अध्याय 8 / 27 पढ़ने में 11 मिनट
झूठ और जड़ी
नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi
किआरा एक उस्तरे की धार पर दोहरा खेल खेलती है, तक्षक को झूठी ख़बर देती है कि खुदाई तहख़ाने की तरफ़ बढ़ रही है, जबकि सच में वो उसे रोज़ पीछे खींच रही है। शिलालेखों पर झुके-झुके वो और शिवांश और क़रीब आते हैं, और शिवांश उसे अपने उस सपने की बात बताता है जिसमें वो हर बार एक औरत को खोता है, यह जाने बिना कि वो औरत उसी के सामने बैठी है। इसी बीच नव्या, कैंप और शिवांश की सच्ची फ़िक्र में, गाइड पर अपने शक लेकर ठाकुर करमवीर के पास पहुँच जाती है, और अनजाने में किआरा के दुश्मन के हाथ में पहला सिरा थमा देती है।
रात का वो पहर, जब रेगिस्तान सबसे गहरी साँस लेता है। कैंप की मशालें बुझ चुकी थीं, तंबू ठंडी हवा में काँप रहे थे, और उन तंबुओं के बीच एक परछाईं बिना आहट फिसल रही थी।
किआरा तहख़ाने वाली सुरंग के मुँह पर झुकी। लकड़ी की जिस टेक पर कल शिवांश की टीम खुदाई आगे बढ़ाती, उसे उसने बस इतना ढीला किया कि सुबह इंजीनियर घंटों उसे दोबारा कसने में लगा दे। एक टेक, एक दिन। और एक दिन, यानी मणि से एक दिन और दूर।
आज उसका खेल दोहरा था, और दोनों तरफ़ मौत खड़ी थी। एक तरफ़ शिवांश, जिसे उसे तहख़ाने से दूर रखना था। दूसरी तरफ़ तक्षक, जिसे उसे यक़ीन दिलाना था कि वो उसका साथ दे रही है। एक को धीमा करना था, दूसरे को धोखा देना था, और दोनों को इसकी भनक तक नहीं लगनी थी।
और वो जानती थी कि रात की हर सरसराहट में उसके दुश्मन की आँखें बसी हैं। तो उसने रेत के अँधेरे की तरफ़ मुँह किया, और बहुत धीरे, जैसे कोई पैग़ाम छोड़ रहा हो, बोली।
"सुन रहा है ना, तक्षक? खुदाई ठीक अपनी राह पर है। इंसान रोज़ तहख़ाने की तरफ़ बढ़ रहे हैं। नागमणि की रात तक मुहर तेरी पहुँच में होगी, जैसा तूने चाहा। ... बस थोड़ा और सब्र रख। रानी अपना वादा निभा रही है।"
सच इसका ठीक उलटा था। इंसान तहख़ाने की तरफ़ नहीं, पीछे की तरफ़ जा रहे थे, और उन्हें पीछे खींचने वाला हाथ किआरा का ही था। पर तक्षक को यही सुनना था। और झूठ तभी चलता है, जब सुनने वाला उसे सच मानना चाहता हो।
सुबह हुई, और रात के झूठ की जगह दिन की जड़ी-बूटियों ने ले ली।
"अरे वाह बिटिया, वाह! ये तूने क्या घोल पिला दिया रामसिंह की माई को! रात-भर का बुख़ार पौ फटते ही उतर गया! तेरे हाथ में तो साक्षात नागदेवी बैठी हैं, मैं कहता हूँ। जो जड़ी तू पहचानती है, वो तो हमारे बड़े-बूढ़े भी भूल बैठे।"
"बस काका, दादी सिखा गई थीं। रेगिस्तान की हर झाड़ी किसी न किसी मर्ज़ की दवा है, बस पहचानने वाला चाहिए। इसमें कोई देवी नहीं, बस थोड़ी-सी पहचान है।"
"पहचान! अरे पहचान तो तेरी शिवांश साहब को भी ख़ूब है, बिटिया। कल तुझे वो पत्थर पढ़ते देख रहे थे तो ऐसे ताक रहे थे जैसे... जैसे कोई पंडित शादी का मुहूरत निकाल रहा हो! मैं तो कहता हूँ..."
"काका!" "तुम्हारी ज़बान को लगाम नहीं है। साहब सुन लेंगे तो मेरी नौकरी जाएगी, और तुम्हारी हँसी। जाओ, चाय चढ़ाओ, और ये अफ़वाहें अपने चूल्हे में झोंको।"
मनोहर हँसता हुआ चला गया, ये जाने बिना कि जिस जड़ी को वो नागदेवी का वरदान समझ रहा था, वही जड़ी दो मज़दूरों को हल्का बीमार भी कर गई थी, बस इतना कि वो आज कुदाल न उठा सकें। सुरंग फिर एक दिन के लिए सो गई। भोला काका उसी हाथ को पूज रहा था जो असली श्राप था।
दोपहर ढली, और किआरा को वहीं पहुँचना था जहाँ उसका दिल सबसे कमज़ोर पड़ता था। शिवांश के तंबू में, उन पुरानी लिखाइयों के बीच, उसके पास।
"किआरा, ज़रा इधर देखो। ये पंक्ति... मैं तीन दिन से इस पर अटका हूँ। लिपि जानी-पहचानी है, पर शब्द किसी शब्दकोश में नहीं मिलते। जैसे किसी ने जान-बूझ कर इसे उलझा कर लिखा हो।"
किआरा ने पत्थर पर झुक कर देखा। उसे पढ़ने की ज़रूरत नहीं थी। ये पंक्तियाँ उसने ख़ुद, सौ साल पहले, अपनी आँखों से इसी दीवार पर उभरते देखी थीं। पर उसने माथे पर वो नक़ली शिकन ओढ़ी, जो एक अजनबी के चेहरे पर होनी चाहिए।
"ये... शायद कोई चेतावनी है। यहाँ लिखा है, जो पहरेदार नहीं, वो इस दहलीज़ को पार न करे, वरना जगाने वाला ख़ुद हमेशा की नींद सो जाएगा। ये मंदिर की पुरानी बोली है, साहब। शब्दकोश में नहीं, गीतों में बची है।"
"गीतों में..." "तुम इसे ऐसे पढ़ती हो जैसे ये तुम्हारी माँ-बोली हो। कोई मज़दूर, कोई गाइड, ऐसी मरी हुई लिपि नहीं जानता, किआरा। तुम आख़िर किस किताब से निकल कर आई हो?"
"किसी किताब से नहीं। दादी हर रात यही गीत गा कर सुलाती थीं। बच्चा शब्द नहीं समझता, पर धुन याद रख लेता है। और फिर, इसी मंदिर की कहानियों में तो मैं पली-बढ़ी हूँ। बस इतनी-सी बात है।"
दो सिर एक पत्थर पर झुके थे, इतने पास कि साँसें आपस में मिल रही थीं। बीच में सौ बरस थे, और एक भी नहीं। किआरा को उसकी कलाई पर वो निशान दिख रहा था, नाग जैसा, पृथ्वी वाला, और उसे अपने हाथ रोकने पड़ रहे थे कि वो उसे छू न बैठें।
"किआरा, एक अजीब बात पूछूँ? तुम्हें कभी लगा है कि तुम किसी को जानती हो, उससे मिलने से भी पहले? जैसे कोई चेहरा तुम्हारे अंदर पहले से रहता हो, बरसों से।"
"क्यों पूछ रहे हो?"
"क्योंकि बचपन से एक सपना मुझे नहीं छोड़ता। एक औरत है उसमें। मैं उसका चेहरा साफ़ नहीं देख पाता था, बस उसकी आँखें, और उसका ग़म। हर सपने में मैं उसे खोता हूँ। हर बार। और जागता हूँ तो सीने में ऐसा दर्द जैसे किसी को सच में दफ़नाया हो। जिससे मैं कभी मिला ही नहीं, उसे मैं पूरी उम्र से रो रहा हूँ, किआरा।"
और किआरा को अपना पूरा ज़ोर लगाना पड़ा, हर बरस की पहरेदारी का सारा ज़ोर, कि उसका चेहरा पत्थर बना रहे। क्योंकि वो औरत, जिसे वो सौ साल से सपने में खोता आया था, इस वक़्त उसके ठीक सामने बैठी थी, और उसे रोने की भी इजाज़त नहीं थी।
"शायद..." "शायद वो कोई है जिसे तुमने सच में खोया हो, शिवांश। किसी और जनम में। कहते हैं ना, कुछ रिश्ते एक ज़िंदगी में पूरे नहीं होते, तो अगली में लौट आते हैं, किसी अधूरे सवाल की तरह।"
"अगले जनम में..." "मैं एक वैज्ञानिक हूँ, किआरा। मैं पत्थरों की उम्र नापता हूँ, हड्डियों की तारीख़ें निकालता हूँ। मैं जनम-जनम के क़िस्सों पर हँसता आया हूँ। पर तुम्हारे साथ बैठ कर ये बातें करना, बिल्कुल उसी सपने जैसा लगता है। सुकून भी, और डर भी। जैसे तुम्हें पा लेना और फिर खो देना, दोनों मेरी क़िस्मत में पहले से लिखे हों।"
"तो इस बार मत खोना। ... इस बार नहीं।"
शब्द उसके मुँह से फिसल गए, इससे पहले कि वो उन्हें रोक पाती। इस बार। जैसे कोई पिछली बार भी रही हो। शिवांश ने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा, होंठ कुछ पूछने को खुले, पर ठीक उसी पल तंबू का परदा हटा।
"शिवांश, मुझे तुमसे अकेले में बात करनी है।" "ज़रूरी बात है।"
नव्या अंदर आई, हाथ में एक फ़ाइल, आँखों में वो ठंडक जो किआरा के लिए दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही थी। किआरा उठ कर बाहर निकलने लगी, पर नव्या की आवाज़ ने उसे दरवाज़े पर ही रोक लिया।
"नहीं, किआरा, तुम भी सुन लो। शायद तुम ही कुछ समझा सको। शिवांश, पिछले दस दिन में हर देरी, हर हादसा, हर टूटा औज़ार, मैंने सब लिख रखा है। और हर बार, एक ही नाम इनके सबसे पास खड़ा मिलता है।"
"नव्या, तुम कहना क्या चाहती हो?"
"मैं कह रही हूँ कि सुरंग की टेक अपने आप ढीली नहीं होती। नक़्शे अपने आप ग़लत नहीं छपते। और जो लड़की इस गाँव में किसी और से ज़्यादा इस मंदिर के बारे में जानती है, वो हर रात कैंप से बाहर, अकेली, कहाँ जाती है? मैंने तुम्हें कल आधी रात को टीलों की तरफ़ जाते देखा था, किआरा।"
"मैं दुआ करने जाती हूँ, नव्या जी। मेरे लोग रात को नाग-देवता को दूध चढ़ाते हैं, ताकि ये खुदाई किसी की जान न ले। तुम्हें शक है, तो किसी रात मेरे साथ चल लेना। अपनी आँखों से देख लेना।"
"बस, नव्या। किआरा के बिना हम पहले ही हफ़्ते में भटक गए होते। उसने जितनी बार हमें बचाया है, उतनी बार तुम्हारी मशीनों ने नहीं। मुझे सबूत चाहिए, शक नहीं। और शक किसी बेगुनाह पर उँगली उठाने का हक़ नहीं देता।"
"ठीक है। पर जब सबूत मिलेगा, शिवांश, तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी। मैं तुम्हारी दोस्त हूँ, इसीलिए कह रही हूँ। और मैं किसी की मीठी सफ़ाई पर नहीं, अपनी आँखों पर भरोसा करती हूँ।"
नव्या तंबू से बाहर निकल गई, पर उसका मन शांत नहीं हुआ। शिवांश उस गाइड की आँखों में इतना डूबा था कि उसे और कुछ दिख ही नहीं रहा था। और अगर साहब नहीं सुनेगा, तो नव्या ने ठान लिया, वो किसी ऐसे के पास जाएगी जिसके पास इस ज़मीन पर हक़ है, इस गाँव में रुतबा है।
और सरपगढ़ में रुतबा सिर्फ़ एक आदमी के पास था। ठाकुर करमवीर सिंह। जिसके आदमी अब कैंप के किनारे तंबू गाड़ कर बैठ गए थे, सुरक्षा के नाम पर, पर उनकी बंदूक़ें कभी किसी चोर की तरफ़ नहीं तनीं। उनकी आँखें मशालों पर नहीं, ट्रेंचों पर टिकी रहती थीं, इसी घात में, कि कब मिट्टी में से कोई चमक फूटे, और वो झपट पड़ें। किआरा उन्हें रोज़ देखती थी, और हर रोज़ एक और गिनती अपने मन में जोड़ती थी।
उसी शाम, नव्या ठाकुर के डेरे पर पहुँची। मख़मली गद्दे, चाँदी का हुक़्क़ा, और एक मुस्कान जो चेहरे पर तो थी, पर आँखों में कहीं नहीं।
"आइए, आइए, बिटिया। शहर की पढ़ी-लिखी बेटी मेरे ग़रीबख़ाने पर। बैठिए, बैठिए। इस बूढ़े ठाकुर से क्या काम आन पड़ा? आपके साहब तो हमें घास भी नहीं डालते।"
"ठाकुर साहब, मैं एक फ़िक्र लेकर आई हूँ। हमारे कैंप में एक गाइड है, किआरा। वो इस मंदिर के बारे में इतना जानती है, जितना कोई गाँव वाला भी नहीं जानता। मरी हुई लिपि पढ़ लेती है, रात को अकेली टीलों में जाती है, और उसके पहुँचते ही खुदाई में एक के बाद एक अड़चनें शुरू हो गईं। मुझे डर है, वो हमें अंदर से नुक़सान पहुँचा रही है।"
और ठाकुर करमवीर की मुस्कान एक पल को जम गई। उसने हुक़्क़े का कश बीच में ही रोक लिया। किआरा। मरी हुई लिपि। रात के फेरे। ये लड़की उसे वो पत्ता थमा रही थी, जिसे वो हफ़्तों से ढूँढ रहा था, और उसे भनक तक नहीं थी कि वो पत्ता किसके हाथ में जा रहा है।
"अच्छा-अच्छा। और बताइए, बिटिया। ये किआरा, इसका कोई घर-बार? कोई ख़ानदान इस गाँव में? या ये यूँ ही, कहीं से, रेत के तूफ़ान के साथ आ टपकी?"
"यही तो सबसे अजीब है, ठाकुर साहब। किसी को नहीं पता वो कहाँ से आई। जिस दिन शिवांश ने खुदाई का परमिट खोला, ठीक उसी दिन वो कैंप के दरवाज़े पर खड़ी थी। जैसे... जैसे वो हमारा नहीं, इस मंदिर के खुलने का इंतज़ार कर रही हो।"
"बस, बस। आप निश्चिंत रहिए, बेटी। आपने बहुत अच्छा किया जो सीधे मेरे पास आईं। इस परेशान करने वाली लड़की का मैं ख़ुद... ख़याल रखूँगा। आप जाइए, और अपने साहब को इसकी भनक मत लगने दीजिए। बड़े लोगों के मामले, बड़े लोग ही सुलझाते हैं।"
और नव्या चली गई, इस तसल्ली के साथ कि उसने अपने कैंप की हिफ़ाज़त कर दी। उसे सपने में भी अंदाज़ा नहीं था कि उसने अभी-अभी अपने भेड़िये के हाथ में उस गड़रिये का सुराग़ थमा दिया है, जिसे वो सौ साल से ढूँढ रहा था। वफ़ादारी ने वो दरवाज़ा खोल दिया, जो नफ़रत नहीं खोल पाई थी।
"रघुवीर। उस गाइड पर नज़र रखो। जानो वो कौन है, कहाँ से आई, रात को किससे मिलती है। जो लड़की मंदिर के भेद जानती है, वो मणि का रास्ता भी जानती होगी। और उस रास्ते पर, अब सिर्फ़ एक आदमी का हक़ है। ठाकुर करमवीर सिंह का।"
और यूँ, उस एक शाम में, किआरा का सबसे बड़ा ख़तरा उस दुश्मन से नहीं आया, जिस पर उसकी नज़र गड़ी थी। वो उस मासूम दोस्त से आया, जो इस कैंप से सच में प्यार करती थी। तक्षक अँधेरे में इंतज़ार कर रहा था, और अब एक इंसानी भेड़िया भी पहरेदार की ख़ुशबू सूँघ चुका था। किआरा चारों तरफ़ से घिर रही थी, और उसे ख़बर तक नहीं थी।
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