल रही थी, पर धीमी। बहुत धीमी। और उस पल, किआरा के अंदर सौ साल की वो नागिन, जो ज़मीन फाड़ सकती थी, जो इन सारे आदमियों को एक साँस में ख़त्म कर सकती थी, वो जाग उठी।

पर वो अपना रूप नहीं धर सकती थी। इतनी बड़ी भीड़ के सामने नहीं। एक बार वो नागिन बनी, तो उसका राज़ पूरी दुनिया में फैल जाता, और तब सिर्फ़ करमवीर नहीं, हर आदमी उस मंदिर पर टूट पड़ता। और यही उसका दूसरा डर था। क्योंकि उसी अफ़रा-तफ़री में, उसकी नाक ने वो ठंडी, तहख़ाने वाली बू पकड़ी। नागपाल के आदमी, उस शोर की आड़ में, चुपचाप तहख़ाने की तरफ़ बढ़ रहे थे।

एक तरफ़ मनोहर, उसकी गोद में, अपनी आख़िरी साँसें गिनता हुआ। दूसरी तरफ़ वो तहख़ाना, जहाँ नाग मणि तक पहुँचने की कोशिश में थे। एक तरफ़ एक जान, दूसरी तरफ़ पूरी दुनिया। वही तराज़ू, फिर से। पर इस बार, किआरा ने तराज़ू को इनकार कर दिया।

"नहीं। इस बार नहीं। इस बार मैं किसी को अपनी गोद में मरने नहीं दूँगी। ना पृथ्वी को, ना मनोहर को। मैंने कहा था ना, इस बार मैं तराज़ू ही तोड़ दूँगी।"

"अगर मैं तुम्हें अपना रूप नहीं दिखा सकती... तो अपने भाइयों को भेज देती हूँ।"

और किआरा ने अपनी हथेली रेत पर रखी, और आँखें बंद कर लीं। और रेगिस्तान ने जवाब दिया। हर बिल से, हर दरार से, हर पत्थर के नीचे से, साँप निकल आए। सैकड़ों। हज़ारों। एक ज़िंदा, फुफकारती लहर, जो करमवीर के आदमियों की तरफ़ बढ़ी।

और भीड़ में क़यामत मच गई। लोहा थामे वो आदमी, जो एक बावर्ची और एक बूढ़े को गिरा कर ख़ुद को शेर समझ रहे थे, अब चीख़ते हुए भाग रहे थे। श्राप! श्राप! मंदिर का श्राप जाग गया! और भागती भीड़ में किसी ने नहीं देखा कि वो लहर ठीक उन्हीं आदमियों की तरफ़ गई थी जो तहख़ाने की तरफ़ बढ़ रहे थे। किसी ने किआरा को नहीं देखा। सबने बस श्राप देखा।

"ये... ये क्या है! पीछे हटो! सब पीछे हटो! ये किसी का जादू है! मैं वापस आऊँगा! मैं ज़रूर वापस आऊँगा!"

और ठाकुर करमवीर, जो कुछ ही पल पहले एक राजा की तरह खड़ा था, अपनी छड़ी घसीटता, अपनी गाड़ी की तरफ़ भागा। इंसानी तूफ़ान, अभी के लिए, थम गया। पर किआरा की गोद में, मनोहर की साँस अब भी धीमी थी, और उसका ख़ून रेत में फैल रहा था।

"काका, आँखें खोलो। तुमने मुझे अपनी बेटी कहा था, याद है? बेटियाँ बाप को ऐसे नहीं जाने देतीं। रुको, मैं तुम्हें ठीक करती हूँ, पर किसी को देखने मत देना..."

उसने अपनी हथेली मनोहर के घाव पर रखी, और उसमें से एक हल्की, नीली रोशनी फूटी। नागिन का स्पर्श, जो ज़हर भी देता है, और ज़िंदगी भी। वो उसे पूरा ठीक नहीं कर सकती थी, इतनी भीड़ में नहीं, इतनी जल्दी नहीं। पर उसने उसकी बहती साँस को थाम लिया, उस बुझते दीये को फिर से टिमटिमा दिया।

"बिटिया... तेरे हाथ इतने ठंडे क्यों हैं... और ये नीली रोशनी... मैं मर तो नहीं गया? अगर स्वर्ग में भी चाय बनानी पड़ी ना, तो मैं वापस लौट आऊँगा..."

"तुम नहीं मरे, काका। तुम्हें अभी बहुत साल चाय बनानी है। चुप रहो, आँखें बंद रखो, और बस साँस लेते रहो। तुम्हारी बिटिया तुम्हें कहीं नहीं जाने देगी।"

और तभी, पीछे से, एक आवाज़ आई, जिसे सुनते ही किआरा का हाथ रुक गया। शिवांश। पर ये वो ठंडा, दूर शिवांश नहीं था जो कल रात तक्षक के साथ अँधेरे में गया था। ये कोई और था। हाँफता हुआ, दौड़ता हुआ, और उसकी आँखों में वो पुरानी आग वापस थी।

"किआरा! मनोहर काका, वो ठीक तो हैं? मैंने दूर से देखा, साँप, भगदड़... तुमने ये किया, है ना? तुमने सबको बचा लिया।"

"तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है, शिवांश? तुम तो तक्षक के हो गए हो। जाओ, अपने नए दोस्त के पास जाओ। यहाँ बचाने का काम मैं देख लूँगी। मैं सौ साल से यही तो करती आई हूँ।"

"मैं तक्षक का नहीं हुआ, किआरा। एक पल के लिए भी नहीं। कल रात, जब मैं उसके साथ गया, वो गिरना नहीं था। वो शिकार था। मैं उसके बिल में उतरा था, उसकी चाल जानने। क्योंकि दुश्मन को हराने के लिए, पहले उसके अंदर घुसना पड़ता है।"

और किआरा का दिल एक धड़कन को रुक गया। वो ठंडक, वो दूरी, वो तक्षक के साथ जाना, सब एक नाटक था। शिवांश गिरा नहीं था। वो एक जासूस बन कर, अपने ही टूटे दिल को एक ढाल बना कर, दुश्मन के सबसे गहरे राज़ तक पहुँच गया था।

"तुमने... तुमने मुझे भी नहीं बताया। मैंने तुम्हें उसके सामने झुकते देखा। मैं सारी रात रोई हूँ, शिवांश। तुमने मुझे भी अँधेरे में रखा।"

"क्योंकि अगर तुम्हें पता होता, तो तक्षक तुम्हारी आँखों में पढ़ लेता। तुम मेरे लिए कभी अच्छा झूठ नहीं बोल पातीं, किआरा। तुम्हारा चेहरा तुम्हारा साथ नहीं देता। मुझे माफ़ कर दो। पर मैंने वो जान लिया जो हमें बचा सकता है। और वो जान कर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।"

और सौ साल पुराना वो ज़ख़्म, वो अभी भरा नहीं था। वो अब भी दोनों के बीच पड़ा था, तुमने मणि चुनी थी, वाला ज़ख़्म। पर इस पल, उस टूटे मंदिर के मलबे में, एक घायल बूढ़े के ऊपर झुके, दो लोग जो एक-दूसरे से नाराज़ थे, फिर से एक ही तरफ़ खड़े हो गए थे। प्यार बाद में। पहले, ज़िंदा रहना।

"ठीक है। बाद में हिसाब करेंगे, तुम्हारा और मेरा। अभी बताओ। तुमने तक्षक के बिल में क्या जाना? ऐसा क्या है जिससे तुम्हारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई?"

"तक्षक को इस खुदाई की, इन मशीनों की, करमवीर की, किसी की ज़रूरत नहीं है, किआरा। ये सब सिर्फ़ एक तमाशा है, हमें उलझाए रखने के लिए। वो अंदर से मुस्कुरा रहा था, क्योंकि उसका असली काम मशीनों से नहीं, नीचे से हो रहा है। ज़मीन के नीचे से। सौ साल से।"

"नीचे से? क्या मतलब है तुम्हारा, नीचे से?"

"तक्षक ने एक बात कही, शायद जान-बूझ कर, ताकि मैं डर जाऊँ। उसने कहा, 'मैं सौ साल से इंतज़ार नहीं कर रहा, पृथ्वी। मैं सौ साल से काम कर रहा हूँ।' मुझे तब समझ नहीं आया था। अब आ रहा है। वो नागमणि की रात का इंतज़ार नहीं कर रहा। वो उसे ख़ुद, वक़्त से पहले, बुला रहा है।"

"और मैं मूर्ख, ऊपर उसके आदमियों की खुदाई रोकती रही, ये सोच कर कि मैं वक़्त जीत रही हूँ। और असली खुदाई, इस पूरे वक़्त, नीचे हो रही थी। मेरे अपने पैरों के नीचे। चलो। मुझे वो भीतरी मुहर देखनी है। अभी, इसी वक़्त।"

और शिवांश ने कुछ कहा नहीं। उसने बस किआरा का हाथ थामा, और उसे उस टूटी दीवार की तरफ़ खींचा, उस तहख़ाने की तरफ़, जिसकी नीली धड़कन अब पहले से तेज़ थी। भागती भीड़ की धूल अभी बैठी नहीं थी, और वो दोनों, मलबा फाँदते हुए, उस भीतरी कक्ष तक पहुँचे, जहाँ मणि की आख़िरी मुहर थी।

वो भीतरी मुहर, वो पवित्र पत्थर, जिस पर किआरा के पुरखों ने अपने लहू से वो प्राचीन बंधन लिखे थे। सौ साल से वो अटूट खड़ी थी। शिवांश ने अपनी टॉर्च उस पर डाली, और किआरा की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो उसने पहले कभी नहीं देखा था।

"देखो। ध्यान से देखो, किआरा। ये दरारें। तुम्हें लगता होगा कि ये हमारी खुदाई से पड़ीं, बाहर से। पर पास आकर देखो। इनके किनारे बाहर की तरफ़ हैं। ये मुहर बाहर से नहीं टूट रही। ये अंदर से टूट रही है।"

"नहीं... ये नामुमकिन है। इस मुहर को सिर्फ़ अंदर की चीज़ ही तोड़ सकती है। सिर्फ़ वो, जो इसमें बंद है। इसका मतलब..."

"इसका मतलब, जो अँधेरा इसमें क़ैद है, वो सौ साल से, चुपचाप, अंदर से इस मुहर को ढीला कर रहा है। धीरे-धीरे। एक-एक दरार। और तक्षक को ये पता है। इसीलिए वो इतना शांत है। उसे उस रात का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं। ये मुहर उससे पहले ही टूट सकती है।"

"मेरे पुरखों का लहू इस पत्थर में है, शिवांश। सौ पीढ़ियों का बंधन। और वो चीज़ अंदर से उसे ऐसे कुतर रही है जैसे दीमक लकड़ी को। अगर ये मुहर पूरी टूट गई, तो कोई नागमणि की रात नहीं होगी। बस एक रात होगी। आख़िरी रात। सबकी आख़िरी रात।"

और किआरा को अपने पैरों तले वो ज़मीन खिसकती महसूस हुई, जिसकी वो सौ साल से पहरेदार थी। वो सारा हिसाब, वो उलटी गिनती, नागमणि की रात के वो कुछ बचे दिन, सब झूठ थे। वो जिस रात का इंतज़ार कर रही थी, वो शायद उससे पहले ही आ जाए। मुहर का टूटना अब किसी चाँद का, किसी रात का मोहताज नहीं था। वो अंदर से, अपने ही वक़्त पर, टूट रही थी।

"मैं सौ साल से एक तयशुदा रात का पहरा दे रही थी। और वो चीज़, इस पूरे वक़्त, मेरे पैरों के नीचे, चुपचाप अपनी क़ैद काट रही थी। हम बहुत देर से जागे, शिवांश। बहुत देर से।"

और उस तहख़ाने में, उस टूटती मुहर के आगे, दो लोग खड़े थे, जिन्होंने अभी-अभी अपनी सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी का पर्दा उठाया था। वो सोच रहे थे कि उनके पास अभी कुछ दिन हैं। कुछ हफ़्ते। पर मुहर की उन दरारों ने, जो बाहर की तरफ़ खुल रही थीं, एक ही सच चीख़ कर कह दिया। वक़्त ख़त्म हो चुका था। नागमणि की रात, कैलेंडर पर चाहे जब भी हो, अब कभी भी आ सकती थी। किसी भी पल। और वो चीज़ जो सौ साल से नीचे सोई थी, अब करवट ले रही थी।

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