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अध्याय 18 / 27 पढ़ने में 12 मिनट

नागमणि जागी

नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi

उस रात रेगिस्तान चुप था। इतना चुप कि साँस लेना भी गुनाह लगे। हवा रुक गई थी, टिड्डे चुप थे, और आसमान के नीचे वो पूरा कैंप एक नीली धड़कन में डूबा हुआ था, जो अब किसी मशीन से नहीं, ज़मीन के अपने दिल से आ रही थी।

तहख़ाने की वो टूटती दीवार अब एक ज़ख़्म की तरह चमक रही थी। हर धड़कन के साथ नीली रोशनी की एक लहर उठती, रेत पर फैलती, और बुझ जाती। नव्या की सारी मशीनें मर चुकी थीं, सूइयाँ घूम-घूम कर रुक गई थीं, क्योंकि जो नीचे जाग रहा था, उसे कोई पैमाना नाप नहीं सकता था।

और वो धड़कन सिर्फ़ रेत में नहीं थी। वो किआरा के लहू में भी थी। मणि जाग रही थी, और सौ साल में पहली बार, वो अपनी पहरेदार को उसके असली नाम से पुकार रही थी।

"नहीं। अभी नहीं। मुझे अभी थोड़ी देर और इंसान रहना है। बस थोड़ी देर और... रुक जा।"

उसकी उँगलियों की खाल पर, एक पल को, सुनहरी शल्कें उभरीं और डूब गईं। उसकी आँखों में वो पुरानी सुनहरी आग एक दीये की तरह काँप रही थी। सौ साल से जिस इंसानी झूठ को उसने लोहे की तरह जकड़ रखा था, आज वो मोम की तरह पिघलने लगा था।

"किआरा! तुम्हारा हाथ... तुम काँप रही हो। तुम्हारी आँखें... ये क्या हो रहा है तुम्हें?"

"जो सौ साल से नहीं हुआ, शिवांश। मणि जाग गई है। और जैसे-जैसे वो जागती है, मेरा ये चेहरा फिसलता जाता है। वो मुझे वापस बुला रही है। अपनी असली शक्ल में। और आज मेरे अंदर उसे रोकने की ताक़त कम पड़ रही है।"

"तो मुझे थाम लेने दो। देखो मेरी तरफ़। सिर्फ़ मेरी तरफ़। तुम किआरा हो। तुम यहाँ हो, मेरे सामने, ज़मीन पर पैर टिकाए। साँस लो। बस साँस लो।"

और उसकी छुअन से, उस टूटते पल में भी, किआरा के अंदर की वो लहर एक घड़ी को थम गई। सौ साल का ग़ुस्सा, सौ साल का डर, और उन दोनों के बीच पड़ा वो पुराना ज़ख़्म, सब एक तरफ़, और उसका बढ़ा हुआ हाथ, दूसरी तरफ़।

"अच्छा हुआ तुमने मुझे थाम लिया। क्योंकि अब मुझे तुम्हें वो सब बताना है जो मैं सौ साल से किसी जीव को नहीं बता पाई। पूरा सच, शिवांश। वो सच जिसके बोझ से मेरी कमर झुक गई है।"

"मैं सुन रहा हूँ। और इस बार मुझसे कुछ मत छुपाना। ना अपना डर, ना अपना दर्द। मैंने सौ साल तुम्हारे बिना काटे हैं। मैं आधा सच अब और नहीं सह सकता।"

"ये पत्थर, ये नागमणि, कोई ख़ज़ाना नहीं है, शिवांश। ये एक ताला है। एक क़ैद। इसके अंदर कोई चीज़ बंद है। कोई भूख। इतनी पुरानी कि उसका कोई नाम नहीं बचा, इतनी गहरी कि रोशनी भी उसके पास जाकर मर जाती है। मेरे पुरखों ने उसे इस पत्थर में क़ैद किया था, अपने ही लहू की मुहर लगा कर।"

भूख। शिवांश ने वो लफ़्ज़ अपने अंदर उतरते महसूस किया, जैसे किसी ने बरफ़ का एक टुकड़ा उसकी रीढ़ पर रख दिया हो।

"एक भूख। तो फिर तक्षक इसे क्यों चाहता है? अगर ये सिर्फ़ ताक़त नहीं, बल्कि किसी राक्षस की क़ैद है, तो कोई इसे अपने हाथ में क्यों लेना चाहेगा?"

"यही तो सबसे बड़ा झूठ है जो तक्षक ने दुनिया को बेचा है। सब सोचते हैं वो मणि की ताक़त चाहता है, वो रोशनी जो तक़दीरें पलट दे। पर मैं उसे सौ साल से जानती हूँ। तक्षक ताक़त का लालची नहीं है। तक्षक उस भूख का अपना है। उसका ख़ून। उसका वारिस।"

"और अगर उसने ये मुहर तोड़ दी, तो वो अमीर नहीं बनेगा, शिवांश। वो उस भूख का दरवाज़ा बन जाएगा। एक ऐसा दरवाज़ा जो कभी बंद नहीं होगा। और फिर सिर्फ़ सरपगढ़ नहीं जलेगा। ये पूरी दुनिया, हर गाँव, हर चेहरा, सब उस भूख का निवाला बन जाएगा।"

"मनोहर काका। नव्या। वो गाँव के बच्चे जो नाग-पंचमी पर दूध चढ़ाते हैं। तुम ये कह रही हो कि वो सब... एक पत्थर के टूटने की दूरी पर हैं।"

"सब। इसीलिए मैं इसे किसी क़ीमत पर जाने नहीं दे सकती। समझे तुम अब? सौ साल पहले, उस रात, जब तक्षक ने कहा था, मणि दे दे और मैं पृथ्वी को जीने दूँगा... मैं मणि नहीं छोड़ सकती थी। तुम्हारे लिए भी नहीं। क्योंकि मणि छोड़ने का मतलब था ये भूख आज़ाद, और तुम्हारे साथ-साथ वो हर चीज़ राख, जिसे तुम अपनी जान देकर बचा रहे थे।"

और वहीं, उस टूटते तहख़ाने की नीली रोशनी में, वो सौ साल पुराना ज़ख़्म फिर दोनों के बीच आ खड़ा हुआ। शिवांश की आँखों में समझ थी, पर उस समझ के नीचे अब भी एक बच्चे जैसी टीस थी। तुमने मुझे मरते देखा, और मेरा हाथ छोड़ दिया।

"मैं समझ रहा हूँ, किआरा। दिमाग़ से, मैं सब समझ रहा हूँ। एक जान बड़ी है या पूरी दुनिया, इसका जवाब मुझे भी पता है। पर मेरा दिल अब भी उस रात में अटका है, जब मैंने अपना हाथ तुम्हारी तरफ़ बढ़ाया था, और तुमने मणि उठा ली थी। दिमाग़ माफ़ कर देता है। दिल को अभी थोड़ा वक़्त लगेगा।"

"मुझे तुम्हारी माफ़ी नहीं चाहिए, शिवांश। मैंने ख़ुद को सौ साल में एक पल के लिए भी माफ़ नहीं किया। मैं बस चाहती थी कि तुम ये जान लो, कि मैं कोई पत्थरदिल पहरेदार नहीं थी जिसने अपने प्यार पर एक जौहर को चुना। मैंने एक जहन्नुम को बंद रखने के लिए अपनी जन्नत अपने हाथों जला दी थी।"

और एक पल के लिए, उन दोनों के बीच वो ख़ामोशी उतरी जो माफ़ी नहीं थी, पर माफ़ी की तरफ़ बढ़ा पहला क़दम थी। पर वो पल लंबा नहीं चला। क्योंकि अँधेरे में एक तीसरी आवाज़ उभरी, बूढ़ी, गहरी, और चट्टान जैसी सख़्त।

"तो आख़िरकार तूने उसे सब बता दिया, किआरा। सौ साल की चुप्पी एक ही रात में तोड़ दी। समझदारी की, या बेवक़ूफ़ी की, ये वक़्त बताएगा।"

और खंडहर की एक टूटी मेहराब के नीचे से, चाँदनी में लिपटी, भैरवी निकल आई। सौ साल की गुरु, नागों के पहरेदार-वंश की सबसे बूढ़ी आँख। उसकी नज़र सीधी शिवांश पर पड़ी, और वहीं जम गई।

"तो ये है वो। लौटा हुआ। वही माथा, वही आँखें, वही कलाई का निशान। पृथ्वी। सौ साल पहले मैंने इसी लड़के की चिता के आगे तुझे टूटते देखा था, किआरा। और आज वो फिर तेरे सामने खड़ा है, वही पुरानी ग़लती दोहराने के लिए तैयार।"

"मैं पृथ्वी था, माता जी। मेरे अंदर लौटी हर याद यही कहती है। पर मैं शिवांश भी हूँ। और इस बार मैं वो लड़का नहीं बनूँगा जो सिर्फ़ मरना जानता था और किआरा को अकेला छोड़ गया था। इस बार मैं लड़ूँगा। इसके लिए भी, और इसके साथ भी।"

"लड़ेगा। तुम इंसान हमेशा लड़ने की बात करते हो, जैसे हिम्मत से चट्टानें पिघल जाती हों। इधर आ। दोनों। और उस मुहर को अपनी आँखों से देखो, जिसकी तुम रखवाली करने चले हो।"

भैरवी उस भीतरी मुहर के पास गई, उस पवित्र पत्थर के, जिस पर सौ पीढ़ियों का लहू सूखा हुआ था। उसने अपनी झुर्रीदार उँगलियाँ उन दरारों पर फेरीं, और उसका चेहरा राख जैसा पड़ गया।

"मैंने सोचा था ख़तरा अभी हफ़्तों दूर है। पर ये... ये मुहर मर रही है, किआरा। और ये अभी नहीं मरने लगी। ये सौ साल से मर रही है। अंदर की उस भूख ने इसे धीरे-धीरे कुतरा है, हर रात थोड़ा-थोड़ा, जैसे दीमक लकड़ी को खाती है।"

और किआरा ने अपनी हथेली उस ठंडे पत्थर पर रखी, उन दरारों पर, जिनमें उसके अपने पुरखों का लहू लिखा था। सौ पीढ़ियों की पहरेदारी, सौ पीढ़ियों की क़ुर्बानी। और उसे लगा जैसे उसकी उँगलियों के नीचे वो सारा लहू अब पानी की तरह पतला पड़ रहा हो।

"मेरी अम्मा ने इसे थामा था। उनकी अम्मा ने। और उनसे पहले वो सब, जिनके नाम अब सिर्फ़ इस पत्थर को याद हैं। और मैं समझती रही कि मैं बस पहरा दे रही हूँ, इंतज़ार कर रही हूँ। मुझे नहीं पता था कि ये पत्थर, इस पूरे वक़्त, मेरे पैरों के नीचे मुझे भी काट रहा था।"

"पर सौ साल पहले तो इसे नया किया गया था ना, माता जी? उस रात, नागमणि की रात। फिर ये मुहर मर क्यों रही है? नई मुहर तो सदी भर मज़बूत रहती है।"

"क्योंकि वो रात अधूरी रह गई थी, किआरा। जो रीत उस रात पूरी होनी थी, वो नहीं हुई। क्यों नहीं हुई, ये एक और ज़ख़्म है, और वो ज़ख़्म किसी और रात के लिए है। अभी बस इतना जान, कि सौ साल पहले जो मुहर आधी बँधी रह गई, वो आज पूरी तरह चरमरा रही है।"

"तो हम इसे फिर से बाँधेंगे। पूरी तरह। नागमणि की रात, जैसे सौ साल पहले होना था। बताइए मुझे कैसे, माता जी। मैं तैयार हूँ। जो भी करना हो, मैं करूँगी।"

और भैरवी ने जवाब नहीं दिया। उसने बस किआरा की तरफ़ देखा, एक लंबी, भारी नज़र से। उस नज़र से, जिससे कोई माँ अपनी बेटी को कुछ ऐसा बताने से पहले देखती है, जो उसका दिल दो टुकड़े कर देगा।

"आप ऐसे क्यों देख रही हैं इसे? कोई तरीक़ा तो है, है ना? इस मुहर को नया करने का। आप चुप क्यों हैं?"

"तरीक़ा है। एक ही। नागमणि की रात, जब चाँद ठीक उस सुराख़ पर आ ठहरता है, तब ये मुहर दो में से एक चीज़ बन सकती है। या तो टूट सकती है, या नई हो सकती है। टूटना आसान है। किसी पहरेदार का लहू उस वेदी पर बहा दो, और दरवाज़ा खुल जाता है। पर नई करना... नई करना आसान नहीं।"

भैरवी रुकी। हवा रुकी। तहख़ाने की वो नीली धड़कन भी एक पल को थम सी गई, जैसे वो भी सुनना चाहती हो।

"मुहर को नई करने के लिए एक नागिन को ख़ुद को उस पत्थर के हवाले करना पड़ता है। अपनी जान, अपनी सारी अमरता, अपनी हर बची हुई साँस, अपनी ख़ुशी से। ये बलि नहीं है, बेटा। बलि में इंसान डरता है। ये समर्पण है। एक नागिन उस वेदी पर खड़ी होकर, अपनी मर्ज़ी से, अपना सब कुछ उस भूख के आगे रख देती है, ताकि वो भूख उसे अपने अंदर समेट कर सौ साल के लिए फिर सो जाए।"

एक नागिन की जान। शिवांश ने वो लफ़्ज़ सुने, और उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने से सारी हवा खींच ली हो। उसने बहुत धीरे किआरा की तरफ़ देखा। और किआरा के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।

"एक नागिन की जान। किआरा। तुम्हें ये पहले से पता था। है ना? तुम्हारा चेहरा हैरान नहीं है। तुम... तुम जानती थीं कि इस मुहर की क़ीमत तुम हो।"

"मैं इस मुहर की आख़िरी पहरेदार हूँ, शिवांश। मेरे बाद इस वंश में कोई नागिन नहीं। सौ साल पहले जो रात अधूरी रह गई थी, वो इस बार पूरी होगी। और उसे पूरा करने के लिए जो जान चाहिए, वो मेरी है। मैं ये हमेशा से जानती थी। बस तुम्हें बताने की हिम्मत नहीं थी।"

"नहीं। नहीं, किआरा, ये नहीं होगा। मैंने तुम्हें अभी-अभी वापस पाया है। सौ साल बाद। एक नए जनम में, एक नए चेहरे में, और उस पूरी उम्र के बाद जो मैंने तुम्हारा ग़म काटते हुए बिताई। और तुम मुझे ये बता रही हो कि दुनिया को बचाने का तरीक़ा ही तुम्हें मुझसे हमेशा के लिए छीन लेना है? ये कैसा इंसाफ़ है?"

"कोई और रास्ता होगा। हमेशा कोई और रास्ता होता है। आप सौ साल की गुरु हैं, माता जी। आपकी किताबों में, आपके पुरखों की कथाओं में, कहीं तो लिखा होगा कि इसे बाँधने का कोई और तरीक़ा भी है। जो किआरा की जान न माँगे।"

"इंसाफ़? बेटा, पहरेदारी इंसाफ़ नहीं होती। पहरेदारी क़ीमत होती है। सौ साल पहले इस लड़की ने तुझे खोया था, ताकि दुनिया साँस लेती रहे। और अब वही दुनिया इससे ख़ुद को माँग रही है। तराज़ू वही पुराना है। बस इस बार, दूसरे पलड़े में कोई और नहीं, ये ख़ुद है।"

और उस टूटते तहख़ाने में, उस मरती हुई नीली रोशनी के नीचे, सच अपने पूरे क़द में खड़ा हो गया। नागमणि सिर्फ़ एक पत्थर नहीं थी। वो एक जेल थी, एक अनादि भूख की जेल। और उस जेल का ताला, नागमणि की रात, या तो एक पहरेदार के लहू से टूटता, या एक नागिन की ख़ुशी से दी हुई जान से नया होता।

सौ साल पहले किआरा ने अपने प्यार को इसी पत्थर की ख़ातिर अपनी बाँहों में मरते देखा था। और अब, इस मरती मुहर को फिर बाँधने के लिए, दुनिया को बचाने के लिए, किआरा को ख़ुद उस वेदी पर चढ़ना था। ख़ुशी से। अपनी मर्ज़ी से। अपनी जान देकर। शिवांश ने उसे सौ साल बाद वापस पाया था। और नागमणि की रात, कुछ ही दिनों में, उसे उससे हमेशा के लिए छीनने वाली थी।

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नागमणि की रात