अध्याय 19 / 27 पढ़ने में 12 मिनट
क़ुर्बानी की क़ीमत
नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi
मौत का फ़रमान सुनने के बाद किआरा एक अजीब सी शांति में डूबी है, क्योंकि वो सौ साल से मरने को तैयार है और उसके लिए ये सज़ा नहीं, एक रिहाई है, पर शिवांश ये क़ुबूल नहीं कर पाता। दोनों के बीच वही सौ साल पुराना तराज़ू अब उलटा रखा है, पहले उसने शिवांश को मणि की ख़ातिर मरते देखा था और अब शिवांश को किआरा को मरते देखना है, और इसी उलटी हुई तक़दीर के सामने उनका प्यार और गहरा उतर आता है। शिवांश मान लेता है कि अब वो समझता है कि उस रात किआरा ने मणि क्यों चुनी थी, और इस अधूरी माफ़ी से घाव भरना शुरू होता है, पर वो इस तयशुदा त्रासदी को स्वीकार करने से इनकार कर देता है। रात को अकेले, वो चुपचाप ठान लेता है कि वो
सुबह रेगिस्तान में सबसे ईमानदार वक़्त होता है। रात के सारे साये उतर जाते हैं, और रेत पर बस सच रह जाता है, सुनहरा, नंगा, बेरहम। उस सुबह, पुरानी बावड़ी के सबसे ऊपरी ज़ीने पर, किआरा बैठी सूरज को उगते देख रही थी।
और उसके चेहरे पर वो शांति थी जो डराती है। वो शांति जो किसी लड़की के चेहरे पर नहीं होनी चाहिए जिसे कल रात उसकी अपनी मौत का दिन बता दिया गया हो।
और उन ज़ीनों से उतरता हुआ शिवांश आया, आँखों में रात भर की जागी हुई लाल डोरें, बाल बिखरे, चेहरे पर वो हार जो अभी हारी नहीं थी।
"तुम यहाँ हो। मैं सारी रात कैंप में तुम्हें ढूँढता रहा। एक पल को लगा कि तुम... कि तुम कहीं चली गईं।"
"मुझे सूरज देखना था। सौ साल में हज़ारों सूरज देखे हैं, शिवांश। पर आजकल हर एक ऐसे देखती हूँ जैसे आख़िरी हो। शायद इसीलिए हर एक अब ज़्यादा सुंदर लगता है।"
"कैसे? तुम इतनी शांत कैसे हो? कल रात भैरवी ने तुम्हारी मौत का फ़रमान पढ़ा। साफ़ लफ़्ज़ों में। और तुम यहाँ बैठी सूरज की तारीफ़ कर रही हो, जैसे कुछ हुआ ही न हो।"
"क्योंकि जो कल रात कहा गया, वो मेरे लिए नया नहीं है, शिवांश। मैं सौ साल से मरने के लिए तैयार हूँ। बस मौत ने आने में देर कर दी। तुम्हें लगता है ये सज़ा है। मेरे लिए ये... रिहाई है। एक बहुत लंबी, बहुत अकेली पहरेदारी का अंत।"
और वो जो इतनी सादगी से बोली, उसके नीचे सौ साल की एक ऐसी थकान थी जिसे कोई इंसानी उम्र नाप नहीं सकती। हर जान-पहचान का चेहरा मिट्टी में मिलते देखना। हर मौसम को दोहराते देखना। और अकेले, हमेशा अकेले, एक पत्थर की रखवाली करना जो तुम्हारे प्यार की क़ीमत पर तुम्हारे हाथ में रहा हो।
"तुम्हें पता है सबसे बड़ी सज़ा क्या है? मरना नहीं। ना मरना। सौ साल तक हर उस चेहरे को खोते जाना जिससे तुम प्यार करो, और ख़ुद वहीं खड़े रहना, वैसा ही, जवान, अकेला। मैं थक गई हूँ, शिवांश। इस अमरता से मैं बहुत थक गई हूँ।"
"तो थकान का इलाज मौत है? नहीं। मैं ये नहीं मानूँगा। मैंने अभी तुम्हें वापस पाया है। और तुम मुझे बता रही हो कि जिस रात हम फिर से एक हो सकते हैं, ठीक उसी रात तुम मुझे छोड़कर उस वेदी पर चढ़ जाओगी। मैं इसे तक़दीर नहीं मानता। मैं इसे डाका मानता हूँ।"
और वहीं, उस पुरानी बावड़ी के ज़ीने पर, वो सच अपने पूरे ज़ालिम रूप में उन दोनों के सामने आ खड़ा हुआ। सौ साल पहले जो तराज़ू रखा गया था, वही तराज़ू आज फिर रखा था। बस इस बार पलड़े बदल गए थे।
"समझती हो तुम? सौ साल पहले मैं मरा, और तुमने देखा। और अब तुम मरोगी, और मुझे देखना है। बस यही है हमारी कहानी? हम बारी-बारी लौटते हैं, सिर्फ़ एक-दूसरे को मरते देखने के लिए? ये प्यार है या कोई सज़ा जो हम एक-दूसरे को दिए जा रहे हैं, जनम-दर-जनम?"
"मत कहो ऐसे। ये सज़ा नहीं है। ये... ये शायद वो एक मौक़ा है जो हमें नहीं मिलना चाहिए था। सौ साल पहले मैं तुम्हारे लिए मर नहीं सकी थी, शिवांश। मुझे मणि थामनी पड़ी। पर इस बार, इस बार मैं तुम्हारे लिए ही मरूँगी। ताकि तुम जियो। शायद यही मेरी माफ़ी है।"
"तुम्हें पता है, उस रात के बाद, मैंने तुम्हें अपने हाथों से दफ़नाया था? इसी रेगिस्तान में, एक पीपल के नीचे, जो अब सूख चुका है। मैंने तुम्हारी कलाई पर वो निशान आख़िरी बार देखा था, और मिट्टी डाल दी थी। सौ साल मैं उस पीपल के पास जाती रही, हर मौसम, और उस मिट्टी से बातें करती रही। और फिर एक दिन, वही निशान एक जीप से उतर कर मेरे सामने आ खड़ा हुआ। तुम समझ सकते हो कि मेरे साथ क्या बीती होगी?"
और शिवांश के पास इसका कोई जवाब नहीं था। कोई इंसान नहीं समझ सकता कि अपने ही प्यार को दफ़नाने वाली एक औरत के लिए उस प्यार का लौट आना क्या होता है। एक चमत्कार, या एक और सज़ा। शायद दोनों, एक ही साँस में।
और वो लफ़्ज़ हवा में तैरते रहे, और उन दोनों के बीच की दूरी अपने आप घटने लगी। सौ साल का ग़ुस्सा, सौ साल का फ़र्ज़, सब उस उगते सूरज की रोशनी में पिघल रहा था, और बच रहे थे बस दो लोग, जिन्हें एक-दूसरे से मिले सौ बरस हो गए थे।
"मुझे तुम्हारी माफ़ी नहीं चाहिए, किआरा। मुझे तुम चाहिए। ज़िंदा। साँस लेती हुई। मेरे बग़ल में। सौ साल की मौत के बाद, मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ, कि एक बार, एक ही बार, हम मरने की बात किए बिना एक साथ हों।"
"जितना पास आओगे, उतना टूटोगे उस रात, जब मैं... जब मैं वहाँ नहीं रहूँगी। मुझसे और मत जुड़ो, शिवांश। अपने आप पर रहम करो।"
"बहुत देर हो गई। मैं तुमसे सौ साल पहले जुड़ा था। जिस दिन मैंने तुम्हें पहली बार देखा था, उससे भी पहले। हर सपने में जिस औरत को मैं खोता रहा, वो तुम थीं। मैं टूटने से नहीं डरता, किआरा। मैं बस अधूरा रहने से डरता हूँ।"
और उस उगते सूरज के नीचे, बावड़ी के ठंडे पत्थर पर, दोनों के होंठ मिले, धीरे, जैसे कोई पुराना घाव अपने आप को याद कर रहा हो। उस चुंबन में सौ साल की तड़प थी, और उसके ठीक नीचे, एक आने वाली रात का पूरा मातम। वो प्यार करते हुए भी रो रहे थे।
और जब वो अलग हुए, तो अलग नहीं हुए। माथे से माथा टिकाए, आँखें बंद किए, वो बस एक-दूसरे की साँस को थामे बैठे रहे, जैसे उस एक पल को जितना खींच सकें, खींच लेना चाहते हों।
"एक बात बताओ। अगर वो रात कभी न आती। अगर कोई मुहर न होती, कोई मणि न होती, कोई तक्षक न होता। बस तुम और मैं, और एक साधारण ज़िंदगी। तो तुम क्या चाहतीं? सच बताना।"
"कुछ बहुत छोटा सा। कोई महल नहीं, कोई ताक़त नहीं। बस एक छोटा सा घर, इसी रेगिस्तान के किसी कोने में। सुबह मनोहर काका की बनाई कड़क चाय। तुम्हारे साथ बूढ़ा होना, शिवांश। मेरे बालों में सफ़ेदी। तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियाँ। और एक दिन, एक ही दिन, साथ-साथ थक कर सो जाना, और न उठना।"
"पर यही एक चीज़ है जो एक नागिन को कभी नहीं मिलती। मैं जहान को अमरता देती हूँ, अपने ज़हर से, अपने वरदान से। पर मेरे अपने हिस्से में सिर्फ़ न ख़त्म होने वाला वक़्त है। मुझे बूढ़ा होना नसीब नहीं। मुझे तुम्हारे साथ थकना नसीब नहीं। और यही, शिवांश, यही मेरी सबसे बड़ी हसरत है।"
और शिवांश ने सोचा, कितनी अजीब बात है। एक अमर नागिन, जो पहाड़ चीर सकती है, जो रेगिस्तान से साँप बुला सकती है, जो सौ साल से मौत को छू भी नहीं पाई, उसकी सबसे बड़ी हसरत बस इतनी है, कि वो एक दिन बूढ़ी होकर, किसी के बग़ल में, चैन से मर सके।
"मुझे एक बात कहनी है तुमसे। कल रात, जब मुझे पता चला कि ये पत्थर सच में क्या है, कि इसके अंदर क्या क़ैद है... मुझे उसी पल समझ आ गया कि तुमने उस रात मणि क्यों चुनी थी। मेरी जान के बदले।"
"शिवांश..."
"मैं उस चुनाव से अब भी नफ़रत करता हूँ। पर मैं समझता हूँ। और मुझे उस समझ से भी नफ़रत है। क्योंकि जब तक मैं तुमसे नाराज़ रह सकता था, तब तक मैं मज़बूत था। नाराज़गी एक दीवार थी। अब वो दीवार गिर गई है, और उसके पीछे बस डर है। तुम्हें खोने का डर।"
और सौ साल पुराना वो ज़ख़्म, वो पूरी तरह भरा नहीं था। पर पहली बार, उसके किनारे जुड़ने लगे थे। शिवांश अब भी नहीं जानता था कि उस आख़िरी रात असल में क्या हुआ था। पर उसने किआरा को दोष देना छोड़ दिया था। और किआरा के लिए, सौ साल में, ये किसी माफ़ी से कम नहीं था।
"तुम्हें पता है, मुझे तुम्हारा गुस्सा भी क़ुबूल था? सौ साल किसी ने मुझसे इतना भी नहीं कहा कि तुमने ग़लत किया। सब बस डरते थे मुझसे। तुम्हारी नाराज़गी में कम से कम एक सच्चाई थी, जो मेरी थी। जो सिर्फ़ तुम्हारी थी।"
और अगर कहानी यहीं रुक जाती, तो शायद वो एक ख़ूबसूरत, टूटी हुई त्रासदी होती। दो प्रेमी, माथे से माथा टिकाए, एक तयशुदा मौत का इंतज़ार करते। पर शिवांश के अंदर कुछ था जो इस ख़ूबसूरत त्रासदी को क़ुबूल करने से इनकार कर रहा था।
"नहीं।"
"क्या नहीं?"
"ये अंत। मैं इसे क़ुबूल नहीं करूँगा। भैरवी ने कहा कि इस मुहर को बाँधने का एक ही रास्ता है, तुम्हारी जान। पर मैं सारी उम्र ज़मीन खोदता आया हूँ, किआरा। और मैंने एक बात सीखी है। हर बंद दरवाज़े के पीछे एक और रास्ता होता है, बस उसे किसी ने अभी तक खोदा नहीं होता।"
"ये कोई खुदाई नहीं है, शिवांश। ये सौ पीढ़ियों का बंधन है। भैरवी झूठ नहीं बोलतीं। अगर कोई और रास्ता होता, तो मेरे पुरखे उसे सौ साल पहले ढूँढ चुके होते।"
"या शायद वो रास्ता किसी किताब में नहीं, किसी याद में दबा है। सोचो, किआरा। उस आख़िरी रात, सौ साल पहले, जब मुहर आधी बँध कर रह गई... उस रात जो हुआ, उसका सबसे सच्चा गवाह कौन है? किताबें नहीं। भैरवी भी नहीं, जो शायद बाहर खड़ी थीं। वो गवाह मैं हूँ। पृथ्वी। मैं वहाँ था। मैं उस रात के बीचोंबीच था।"
"सारी उम्र मुझे एक ही सपना आता रहा, किआरा। आग। एक चमकता हुआ पत्थर। एक औरत का चेहरा, तुम्हारा चेहरा, मेरे ऊपर झुका हुआ। और मेरा अपना हाथ, किसी की तरफ़ बढ़ता हुआ। और हर बार, ठीक अंत से पहले, मैं जाग जाता था, पसीने में डूबा, चीख़ता हुआ। मैंने सारी ज़िंदगी उस दरवाज़े को बंद रखा। अब मुझे उसे खोलना है। पूरा।"
"तुम नहीं जानते उस दरवाज़े के पीछे क्या है। मैंने तुम्हें उस आग में जलते देखा है, शिवांश। वो सपना जो तुम्हें अधूरा आता है, वो मुझे सौ साल से पूरा आता है। और उसका अंत... उसका अंत रहम नहीं करता।"
और शिवांश की आँखों में वो पुरानी चमक लौट आई, वही चमक जो किसी दबे शहर के नक़्शे के आगे आती थी। पर इस बार जो ज़मीन उसे खोदनी थी, वो रेगिस्तान में नहीं थी। वो उसके अपने अंदर थी। उसकी अपनी सबसे गहरी, सबसे डरावनी याद में।
"नहीं। उस रात में मत जाओ, शिवांश। तुम नहीं जानते वो याद कैसी है। मैं जानती हूँ। मैंने उसे सौ साल जिया है। वो याद तुम्हें बचाएगी नहीं, तुम्हें तोड़ देगी। तुम अपनी ही मौत को दोबारा जियोगे। कोई इंसान उतना दर्द दोबारा नहीं सह सकता।"
"हो सकता है वो याद मुझे तोड़ दे। पर हो सकता है वो याद तुम्हें बचा ले। और उन दोनों में से, मैं दूसरा चुनूँगा। हर बार। सौ बार।"
और किआरा ने उसकी आँखों में देखा, और समझ गई कि इस आदमी को रोकना नामुमकिन है। यही तो पृथ्वी था। वही ज़िद, वही बेवक़ूफ़ी भरी बहादुरी, जो सौ साल पहले उसे उस वेदी तक ले गई थी। वो बदला नहीं था। नए चेहरे में भी, वही रूह थी।
"अगर तुम उस अँधेरे में उतरे, और वापस न लौटे... तो मैं तुम्हें खोने से पहले ही खो दूँगी। मत जाओ। कम से कम अभी नहीं। हमारे पास जो थोड़े दिन बचे हैं, उन्हें ऐसे मत जलाओ।"
"अगर मैं वो रास्ता ढूँढ लूँ, किआरा, तो हमारे पास थोड़े दिन नहीं, पूरी उम्र होगी। और उस एक उम्मीद के लिए, मैं किसी भी अँधेरे में उतर सकता हूँ। तुम बस मुझ पर भरोसा रखो। जैसे मैंने कल तुम पर रखा था।"
और उस रात, जब कैंप सो गया, जब नागमणि की वो नीली धड़कन अँधेरे में और गहरी हो गई, शिवांश अपने तंबू में अकेला बैठा था। उसके सामने कोई नक़्शा नहीं था, कोई मशीन नहीं थी। सिर्फ़ एक बुझती हुई लालटेन थी, और उसकी अपनी बंद आँखें।
उसने एक लंबी साँस ली, और जिस याद से वो सारी उम्र भागता आया था, उस सपने से, जिसमें वो हर बार एक औरत को खोता था, उस मौत से जो उसके ख़ून में लिखी थी, उसकी तरफ़ पहली बार, अपने पैरों पर, चलना शुरू किया। सौ साल पहले की वो आख़िरी रात। नागमणि की वो रात, जिसमें पृथ्वी मरा था। शिवांश ने अपनी ही मौत का दरवाज़ा खटखटाया, एक ऐसे रास्ते की तलाश में जिसके होने से भैरवी ने साफ़ इनकार कर दिया था।
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