DesiHub

अध्याय 5 / 27 पढ़ने में 10 मिनट

लहू की पहचान

नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi

सुरंग की गहराई में हवा भारी थी, और मशालों की रोशनी में धूल तैर रही थी। शिवांश आगे था, हमेशा की तरह सबसे आगे, एक कमज़ोर दीवार से रेत खुरचता हुआ, जब छत ने पहली बार आह भरी।

"शिवांश, रुको! ये पत्थर मत हटाओ, ये पूरी छत को थामे है! पीछे हटो, अभी!"

"बस एक पल, किआरा। इसके पीछे कुछ है, मुझे दिख रहा है, एक खोखली जगह..."

और तभी छत चीख़ी। पत्थर पर पत्थर सरका, एक दरार बिजली की तरह छत पर दौड़ी, और फिर, एक भयानक गड़गड़ाहट के साथ, सुरंग की पूरी छत का एक हिस्सा नीचे आ गिरा, ठीक वहाँ जहाँ शिवांश खड़ा था।

"शिवांश!"

धूल का एक बादल उठा और सब कुछ ढक गया। जब वो बैठा, तो जहाँ शिवांश खड़ा था, वहाँ सिर्फ़ मलबे का एक ढेर था। पत्थर, रेत, और ख़ामोशी। एक ऐसी ख़ामोशी जो किआरा ने सौ साल पहले भी सुनी थी।

"साहब! साहब दब गए! जल्दी, कुदाल लाओ, फावड़े लाओ! हे भगवान, मैंने कहा था ना, ये जगह श्रापित है!"

पर किआरा ने कुदाल का इंतज़ार नहीं किया। इंसानी हाथों की रफ़्तार से वो उसे नहीं निकाल सकती थी, और उसके पास वक़्त नहीं था। एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, उसने सौ साल की एहतियात को हवा में उड़ा दिया।

उसकी आँखें सोने की तरह जल उठीं। और उसने अपने हाथ मलबे में डाले, और उन पत्थरों को यूँ फेंकना शुरू किया जैसे वो तिनके हों। जो चट्टानें दस मज़दूर नहीं हिला सकते थे, उन्हें एक अकेली लड़की एक-एक कर के उछाल रही थी। मशाल की धुँधली रोशनी में, धूल की आड़ में, नागिन अपनी असली ताक़त से लड़ रही थी।

"तुम मरोगे नहीं। इस बार नहीं। सुन रहे हो? इस बार मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगी!"

धूल का बादल इतना घना था कि किसी ने उसके हाथों की असली रफ़्तार नहीं देखी। मनोहर पीछे कुदाल ढूँढ रहा था, मज़दूर एक दूसरे से टकरा रहे थे, और उस अफ़रा-तफ़री की आड़ में, नागिन ने पहाड़ को हिला दिया।

और फिर उसकी उँगलियाँ एक हाथ से टकराईं। गरम। ज़िंदा। उसने आख़िरी पत्थर हटाया और उसे खींच निकाला, बेहोश, धूल में सना, पर साँस लेता हुआ। और उसी पल, जब उसने उसे अपनी बाँहों में खींचा, उसकी नंगी कलाई उसकी त्वचा से छू गई। वही कलाई। वही निशान।

और दुनिया ग़ायब हो गई।

दोनों पर एक साथ एक दृश्य टूट पड़ा। रेत का तूफ़ान। एक जलता हुआ पत्थर। एक तहख़ाना। और उस याद के अंदर, एक जवान आवाज़, गरम और जीती-जागती, जो सौ साल से ख़ामोश थी।

"किआरा, अगर आज हम बच गए, तो मैं तुम्हें ये पूरा आसमान दूँगा। मंदिर की छत पर बैठ कर तारे गिनेंगे, तुम और मैं, सारी रात।"

"तुम पहरेदार हो, पृथ्वी, तारे गिनने वाले नहीं। पर हाँ। अगर हम बच गए। अगर।"

और फिर वो जवान आवाज़ बदल गई, हँसी से चीख़ में। तहख़ाने में एक नाग का फन उठा। दो लोग एक दूसरे की तरफ़ हाथ बढ़ाए, और उनके बीच अँधेरा गिरता हुआ। एक हाथ जो दूसरे तक कभी नहीं पहुँचा। एक चीख़। एक मौत। और एक वादा, राख से भी ठंडा।

किआरा के लिए वो याद थी। शिवांश के लिए वो सपना था, वही सपना जो उसे बचपन से आता था, पर इस बार इतना साफ़, इतना क़रीब, कि उसका पूरा शरीर काँप उठा। पहली बार, सपने की उस औरत का चेहरा धुँधला नहीं था।

"नहीं! रुको, रुको मत जाओ! कहाँ... कहाँ है वो? वो जलता हुआ पत्थर... वो औरत..."

उसने आँखें खोलीं, और सबसे पहले जो चीज़ उसे दिखी, वो किआरा का चेहरा था, ठीक उसके ऊपर, धूल में सना, आँखों में आँसू। वही चेहरा जो अभी उसके सपने में था। वही चेहरा जो सौ रातों से उसके सपने में था।

"तुम। सपने में जो औरत थी... वो तुम थीं। हमेशा तुम थीं। मैं सौ बार तुम्हारी तरफ़ हाथ बढ़ाता रहा और हर बार अँधेरा तुम्हें ले जाता रहा। किआरा, ये क्या हो रहा है मेरे साथ?"

"कुछ नहीं, साहब। आप बेहोश थे, आपने बुरा सपना देखा। मैंने बस आपको मलबे से निकाला। और कुछ नहीं। और कुछ नहीं हुआ।"

"बुरा सपना? उस सपने में तुमने मेरा नाम लिया था, किआरा। कोई और नाम, कोई पुराना नाम। और मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हें पूरा आसमान दूँगा। मैं ये कैसे जानता हूँ? मैं तुम्हें कल तक जानता ही नहीं था।"

"आपको चोट लगी है, साहब। सिर पर। दिमाग़ ऐसे में उल्टी-सीधी बातें जोड़ता है। आराम कीजिए। मैं मनोहर को भेजती हूँ।"

पर उसके अपने हाथ काँप रहे थे। क्योंकि किआरा को उस पल एक बात समझ आ गई, वो बात जो सब कुछ बदल देने वाली थी, वो बात जिससे वो सबसे ज़्यादा डरती थी।

यादें सिर्फ़ उसकी नहीं थीं। वो शिवांश में भी लौट रही थीं। पृथ्वी की रूह जाग रही थी, इस नए शरीर के अंदर, धीरे-धीरे, याद-दर-याद। और इसका मतलब था कि ये आदमी सिर्फ़ एक ख़तरा नहीं था जिसे उसे दफ़न करना था। ये एक ज़ख़्म था, जो फिर से खुल रहा था। उसका अपना ज़ख़्म।

"तुम झूठ बोल रही हो। मैं देख सकता हूँ। जब तुमने मुझे छुआ, मैंने कुछ देखा। और तुमने भी देखा। तुम्हारी आँखों में मैंने वही डर देखा जो मेरे अंदर है। किआरा, तुम कौन हो? सच बताओ, तुम कौन हो?"

और एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, किआरा के होंठ खुले। सौ साल का सच उसकी जीभ पर आ गया। मैं वो नागिन हूँ जिसने तुम्हें मरते देखा। तुम पृथ्वी हो। हम एक दूसरे से प्यार करते थे। पर तभी मनोहर और मज़दूर धूल चीरते हुए पहुँच गए।

"साहब ज़िंदा हैं! भगवान का लाख-लाख शुक्र! बिटिया, तूने अकेले इतना मलबा हटा दिया? ये कैसे? चमत्कार है, चमत्कार! नागिन ने आज तुझ पर रहम कर दिया!"

किआरा ने कुछ नहीं कहा। नागिन ने रहम नहीं किया था। नागिन ने ख़ुद, अपने हाथों से, अपनी क़सम तोड़ी थी। और मनोहर, हमेशा की तरह, सच के इतना पास खड़ा था कि उसे छू सकता था, पर देख नहीं सकता था।

उस रात किआरा मंदिर की एक टूटी दीवार पर अकेली बैठी रही, अपने काँपते हाथों को देखते हुए, वो हाथ जिन्होंने अभी उसे बचाया था। भैरवी ने कहा था, उसे मत छूना, दिल से मत छूना। और उसने पहले ही मौक़े पर उसे बाँहों में भर लिया था।

"मैं तुम्हें रोकने आई थी, पृथ्वी। दफ़नाने आई थी। और आज मैंने पहाड़ चीर दिए ताकि तुम एक साँस और ले सको। मैं कैसी पहरेदार हूँ, जो अपने ही दुश्मन के लिए मौत से लड़ पड़ी।"

पर सबसे बड़ा डर ये नहीं था कि उसने क़सम तोड़ी। सबसे बड़ा डर ये था कि अब वो अकेली इस राज़ को नहीं ढो रही थी। यादें उसमें भी लौट रही थीं। और एक याददाश्त वाला पृथ्वी, एक ऐसे सच के इतना क़रीब था जो उसे या तो उसके पास वापस ले आता, या दूसरी बार मार डालता।

उस रात कैंप जल्दी सो गया, हादसे से थका हुआ। शिवांश को आराम करने को कहा गया था। पर पृथ्वी की रूह, जो अब जाग चुकी थी, उसे सोने नहीं दे रही थी।

"वो लिपि जो वो पढ़ गई। वो चेहरा जो मेरे सपने में है। वो पत्थर जो मुझे बचपन से जलता दिखता है। सब कुछ इसी मंदिर की तरफ़ इशारा कर रहा है। और मुझे आज रात जवाब चाहिए।"

मशाल थामे, अकेला, वो फिर सुरंग में उतरा, उसी जगह जहाँ आज उसकी जान गई थी। पर आज वो डर नहीं रहा था। जैसे कोई अनदेखी डोर उसे अंदर खींच रही थी, तहख़ाने की तरफ़, मणि की तरफ़, अपने ही अतीत की तरफ़।

अजीब बात थी। सुबह इसी सुरंग ने उसे मारने की कोशिश की थी, और आज रात वो ख़ुद, अकेला, बिना किसी को बताए, उसी में लौट आया था। जैसे उसका कोई हिस्सा जानता हो कि उसे यहीं होना चाहिए, कि ये मंदिर उसका दुश्मन नहीं, उसका घर है। एक ऐसा घर जिसे वो भूल चुका था।

"यहीं कहीं। ये पत्थर... ढीला है। इसके पीछे कुछ है। खोखला।"

उसने उँगलियाँ दरार में डालीं और पत्थर को खींचा। वो हिला, फिर सरका, और फिर एक धीमी घिसटन के साथ बाहर आ गया, और उसके पीछे एक छोटा सा ताख़ खुला, जिसमें सौ साल से किसी की नज़र नहीं पड़ी थी।

"ख़ज़ाना नहीं है ये। कोई मूरत है। किसी का चेहरा। पत्थर में खुदा हुआ, इतना बारीक..."

और जैसे-जैसे मशाल की रोशनी उस चेहरे पर पड़ी, शिवांश की साँस गले में अटक गई। क्योंकि पत्थर में खुदा वो चेहरा किसी अजनबी का नहीं था।

"ये... ये तो मैं हूँ।"

वही जबड़ा। वही आँखें। वही होंठ, वही कंधों का झुकाव। सौ साल पुराने पत्थर में, हूबहू शिवांश का अपना चेहरा। उसी पहरेदार का चेहरा, जिसे वो जानता नहीं था कि वो ख़ुद था।

"ये नामुमकिन है। ये पत्थर सौ साल पुराना है। मैं... मैं कैसे... मैं इस दीवार पर कैसे हूँ?"

"कोई पूर्वज होगा। मेरा कोई परदादा, जो इस मंदिर से जुड़ा था। हाँ, यही होगा। ख़ून का चेहरा पीढ़ियों में लौटता है। ये विज्ञान है, ये... पर मेरा ख़ानदान तो दिल्ली का है। हम राजस्थान से कभी नहीं जुड़े। हम कभी सरपगढ़ नहीं आए।"

एक-एक कर के उसके सारे तर्क रेत की तरह भुरभुरा रहे थे। कोई पूर्वज नहीं। कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं। बस एक पत्थर, जिसमें उसका अपना चेहरा उसे वापस घूर रहा था, सौ साल पार से।

और फिर उसकी मशाल थोड़ी और नीचे झुकी, और उसने देखा कि उस पहरेदार के चेहरे के पास, पत्थर में, कोई और भी खुदा था। एक नागिन। पर दुश्मन की तरह नहीं। उसके गले से लिपटी हुई, उसके कंधे पर सिर रखे, ठीक वैसे जैसे कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से लिपटती है।

"एक पहरेदार। और एक नागिन। जो... जो एक दूसरे से प्यार करते थे। मनोहर की कहानी। सौ साल पुरानी रात। ग़ायब पहरेदार। और वो नागिन जो अकेली रह गई।"

और अचानक उसे वो लड़की याद आई। किआरा। जो इस मंदिर की हर दरार जानती थी। जो मरी हुई ज़बान माँ-बोली की तरह पढ़ती थी। जिसका चेहरा उसके सपनों में सौ रातों से था। जिसने आज अकेले पहाड़ हटा कर उसे बचाया था। और जिसकी आँखें, एक पल को, धूल में सोने की तरह चमकी थीं।

"नहीं। नहीं, ये पागलपन है। पर अगर वो पहरेदार मैं हूँ... तो वो नागिन..."

एक सौ साल पुरानी दीवार पर, अपना ही चेहरा, और उससे लिपटी एक नागिन। शिवांश की मशाल काँपी, और सुरंग के अँधेरे में उसकी अपनी आवाज़ उसे अजनबी लगी, जब उसने पूछा, किसी से नहीं, सिर्फ़ पत्थर से, और शायद अपने ही सौ साल पुराने आप से।

"मैं कौन था? ... और वो कौन है?"

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।

नागमणि की रात