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अध्याय 24 / 27 पढ़ने में 12 मिनट

नागमणि की रात

नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi

और आख़िरकार, वो रात उतर आई जिसके लिए सौ साल इंतज़ार में बीते थे। सूरज रेगिस्तान के किनारे लहू की तरह डूबा, और उसके साथ ही एक चाँद उठा, गोल, पीला, भारी, और वो धीरे-धीरे आसमान में उस एक बिंदु की तरफ़ सरकने लगा, जहाँ पहुँचकर वो नागमणि की रात बन जाता।

टूटे मंदिर के पेट में, ज़मीन के बहुत नीचे, वो पुराना सेहन था, जहाँ एक पत्थर की वेदी थी, और उसके सिरहाने एक ताख़ में, नागमणि। किआरा और शिवांश उस अँधेरी सुरंग से नीचे उतरे, और ऊपर, ज़मीन पर, एक टूटा ठाकुर, एक घायल बावर्ची, और एक सौ साल पुरानी नागिन-गुरु, नागपाल के आदमियों को रोकने के लिए मोर्चा बाँधे खड़े थे। दुनिया की सबसे कमज़ोर फ़ौज, सबसे बड़ी रात के सामने।

"आ गए। दोनों साथ, हाथ में हाथ डाले। जैसे मैंने सोचा था। सौ साल में आदमी बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, पर मोहब्बत करने वाले हमेशा एक जैसे बेवक़ूफ़ रहते हैं। स्वागत है, मेरे मेहमानो, नागमणि की रात में।"

और वेदी के एक किनारे, एक पत्थर के खंभे से बँधी, मुँह पर कपड़ा कसे, नव्या बैठी थी। उसकी आँखें डर से फैली हुई थीं, पर उनमें एक और चीज़ भी थी, गुस्सा। किआरा को देखकर उसने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ कपड़े में घुट गई।

"बस, तक्षक। बहुत हुआ नाटक। नव्या को छोड़ दे। उसका इस सबसे कोई लेना-देना नहीं। तू हमें चाहता था, हम यहाँ हैं। अब उस लड़की को जाने दे।"

"इतनी जल्दी क्या है? रात तो अभी शुरू हुई है, किआरा। चाँद को अभी उस सुराख़ तक पहुँचने में वक़्त है। और तब तक, ये लड़की मेरी सबसे अच्छी डोर है। जब तक ये बँधी है, पृथ्वी यहीं रहेगा, अपने पैरों पर, ठीक जहाँ मुझे वो चाहिए।"

"मैं यहीं हूँ, तक्षक। मैं कहीं नहीं जा रहा। जो तुझे चाहिए था, तेरे सामने खड़ा है। अब इस खेल में एक मासूम की क्या ज़रूरत? उसे छोड़, और मुझसे बात कर।"

"पृथ्वी। मेरा सबसे क़ीमती मेहमान। सौ साल, मैंने तेरा इंतज़ार किया। तेरी मौत का नहीं, समझे? तेरे जीने का। क्योंकि इस पूरी रात का राज़, इस पूरे सौ साल का राज़, बस इतना है, इस वेदी पर एक चीज़ चाहिए जो सिर्फ़ तेरी रगों में बहती है। एक पहरेदार का लहू। जीवित। धड़कता हुआ।"

और अब तक्षक ने कुछ नहीं छुपाया। सौ दिन जिस जाल को उसने धमकियों और परछाइयों के पीछे छुपाए रखा था, आज, आख़िरी रात, उसने उसे नंगा वेदी पर रख दिया। क्योंकि अब छुपाने की ज़रूरत नहीं थी। अब भागने का कोई रास्ता नहीं था।

और वेदी के उस किनारे, बँधी हुई नव्या की आँखें किआरा पर टिकी थीं, आँसुओं से भरी, पर हार न मानती हुई। किआरा उसके पास एक पल को झुकी, अपनी उँगलियाँ उसके काँपते हाथ पर रखीं, और बहुत धीरे से फुसफुसाई, इतने धीरे कि सिर्फ़ नव्या सुने।

"डरो मत, नव्या। मैंने सौ साल इस मंदिर की पहरेदारी की है। और आज रात, तुम इस अँधेरे से ज़िंदा निकलोगी, ये मेरा वादा है, और मैं अपने वादे कभी नहीं तोड़ती। बस अपनी आँखें बंद कर लो, और चाहे कुछ भी सुनाई दे, उन्हें खोलना मत। मुझ पर भरोसा रखो।"

और तभी, ऊपर, आसमान में, चाँद उस सुराख़ के क़रीब पहुँचा। तहख़ाने की छत में बना वो पुराना छेद, जो सौ साल में सिर्फ़ एक रात चाँद की सीध में आता था। और उसमें से एक पतली, दूधिया किरण उतरी, सीधी उस ताख़ पर, जहाँ नागमणि रखी थी।

और नागमणि जाग उठी। सौ साल से सोया हुआ वो पत्थर एक धड़कन के साथ दहका, एक सफ़ेद, ठंडी आग जो साँस लेती थी। पूरा सेहन उस रोशनी में नहा गया, और उसके साथ हवा में एक आवाज़ घुली, बहुत धीमी, बहुत गहरी, जैसे ज़मीन के बहुत नीचे कोई बहुत पुरानी चीज़ करवट ले रही हो।

और उस पुकार ने किआरा को हिला दिया। मणि की वो नज़दीकी उसके इंसानी रूप को भीतर से खींचने लगी। उसकी आँखें सुनहरी चमक उठीं, उसकी त्वचा पर चाँदी की एक लहर दौड़ी, और एक पल के लिए उसे अपनी ही देह पर से क़ाबू खोता महसूस हुआ। वो लड़खड़ाई, और शिवांश ने उसे थाम लिया।

"मैं यहाँ हूँ, किआरा। मुझे पकड़ो। तुम्हारी देह टूट रही है, मैं देख रहा हूँ। पर तुम अकेली नहीं हो, समझी? सौ साल तुमने ये बोझ अकेले उठाया। आज नहीं। आज ये बोझ मेरा भी है, आधा।"

और किआरा ने उसकी बाँह कस कर पकड़ी, और एक पल के लिए, उस दहकती मणि के सामने, उस भूखे अँधेरे के सामने, उसे लगा कि शायद सौ साल में पहली बार वो सचमुच अकेली नहीं थी। पर उसने उस एहसास को अपने अंदर गहरे दबा दिया। क्योंकि उसे पता था कि इस रात के अंत में, अकेलापन ही उसका आख़िरी और सबसे सच्चा फ़र्ज़ था।

"वो जाग रही है, शिवांश। मणि जाग रही है। और उसके अंदर जो क़ैद है, वो भी। मुहर पहले से चटकी हुई है, और आज रात... आज रात वो पूरी तरह खुल सकती है। हमारे पास वक़्त नहीं है। हमें अभी, इसी पल, इसे नई करना होगा।"

"सुन रही है ना, किआरा? वो आवाज़? वो मेरा मालिक है। सौ साल जिसे तेरे पुरखों ने इस पत्थर में जेल समझकर बंद किया, वो अब जाग रहा है। और आज की रात, जब चाँद पूरा उस सुराख़ पर बैठेगा, तो मैं पृथ्वी का लहू इस वेदी पर उँडेलूँगा, और वो दरवाज़ा हमेशा के लिए खोल दूँगा।"

और ऊपर, सुरंग के मुँह पर, एक शोर उठा। नागपाल और उसके आदमी नीचे उतरने की कोशिश कर रहे थे, और उन्हें रोकने के लिए, एक बूढ़ा ठाकुर अपनी तलवार लिए खड़ा था, एक घायल बावर्ची अपनी लाठी घुमा रहा था, और भैरवी, अपने असली रूप में, रेगिस्तान के हर साँप को उस मुँह पर बुला लाई थी। वो मोर्चा कब तक टिकता, कोई नहीं जानता था। पर वो टिका हुआ था।

"किआरा, सुनो मुझे। हमने वादा किया था। साथ। तुम अकेले उस वेदी पर नहीं चढ़ोगी। मैं तुम्हें अपनी जान देते हुए नहीं देखूँगा। कोई तीसरा रास्ता होगा, हम ढूँढेंगे, पर तुम अभी वो मत करो जो तुम सोच रही हो।"

"तीसरे रास्ते का वक़्त नहीं है, शिवांश! मणि जाग चुकी है। अगर मैंने अभी अपनी जान देकर इसे नई नहीं किया, तो तक्षक इसे तोड़ देगा, और फिर हम दोनों नहीं, पूरी दुनिया मरेगी। मुझे जाने दो। ये मेरा फ़र्ज़ है। सौ साल से मेरा यही फ़र्ज़ है।"

"आह। देखो इन्हें। एक मरना चाहता है ताकि दूसरा जिए, दूसरा मरना चाहता है ताकि पहला जिए। सौ साल पहले भी यही हुआ था, इसी वेदी पर। और आज फिर वही। तुम दोनों की ये मोहब्बत, यही तो मेरा सबसे बड़ा हथियार है। क्योंकि जब तुम एक-दूसरे को बचाने में उलझोगे, तभी मैं वो कर जाऊँगा जो मुझे करना है।"

"तू ग़लत है, तक्षक। सौ साल पहले भी तूने यही सोचा था कि हमारी मोहब्बत हमारी कमज़ोरी है। पर उसी मोहब्बत ने तुझे सौ साल इंतज़ार करवाया, है ना? जिस चीज़ को तू हथियार समझता है, वही तेरी सबसे बड़ी नाकामी है। तू आज तक समझ नहीं पाया कि हम एक-दूसरे के लिए सिर्फ़ मरते नहीं। हम एक-दूसरे के लिए लड़ते भी हैं।"

"बातें, किआरा। सिर्फ़ बातें। लड़ लो, जितना लड़ना है। पर देख, वो चाँद रुकता नहीं। तेरी हर बात के साथ वो सुराख़ के और क़रीब सरक रहा है। और जब वो पहुँच जाएगा, तो तेरी बातें, तेरी मोहब्बत, तेरी लड़ाई, सब उस सफ़ेद आग में राख हो जाएँगी। तब तक बोल ले। मुझे तेरी आवाज़ अच्छी लगती है।"

और चाँद और ऊपर चढ़ा। वो दूधिया किरण अब चौड़ी हो रही थी, और नागमणि की धड़कन तेज़। वेदी के पत्थर पर बनी वो पुरानी मुहर की लकीरें अब साफ़ दिख रही थीं, और उनमें से एक सफ़ेद रोशनी रिसने लगी थी, जैसे नीचे से कोई दरवाज़ा खुलने को हो।

"और अगर मैं मना कर दूँ, तक्षक? अगर मैं अपना लहू उस वेदी पर न बहने दूँ? तू मुझे मार नहीं सकता, क्योंकि मरा हुआ पृथ्वी तेरे किसी काम का नहीं। तेरी सारी सौ साल की मेहनत, मेरे एक इनकार पर टिकी है।"

"सच कहा। पर तू मना नहीं करेगा। क्योंकि मेरे पास वो लड़की है। और मेरे पास वो औरत है जिसे तू प्यार करता है। तू सोच रहा है कि तेरा इनकार मुझे रोक देगा। पर मैं तुझसे कहूँगा, अपना लहू वेदी पर दे, वरना मैं इस लड़की का गला काट दूँगा, और फिर किआरा को इतना दर्द दूँगा कि तू ख़ुद अपने हाथों वो लहू बहा देगा। तेरे पास चुनने को कुछ नहीं है, पृथ्वी। बस देर या सवेर।"

और वो सच था। तक्षक ने हर दरवाज़ा बंद कर रखा था। शिवांश का इनकार, किआरा की क़ुर्बानी, नव्या की जान, हर रास्ता उसी वेदी पर आकर मिलता था, जहाँ आख़िर में एक पहरेदार का लहू बहना ही था। और चाँद, बेरहम, ऊपर चढ़ता जा रहा था।

"किआरा, मेरी तरफ़ देखो। याद है कल रात हमने क्या कहा था? दो वादे नहीं। एक। साथ का। जो भी हो, हम अकेले कोई फ़ैसला नहीं लेंगे। तुम अभी मुझसे कहो कि तुम ये याद रखोगी। कहो, किआरा।"

"मुझे याद है, शिवांश। एक वादा। साथ का। मैं याद रखूँगी।"

और उसने ये कहा, और उसकी आवाज़ बिल्कुल सच्ची थी, और उसकी आँखें बिल्कुल झूठी। क्योंकि उसके दिल में वो पहले ही अपना फ़ैसला ले चुकी थी, अकेले। सौ साल पहले वो शिवांश के लिए मर नहीं पाई थी। इस बार वो नहीं चूकेगी, चाहे इसके लिए उसे अपना सबसे आख़िरी, सबसे प्यारा वादा ही क्यों न तोड़ना पड़े।

"शिवांश। मेरी तरफ़ देखो। एक बार। मैं तुमसे प्यार करती हूँ। सौ साल पहले भी करती थी, आज भी करती हूँ, और जो भी होगा, उसके बाद भी करती रहूँगी। और इसीलिए मैं तुम्हें फिर मरते नहीं देख सकती। माफ़ कर देना।"

और इससे पहले कि शिवांश कुछ समझ पाता, किआरा उसकी बाँहों से छूटी और वेदी की तरफ़ झपटी। उसका इंसानी रूप हवा में ही पिघलने लगा, चाँदी और सोने की एक लपट, सौ साल पुरानी नागिन, अपनी जान उस मुहर पर उँडेलने के लिए, आख़िरी बार, अपनी मर्ज़ी से।

"किआरा, नहीं! रुको! तुम ये नहीं करोगी!"

और उसी पल तक्षक भी हिला। उसका इंसानी चेहरा उतरा, और उसकी जगह वो विशाल, काला नाग उभरा, जिसकी आँखों में सौ साल की भूख जल रही थी। पर वो किआरा की तरफ़ नहीं लपका। वो शिवांश की तरफ़ लपका। क्योंकि उसे किआरा की क़ुर्बानी नहीं चाहिए थी। उसे पृथ्वी का लहू चाहिए था, उसी वेदी पर, ठीक उसी पल जब मुहर सबसे कमज़ोर थी।

"अब! अब वो पल आ गया! तेरा लहू, पृथ्वी, इस वेदी पर, और सौ साल का इंतज़ार ख़त्म! मेरा मालिक जागेगा, और मैं उसका पहला निवाला बनूँगा!"

और ठीक उसी पल, ऊपर, चाँद उस सुराख़ पर पूरा बैठ गया। वो दूधिया किरण अचानक एक सफ़ेद आग बन गई, और नागमणि इतनी तेज़ दहकी कि पूरा सेहन दिन की तरह जगमगा उठा, एक अंधा कर देने वाली, बर्फ़ जैसी सफ़ेद रोशनी।

और उस रोशनी में, वेदी की मुहर की वो सारी लकीरें एक साथ चटकीं। पत्थर के नीचे से एक गड़गड़ाहट उठी, कोई बहुत विशाल, बहुत भूखी चीज़, जो सौ साल की क़ैद के बाद, पहली बार, उस दरार से बाहर झाँक रही थी। सेहन काँपा। छत से रेत झरने लगी।

"मैं अपनी जान देती हूँ! अपनी मर्ज़ी से! ये मुहर मेरे लहू से नई हो! सुन ले, मणि! ये मेरी क़ुर्बानी है, मेरी ख़ुशी से!"

"नहीं! तुम अकेले नहीं! अगर कोई इस वेदी पर मरेगा, तो हम साथ मरेंगे! मैंने वादा किया था, किआरा! साथ!"

और फिर, उस एक पल में, सब कुछ एक साथ हुआ। किआरा वेदी पर झुकी, अपनी जान देने को। शिवांश उसकी और तक्षक के बीच कूदा, उसे बचाने को। और तक्षक, अपने पूरे विशाल रूप में, उन दोनों पर टूट पड़ा, वो लहू बहाने को जिसके लिए उसने सौ साल जिए थे। तीन जानें, एक वेदी, एक भूखा दरवाज़ा, और एक अंधा कर देने वाली सफ़ेद आग।

और तभी, उस सफ़ेद रोशनी के ठीक बीचोंबीच, एक चीख़ गूँजी। एक ऐसी चीख़ जो दर्द की थी, या डर की, या मौत की, कोई नहीं जानता। उसके पीछे-पीछे एक पत्थर के चटकने की भयानक आवाज़ आई, वेदी टूट रही थी, या मुहर, या दोनों। और फिर, एक ही झटके में, वो सारी सफ़ेद आग बुझ गई। पूरा सेहन एक गहरे, काले, बहरे कर देने वाले अँधेरे में डूब गया। नागमणि की रोशनी चली गई। और उस अँधेरे में, कहीं, किसी का लहू बह रहा था। पर किसका, ये किसी को नहीं पता था। ना किआरा को, ना शिवांश को, ना उस अँधेरे में जागती उस भूख को। सिर्फ़ एक आवाज़ बची, गरम लहू की, ठंडे पत्थर पर टपकने की। टप। टप। टप।

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