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Chapter 13 of 27 11 min read

मणि की पुकार

नागमणि की रात by Avni Oberoi

सरपगढ़ के ऊपर रात उतरी, पर आज की रात औरों जैसी नहीं थी। तहख़ाने की बाहरी दीवार टूट चुकी थी, और उस दरार से, ज़मीन के बहुत नीचे से, एक रोशनी रिस रही थी। नीली, ठंडी, और धड़कती हुई। जैसे धरती के सीने में कोई दिल जाग गया हो।

और वो दिल किसी को नहीं, सिर्फ़ एक को पुकार रहा था। हर धड़कन के साथ वो पुकार किआरा के अपने लहू में उतरती जा रही थी, सौ साल पुरानी, जानी-पहचानी, और आज पहली बार, इतनी तेज़।

कैंप के किनारे, अँधेरे में खड़ी किआरा ने अपनी हथेली रेत पर टिका दी। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। और उन उँगलियों की खाल पर, एक पल के लिए, महीन चाँदी जैसी चमक तैर गई। शल्क। फिर ग़ायब।

"चुप हो जा... अभी नहीं। तेरी रात अभी कुछ हफ़्ते दूर है। सौ साल मैंने तुझे थामे रखा है, आज की रात मुझे मत हरा।"

पर मणि सुन नहीं रही थी। जितनी वो नीचे जागती, उतना किआरा का इंसानी रूप ऊपर डगमगाता। यही उसका सबसे बड़ा डर था। कि जिस चीज़ की वो पहरेदार थी, वही चीज़ उसे उसके भेस से खींच कर बाहर ले आएगी, सबके सामने।

तभी रेत पर क़दमों की आहट हुई। किआरा ने आँखें भींचीं, एक गहरी साँस ली, और अपनी खाल को वापस इंसानी बना लिया, ठीक उस पल जब एक टॉर्च की रोशनी उसकी पीठ पर आ पड़ी।

"किआरा? इतनी रात को, यहाँ, अकेले? मैंने तुम्हें टेंट से निकलते देखा तो पीछे आ गया। तुम काँप रही हो। तबीयत ठीक तो है?"

"कुछ नहीं, साहब। बस रेगिस्तान की रात ठंडी होती है। और ये टूटा हुआ तहख़ाना... इसके पास नींद नहीं आती।"

"मुझे भी नहीं आती। जब से उस आख़िरी पत्थर के पीछे वो रोशनी दिखी है, मैं रात-रात भर जागता हूँ। ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे नीचे बुला रहा है, नाम लेकर। पागलपन है ना?"

किआरा का दिल एक धड़कन को रुक गया। वो पुकार, जो उसके लहू को चीर रही थी, अब उस इंसान को भी सुनाई देने लगी थी, जिसकी रगों में कभी एक पहरेदार का लहू बहता था। मणि उसे भी पहचानने लगी थी।

"पागलपन नहीं, शिवांश। ख़तरा। जो चीज़ बुलाती है, वो हमेशा गोद में बिठाने के लिए नहीं बुलाती। कभी-कभी वो निगलने के लिए बुलाती है। उस रोशनी के पास मत जाना। मेरे लिए।"

"तुम जब भी डरती हो, तो मुझे बचाने लगती हो। कोई बताए तो, यहाँ गाइड कौन है और सैलानी कौन?"

किआरा जवाब नहीं दे पाई। उसी पल मणि ने फिर पुकारा, इतने ज़ोर से कि उसके घुटने एक इंच झुक गए और उसकी नज़र एक साँस के लिए सुनहरी हो उठी। उसने झट से मुँह फेर लिया, अँधेरे में, ताकि वो न देख सके।

"सो जाओ, साहब। सुबह जल्दी काम है।"

और वो तेज़ क़दमों से अँधेरे में गुम हो गई। शिवांश वहीं खड़ा रहा, टॉर्च की रोशनी उस ख़ाली रेत पर, जहाँ अभी वो खड़ी थी। उसने कुछ देखा था। उसकी आँखों में, एक पल को, कुछ सुनहरा। और उसका दिमाग़, जो हर चीज़ का सबूत माँगता था, आज पहली बार, सबूत माँगते हुए भी डर रहा था।

सुबह हुई, और रेगिस्तान फिर तपने लगा। कैंप की रसोई के पास, मनोहर एक बड़े पतीले में चाय चढ़ाए, अपनी आदत के मुताबिक़, बिना रुके बोल रहा था। और उसके सामने, हाथ में एक फ़ाइल थामे, नव्या खड़ी थी, माथे पर वो बल जो पिछले कुछ दिनों से जाता ही नहीं था।

"अरे नव्या बिटिया, चाय पियो! दो घूँट अंदर जाएँगे तो ये जो तुम्हारे माथे पर सवाल का पहाड़ खड़ा है ना, वो पिघल जाएगा। और मेरी किआरा बिटिया कहाँ है? उसके बिना तो रसोई भी उदास लगती है।"

"मनोहर जी, यही तो बात है। किआरा। मैंने उसे परसों रात मंदिर की उस दीवार पर हाथ फेरते देखा, और वो लिखाई जो हम हफ़्तों से नहीं पढ़ पाए, वो ऐसे बुदबुदा रही थी जैसे कोई लोरी हो। कोई गाइड इतना नहीं जानती। मुझे डर लगता है।"

"अरे इसमें डर की क्या बात! सरपगढ़ की मिट्टी में ही ज्ञान है, बिटिया। मेरी दादी भी बिना पढ़े नाग देवता के सारे मंतर सुना देती थीं। किआरा इसी गाँव की बेटी है, उसे पत्थर बोलते हैं तो हैरानी कैसी? भोली-भाली लड़की है, दिन में तीन बार मेरे लिए भी दुआ माँगती है।"

मनोहर की हँसी अभी बीच में ही थी कि एक लंबी परछाईं उन तीनों पर आ पड़ी। किआरा, जो अभी-अभी आई थी, ठिठक गई। और सामने खड़ा था ठाकुर करमवीर सिंह, सफ़ेद कुर्ता, मूँछों पर ताव, और वो मख़मली मुस्कान जिसके नीचे हमेशा एक छुरी छिपी रहती थी।

"वाह। पूरी रसोई एक अकेली गाइड की तारीफ़ में लगी है। बेटी, ज़रा मेरे पास आना। बरसों से इस गाँव में मेरा राज है, हर चेहरा मेरा जाना-पहचाना है। पर तेरा चेहरा... मुझे याद नहीं आता। किसकी बेटी है तू? बाप का नाम क्या है?"

एक साधारण-सा सवाल। पर किआरा जानती थी कि नव्या की शक भरी बातें अब इस भेड़िये के कान तक पहुँच चुकी थीं। एक ग़लत नाम, और ठाकुर उसे गाँव के काग़ज़ों में ढूँढ निकालता। उसकी ज़बान एक पल को रुकी।

"अरे ठाकुर साहब, इसे क्यों नहीं याद! ये अपने रामधन काका की भांजी है ना, जो पीपली गाँव वाले... मतलब... नहीं नहीं, गोकुल की साली की बेटी, जो पंद्रह साल पहले शहर चली गई थी, और अब लौट आई! है ना बिटिया?"

और यहीं मनोहर की मदद ख़तरा बन गई। क्योंकि ठाकुर की आँखें सिकुड़ीं। रामधन काका की कोई भांजी नहीं थी, ये आधा गाँव जानता था। मनोहर ने अपनी लगाम में उसे बचाने के चक्कर में, एक ऐसा झूठ बोल दिया था जो पकड़ में आते ही उसे और फँसा देता।

"मनोहर काका को उम्र में सब रिश्ते उलझ जाते हैं, ठाकुर साहब। मेरे पिता यहीं के थे, नागों के पुराने सेवकों में से। हम बरसों पहले गाँव छोड़ गए थे, इसीलिए आप मुझे नहीं जानते। पर ये मिट्टी मुझे जानती है। बस इतना काफ़ी है।"

"नागों के सेवक। दिलचस्प। इस पूरे गाँव में एक तू ही है जो उस मंदिर से डरती नहीं। बाक़ी सब उसका नाम लेते ही थूकते हैं, और तू उसके तहख़ाने के पास सोती है। मुझे ऐसी बहादुरी अच्छी लगती है, बेटी। पर बहुत ज़्यादा बहादुरी, कभी-कभी, राज़ बन जाती है।"

"ठाकुर साहब, किआरा हमारी टीम की सबसे मेहनती इंसान है। इसके बिना ये खुदाई आधी भी न होती। मैं... मैं ख़ुद इसकी ज़िम्मेदारी लेती हूँ।"

और ये कह कर नव्या ख़ुद चौंक गई। वही नव्या, जिसने कुछ रोज़ पहले इसी ठाकुर के कान में इसी गाइड के ख़िलाफ़ शक के बीज बोए थे, अब उसी गाइड के आगे ढाल बन कर खड़ी थी। शक करना एक बात थी। किसी भेड़िये के मुँह में अपने साथी को छोड़ देना, बिलकुल दूसरी।

"अरे, मैं तो बस बातचीत कर रहा था। गाँव का बड़ा हूँ, हाल-चाल पूछना मेरा फ़र्ज़ है। पर याद रखना, बेटी। इस रेगिस्तान में जो चीज़ ज़मीन के नीचे दबी है, वो अब बहुत लोगों को दिखने लगी है। और छिपी चीज़ें, ज़्यादा दिन छिपी नहीं रहतीं। ना पत्थर, ना इंसान।"

और वो अपनी छड़ी ठकठकाता चला गया, पीछे धूल और एक ठंडक छोड़ कर। मनोहर ने एक लंबी साँस छोड़ी, माथे का पसीना पोंछा।

"हे नाग देवता। मैंने तो रामधन काका की भांजी बना डाली तुझे। बिटिया, माफ़ कर देना, घबराहट में जो मुँह में आया बोल दिया। पर उस ठाकुर की आँखें अच्छी नहीं। साँप जैसी हैं। ठंडी।"

"साँप जैसी। काका, आप नहीं जानते आपने कितनी सही बात कह दी।"

दिन ढला, और शाम की सुरमई रोशनी में तहख़ाने की वो नीली धड़कन और तेज़ हो गई। किआरा को उधर नहीं जाना था, पर मणि की पुकार अब उसे खींच रही थी, रस्सी की तरह। वो ख़ुद को रोक नहीं पाई। पैर अपने-आप उस टूटी दीवार की तरफ़ बढ़ गए।

और जैसे-जैसे वो पास पहुँची, उसका काबू रेत की तरह उसकी मुट्ठी से बहने लगा। साँसें फुफकार में बदलने लगीं। रीढ़ की हड्डी में वो पुरानी लहर दौड़ी। उसकी आँखें, दोनों, पूरी तरह सुनहरी हो उठीं, और गर्दन की खाल पर शल्क उभर आए, चमकते हुए।

"नहीं... रुक... मैं किआरा हूँ... मैं इंसान हूँ... मैं..."

और ठीक उसी पल, जब उसका रूप आधा इंसान, आधा नागिन था, जब उसके हाथ की खाल चाँदी में बदल रही थी, पीछे से एक आवाज़ आई। शिवांश। वो उसका पीछा करते हुए यहाँ आ गया था। और उसने सब देख लिया।

"किआरा..."

वो पलटी। और एक पल को, दो अलग दुनियाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। एक इंसान, जिसका दिमाग़ चीख रहा था कि ये नामुमकिन है। और एक नागिन, जिसका सौ साल पुराना राज़, आख़िरकार, उसके अपने प्यार की आँखों के सामने खुल गया था। किआरा के गालों पर आँसू थे, और आँखें अब भी सुनहरी।

"देखो मत, शिवांश। प्लीज़, मुझे ऐसे मत देखो। मुँह फेर लो। भाग जाओ। अभी भी वक़्त है... अभी भी तुम इसे बुख़ार समझ सकते हो, एक सपना समझ सकते हो..."

और शिवांश ने वही किया, जो किसी और ने न किया होता। वो भागा नहीं। वो चीख़ा नहीं। वो एक क़दम, फिर दूसरा, उसकी तरफ़ बढ़ा, धीरे-धीरे, जैसे कोई किसी घायल जानवर के पास जाता है, ताकि वो डर कर भाग न जाए।

"मैं भाग गया, तो तुम अकेली रह जाओगी। और मैं तुम्हें फिर से अकेला नहीं छोड़ूँगा। तुम जो भी हो, किआरा। इंसान, नागिन, कुछ और। मैं वही देख रहा हूँ जो मैं पूरी उम्र सपनों में देखता आया हूँ। और वो चीज़ मुझे डराती नहीं।"

और उसने अपना हाथ उठा कर, उसकी शल्क भरी कलाई थाम ली। इंसान की गरम उँगलियाँ, नागिन की ठंडी खाल पर। और अजीब बात, उस छुअन से किआरा का कँपकँपाता रूप ठहर गया। पुकार धीमी पड़ गई। सुनहरी आँखें फिर काली होने लगीं। जैसे उसका डगमगाता तूफ़ान, बस उसके एक स्पर्श से शांत हो गया हो।

"तुम्हें डरना चाहिए। जिसने भी मुझे बिना डरे देखा, उसने अपनी जान से क़ीमत चुकाई।"

"तो शायद मैं भी चुकाऊँगा। पर आज नहीं। आज मैं बस ये जानता हूँ कि जिस राज़ की तुम पहरेदारी कर रही हो, वो तुम्हें अंदर से खा रहा है। और मैं तुम्हें इस तरह टूटते हुए नहीं देख सकता।"

उस पल, उस टूटी दीवार के सामने, उस धड़कती नीली रोशनी के आगे, शिवांश के अंदर एक फ़ैसला जन्म ले रहा था। एक ऐसा फ़ैसला जो उसकी पूरी ज़िंदगी की मेहनत, उसके करियर, उसके नाम के परमिट, सबके ख़िलाफ़ था।

उसने किआरा का हाथ थामे-थामे, ख़ुद से, चुपचाप, एक बात तय कर ली। वो अब इस मणि को नहीं निकालेगा। वो अपनी ही खुदाई रोक देगा। जो भी उस तहख़ाने में बंद था, जिसकी हिफ़ाज़त में ये लड़की सौ साल से टूट रही थी, वो उसे बाहर नहीं आने देगा। भले ही इसके लिए उसे पूरी दुनिया से लड़ना पड़े।

"कल से ये खुदाई रुकेगी, किआरा। मैं परमिट लौटा दूँगा। जो नीचे है, उसे नीचे ही रहने दूँगा। तुम्हारे लिए। बस, मुझ पर भरोसा करो।"

पर तक़दीर, और तक्षक, दोनों इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं थे। ठीक उसी पल, जब शिवांश अपनी खुदाई रोकने की क़सम खा रहा था, कैंप के दूसरे छोर पर, अँधेरे को चीरती हुई कई गाड़ियों की हेडलाइटें जल उठीं।

लाठियाँ थामे, चेहरे बाँधे, ठाकुर करमवीर के आदमी, एक-एक कर के, कैंप की ओर बढ़ रहे थे। उनके इरादे साफ़ थे। खुदाई अब शिवांश की मर्ज़ी से नहीं, ठाकुर की ताक़त से होगी। मणि किसी परमिट का इंतज़ार नहीं करेगी। वो आज रात, ज़ोर-ज़बरदस्ती से, इस ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने आए थे। शिवांश ने अभी-अभी अपनी खुदाई रोकने का फ़ैसला किया था, और तक़दीर ने ठीक उसी पल, वो फ़ैसला उसके हाथ से छीनने के लिए, अपने बीस आदमी भेज दिए थे।

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