DesiHub

Chapter 22 of 27 12 min read

नागपंचमी की साँझ

नागमणि की रात by Avni Oberoi

नागमणि की रात से ठीक एक शाम पहले। रेगिस्तान पर एक अजीब सी दोहरी हवा बह रही थी। एक तरफ़ मौत का इंतज़ार, दूसरी तरफ़ ज़िंदगी का जश्न। क्योंकि जिस रात को किआरा नागमणि की रात कहती थी, सरपगढ़ के लोग उसे एक और, कहीं मीठे नाम से जानते थे। नागपंचमी।

और उस शाम, पूरा गाँव सज गया। हर देहरी पर दूध का एक कटोरा, हर मोड़ पर गेंदे के फूलों की लड़ियाँ। बच्चे मिट्टी के साँप बना रहे थे, औरतें लोकगीत गा रही थीं, और बिलों के आगे दूध चढ़ाया जा रहा था, उन्हीं नागों के लिए जिन्हें ये लोग देवता मानते थे, ये जाने बिना कि उनका सबसे पुराना देवता आज उन्हीं के बीच, इंसानी रूप में, घूम रहा था।

"अरे भई, दूध यहाँ रखो, यहाँ! और गेंदे की माला मंदिर वाले कोने पर! छोटू, वो ढोल कहाँ है? नागपंचमी है आज, कोई मातम नहीं! नाग देवता ख़ुश होंगे तो पूरे साल दंश से बचाएँगे। चलो, चलो, हाथ चलाओ!"

और उन सबके बीच, सिर पर अब भी पट्टी बाँधे, एक हाथ में लाठी और दूसरे में दूध का कटोरा थामे, मनोहर एक सेनापति की तरह घूम रहा था। दो दिन पहले जो आदमी मौत के मुँह से लौटा था, वो आज पूरे गाँव को नचा रहा था।

"सुनो, सुनो! कहते हैं जब धरती बहुत नई थी, तो नागों ने एक बहुत बड़े अँधेरे को अपनी कुंडली में बाँध कर धरती के नीचे दबा दिया था। और तब से, हर नाग उस पहरे की निशानी है। इसीलिए हम उन्हें दूध पिलाते हैं, फूल चढ़ाते हैं। क्योंकि जो हमारी रक्षा करता है, उसका कर्ज़ हम दूध से चुकाते हैं। और जो लड़कियाँ नागपंचमी पर सच्चे मन से दूध चढ़ाती हैं, उन्हें मनचाहा वर मिलता है, हाँ!"

और उन दूध के कटोरों के बीच, गेंदे की महक में लिपटी, किआरा खड़ी थी। सौ साल पुरानी नागिन, नागपंचमी के जश्न के बीचोंबीच। मनोहर की कहानी सुनते हुए उसके होंठों पर एक हल्की, दर्द भरी मुस्कान आई। क्योंकि वो कहानी सच थी। और वो अँधेरा, कल रात, आज़ाद होने की कोशिश करने वाला था।

"कितनी अजीब बात है, शिवांश। ये लोग सौ पीढ़ियों से नागों को दूध चढ़ाते आए हैं, उस पहरे के लिए शुक्रिया कहते हुए, जिसका उन्हें असल में पता भी नहीं। और कल रात, वो पहरा टूटने की कगार पर होगा, और इन्हें ख़बर तक नहीं होगी। ये बस दूध चढ़ाएँगे, और सो जाएँगे।"

"शायद यही सबसे अच्छा है, किआरा। कि इन्हें ख़बर न हो। कि ये बच्चे मिट्टी के साँप बनाते रहें, ये औरतें गाती रहें, ये बूढ़े हँसते रहें। हम इसी के लिए तो लड़ रहे हैं ना? इसी बेख़बरी के लिए। इसी छोटी सी, ख़ूबसूरत, आम सी ज़िंदगी के लिए।"

और तभी, दूर से, मनोहर की पारखी नज़र उन दोनों पर पड़ी, एक-दूसरे के इतने पास खड़े, इतने डूबे हुए। और उसके घायल चेहरे पर एक शरारती मुस्कान फैल गई, वही पुरानी मुस्कान, जो दो दिन की चोट भी नहीं मिटा पाई थी।

"ओहो-हो! देखो, देखो! एक तरफ़ पूरा गाँव नाग देवता को दूध चढ़ा रहा है, और ये दोनों यहाँ एक-दूसरे को देखे जा रहे हैं, जैसे दुनिया में और कुछ है ही नहीं! अरे किसी ने इन दोनों को अभी तक दूध का कटोरा नहीं दिया? बिटिया के हाथ में कटोरा दो! आज इसे मनचाहा वर माँगना है!"

"काका! बस करो! सब सुन रहे हैं!"

"सुनने दो! मैं तेरा बाप हूँ, और बाप का हक़ है कि वो अपनी बिटिया की शादी की बात सरेआम करे! और तू, सहब। पुरातत्व-वुरातत्व बहुत हो गया। ज़मीन बहुत खोद ली। अब एक घर खोद, और मेरी बिटिया को उसमें बसा। समझा? नागपंचमी की रात है, आज नाग देवता के सामने वादा कर।"

"वादा तो मैं कर चुका हूँ, काका। सौ बार। बस आपकी बिटिया थोड़ी ज़िद्दी है, हर बार पीछे हट जाती है। पर इस बार मैं उसे हटने नहीं दूँगा। नाग देवता गवाह रहें।"

"सुना? सुना सबने? पंडित बुलाओ! नहीं, रुको, कल बुलाना, आज तो जश्न है! मेरी बिटिया का घर बसेगा। मैंने सोचा नहीं था कि ये बूढ़ी आँखें ये दिन भी देखेंगी।"

और गाँव वाले हँस पड़े, तालियाँ बजीं, किसी ने ढोल पर एक थाप दे दी। एक पल के लिए, उस जश्न में, वो चारों, किआरा, शिवांश, मनोहर, और दूर बैठा वो टूटा हुआ ठाकुर भी, एक परिवार लग रहे थे। और यही उस पल की सबसे बड़ी क्रूरता थी। क्योंकि उस परिवार के बीच बैठी लड़की जानती थी कि कल रात, वो इस मेज़ पर नहीं होगी।

"जा, बिटिया। दूध चढ़ा आ, बिल पर। और नाग देवता से कहना, इस बूढ़े बाप की बिटिया को लंबी उमर देना। सौ साल जीना तू। नाग देवता तेरी रक्षा करें।"

सौ साल जीना। किआरा ने वो लफ़्ज़ सुने, और उसका गला भर आया। सौ साल तो वो पहले ही जी चुकी थी। और अब, जब उसे पहली बार जीने की एक वजह मिली थी, उसके पास बस एक रात बची थी। उसने बस सिर हिलाया, मुस्कुराई, और मुड़ गई, ताकि मनोहर उसकी आँखों का पानी न देख ले।

और जब जश्न अपने पूरे शबाब पर था, जब ढोल की थाप और लोकगीत रात के आसमान में घुल रहे थे, दो साये चुपचाप उस भीड़ से निकल गए। पुरानी बावड़ी की तरफ़, जहाँ चाँद पानी पर काँप रहा था, और जहाँ सौ साल पहले उनका प्यार शुरू हुआ था, और ख़त्म भी।

"यहीं, है ना? इसी बावड़ी में। मेरी याद में ये सबसे साफ़ जगह है। यहीं मैंने तुम्हें पहली बार, इस जनम में नहीं, उस जनम में, प्यार किया था। और यहीं, इसी पानी में, वो सब पहली बार लौटा था।"

"हाँ। यहीं। पर तब हमारे बीच एक झूठ खड़ा था, शिवांश। एक ग़लतफ़हमी। एक ज़ख़्म। और अब... अब वो नहीं है। पहली बार, सौ साल में, जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो मेरे और तुम्हारे बीच कुछ नहीं है। ना कोई गुनाह, ना कोई शक, ना कोई माफ़ी की भीख। बस तुम, और मैं।"

"तो फिर आज मैं तुमसे वो कहना चाहता हूँ जो सौ साल पहले पृथ्वी कभी कह नहीं पाया, क्योंकि उसके पास वक़्त नहीं था। मैं तुम्हें चुनता हूँ, किआरा। किसी फ़र्ज़ की वजह से नहीं, किसी पुराने वादे की वजह से नहीं, किसी पिछले जनम की वजह से नहीं। इस जनम में, इस रात, इस पल, अपनी पूरी मर्ज़ी से, मैं तुम्हें चुनता हूँ।"

और सौ साल का वो सारा फ़ासला, वो सारी मौतें, वो सारी अधूरी रातें, उस एक जुमले में पिघल गईं। किआरा ने उसकी आँखों में देखा, और उसे वहाँ ना कोई पहरेदार दिखा, ना कोई नागिन, ना कोई तक़दीर। बस एक आदमी, जो उसे, बिना किसी शर्त के, चुन रहा था।

"और मैं तुम्हें चुनती हूँ, शिवांश। पूरी तरह। बिना किसी डर के। सौ साल मैंने ख़ुद को हर किसी से रोके रखा, क्योंकि प्यार का मतलब मेरे लिए बस खोना था। पर आज रात, मैं वो सब भूल जाना चाहती हूँ। आज रात, मैं सिर्फ़ तुम्हारी होना चाहती हूँ। बस एक रात, जिसमें कोई मणि नहीं, कोई तक्षक नहीं, कोई कल नहीं।"

"तो आज रात कोई कल नहीं। कोई मणि नहीं, कोई मुहर नहीं, कोई सौ साल पुराना ज़ख़्म नहीं। बस ये चाँद, ये पानी, और तुम। सिर्फ़ इतनी सी दुनिया मुझे चाहिए, किआरा। और कोई नहीं।"

"सिर्फ़ इतनी सी दुनिया। हाँ। बस आज रात के लिए, मुझे भी यही चाहिए।"

और उस काँपते चाँद के नीचे, बावड़ी के ठंडे पत्थरों पर, वो एक-दूसरे में सिमट गए। इस बार कोई याद बीच में नहीं टूटी, कोई तक्षक नहीं आया, कोई डर उन्हें अलग नहीं कर पाया। इस बार का चुंबन माफ़ी नहीं माँग रहा था, किसी अतीत का मातम नहीं कर रहा था। ये बस दो लोग थे, जो सौ साल की दूरी के बाद, आख़िरकार, बिना किसी बोझ के, एक हुए थे।

पर उस कोमलता के नीचे, उस चाँदनी के ठीक नीचे, दो राज़ दबे थे। क्योंकि प्यार में डूबे उन दोनों में से हर एक, अपने दिल में, एक ही फ़ैसला लिए बैठा था। कि कल रात, वो दूसरे को बचाने के लिए, ख़ुद वो क़ीमत चुका देगा। और दोनों ने ये फ़ैसला दूसरे से छुपा रखा था।

"किआरा। मुझ पर भरोसा है ना तुम्हें? कल रात, चाहे कुछ भी हो, तुम मुझ पर भरोसा रखना। मैंने... मैंने बहुत सोचा है। और मैं तुम्हें उस वेदी पर चढ़ने नहीं दूँगा। मैं कोई रास्ता निकालूँगा। तुम बस मुझ पर यक़ीन करना।"

और वो सच नहीं बोल रहा था। पूरा सच नहीं। क्योंकि शिवांश ने रास्ता निकाल लिया था, अपने दिल में। भैरवी ने कहा था, मुहर एक पहरेदार के लहू से टूटती है। तो शायद, शिवांश ने सोचा था, एक पहरेदार का लहू, उसे थाम भी सकता है। उसने ठान लिया था कि कल रात, अगर क़ीमत किसी को चुकानी है, तो वो पृथ्वी होगा। इस बार भी। पर इस बार वो किआरा को थामे रहने को नहीं कहेगा। इस बार वो उसे जीने को कहेगा।

"मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, शिवांश। और तुम भी मुझ पर रखना। हम दोनों कल रात इस सबसे बच निकलेंगे। साथ। तुमने कहा था ना, एक तीसरा रास्ता। हम वो ढूँढ लेंगे। और फिर एक छोटा सा घर बनाएँगे, इसी रेगिस्तान में। मनोहर काका की कड़क चाय के साथ।"

और वो भी सच नहीं बोल रही थी। क्योंकि किआरा जानती थी कि कोई तीसरा रास्ता नहीं है। भैरवी झूठ नहीं बोलतीं। मुहर को नई करने के लिए एक नागिन की जान चाहिए, और उस वंश की आख़िरी नागिन वो थी। पर सौ साल पहले वो शिवांश के लिए मर नहीं पाई थी। इस बार वो नहीं चूकेगी। इस बार वो मणि नहीं, उसे चुनेगी, अपनी जान देकर। बस उसे बताए बिना।

और वो दोनों वहाँ लेटे रहे, चाँद के नीचे, एक-दूसरे की बाँहों में, एक-दूसरे से एक ही झूठ बोलते हुए। दोनों जीना चाहते थे, पर दूसरे के लिए। दोनों मरना चाहते थे, ताकि दूसरा जिए। और ये, शायद, प्यार की सबसे सच्ची और सबसे ज़ालिम शक्ल थी।

रात गहरा गई। दूर, गाँव के ढोल थम गए, दीये बुझ गए, दूध के कटोरे बिलों के आगे ठंडे पड़ गए। सरपगढ़ सो गया, अपने नाग देवता के भरोसे। और कैंप में, एक छोटे से तंबू में, किआरा और शिवांश लेटे थे, जागते हुए, पर एक-दूसरे को सोया हुआ जताते हुए।

और कुछ देर बाद, किआरा ने शिवांश की साँसों को सुना, गहरी, धीमी, बराबर। उसे लगा वो सो गया है। सौ साल की नागिन, जो हर धड़कन पहचान सकती थी, आज पहली बार एक साधारण सी ग़लती कर बैठी, क्योंकि उसका अपना दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे शिवांश की जागती साँस सुनाई नहीं दी।

वो धीरे से उठी, एक कोहनी के सहारे, और उसके ऊपर झुक गई। चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और उसकी आँखों में वो पानी था जो वो सारी शाम रोके रही थी। उसने बहुत हल्के से, अपनी उँगलियों से, उसके माथे पर गिरे बालों को हटाया, ठीक वैसे जैसे कोई किसी बहुत क़ीमती, बहुत नाज़ुक चीज़ को छूता है।

"सो जाओ, मेरी जान। सो जाओ। और कल रात, जब सब ख़त्म हो जाएगा, तो मुझसे नाराज़ मत होना। सौ साल पहले, मैं तुम्हारे लिए मर नहीं पाई थी। मुझे मणि थामनी पड़ी थी। और उस एक बात ने मुझे सौ साल जलाया।"

"पर इस बार, तराज़ू फिर रखा जाएगा, और इस बार मैं मणि नहीं चुनूँगी। इस बार मैं तुम्हें चुनूँगी। मैं ख़ुद उस वेदी पर चढ़ जाऊँगी, अपनी मर्ज़ी से, ताकि तुम जियो। ताकि तुम वो घर बना सको, वो चाय पी सको, वो लंबी उमर जी सको जो मनोहर काका ने माँगी थी। मेरे हिस्से की भी।"

"बस मुझे माफ़ कर देना कि मैं तुम्हें फिर छोड़ कर जा रही हूँ। पर इस बार मैं तुम्हें मरते नहीं देखूँगी, शिवांश। इस बार तुम मुझे जीते देखोगे, और फिर जाते देखोगे, और तुम जिओगे। यही मेरा आख़िरी वादा है। यही मेरा प्यार है। सो जाओ।"

और अँधेरे में, किआरा को नहीं पता था कि शिवांश की आँखें बंद थीं, पर वो सोया नहीं था। उसने हर एक लफ़्ज़ सुना। हर एक। उसकी विदाई का पूरा वादा, उसकी क़ुर्बानी की पूरी योजना, जो उसने उसे कभी न बताने के लिए फुसफुसाई थी।

शिवांश आँखें मूँदे, बिल्कुल स्थिर, लेटा रहा, ताकि किआरा को पता न चले। पर उसके सीने में एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। क्योंकि अब वो जानता था कि किआरा कल रात क्या करने वाली है। वो ख़ुद को क़ुर्बान करने वाली थी, चुपचाप, उसे बताए बिना। और किआरा नहीं जानती थी कि ठीक यही, हूबहू यही, शिवांश ने भी ठान रखा था। दो लोग, एक ही रात, एक-दूसरे के लिए मरने को तैयार, और दोनों को लगता था कि उनका राज़ महफ़ूज़ है। पर अब वो राज़ महफ़ूज़ नहीं था। नागमणि की रात अब बस एक सूरज दूर थी। और शिवांश, अँधेरे में जागा हुआ, एक ऐसा वादा सुन चुका था जिसे तोड़ने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार था।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.