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रेत का वादा
नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi
सौ साल पहले नागमणि की उस आख़िरी रात, इच्छाधारी नागिन किआरा और मंदिर के जवान पहरेदार पृथ्वी को दुश्मन नाग तक्षक ने सनसनाते तहख़ाने में घेर लिया, और मणि बचाने की क़ीमत में किआरा को अपना पहला और आख़िरी प्यार अपनी बाँहों में मरता देखना पड़ा। आज, सौ बरस बाद, रेत के तूफ़ान के साथ सरपगढ़ में जीपों का एक क़ाफ़िला उतरता है, और खुदाई का सरकारी परमिट थामे पुरातत्वविद् शिवांश की कलाई पर किआरा वही निशान देखती है जो कभी पृथ्वी की कलाई पर था। मरा हुआ आदमी लौट आया है, नए चेहरे में, बिना कोई याद लिए।
कुछ रातें ख़त्म नहीं होतीं। वो बस दफ़्न हो जाती हैं, और सौ बरस तक रेत के नीचे साँस लेती रहती हैं।
सरपगढ़। अरावली की उजड़ी हुई गोद में बसा एक गाँव, जहाँ ज़मीन के नीचे एक नाग मंदिर सोता है, और उस मंदिर के सबसे गहरे तहख़ाने में एक पत्थर धड़कता है। नागमणि।
सौ साल पहले। नागमणि की एक रात।
बाहर रेत का तूफ़ान चीख़ रहा था, और तहख़ाने में मणि इतनी तेज़ जल रही थी कि पत्थर की नागिनें दीवारों पर ज़िंदा लगती थीं। दो लोग उस रोशनी के सामने खड़े थे, हाँफते हुए, ख़ून में लथपथ। एक जवान पहरेदार, और एक औरत जो औरत नहीं थी।
"किआरा, पीछे हटो! ये तुम्हारा नहीं, मेरा फ़र्ज़ है। मणि की मुहर मुझे लगानी है, मंदिर के पहरेदार को!"
"और तुम्हें मरता देखना मेरा फ़र्ज़ है, पृथ्वी? मैं नागिन हूँ। ये मणि सौ जन्मों से मेरे ख़ून की अमानत है। तुम पीछे हटो।"
और तभी अँधेरे से एक आवाज़ फिसली, ठंडी और मुलायम, जैसे रेशम पर रेंगता हुआ ज़हर।
"वाह। दो प्रेमी, एक पत्थर, और मौत बीच में खड़ी। कितना ख़ूबसूरत है ना, किआरा?"
तक्षक। उनका सबसे पुराना दुश्मन। नाग, जो सदियों से इस मणि के पीछे था।
"मैं थका नहीं हूँ, किआरा। मैंने सौ साल इंतज़ार किया इस एक रात का, और ज़रूरत पड़ी तो सौ और करूँगा। पर आज रात मुझे मणि चाहिए। बस मणि।"
"मेरी लाश पर से, तक्षक।"
"लाश? तुम इच्छाधारी हो, किआरा, तुम्हारी लाश गिरती ही नहीं। सौ बार काटो, सौ बार जी उठती हो। यही तो तुम्हारी सज़ा है। तुम मरना चाहोगी, और मौत तुम्हें नहीं आएगी। पर ये इंसान... ये तो एक ही वार में जाएगा।"
"तो कर वार, नाग। पहरेदार का काम मणि बचाना है, अपनी जान बचाना नहीं। मैं इस मंदिर की मिट्टी में पैदा हुआ, इसी मिट्टी में गिरूँगा।"
"पृथ्वी, चुप! तक्षक, तू मुझे चाहता है ना, सदियों से? मुझे ले जा। मणि छोड़ दे, इसे छोड़ दे, और मैं तेरे साथ चलूँगी। ख़ुशी से।"
"अब? जब तेरी हर साँस इसके नाम की है? नहीं, रानी। मुझे ख़ैरात नहीं चाहिए। मुझे मणि चाहिए, और वो दिन चाहिए जब तू ख़ुद, अपने हाथों से, मुझे चुने। आज नहीं तो सौ साल बाद।"
"नहीं, रानी। तुम्हारी लाश मुझे नहीं चाहिए। उसकी चाहिए।"
और उसने अपना फन पृथ्वी की तरफ़ मोड़ दिया। किआरा के और मणि के बीच अब सिर्फ़ एक फ़ासला था, पृथ्वी का शरीर।
"सौदा आसान है, किआरा। तुम मणि मुझे दे दो, और मैं इसे जाने दूँगा। या मणि की मुहर पर बैठी रहो, अपने फ़र्ज़ की तरह ठंडी, और मुझे इसका गला घोंटने दो। चुनो।" और वो पल, वो एक पल, जिसे किआरा सौ साल तक बार बार जीने वाली थी। "तक्षक, रुक जा। रुक जा! मैं... मैं तुझसे बात करती हूँ..."
"नहीं, किआरा। उसे मत देना। सुन मेरी बात, आख़िरी बार सुन। अगर ये मणि तक्षक के हाथ लगी, तो जो अँधेरा इसके अंदर बंद है, वो पूरी दुनिया निगल जाएगा। एक जान से लाखों जानें नहीं तोली जातीं।"
"पृथ्वी, ख़ामोश हो जाओ, मैं कोई और रास्ता निकालती हूँ..."
"कोई और रास्ता नहीं है। तुम पहरेदार हो, किआरा। मणि पर बैठी रहो। बस एक वादा करो... भूलना मत। मुझे भूलना मत।" और उसी पल तक्षक ने वार किया।
किसी नागिन की सारी ताक़त उस एक साँस में बेकार हो गई। किआरा मणि की मुहर से हट सकती थी, उसे तक्षक को सौंप सकती थी, पृथ्वी को बचा सकती थी। पर उसने ऐसा नहीं किया।
उसने अपना फ़र्ज़ चुना। और पृथ्वी उसकी बाँहों में गिर गया।
"अगले जनम में... किआरा... इतनी दूर मत खड़ी रहना।"
और फिर वो शांत हो गया। रेत का तूफ़ान बाहर चीख़ता रहा। मणि जलती रही। और किआरा ने आसमान की तरफ़ देखा नहीं, ज़मीन की तरफ़ देखा, जहाँ उसका पहला और आख़िरी प्यार पड़ा था।
"तुमने पत्थर चुना, नागिन। याद रखना, ये रात सौ साल में एक बार लौटती है। और मैं लौटूँगा।"
तक्षक अँधेरे में घुल गया, ख़ाली हाथ। पर किआरा जीत कर भी हार गई थी।
"सुन ले, तक्षक। सुन ले, आसमान। आज के बाद ये मणि अकेली मेरी है। मैं इसकी अकेली पहरेदार रहूँगी, सौ साल, हज़ार साल, जब तक ये धरती है। और कभी किसी इंसान से प्यार नहीं करूँगी। कभी नहीं।"
उसने पृथ्वी के माथे को छुआ, और उसकी कलाई पर बना वो निशान देखा, एक नन्हा साँप, जन्म से खिंचा हुआ, पहरेदारों के ख़ानदान का निशान। उसने उस निशान पर होंठ रखे।
"भूलूँगी नहीं। मैं वादा करती हूँ। भूलूँगी नहीं।"
और फिर सौ साल गुज़र गए। रेत आई और गई। गाँव बूढ़े हुए। मणि जलती रही, तहख़ाने में, अकेली। और उसकी पहरेदार भी।
आज। वही सरपगढ़। सौ बरस बाद।
रेत के एक और तूफ़ान के बीच से, इस बार घोड़े नहीं, जीपें आईं। तीन काली जीपें, धूल उड़ातीं, और उनके पीछे एक ट्रक जिस पर अजीब सी मशीनें लदी थीं, ज़मीन के नीचे देखने वाली मशीनें।
गाँव के चौक पर एक दुबला पतला आदमी दौड़ता हुआ आया, गमछा उड़ता हुआ, चेहरे पर वो मुस्कान जो हर मुसाफ़िर में अपना गाहक देखती है। मनोहर। गाँव का ड्राइवर, रसोइया, और ज़बान का धनी।
"आइए साहब, आइए! सरपगढ़ में स्वागत है! मनोहर हाज़िर है, गाड़ी चाहिए, खाना चाहिए, कहानी चाहिए, सब मनोहर के पास मिलेगा! पर एक बात पूछूँ... आप लोग उस मंदिर की तरफ़ तो नहीं जा रहे?"
जीप का दरवाज़ा खुला, और एक जवान आदमी उतरा। लंबा, धूप में तपा हुआ, हाथ में एक चमड़े का बैग और एक मुड़ा हुआ काग़ज़। पुरातत्वविद् शिवांश।
"उसी मंदिर की तरफ़ जा रहे हैं, भाई। ये देखो, सरकारी परमिट। भारत सरकार की खुदाई। इसी हफ़्ते नाग मंदिर की मिट्टी हटनी शुरू होगी।"
"अरे नहीं नहीं नहीं, साहब! वो मंदिर श्रापित है! वहाँ नागों का पहरा है! मेरे दादा कहते थे, जो उस तहख़ाने में गया, वो कभी वापस नहीं आया..."
"तुम्हारे दादा ने रडार देखा था कभी? ये मशीन ज़मीन के तीस फ़ुट नीचे तक देख लेती है, मनोहर। नाग नहीं, पत्थर होते हैं वहाँ। पुराने, क़ीमती पत्थर। इतिहास होता है। भूत नहीं।"
"साहब, इतिहास भी काटता है अगर उसके दाँत हों। चलो, मनोहर मना करके अपना फ़र्ज़ निभा चुका। अब आपका जो होगा, आपका होगा।"
"अच्छा एक बात बता, मनोहर। तेरे दादा ने ये सब देखा था, या सुना था? क्योंकि मेरे बारह साल के तजुर्बे में, हर श्रापित जगह के पीछे बस एक सस्ती कहानी और एक महँगा ख़ज़ाना छिपा होता है।"
"सुना था, साहब। पर सुनी हुई बात भी सच होती है अगर तीन पीढ़ियाँ एक ही डर से काँपती हों। हर नाग पंचमी पर पूरा गाँव उस मंदिर की सीढ़ियों तक दूध चढ़ाने जाता है, अंदर कोई नहीं जाता। अंदर सिर्फ़ वो जाती है।"
"वो? कौन वो?"
"पता नहीं, साहब। कोई कहता है नागिन है, कोई कहता है पगली, कोई कहता है वो सौ साल से यहीं है। मैंने ख़ुद उसे दो बार देखा है, उसी दीवार के पास, चाँदनी में। पर उससे बात करने की हिम्मत... वो किसी और की है।"
और ठीक उसी वक़्त, गाँव के दूसरे छोर पर, उस टूटे मंदिर की एक ऊँची दीवार के पीछे से, किसी ने ये सारा तमाशा देखा।
एक औरत। पत्थर की ओट में खड़ी, आँखें उस काफ़िले पर टिकी हुई। सौ साल में उसने बहुत काफ़िले देखे थे, लुटेरे, ठग, ठाकुर, तांत्रिक। सब मणि के लालच में आए, और सबको उसने चुपचाप वापस भेज दिया।
ये भी वैसे ही होंगे, उसने सोचा। मशीनें ज़्यादा हैं, बस। इन्हें भी डरा कर भगा दूँगी।
फिर शिवांश ने अपनी आस्तीन ऊपर सरकाई, मशीन का तार खोलने के लिए। और उसकी कलाई धूप में चमकी।
और किआरा का सौ साल पुराना दिल एक धड़कन के लिए रुक गया।
उस कलाई पर एक निशान था। एक नन्हा साँप। जन्म से खिंचा हुआ। पहरेदारों के ख़ानदान का निशान।
वही निशान जिस पर उसने सौ साल पहले, एक मरते हुए आदमी की कलाई पर, अपने होंठ रखे थे।
"ये... ये नहीं हो सकता।"
उसने और ग़ौर से देखा। वो जबड़ा। वो कंधों का झुकाव। हँसते हुए आँखों के कोने में पड़ने वाली वो एक लकीर। सब कुछ अलग था, चेहरा नया था, आवाज़ नई थी, नाम नया था। और फिर भी।
उसका हाथ अपने आप दीवार के पत्थर पर कस गया, और पत्थर उसकी मुट्ठी में भुरभुरा कर रेत बन गया। नागिन की देह में जो ताक़त पहाड़ गिरा दे, वो इस पल एक इंसानी हाथ की तरह काँप रही थी।
"नहीं। ये कोई और है। दुनिया बड़ी है, चेहरे मिलते हैं, निशान मिलते हैं। मैं... मैं थक गई हूँ, बस। सौ साल की थकान मुझे धोखा दे रही है।"
पर वो झूठ बोलने में माहिर थी, दुनिया से, तक्षक से, अपने आप से। और फिर भी ये एक झूठ उसके गले से नीचे नहीं उतरा। क्योंकि उसका ख़ून जानता था। नागिन का ख़ून अपने साथी को सौ जन्मों के पार भी पहचान लेता है।
और फिर भी वो वही था। "पृथ्वी।"
नाम उसके होंठों से यूँ गिरा जैसे सौ साल से उसकी जीभ पर रखा हो, बस इसी पल के इंतज़ार में।
पर ये मुमकिन नहीं था। पृथ्वी मर गया था। उसने ख़ुद उसे मरते देखा था। उसने ख़ुद उसकी चिता को आग दी थी। मुर्दे लौटते नहीं।
और फिर भी, नीचे चौक में, वो मुर्दा हँस रहा था। मनोहर से मज़ाक कर रहा था। मशीन का तार खोल रहा था। बिलकुल बेख़बर कि सौ फ़ुट दूर एक दीवार के पीछे, उसकी अपनी मौत की गवाह खड़ी काँप रही थी।
"नव्या! रडार सेट करो। कल सुबह हम मंदिर की पहली रीडिंग लेंगे।"
वो नहीं जानता था। वो कुछ नहीं जानता था। ना ये कि वो कौन था, ना ये कि उसने किसे खोया था, ना ये कि जिस मंदिर की मिट्टी वो हटाने आया था, उसके नीचे उसकी अपनी पिछली मौत दफ़्न थी।
और किआरा जानती थी कि अब उसके पास दो दुश्मन नहीं, तीन थे। तक्षक, जो सौ साल बाद ज़रूर लौटेगा। ये खुदाई, जो मणि को उस रात से पहले खोल देगी। और ये तीसरा, सबसे ख़तरनाक, जो कोई दुश्मन नहीं था।
जो उसका प्यार था। लौट आया। नए चेहरे में। बिना कोई याद लिए।
"तुमने कहा था, अगले जनम में इतनी दूर मत खड़ी रहना। और अब तुम मुझे पहचानते तक नहीं।"
सौ साल पहले उसने कसम खाई थी, किसी इंसान से प्यार नहीं करूँगी। और आज उसकी वो कसम, रेत के एक कण की तरह, उस आदमी की हँसी में उड़ गई।
उसने आँसू पोंछे। नागिन की आँखों में एक पल को सोने जैसी चमक तैरी, और बुझ गई। अगर वो सचमुच पृथ्वी था, तो एक बात पक्की थी।
"इस बार तुम मेरी वजह से नहीं मरोगे। इस मंदिर की मिट्टी को हाथ लगाने से पहले, तुम्हें मुझसे गुज़रना होगा। और मैं तुम्हें रोकूँगी, चाहे इसके लिए मुझे तुम्हारे पास वापस आना पड़े।"
सुनने वाले जान चुके थे जो शिवांश नहीं जानता था। कि जो प्यारी सी गाँव की गाइड कल उसके कैंप में काम माँगने आने वाली थी, वो कोई मामूली लड़की नहीं थी।
वो सौ साल पुरानी इच्छाधारी नागिन थी, जो इस खुदाई को रोकने की क़सम खा चुकी थी। और वो आदमी जिसकी वो मदद करने का नाटक करेगी, उसका अपना खोया हुआ प्यार था, जो कुछ भी याद नहीं रखता था।
मुर्दे लौट आए थे, सरपगढ़ में। ... और नागमणि की अगली रात, बस कुछ ही हफ़्ते दूर थी।
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