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Chapter 16 of 27 11 min read

नाग का प्रस्ताव

नागमणि की रात by Avni Oberoi

तक्षक फिर लौटा। एक रात नहीं, कई रातें। जब कैंप सो जाता, जब किआरा भैरवी के पास जाती, तब वो टीलों के पार, चाँद की ओट में, शिवांश के पास आ बैठता। कभी धमकी नहीं, कभी ज़ोर नहीं। बस बातें। शहद में लिपटी हुई, और उतनी ही ज़हरीली।

और शिवांश, जो एक इंसान था, टूटा हुआ, थका हुआ, अपने ही प्यार से घायल, धीरे-धीरे उन बातों को सुनने लगा था। सुनना ही तो था। बस सुनना। इसमें क्या हर्ज़ था, उसने ख़ुद से कहा। पर हर ज़हर की शुरुआत, बस सुनने से ही होती है।

"तुम रात-भर जागते हो, पृथ्वी। मैं जानता हूँ। तुम उस लड़की का चेहरा सोचते हो, और फिर उसका वो मुँह फेरना सोचते हो। और तुम्हें समझ नहीं आता कि उसे प्यार करूँ या उससे नफ़रत। मैं तुम्हें एक बात बताऊँ? जो वो तुम्हें अब देती है, वो प्यार नहीं है। वो अपराधबोध है।"

"तुम उसके बारे में कुछ नहीं जानते।"

"मैं सौ साल से उसे जानता हूँ। सोचो। जिस रात उसने तुम्हारा हाथ छोड़ा, उस रात तुम उसके लिए मर गए। और तब से, सौ साल, वो उस गुनाह के बोझ तले दबी रही। अब तुम लौट आए हो। और अचानक वो तुमसे 'प्यार' करने लगी है। पर सोचो, पृथ्वी, वो प्यार है, या बस अपने पुराने गुनाह को धोने का एक मौक़ा? तुम उसके लिए इंसान हो, या एक पुरानी रसीद, जिसे वो आख़िरकार चुका देना चाहती है?"

और ये सवाल, शिवांश के अंदर बैठ गया, एक काँटे की तरह। क्योंकि वो जवाब नहीं जानता था। किआरा का प्यार, क्या वो सच में उसके लिए था, या उस पुराने ज़ख़्म के लिए जो वो भरना चाहती थी? तक्षक ने उसे कोई नई बात नहीं बताई थी। उसने बस वो शक बोया था, जो हर टूटे दिल में अपने आप उग आता है।

"और एक बात। तुम हमेशा उसके रहम पर रहोगे। हर बार वो तराज़ू आएगा, और हर बार तुम्हारी जान उसके हाथ में होगी। पर अगर वो मणि तुम्हारे हाथ में हो, तो? उसमें जो ज़िंदगी बंद है, वो अगर तुम ले लो, तो तुम्हें फिर कभी किसी के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। न उसके, न मौत के। तुम आज़ाद हो जाओगे, पृथ्वी। हमेशा के लिए।"

"और तुम्हें इससे क्या मिलेगा? कोई मुफ़्त में ज़िंदगी नहीं बाँटता। तुम मुझे बचाना नहीं चाहते। तुम कुछ और चाहते हो।"

"मैं चाहता हूँ कि वो मणि उस तहख़ाने से बाहर आए। मैं इससे इनकार नहीं करता। पर तुम्हें उससे क्या? तुम्हें अपनी ज़िंदगी चाहिए, मुझे मेरी। दोनों एक ही रास्ते पर हैं। और वो लड़की? वो नहीं चाहती कि मणि बाहर आए, और वो नहीं चाहती कि तुम उसे पाओ। यानी वो न तुम्हारा भला चाहती है, न मेरा। सोचो, इस सारे खेल में, अकेला वो ही है जो तुम्हें कुछ नहीं देना चाहता।"

"तुम नहीं जानते वो कैसे हँसती है, तक्षक। जब वो हँसती है, तो मुझे यक़ीन हो जाता है कि वो सच में मुझसे प्यार करती है। कोई इतना सच्चा झूठ नहीं हँस सकता।"

"हाँ, वो हँसती है। और सौ साल पहले भी हँसती थी, उस पीपल के नीचे, तुम्हारे कंधे पर। और उसी हँसी के कुछ ही देर बाद, उसने तुम्हारा हाथ छोड़ दिया था। उसकी हँसी सच्ची है, पृथ्वी, मैं इनकार नहीं करता। पर सच्ची हँसी और सच्चा साथ, दो अलग चीज़ें हैं। एक तुम्हें उस रात भी मिली थी। दूसरी, कभी नहीं।"

और यही तक्षक की सबसे बड़ी चालाकी थी। वो कभी पूरा झूठ नहीं बोलता था। वो हमेशा एक सच लेता, और उसके किनारों को धीरे-धीरे मोड़ देता, जब तक वो सच एक फंदा न बन जाए। और शिवांश, जो पूरी उम्र सच का आदी रहा था, उस मुड़े हुए सच में उलझता चला जा रहा था।

और शिवांश चुप रहा। उसने हाँ नहीं कहा। पर उसने ना भी नहीं कहा। और तक्षक, जो सौ साल का शिकारी था, उस चुप्पी में अपनी जीत की पहली महक सूँघ चुका था।

सुबह हुई, और उधर, इंसानी दुनिया में, ठाकुर करमवीर ने अपना अगला पत्ता फेंका। उसकी लाठियाँ काम नहीं आई थीं, तो अब वो काग़ज़ लेकर आया। पूरा एक जत्था, गाड़ियाँ, सरकारी मुहरें, और उसके पीछे, काला चश्मा लगाए, वो शांत डॉक्टर नागपाल, जो हर चीज़ को ऐसे देख रहा था जैसे वो पहले से जानता हो कि क्या होने वाला है।

"डॉक्टर शिवांश! आपकी छुट्टी का वक़्त आ गया। ये देखिए, नया आदेश। इस पूरे इलाक़े को अब पुरातत्व विभाग और राज्य सरकार की सीधी निगरानी में ले लिया गया है। मतलब, आपका परमिट रद्द। आपकी टीम को अड़तालीस घंटे में ये जगह ख़ाली करनी है।"

"ये ज़मीन मेरी खोज है, ठाकुर। मेरे नाम का परमिट है। आप ऐसे मुझे नहीं निकाल सकते।"

"निकाल सकता हूँ, और निकाल रहा हूँ। बड़े-बड़े लोग मेरे साथ हैं, साहब। दिल्ली तक। आपने तहख़ाना खोल दिया, बहुत अच्छा किया, आपका काम हो गया। अब उसमें से जो निकलेगा, उसे निकालना आप जैसे मामूली मज़दूरों का काम नहीं। वो बड़े लोगों का काम है। अपना सामान बाँधिए।"

और भीड़ के किनारे खड़ी किआरा सब समझ गई। करमवीर का लालच, नागपाल की चाल, और तक्षक की छाया, तीनों अब एक ही डोर के तीन सिरे थे। वो चाहते थे कि खुदाई तेज़ हो, तहख़ाना पूरा खुले, और मणि उस रात, तयशुदा वक़्त पर, बाहर आ जाए। करमवीर को लगता था वो मालिक है। पर वो बस नाग का हथौड़ा था।

"और अगर मैं इनकार कर दूँ? अगर मैं ये जगह न छोड़ूँ?"

"तो ये रेगिस्तान बहुत बड़ा है, डॉक्टर। और यहाँ लोग अक्सर खो जाते हैं। किसी रेत के तूफ़ान में, किसी गहरे गड्ढे में। किसी को ख़बर तक नहीं होती। पर आप समझदार आदमी हैं। आप ऐसी नादानी नहीं करेंगे।"

"घबराइए मत, डॉक्टर शिवांश। आपकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी। बस उसका फल कोई और खाएगा। अड़तालीस घंटे। उससे पहले, वो पत्थर सतह पर आ जाना चाहिए। और वो आएगा। मैं ख़ुद इसकी निगरानी करूँगा।"

पर किआरा की नज़र करमवीर पर नहीं थी, न नागपाल पर। उसकी नज़र शिवांश पर थी। और उसने देखा कि उसने विरोध तो किया, पर उतना नहीं जितना पहले करता। उसकी आँखों में एक अजीब ठंडक थी, एक दूरी। जैसे वो इस लड़ाई में आधे मन से खड़ा हो। और वो ठंडक, किआरा को उन लाठियों से ज़्यादा डरा गई।

उस रात, किआरा शिवांश के पास गई। भीड़ छँट चुकी थी। वो अपने तंबू के बाहर बैठा था, अकेला, और उसके चेहरे पर वो नयी, अनजानी सर्दी थी।

"तुम बदल गए हो, शिवांश। दो दिन में। मैं तुम्हें देख कर बता सकती हूँ। कोई तुम्हारे कान में कुछ भर रहा है। मुझे उसकी बू आती है। उसकी बू, तहख़ाने जैसी ठंडी। तक्षक तुम्हारे पास आया है, है ना?"

"कोई मेरे कान में कुछ नहीं भर रहा, किआरा। बस पहली बार, कोई मुझसे सच बोल रहा है। बिना डर, बिना पहरे, बिना ये सोचे कि सच सुन कर मैं क्या करूँगा।"

"वो तक्षक है, शिवांश। वो सौ साल पुराना झूठ है। वो तुम्हारी मौत का ज़िम्मेदार है। और तुम उसे सच बोलने वाला कह रहे हो?"

"उसने मुझसे एक सवाल पूछा, किआरा। और मैं तब से वो सवाल सोच रहा हूँ। तुम मुझसे प्यार करती हो, या तुम बस अपना वो सौ साल पुराना गुनाह धोना चाहती हो? क्या मैं तुम्हारे लिए एक इंसान हूँ, या एक मौक़ा, जिससे तुम ख़ुद को माफ़ कर सको?"

"तुम्हें सच जानना है? हाँ, मैं ख़ुद को माफ़ करना चाहती हूँ, सौ साल से चाहती हूँ। पर तुमसे प्यार, वो अलग है, शिवांश। मैंने तुम्हें तब भी चाहा जब तुम एक अजनबी थे, जिसकी कलाई पर बस एक निशान था, तुम्हारी याद लौटने से बहुत पहले। तुम मेरा गुनाह नहीं हो। तुम वो एकमात्र वजह हो, जिसके सहारे मैं ये सौ साल की सज़ा काट पाई।"

और वो सवाल किआरा को भी चीर गया। क्योंकि वो जानती थी कि इसमें एक छोटा सा, ज़हरीला सच था। उसका अपराधबोध और उसका प्यार, वो सौ साल से इतने उलझे हुए थे कि वो ख़ुद भी उन्हें अलग नहीं कर पाती थी। और तक्षक ने ठीक उसी उलझन पर उँगली रख दी थी।

"शिवांश, सुनो। मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूँ। वो पूरा सच, जो मैंने आज तक तुमसे छिपाया है। उस रात के बारे में। मेरे बारे में। जो हुआ, उसके पीछे का सच। अगर तुमने वो सुन लिया, तो शायद..."

"बस, किआरा। और सच नहीं। हर बार तुम्हारा एक नया सच होता है, एक नई परत। पहले तुम इंसान थीं, फिर नागिन। पहले तुमने मुझे बचाया, फिर तुमने मुझे मरने दिया। पहले तुम मुझसे प्यार करती थीं, अब तुम अपना गुनाह धो रही हो। मैं तुम्हारी परतों में थक गया हूँ। मुझे सोचना है। अकेले।"

और वो लफ़्ज़, जो किआरा के होंठों पर था, फिर वापस अंदर चला गया। दूसरी बार। पहली बार उसने ख़ुद को रोका था, डर से। इस बार, शिवांश ने उसे रोक दिया, अपने ग़ुस्से से। और वो सच, जो शायद दोनों को बचा सकता था, फिर एक रात के लिए, अनकहा रह गया।

"ठीक है। सोच लो। पर एक बात याद रखना, शिवांश। तक्षक तुम्हें जीने का रास्ता दिखा रहा है, ये सच है। पर वो रास्ता एक क़ब्रिस्तान से होकर जाता है। और उस क़ब्रिस्तान की पहली क़ब्र, तुम्हारी अपनी होगी।"

पर उसकी बात हवा में रह गई। शिवांश उठ कर, अँधेरे में, टीलों की तरफ़ चल दिया। उसी तरफ़, जहाँ तक्षक इंतज़ार करता था। और किआरा वहीं खड़ी रह गई, अपने सीने में एक डूबता हुआ पत्थर लिए। वो उसे खो रही थी। दूसरी बार, वो उसे खो रही थी। और इस बार, मौत से नहीं, एक ज़हर से।

टीलों के पार, चाँद के नीचे, तक्षक खड़ा इंतज़ार कर रहा था, जैसे उसे पता था कि शिवांश आएगा। और वो आया। धीमे क़दमों से, सिर झुकाए, पर आया।

"मुझे पता था तुम आओगे, पृथ्वी। समझदार लोग सच के पास लौट ही आते हैं। बोलो। क्या सोचा तुमने?"

और उसी वक़्त, अँधेरे में, चुपचाप, किआरा उसके पीछे आ गई थी। वो दूर, एक चट्टान की ओट में खड़ी थी, और उसने देखा, अपने प्यार को, अपने सबसे पुराने दुश्मन के सामने खड़ा। और उसकी साँस रुक गई।

"मैंने सोच लिया। तुम सही कहते हो। मैं हर बार किसी और के फ़ैसले पर नहीं जी सकता। न उसके, न मौत के। बताओ, तक्षक। वो रास्ता क्या है? मैं सुनने के लिए तैयार हूँ।"

और चट्टान की ओट में, किआरा का दिल एक पत्थर की तरह नीचे गिरा। उसने ये सुना। अपने कानों से सुना। उसका पृथ्वी, उसका शिवांश, तक्षक के सामने झुक रहा था। उसने अपना हाथ मुँह पर रखा, ताकि उसकी सिसकी बाहर न निकले।

"नहीं... शिवांश, नहीं। तुम नहीं।"

और तक्षक मुस्कुराया, और शिवांश को अपने साथ, अँधेरे में और गहरे, ले चला। किआरा वहीं जमी रह गई, टूटी हुई, ठगी हुई। उसका दुश्मन जीत रहा था, और उसका प्यार, उसका साथ दे रहा था।

पर एक सवाल हवा में तैरता रह गया, जिसका जवाब न किआरा के पास था, न सुनने वालों के पास। शिवांश की आँखें, जब उसने तक्षक से वो बात कही, तो उनमें एक ठंडक थी, ये सच था। पर वो ठंडक टूटे हुए दिल की थी, या किसी और चीज़ की? क्या वो सच में गिर गया था, तक्षक के झूठ में, अपने ही ज़ख़्म के हाथों? या वो एक शिकारी बन कर, अपने दुश्मन के बिल में, उसकी चाल जानने उतर गया था, ये जानते हुए कि दुश्मन को हराने के लिए, पहले उसका भरोसा जीतना पड़ता है? कोई नहीं जानता था। और नागमणि की रात, अब बस कुछ ही दिन दूर थी।

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