Chapter 7 of 27 10 min read
दुश्मन का साया
किआरा को यक़ीन हो जाता है कि सौ साल पुराना उसका दुश्मन लौट आया है, तक्षक, जिसकी गद्दारी ने आख़िरी रात पृथ्वी की जान ली थी, और जो अब खुदाई, मणि और ख़ुद उसके इर्द-गिर्द मँडरा रहा है। वो अकेले में उसके सामने आता है, पूरी शराफ़त और सधे हुए ज़हर के साथ, और उसे एक सौदे की पेशकश करता है, यह बताते हुए कि उसने इस एक रात का पूरा एक सदी इंतज़ार किया है, और उसे नागमणि भी चाहिए और, आज भी, किआरा भी। पुरानी नफ़रत और उससे भी पुराने इतिहास से भरी उस टक्कर के आख़िर में तक्षक अपनी शर्त रखता है, नागमणि की रात मणि छीनने में उसका साथ दे, वरना वो लौटे हुए पृथ्वी को फिर से मार डालेगा और किआरा को देखने पर मजबूर करेगा,
रामू को शहर के अस्पताल ले जाया गया, और वो साँस लेता रहा, पर जागा नहीं। पूरे गाँव पर एक साया पड़ गया था, और कैंप के मज़दूर काम छोड़ने की बातें करने लगे थे। शिवांश उन्हें रोकने में लगा था, और किआरा को यही चाहिए था, कि सब उलझे रहें, ताकि वो जो करना चाहती थी, अकेले कर सके।
"बिटिया, तू भी मत जा उधर अकेले। रामू भी तो कुएँ पर अकेला ही था। जो चीज़ रात में घूम रही है, वो किसी को नहीं छोड़ेगी। साहब को बोल, गाड़ी में बैठ के शहर चलते हैं, दो दिन को।"
"काका, कुछ लोग भागने के लिए नहीं बने होते। तुम कैंप में रहो, मशाल जलाए रखो, और किसी को अकेले बाहर मत जाने देना। मैं ठीक हूँ। जो मुझे ढूँढ रहा है, उसे मैं ख़ुद ढूँढने जा रही हूँ।"
और सूरज ढलते ही वो अकेली रेगिस्तान में निकल गई, कैंप की रोशनी से दूर, वहाँ जहाँ टीले चाँदनी में हड्डियों की तरह चमकते थे। उसे किसी को ढूँढना नहीं था। उसे बस खड़े रहना था, और वो ख़ुद आ जाएगा। सौ साल का शिकारी अपने शिकार को इंतज़ार करवाना जानता था।
और फिर हवा बदली। रेत की एक सरसराहट, जो हवा की नहीं थी। एक ठंडक, जो रात की नहीं थी। किआरा की रीढ़ में वो सदियों पुरानी नफ़रत जागी, और उसने आँखें बंद कर लीं, क्योंकि वो जानती थी कि जब वो खोलेगी, तो वो सामने होगा।
"सौ साल। सौ साल हो गए, किआरा, और तुम रत्ती भर नहीं बदलीं। वही ग़ुस्सा, वही तनी हुई गर्दन, वही आँखें जो मुझे देखते ही ज़हर उगलने लगती हैं। मैंने तुम्हें याद किया।"
"मैंने तुझे नहीं किया, तक्षक। सौ साल में एक भी रात ऐसी नहीं गई जब मैंने तेरी मौत का सपना न देखा हो। और अब तू सामने खड़ा है। शायद आज वो सपना पूरा हो जाए।"
"आह, वही पुरानी किआरा। पर तुम मुझे मार नहीं सकतीं, जान-ए-मन, और तुम ये जानती हो। हम दोनों एक ही मिट्टी के बने हैं, एक ही आग के। तुम मुझे मारोगी, तो अपना आधा वजूद भी मार दोगी। इसीलिए तो सौ साल पहले तुम मुझे मार नहीं पाई थीं। सिर्फ़ नफ़रत कर पाई थीं।"
और उसकी इस बात में एक कड़वा सच था। तक्षक और किआरा अजनबी नहीं थे। वो एक ही नाग-कुल के थे, एक ही सर्प-लोक के। सदियों पहले, नागमणि की एक पुरानी रात, तक्षक ने उसे अपनी रानी बनने को कहा था, पूरे सर्प-लोक का राज दिया था। और किआरा ने उसे ठुकरा कर एक इंसान को चुना था। एक मामूली मंदिर के पहरेदार को। पृथ्वी को।
"मैंने तुम्हें दुनिया दी थी, किआरा। सर्प-लोक का सिंहासन, अमरता का ताज, अपने बराबर की जगह। और तुमने? तुमने एक इंसान को चुना। एक ऐसा जीव जो एक सदी भी नहीं जीता। तुमने राज को ठुकराया, एक मरने वाले के लिए।"
"मैंने प्यार को चुना, तक्षक। और तूने उसकी सज़ा उसे दी, मुझे नहीं। तूने पृथ्वी को उस रात जाल में फँसाया। तूने ही उसे बताया था कि मुहर कमज़ोर है, तूने ही उसे उस तहख़ाने में खींचा। तूने उसे मारा, और फिर मेरे सामने खड़ा हो कर मुस्कुराया।"
"मैंने उसे नहीं मारा, किआरा। तुमने मारा। मैंने तो सिर्फ़ तुम्हारे सामने सौदा रखा था, वही जो आज रखने आया हूँ। उस रात तुम्हारे पास मौक़ा था, मणि दे देतीं, वो जी जाता। तुमने पत्थर चुना। तो उसका ख़ून तुम्हारे हाथ पर है, मेरे नहीं। मैं तो बस... वहाँ था।"
और यही तक्षक का सबसे तेज़ ज़हर था। झूठ नहीं। आधा सच। क्योंकि किआरा ने सचमुच पत्थर चुना था। और सौ साल से यही आधा सच उसके सीने में गड़ा था, हर रात उसे यही कहता, तूने उसे मरने दिया।
"तू मणि के लिए इतना बेचैन क्यों है, तक्षक? तू पहले भी ताक़तवर था, सर्प-लोक का राजकुमार। ये पत्थर तुझे ऐसा क्या देगा जो तेरे पास नहीं? कोई और इसे लालच कहता। पर तेरी आँखों में लालच नहीं है। भूख है। किसी और की भूख।"
"तुम हमेशा से बहुत तेज़ थीं, किआरा। मान लो कि ये मणि सिर्फ़ एक पत्थर नहीं है। मान लो कि इसके अंदर कुछ है जो मुझे... अपना कहता है। जो सदियों से मुझे पुकारता है, हर रात, उस मुहर के पीछे से। पर ये बातें बाद की हैं। अभी तो बस सौदे की बात करो।"
और उस एक पल में, किआरा ने तक्षक की आँखों में कुछ देखा जो उसने सौ साल में नहीं देखा था। डर। जैसे वो ख़ुद भी किसी का ग़ुलाम हो। भैरवी के शब्द उसके कानों में गूँजे, वो सिर्फ़ मणि का लोभी नहीं है, वो उस चीज़ का ग़ुलाम है जो अंदर बंद है। पर ये पहेली अभी अधूरी थी।
"और एक बात समझ लो, किआरा। तुम सोच रही होगी कि तुम इन इंसानों की खुदाई को धीमा कर के, इधर-उधर के खूँटे उखाड़ कर, मुझे रोक लोगी। कितनी प्यारी हो तुम। मुझे मणि निकालने के लिए इनकी मशीनों की ज़रूरत नहीं। मुझे बस वो रात चाहिए, और एक पहरेदार का ख़ून चाहिए। और दोनों, अब मेरी पहुँच में हैं।"
"एक पहरेदार का ख़ून।"
"बातें, किआरा, बातें। तुम मुझसे मेरे सारे पत्ते खिलवा लोगी, अगर मैं तुम्हें देखता रहा। इसीलिए तो मैंने तुम्हें हमेशा चाहा। तुम अकेली हो जो मुझसे डरती नहीं, और अकेली जिससे मैं थोड़ा डरता हूँ।"
और एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, उस राक्षस के चेहरे पर कुछ और तैरा, कोई बहुत पुरानी चाहत, कोई ठुकराया हुआ प्यार जो सदियों में नफ़रत बन कर जम गया था। तक्षक किआरा से नफ़रत नहीं करता था। वो उससे प्यार करता था, और यही उसे सबसे ख़तरनाक बनाता था। क्योंकि जो प्यार में पागल हो, वो कुछ भी कर सकता है।
"अपनी ज़बान की चालाकी अपने पास रख, नाग। मैं अब वो लड़की नहीं जिसे तू सौ साल पहले जानता था। अब बता, तू क्या चाहता है। सीधे-सीधे। क्योंकि मैं जानती हूँ तू अपनी शक्ल यूँ ही नहीं दिखाता।"
"क्या चाहता हूँ? वही जो हमेशा से चाहा। दो चीज़ें, किआरा। एक, वो मणि। और दो... तुम। और इस बार, दोनों मुझे मिलेंगी।"
"तू पागल है। मैं मणि की पहरेदार हूँ। मैं उसे तुझे सौंपने से पहले हज़ार बार मरूँगी।"
"मरना? तुम मर नहीं सकतीं, याद है? पर वो मर सकता है। तुम्हारा प्यारा पुरातत्वविद्। शिवांश। या मुझे उसे उसके असली नाम से बुलाना चाहिए? पृथ्वी।"
और किआरा का पूरा शरीर पत्थर हो गया। उसने उम्मीद की थी कि तक्षक को नहीं पता होगा। कि शायद वो सिर्फ़ मणि के लिए आया है। पर वो जानता था। वो सब जानता था।
"वो पृथ्वी नहीं है। वो एक अजनबी है, एक इंसान, जो कल यहाँ से चला जाएगा। उसका इस सब से कोई लेना-देना नहीं।"
"झूठ, किआरा, और वो भी मुझसे? मैं उसकी रूह को सूँघ सकता हूँ, जैसे तुम सूँघ सकती हो। वही पहरेदार, वही ख़ून, वही मूरख भोलापन जो उसे फिर उसी मणि की तरफ़ खींच रहा है। क़ुदरत ने तुम्हें एक तोहफ़ा दिया है, किआरा। तुम्हारा मरा हुआ प्यार, वापस। और मैंने ठान लिया है कि मैं तुमसे वो तोहफ़ा दूसरी बार छीन लूँगा।"
और फिर उसने अपना असली पत्ता खोला, धीरे से, जैसे कोई क़ातिल चाकू निकालता है, मुस्कुराते हुए।
"सौदा ये है। नागमणि की रात, जब मुहर सबसे कमज़ोर होगी, तुम मेरा साथ दोगी। मणि निकालने में, उसे मेरे हाथ में देने में। बदले में, मैं तुम्हारे पृथ्वी को जीने दूँगा। वो अपनी ज़िंदगी जिएगा, कहीं और, तुमसे दूर, पर ज़िंदा।"
"और अगर तुमने इनकार किया? तो मैं उसे फिर मारूँगा, किआरा। ठीक तुम्हारे सामने, ठीक उसी तहख़ाने में, ठीक उसी रात। और इस बार तुम उसे बचा नहीं पाओगी, क्योंकि तुम मणि की पहरेदारी में बँधी रहोगी। मैं तुम्हें वो लम्हा दोबारा जिवाऊँगा। सौ साल बाद, वही मौत, दोबारा।"
और यही किआरा का सबसे बड़ा डर था, हूबहू लौट आया। मणि या पृथ्वी। फ़र्ज़ या प्यार। सौ साल पहले उसने फ़र्ज़ चुना था, और अपना प्यार खोया था। और अब तक्षक उसके सामने वही तराज़ू रख रहा था, उसी क्रूर मुस्कान के साथ।
"और मैं तुझ पर भरोसा कैसे करूँ? तू गद्दार है, तक्षक। तू सौदा करेगा और फिर भी उसे मार देगा।"
"शायद। पर तुम्हारे पास कोई और रास्ता है क्या? इनकार करोगी, तो वो पक्का मरेगा। हाँ करोगी, तो शायद बच जाए। जुए में भी एक कमज़ोर पत्ता, ख़ाली हाथ से बेहतर होता है। सोच लो। पर जल्दी। रात क़रीब आ रही है।"
किआरा जानती थी कि ये एक जाल है। तक्षक कभी अपनी बात नहीं रखता। पर वो ये भी जानती थी कि इनकार का मतलब था शिवांश की पक्की मौत, आज रात, कल सुबह। और हाँ का मतलब था वक़्त। और वक़्त में, एक चालाक पहरेदार हज़ार रास्ते बुन सकती थी।
"और अगर मैं हाँ कहूँ, तो तू आज रात शिवांश को नहीं छुएगा? कसम खा, अपने कुल की।"
"आह, तो तुम मोल-भाव कर रही हो। अच्छा है। इसका मतलब तुम सोच रही हो हाँ की तरफ़। ठीक है। नागमणि की रात तक, तुम्हारा पहरेदार सुरक्षित है, मेरे हाथों से। इससे ज़्यादा मैं वादा नहीं करता। बाक़ी... रेत में बहुत से साँप हैं, किआरा। मैं सबका मालिक नहीं।"
और किआरा जानती थी कि उसे क्या करना है, कम से कम अभी। उसे वक़्त चाहिए था। शिवांश को बचाने का, मणि को बचाने का, और तक्षक को मात देने का कोई रास्ता ढूँढने का वक़्त। और वक़्त ख़रीदने का सिर्फ़ एक तरीक़ा था। साफ़ इनकार न करना।
"मुझे... सोचने का वक़्त चाहिए।"
"आह। सुनो इसे। सौ साल पहले तुमने एक पल में मुझे ठुकरा दिया था। और आज? आज तुम कह रही हो, मुझे सोचने का वक़्त चाहिए। देखा, किआरा? तुम पहले ही बदल चुकी हो। उसके लिए। तुम पहले ही झुक रही हो।"
और वो सच कह रहा था। इनकार न करके, किआरा ने पहली बार, सौ साल में पहली बार, अपने दुश्मन के सामने एक क़दम पीछे हटा दिया था। फ़र्ज़ की तरफ़ नहीं। प्यार की तरफ़।
"सोच लो, रानी। पर याद रखना, जो सौदा मैं आज पेश कर रहा हूँ, वो कल और महँगा होगा। और परसों, शायद उसकी क़ीमत, एक साँस हो।"
तक्षक रेत में घुल गया, और किआरा अकेली खड़ी रह गई, उस चाँदनी में, उसी पुराने तराज़ू के सामने, जिसके एक पलड़े में उसका फ़र्ज़ था, और दूसरे में, फिर से, पृथ्वी की साँसें।
पर एक बात इस बार अलग थी। सौ साल पहले वो अकेली थी, बेबस, एक ऐसे जाल में फँसी जिसका कोई सिरा उसे नहीं दिखता था। और आज? आज उसके पास वक़्त था, थोड़ा सा। आज उसके पास एक ऐसा पृथ्वी था जो ज़िंदा था, और जिसमें यादें लौट रही थीं। और आज, पहली बार, उसके मन में फ़र्ज़ और प्यार के बीच चुनने का नहीं, दोनों को बचाने का ख़याल आया।
"इस बार नहीं, तक्षक। इस बार मैं तराज़ू ही तोड़ दूँगी। ... चाहे इसके लिए मुझे अपनी जान देनी पड़े।"
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