DesiHub

Chapter 27 of 27 12 min read

फिर वही सुबह

नागमणि की रात by Avni Oberoi

सरपगढ़ के आसमान पर सुबह की पहली लकीर फूट रही थी, नरम और गुलाबी, जैसे सौ साल बाद कोई ज़ख़्म आख़िरकार भरने को हो। पर उस तहख़ाने के अँधेरे में, वेदी के सहारे बैठे शिवांश की गोद में, किआरा की चाँदी अब भी बूँद-बूँद बुझती जा रही थी।

"नहीं। किआरा, मेरी तरफ़ देखो। हमने जीत लिया, सुना तुमने? तक्षक चला गया, मुहर बंद हो गई, बाहर सुबह हो रही है। ... अब तुम्हें रुकना है। मेरे साथ। तुम कहीं नहीं जाओगी।"

"शिवांश... इतनी घबराओ मत। सौ साल मैंने एक ठंडे पत्थर पर, अकेले पहरा दिया। और आज मैं तुम्हारी बाँहों में हूँ। ये मौत नहीं है, ये तो रिहाई है। मुझे इस बार मुस्कुराते हुए जाने दो।"

पर भैरवी, जो सबसे पुराना क़ानून जानती थी, वहीं घुटनों के बल बैठ गई और उसने किआरा के बुझते चेहरे को अपनी हथेलियों में थाम लिया। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, एक तेज़ चमक थी, जैसे कोई भूला हुआ पन्ना अचानक याद आ गया हो।

"रुको। दोनों रुको। ये पत्थर एक जान माँगता है, ये सच है। तुम दोनों ने साथ देकर उस क़ीमत को आधा कर दिया, पर आधी अमरता भी सदियों की होती है, इसीलिए ये अब भी किआरा की चाँदी को निचोड़ रहा है। पर एक बात है, जो ये पुराना तराज़ू आज तक किसी को करने नहीं देता।"

"क्या? बोलो, भैरवी। जो भी क़ीमत है, मैं दूँगा। मेरी जान, मेरे साल, मेरा लहू, जो माँगो। बस उसे मत ले जाओ।"

"सुन, पृथ्वी। ये पत्थर एक मौत नहीं माँगता। एक जान माँगता है। और जान का मतलब हमेशा मरना नहीं होता। तुम दोनों एक ही आत्मा के दो टुकड़े हो, एक सदी के आर-पार बँधे हुए। अगर तू अपने इंसानी जीवन के बरस इस बंधन में उड़ेल दे, तो किआरा को अपनी हस्ती नहीं देनी पड़ेगी। सिर्फ़ अपनी अमरता देनी पड़ेगी।"

और उस एक लफ़्ज़ पर, शिवांश की साँस रुक गई। अमरता। किआरा की वो सदियों की अकेली, ठंडी, कभी न ख़त्म होने वाली उमर, जो असल में उसका सबसे बड़ा क़ैदख़ाना थी।

"समझ, किआरा। ये पत्थर तेरी अमरता को निगल लेगा, पूरी की पूरी। बदले में तू एक इंसान बन जाएगी। बूढ़ी होने वाली, थकने वाली, धड़कने वाली इंसान। और उस एक इंसानी जीवन को तुम दोनों बाँट लोगे, एक ही उमर, एक ही साँस, साथ। न कोई अकेला मरेगा, न कोई अकेला जिएगा। सौ साल जो तराज़ू किसी एक की मौत माँगता रहा, वो आज पहली बार दो ज़िंदगियों को एक में तौल देगा।"

"नहीं, शिवांश। अपने बरस मत दो। तुम्हारी तो अभी पूरी ज़िंदगी बाक़ी है। मैं सौ साल जी चुकी हूँ, मेरा जाना कोई नुक़सान नहीं। तुम अपनी उमर मुझ पर मत लुटाओ।"

"किआरा, सुनो। सौ साल पहले तुम्हारे सामने एक तराज़ू रखा गया था, मणि या मैं, और उस चुनाव ने तुम्हें एक सदी तक जलाया। आज मेरे सामने वही तराज़ू है, और मैं वो ग़लती नहीं दोहराऊँगा। मुझे सौ अकेले साल नहीं चाहिए। मुझे तुम्हारे साथ एक इंसानी उमर चाहिए, चाहे वो छोटी हो।"

"पर तुम्हारी उमर आधी हो जाएगी, शिवांश। जो तुम्हारा अकेले का था, वो अब बँट जाएगा। ये सौदा तुम्हारे हक़ में नहीं है।"

"आधी उमर तुम्हारे साथ, या पूरी उमर तुम्हारे बिना। ये कोई मुश्किल हिसाब नहीं है, किआरा। मैं हर बार आधी चुनूँगा। हर जनम में।"

और भैरवी ने आख़िरी बार चेताया, कि ये रास्ता एक बार खुला तो फिर बंद नहीं होगा, कि इंसानी उमर लौटाई नहीं जा सकती, कि ये फ़ैसला किसी डर से नहीं, सिर्फ़ पूरी मर्ज़ी से लिया जा सकता है।

"फिर मैं अपनी मर्ज़ी से चुनती हूँ, भैरवी। सौ साल मैंने कभी न मरने की सज़ा काटी है। आज मुझे बस एक बार जीना है, ठीक से, इसके साथ। मुझे अपनी अमरता नहीं चाहिए। मुझे बस ये एक ज़िंदगी चाहिए।"

और फिर, दूसरी बार उस रात, दो जुड़े हुए हाथ उस गर्म पत्थर पर उठे। पर इस बार वो मरने के लिए नहीं थे। इस बार वो जीने के लिए थे।

"मैं, पृथ्वी, अपने इंसानी जीवन के सारे बरस इस बंधन में देता हूँ। इन्हें बाँट दो, आधे इसके, आधे मेरे। मुझे अलग एक लंबी उमर नहीं चाहिए। मुझे बस एक साझा उमर चाहिए, इसके साथ।"

"और मैं, किआरा, इस वंश की आख़िरी नागिन, अपनी अमरता, अपनी वो सदियों की अकेली उमर, अपनी ख़ुशी से इस पत्थर को लौटाती हूँ। इसे रख ले। मुझे अब हमेशा नहीं जीना। मुझे बस एक इंसान की तरह जीना है, और फिर एक इंसान की तरह चले जाना है, इसके साथ।"

और नागमणि, जो अब तक किआरा की चाँदी को घूँट-घूँट पी रही थी, अचानक ठहर गई, जैसे उसे उसका असली मोल मिल गया हो। एक जान की जगह, एक अमरता। और वो सुनहरी रोशनी किआरा की देह में उलटी बहने लगी, उसका बहता लहू रोकती हुई।

और शिवांश ने अपनी आँखों के सामने वो चमत्कार होते देखा। किआरा के घाव से बहती चाँदी धीरे-धीरे गाढ़ी होने लगी, गरम होने लगी, लाल होने लगी। इंसानी लहू। उसकी कलाई पर सदियों के पहरे का वो पुराना चाँदी-सा निशान मद्धम पड़ गया, और उसकी जगह एक साधारण, गरम नब्ज़ धड़कने लगी।

"शिवांश... रुको... ये क्या है? मेरे सीने में... कुछ धड़क रहा है। तेज़, और गरम, और... ज़रा डरा हुआ सा। ... ये धड़कन है ना? सौ साल में पहली बार, मेरे अंदर एक दिल धड़क रहा है।"

"हाँ, किआरा। ये तुम्हारा दिल है। एक इंसानी दिल। ... और अब ये मेरे साथ धड़केगा, जब तक धड़केगा। न ज़्यादा, न कम। बस हमारे बराबर।"

"अब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी, शिवांश। मेरे बाल सफ़ेद होंगे, मेरे हाथ काँपेंगे। सौ साल में पहली बार, मैं वक़्त के साथ बहूँगी, रुकी नहीं रहूँगी। ... और ये सोचकर मुझे डर नहीं लग रहा। बस अच्छा लग रहा है।"

"मैं तुम्हारे हर सफ़ेद बाल का इंतज़ार करूँगा, किआरा। तुम्हारे चेहरे की हर लकीर का। जो औरत सौ साल एक ही उम्र पर रुकी रही, मैं उसे तुम्हारे साथ धीरे-धीरे बूढ़ा होते देखूँगा। इससे ख़ूबसूरत मेरे लिए कुछ नहीं होगा।"

"हो गया। सौ साल में पहली बार, इस पत्थर ने किसी को मारा नहीं। उसने किसी को इंसान बना दिया। तराज़ू टूट गया, बच्चों। आज न फ़र्ज़ जीता, न मौत। आज सिर्फ़ प्यार जीता, और उसने दोनों को ज़िंदा रख लिया।"

और तभी, सेहन के उस कोने से एक टूटी हुई आवाज़ आई, जहाँ बूढ़ा ठाकुर करमवीर पत्थर की दीवार के सहारे पड़ा था, अपनी आख़िरी साँसें गिनता हुआ। तक्षक की चोट उसकी हड्डियों में बहुत गहरी उतर चुकी थी।

"बच गए... तुम दोनों बच गए... और ये दुनिया भी। देखा मनोहर, इस बूढ़े ने आख़िर में एक ठीक काम कर ही दिया। ... शिवांश बेटा, मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं। पास आ। एक आख़िरी बात सुन ले।"

और शिवांश किआरा को धीरे से एक तरफ़ बिठाकर उस बूढ़े के पास घुटनों के बल बैठ गया। करमवीर ने अपनी काँपती उँगली से अपनी वो अँगूठी उतारी, जिस पर उसके ख़ानदान की सदियों पुरानी मुहर खुदी थी, और उसे शिवांश की हथेली में दबा दिया।

"ये मंदिर, ये ज़मीन, मेरी हवेली, सब... सब सरपगढ़ के नाम कर देना। मेरे ख़ानदान ने पीढ़ियों इस गाँव से छीना, इस पत्थर के लालच में। आज वो लालच मेरे साथ ख़त्म हो जाएगा। गाँव को उसका मंदिर लौटा दो, बेटा। और उस दीवार पर मेरा नाम मत लिखवाना... बस इतना लिख देना, कि एक लालची आदमी आख़िर में बदल गया था।"

और उस बूढ़े ठाकुर की आँखें, जिनमें पूरी उम्र सिर्फ़ लालच और डर तैरता रहा था, आख़िरी बार एक अजीब से चैन से भर गईं, और फिर धीरे से मुँद गईं। सरपगढ़ पर पीढ़ियों से पड़ा उस ख़ानदान के लालच का साया, उस एक आख़िरी नेक साँस के साथ, हमेशा के लिए मिट गया।

और जब वो सब उस अँधेरे तहख़ाने से बाहर निकले, तो सरपगढ़ के ऊपर पूरी सुबह फैल चुकी थी, सुनहरी और साफ़। और सुरंग के मुँह पर, अपनी टूटी पसलियों को थामे, मनोहर उन्हें ढूँढती नज़रों से खड़ा था, और उसके पास नव्या।

"आ गई! मेरी बिटिया आ गई! अरे मैं तो कब से नव्या बिटिया को कह रहा था, कि मेरी किआरा को कुछ नहीं हो सकता, ये तो शेरनी है... अच्छा, शेरनी नहीं। नागिन है। ... हाँ हाँ, मुझे पता है! सौ साल पुरानी नागिन! तो क्या हुआ? नागिन भी तो किसी की बेटी होती है!"

और वहीं, उस एक वाक्य में, मनोहर ने वो कह दिया जो किआरा सौ साल से सुनना चाहती थी। कि उसका सच जानकर भी कोई उसे अपना कह सकता है। किआरा उस मोटे, घायल आदमी से लिपट गई, और पहली बार, उसकी इंसानी आँखों से सचमुच के, गरम, इंसानी आँसू बहे।

"सौ साल से मेरा कोई नहीं था, मनोहर काका। कोई घर नहीं, कोई अपना नहीं। और तुमने मुझे पहले ही दिन बेटी कह दिया, बिना कुछ जाने। ... आज मैं इंसान बनी हूँ, पर सच कहूँ, तुमने मुझे उसी दिन इंसान बना दिया था, जिस दिन तुमने मुझे अपनी बिटिया कहा।"

"अरे अरे, बस बस, रोना-वोना बंद! अब तू इंसान बन गई है ना, तो अब कायदे से एक ही काम बचा है। शादी! पूरे सरपगढ़ की शादी! और खाना मैं बनाऊँगा, इसमें कोई बहस नहीं। एक नागिन के ब्याह का खाना, हैं? ये गाँव सौ साल याद रखेगा!"

"मनोहर काका, अभी तो मैंने पूछा भी नहीं। ... पर अगर आप ही तय कर रहे हैं, तो मुझे मंज़ूर है। सौ साल जिसका इंतज़ार किया, उसके लिए एक शादी का इंतज़ार तो कर ही सकता हूँ। बस इस बार, इंतज़ार छोटा रखना।"

और नव्या, वो नव्या जो सारी उम्र सिर्फ़ नाप-तौल और सबूत पर यक़ीन करती आई थी, चुपचाप सब देखती रही। उसने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खोज अपनी आँखों से देखी थी, एक सदी पुरानी नागिन, एक जागती दिव्य मणि, एक पुनर्जन्म। और उसने वहीं, उसी वक़्त, एक फ़ैसला किया।

कि उसकी ये खोज कभी किसी रिपोर्ट में नहीं लिखी जाएगी, कभी किसी जर्नल में नहीं छपेगी। कुछ सच सबूत के लिए नहीं होते। कुछ सच सिर्फ़ सँभालने के लिए होते हैं। उसने अपनी मोटी फ़ील्ड-डायरी चुपचाप बंद की, और मुस्कुराकर बस इतना तय किया, कि इस खुदाई की सरकारी रिपोर्ट में सिर्फ़ तीन लफ़्ज़ जाएँगे। कुछ नहीं मिला।

और फिर भैरवी उनके पास आई, अपने उसी शांत, चाँदी जैसे तेज के साथ। उसने किआरा के माथे पर हाथ रखा, उस माथे पर जो अब सदियों का नहीं, बस एक इंसानी उमर का था।

"किआरा, आज से तेरा पहरा ख़त्म। सौ साल तूने वो क़सम निभाई जो तेरी उमर से भी भारी थी। अब वो बोझ मेरा, और मेरे बाद इस वंश का। तू जा, और जी अपनी वो एक ज़िंदगी, जो तूने सौ साल पहले खो दी थी। और इस बार, बिना किसी अपराधबोध के। तूने कभी पृथ्वी को नहीं छोड़ा था, बेटी। ये पत्थर आज उसका गवाह है।"

"सौ साल मैं उस एक रात में अटकी रही, भैरवी। उस एक पल में, जब मैंने सोचा कि मैंने फ़र्ज़ को प्यार पर चुना। पर आज मैंने वो नहीं चुना जो सौ साल पहले चुना था। आज मैंने दोनों चुने, ये दुनिया भी, और ये आदमी भी। और शायद... शायद असली मुहर तो आज बंद हुई है, यहाँ, मेरे अंदर।"

"जो रात सौ साल पहले अधूरी रह गई थी, किआरा, वो आज पूरी हुई। तुमने अपना हाथ छुड़ाया नहीं। मैं मरा नहीं। और सुबह इस बार हम दोनों पर एक साथ उतरी है। फिर वही सुबह, पर इस बार अधूरी नहीं। पूरी।"

पर हर ख़त्म होती कहानी, किसी और कहानी की शुरुआत होती है। जिस पल सरपगढ़ की उस मणि पर एक नरम, सोई हुई चमक लौटी, ठीक उसी पल, यहाँ से कोसों दूर, किसी और रेगिस्तान के नीचे, किसी और भूले हुए तहख़ाने में, एक और पत्थर ने करवट ली।

"किआरा, एक बात याद रखना। नाग सिर्फ़ एक मणि की पहरेदारी नहीं करते। ये तो बस पहली थी। इस धरती के नीचे और भी मुहरें हैं, और भी क़ैद भूखें, और भी रातें, जो सौ-सौ साल में एक बार लौटती हैं। तक्षक अकेला हरकारा नहीं था। ... कहीं और, कोई और साया अभी-अभी जागना शुरू हुआ है।"

और उस दूसरे, दूर के तहख़ाने की गहरी काली दीवार पर, एक और नाग-निशान बहुत धीरे से सुलगा, जैसे कोई आँख सौ साल की नींद से अभी-अभी खुल रही हो। एक और मणि। एक और पहरा। एक और अधूरी कहानी, जो अपनी रात का इंतज़ार कर रही थी।

पर वो कहानी, किसी और रात की थी। आज की रात, सरपगढ़ की रात, आख़िरकार पूरी हो चुकी थी। जो कहानी सौ साल से अधूरी थी, जिसे एक नागिन एक ठंडी वेदी पर सौ बरस से थामे बैठी थी, उसे आख़िरकार उसकी सुबह मिल गई। नागमणि की वो रात, जो कभी ख़त्म ही नहीं होती थी, आख़िरकार एक सुबह में जा खुली। फिर वही सुबह। पर इस बार, दोनों के लिए।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.