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Chapter 4 of 27 10 min read

पुरानी दीवारें

नागमणि की रात by Avni Oberoi

लैंप की लौ काँपी, और नव्या की नज़र सीधे किआरा के जलते हुए चेहरे पर पड़ी। एक पल। सोने जैसी वो चमक। और फिर किआरा ने वो किया जो उसने सौ साल में हज़ार बार किया था, ख़ुद को छिपाना।

"आह! रेत चली गई आँख में। इस लैंप की रोशनी में तो कुछ दिखता ही नहीं, मैडम। आप लोग सारा दिन इन्हीं में आँखें फोड़ते हैं, हैरानी है अंधे नहीं हो जाते।"

"रेत। तुम्हारी आँखें अभी... छोड़ो। शायद लौ का धोखा था।"

नव्या ने बात छोड़ दी, पर भुलाई नहीं। वैज्ञानिक ऐसे ही होते हैं। वो जवाब को सुविधा के लिए मान लेते हैं, और सवाल को किसी अलमारी में बंद कर देते हैं, इस इंतज़ार में कि एक दिन दूसरा सबूत आएगा।

"छोड़ो आँखें-वाँखें! ये देखो! ये सुरंग सीधे मंदिर के केंद्र की तरफ़ जाती है। कल से हम यहीं खोदेंगे। किआरा, तुम आगे रहोगी, तुम्हें रास्ता पता है।"

और किआरा के पेट में एक गाँठ पड़ गई। सुरंग मिल चुकी थी। बंजर टीले का खेल ख़त्म। अब उसे इस सुरंग को धीमा करना था, और तेज़ी से।

"रास्ता पता है, साहब, इसीलिए कह रही हूँ। ये सुरंग जितनी सीधी दिखती है, उतनी है नहीं। इसकी छत सौ साल पुरानी है, और एक भी ग़लत पत्थर हटा, तो पूरी छत बैठ जाएगी, आपके सारे आदमियों के ऊपर। जल्दी खोदेंगे, तो लाशें गिनेंगे। धीरे खोदेंगे, तो शायद ज़िंदा पहुँचेंगे।"

"तुम्हें पता है मैं कितने साल से इस पल का इंतज़ार कर रहा हूँ? और तुम कह रही हो धीरे?"

"मैं कह रही हूँ ज़िंदा। साहब, जो पत्थर सौ साल से इंतज़ार कर रहा है, वो कुछ हफ़्ते और इंतज़ार कर लेगा। पर आपके आदमी नहीं करेंगे, अगर वो मलबे के नीचे दब गए।"

और फिर से, उसका सबसे तेज़ हथियार, सच में लिपटा झूठ। सुरंग की छत सचमुच कमज़ोर थी। पर किआरा को मज़दूरों की जान की परवाह नहीं थी। उसे बस हर वो दिन चाहिए था जो वो चुरा सके, नागमणि की रात तक।

"ठीक है। धीरे। पर हर दिन एक क़दम आगे, किआरा। एक क़दम। तुमने मुझे रोका, तो मुझे पता चल जाएगा।"

अगली सुबह वो दोनों सुरंग के मुहाने पर झुके थे, जहाँ रेत हटाने पर एक आधी दबी लिखाई निकली थी। पत्थर पर खुदे प्राचीन अक्षर, इतने पुराने कि दुनिया की कोई किताब उन्हें नहीं जानती थी।

"ये लिपि... ये किसी ज्ञात भाषा से नहीं मिलती। सिंधु से भी पुरानी लगती है। मुझे इसे कैंप ले जाकर, अक्षर-दर-अक्षर मिलाना होगा। हफ़्तों लगेंगे इसे पढ़ने में..."

और यहीं किआरा से एक ग़लती हुई। दिल की ग़लती। क्योंकि वो लिखाई उसके लिए हफ़्तों का काम नहीं थी। वो उसकी अपनी ज़बान थी। और उसे पढ़ते हुए, उसकी आवाज़ अपने आप निकल गई, धीमी, गहरी, सौ साल पुरानी।

"जो प्रेम करता है, वही पहरा दे सकता है। क्योंकि पहरा डर से नहीं, प्रेम से मज़बूत होता है। यहाँ सोई है वो ज्योति जो अँधेरे को बाँधे रखती है, और उसका पहरेदार वही, जो उसके लिए मरना जानता हो।"

और फिर एक भयानक ख़ामोशी। किआरा को अपनी ग़लती का एहसास तब हुआ जब उसने शिवांश का चेहरा देखा।

"तुमने... तुमने अभी इसे पढ़ा। बिना रुके। जैसे... जैसे ये तुम्हारी अपनी ज़बान हो। किआरा, इस लिपि को दुनिया में कोई नहीं पढ़ सकता। कोई नहीं। फिर तुमने कैसे?"

"मैं... मेरी दादी। वो पुजारन थीं। बचपन में ये कहानियाँ सुनाती थीं, इसी लय में। मैंने सिर्फ़ याद से बोला, साहब, पढ़ा नहीं। तुक मिला दी। बस।"

"तुक नहीं थी वो, किआरा। वो अर्थ था। पूरा, साफ़ अर्थ। तुमने कहा, पहरा प्रेम से मज़बूत होता है, डर से नहीं। मैं बारह साल से पत्थर पढ़ रहा हूँ, और मैंने कभी किसी को ऐसी लिपि यूँ बोलते नहीं सुना, जैसे वो उसे रो रहा हो।"

"आप बहुत कुछ पढ़ लेते हैं मुझमें, साहब, जो है ही नहीं। मैं एक गाइड हूँ। आप वैज्ञानिक। रहने दीजिए इन बातों को। खुदाई पर ध्यान दीजिए, वरना ठाकुर जैसे लोग आपसे आगे निकल जाएँगे।"

पर शिवांश की नज़र उस पर से नहीं हटी। जितना वो इस लड़की को समझने की कोशिश करता, उतना ही एक अजीब सा एहसास उसे घेरता, जैसे उसका कोई हिस्सा, कोई बहुत गहरा, बहुत पुराना हिस्सा, इस चेहरे को पहले से जानता हो। और वही हिस्सा उसे बार बार इसकी तरफ़ खींच रहा था, उसके तर्क के ख़िलाफ़।

"तुम सही कह रही हो। मुझे ध्यान खुदाई पर देना चाहिए। पर पता है क्या अजीब है? जब से तुम इस कैंप में आई हो, मुझे वो पुराना सपना नहीं आया। पहली बार, सौ रातों में। जैसे जिसे मैं ढूँढ रहा था, वो सपने से निकल कर सामने आ गया हो।"

और किआरा को वहाँ से हटना पड़ा, क्योंकि अगर वो एक पल और रुकती, तो उसकी आँखें उसे धोखा दे देतीं। सौ साल की तपस्या एक वाक्य से डगमगा गई थी। जिसे वो ढूँढ रहा था, वो सचमुच सामने खड़ी थी। पर उसका काम उसे मिलना नहीं, उससे बचाना था। ख़ुद से भी, और उस मणि से भी।

शिवांश ने कुछ नहीं कहा। पर उसकी आँखें उस गाइड पर टिकी रहीं जो एक मरी हुई ज़बान को माँ-बोली की तरह बोल गई थी। उसका विज्ञान इसका कोई जवाब नहीं दे सकता था। और उसके भीतर की वो पुरानी रूह, जो कुछ भी याद नहीं रखती थी, फिर भी काँप उठी।

दोपहर में मज़दूरों ने सुरंग की एक दीवार से रेत हटाई, और जो निकला उसने सबको चुप कर दिया। पत्थर में खुदी एक तस्वीर। एक नागिन, और उसके साथ एक जवान पहरेदार। दोनों आमने-सामने। दोनों के हाथ एक दूसरे की तरफ़ बढ़े हुए।

"देखो इनके चेहरे। कितने... जीवित हैं। जैसे कारीगर ने इन्हें सचमुच जाना हो। ये औरत... इसका चेहरा... मुझे क्यों लग रहा है जैसे मैं इसे..."

शिवांश उस तस्वीर के सामने रुक गया, और उसकी आँखें, बिना किसी वजह के, भर आईं। एक अजनबी नागिन और एक अजनबी पहरेदार के लिए, पत्थर में जमे दो चेहरों के लिए, उसे एक ऐसा ग़म घेर गया जिसका कोई सिरा उसे नहीं मिल रहा था।

"पता नहीं मुझे क्या हुआ। बस थकान होगी। पर किआरा, सच बताऊँ, इन दोनों को देख कर मुझे ऐसा लगा जैसे... जैसे कोई बहुत पुराना ज़ख़्म खुल गया हो। जो मेरा है ही नहीं।"

और किआरा उस तस्वीर के सामने खड़ी थी, उन्हीं दो चेहरों को देखते हुए, जो कभी उसका और पृथ्वी का था। उसका पहरेदार, आज फिर उसके बगल में, अपनी ही मौत की तस्वीर के सामने रोता हुआ, और ये नहीं जानता हुआ कि वो पत्थर वाला आदमी वो ख़ुद था।

"कुछ ज़ख़्म हवा में तैरते हैं, साहब। एक जगह से दूसरी जगह। एक जनम से दूसरे जनम। शायद ये उनका ग़म था, जो आपको छू गया।"

उस शाम, जब शिवांश तस्वीर के नक़्शे बनाने में डूब गया, मनोहर किआरा को एक तरफ़ ले गया। उसकी हमेशा की हँसी आज ग़ायब थी।

"बिटिया, एक बात कान खोल के सुन। तू नागों से, श्रापों से मत डर। इस गाँव का असली ख़तरा ज़मीन के नीचे नहीं रहता। वो ऊपर रहता है, हवेली में, इंसान की खाल में। और मुझे लगता है वो जल्द ही आने वाला है।"

"कौन, काका?"

"ठाकुर करमवीर सिंह। सरपगढ़ का मालिक। उसका पूरा ख़ानदान सौ साल से इस मंदिर के ख़ज़ाने के पीछे है। उसके दादा, उसके परदादा, सब इसी लालच में मरे। और अब वो। जिस दिन उसे पता चला कि तुम लोगों को कुछ मिलने वाला है, वो गिद्ध की तरह मँडराने आ जाएगा।"

करमवीर। ये नाम किआरा के लिए नया नहीं था। इसी ख़ानदान के लोग सौ साल से मणि के लिए हाथ-पैर मारते रहे थे, और वो हर बार उन्हें ख़ाली हाथ लौटाती रही थी। पर मनोहर ठीक कहता था। असली ख़तरा हमेशा वही होता है जो इंसान जैसा दिखे।

और जैसे मनोहर के शब्दों ने ही उसे बुला लिया हो, कैंप के मुहाने पर धूल का एक बादल उठा। एक चमचमाती सफ़ेद गाड़ी रुकी, और उसमें से एक आदमी उतरा, ऊँचा, चौड़ी मूँछों वाला, रेशमी बंडी पहने, उँगलियों में मोटी अँगूठियाँ।

"अरे वाह वाह वाह! तो ये हैं दिल्ली से आए हमारे मेहमान! शिवांश साहब! सरपगढ़ में आपका स्वागत है! मैं करमवीर सिंह, इस गाँव का सेवक। और सुनिए, आप जिस ज़मीन पर खड़े हैं ना, वो मेरे बाप-दादा की है। तो समझ लीजिए, आप मेरे घर के मेहमान हैं।"

"शुक्रिया, ठाकुर साहब। पर ये खुदाई सरकारी है, भारत सरकार के परमिट से। ज़मीन किसी की भी हो, जो मिलेगा वो राष्ट्र की धरोहर होगी।"

"बिलकुल! बिलकुल राष्ट्र की! मैं तो बस मदद के लिए हूँ। आदमी चाहिए, पानी चाहिए, सुरक्षा चाहिए, करमवीर सिंह हाज़िर है। आख़िर सौ साल से मेरा ख़ानदान इस मंदिर की रखवाली कर रहा है। अब आप निकालिए, हम... हम बस देखेंगे।"

और उसकी उस चौड़ी मुस्कान के पीछे, सुनने वाले साफ़ देख सकते थे उसका असली इरादा। इन बाहरी लोगों को पत्थर ढूँढने दो। मशीनों से, पसीने से, वो मणि तक पहुँचें। और फिर, ऐन उस वक़्त, करमवीर सिंह अपना हाथ बढ़ाएगा, और सौ साल की भूख एक ही रात में मिटा लेगा।

"और ये कौन है? गाँव की लगती हो, पर मैंने तुम्हें पहले नहीं देखा। सरपगढ़ में कोई ऐसा नहीं जिसे करमवीर सिंह न जानता हो।"

"मैं मामूली गाइड हूँ, ठाकुर साहब। कल आई, कल चली जाऊँगी। मुझे कौन जानेगा।"

"हूँ। मामूली। साहब, एक सलाह दूँ? बाहरी गाइड पर भरोसा मत करना। ये रेगिस्तान के लोग होते हैं ना, ऊपर से मीठे, अंदर से रेत जैसे फिसलन भरे। कल को कुछ मिल गया, और ये किसी और को बता आई, तो? मेरे आदमी रखो अपने साथ। भरोसेमंद हैं।"

"मेरी टीम मैं चुनता हूँ, ठाकुर साहब। और किआरा ने अब तक जो बताया, सब सही निकला। मुझे उस पर भरोसा है।"

और उन तीन शब्दों ने, मुझे उस पर भरोसा है, किआरा के भीतर एक अजीब सी हरारत भर दी। सौ साल में किसी ने उस पर भरोसा नहीं किया था, क्योंकि सौ साल में किसी ने उसे जाना ही नहीं था। और अब जिस आदमी को धोखा देना उसका फ़र्ज़ था, वही उसकी ढाल बन कर खड़ा था।

"अरे भरोसा तो अच्छी बात है, साहब, अच्छी बात है! बस इतना याद रखिएगा। इस मंदिर ने आज तक जिसने भी इसका पत्थर छीनना चाहा, उसे कुछ न कुछ चुकाना पड़ा। और मैं नहीं चाहता कि इतने अच्छे मेहमान को कोई क़ीमत चुकानी पड़े। समझ रहे हैं ना?"

गाड़ी की धूल उड़ी और करमवीर चला गया, पर उसकी धमकी हवा में टँगी रह गई। किआरा की नीची पलकों के पीछे, नागिन ने अपने नए दुश्मन को तौल लिया। लालची। बेरहम। और सबसे ख़तरनाक, धैर्यवान। बिलकुल एक और शिकारी की तरह, जिसे वो सौ साल से जानती थी।

इस मंदिर के लिए अब तीन ताक़तें आमने-सामने थीं। एक इच्छाधारी नागिन, जो मणि को बचाना चाहती थी। एक पुरातत्वविद्, जो उसे निकालना चाहता था। और एक इंसानी गिद्ध, जो उसे हड़पना चाहता था।

और इन तीनों को नहीं पता था कि अँधेरे में एक चौथा भी था, जो सबसे पुराना और सबसे भूखा था, और जो अब बहुत क़रीब आ चुका था।

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