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अध्याय 3 / 27 पढ़ने में 10 मिनट

कैंप में अजनबी

नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi

सूरज सरपगढ़ की रेत पर चढ़ते ही सोना बरसाने लगा, और कैंप जाग गया। तंबुओं के बीच धुआँ उठा, कड़ाही खनकी, और सबसे ऊँची आवाज़, हमेशा की तरह, मनोहर की थी।

"किआरा बिटिया, सुन। इस कैंप में तीन नियम हैं। एक, मनोहर की चाय को कभी मना मत करना। दो, नव्या मैडम के काग़ज़ों को कभी हाथ मत लगाना, वो काटती हैं। और तीन, सूरज ढलने के बाद उस मंदिर की तरफ़ अकेले मत जाना। कभी नहीं।"

"क्यों, मनोहर काका? रात में मंदिर में क्या है?"

"नागिन, बिटिया। असली वाली। मेरे परदादा कहते थे, सौ साल पहले इस मंदिर में एक भयानक रात आई थी। आग नहीं, ख़ून नहीं, बस एक चीख़, और सुबह मंदिर का पहरेदार ग़ायब। तब से एक नागिन उस तहख़ाने की रखवाली करती है, जो कभी बूढ़ी नहीं होती। जो उसका राज़ देख ले, उसे वो पत्थर बना देती है!"

किआरा ने चाय का घूँट भरा और अपनी मुस्कान पर काबू रखा। वो पहरेदार ग़ायब नहीं हुआ था। वो मरा था। और उसकी बाँहों में मरा था। पर मनोहर की कहानी में वो एक डरावनी परी-कथा थी, और किआरा उसे यूँ सुन रही थी जैसे कोई अपनी ही मौत का क़िस्सा अजनबियों से सुने।

"और वो नागिन, काका? वो बुरी है?"

"पता नहीं, बिटिया। मेरी दादी कहती थीं, वो बुरी नहीं है, बस अकेली है। और अकेलापन आदमी को, और नागिन को, दोनों को डरावना बना देता है। ख़ैर! कहानी है, कहानी। चल, नाश्ता कर।"

बस अकेली है। एक अनपढ़ रसोइए ने, बिना जाने, सौ साल का पूरा सच एक वाक्य में कह दिया था।

"मनोहर, बस करो अपनी कहानियाँ। और तुम। मुझे एक बात समझाओ। पूरा गाँव उस मंदिर से इतना डरता है कि कोई पास नहीं फटकता, पर तुम उसकी हर दीवार जानती हो, हर लिखाई पढ़ लेती हो। ये कैसे?"

"डर और जानकारी दुश्मन नहीं हैं, मैडम। जो चीज़ आप जानते हैं, उससे आप कम डरते हैं। इसीलिए मैं वहाँ जा सकती हूँ, और बाक़ी नहीं। आपको भी तो पत्थरों से डर नहीं लगता। आप उन्हें समझती हैं।"

"हम्म। या फिर तुम इसलिए नहीं डरतीं, क्योंकि तुम्हें पता है वहाँ डरने को कुछ है ही नहीं। या फिर... तुम ख़ुद वो चीज़ हो जिससे बाक़ी डरते हैं।"

नव्या ने ये आख़िरी बात इतनी धीरे कही कि किसी ने नहीं सुनी। पर किआरा ने सुनी। नागिन के कान बहुत तेज़ होते हैं। और उसने पहली बार इस दुबली, चुप, तेज़ आँखों वाली लड़की को अपने दुश्मनों की सूची में जोड़ लिया, तक्षक और खुदाई के साथ। नव्या, जो हर झूठ को सूँघ लेती थी।

"नव्या मैडम, आप हँसिए मत। पिछले साल एक इंजीनियर आया था, बड़ा घमंडी, कहता था नाग-वाग सब बकवास। उस मंदिर की एक ईंट उठा के ले गया, अपने कमरे में रख ली। तीन दिन बाद उसका पूरा बदन ठंडा पड़ गया, जैसे किसी ने ख़ून निचोड़ लिया हो। डॉक्टर कहते रहे कुछ नहीं है, पर बंदा वापस ईंट रखने आया, अपने पैरों पर, और गाँव की मिट्टी में सिर रगड़ के माफ़ी माँगी!"

"तो सबक़ ये है, काका, कि जो चीज़ अपनी नहीं, उसे उठाना नहीं चाहिए।"

"सुना साहब? बिटिया की बात सुनो! ये तो अभी आई है और इसे भी पता है! और आप हैं कि पूरे मंदिर को ही उठा ले जाने का परमिट लेकर बैठे हैं!"

"मैं उठा नहीं रहा, मनोहर, मैं बचा रहा हूँ। जो ज़मीन के नीचे दबा है, वो एक दिन रेत में मिट जाएगा अगर कोई उसे निकाल कर सँभाल कर न रखे। ये लूट नहीं है। ये इतिहास को बचाना है।"

किआरा ने ये सुना और एक पल को उसका दिल भर आया। क्योंकि ये बात, हूबहू यही बात, सौ साल पहले पृथ्वी भी कहता था। मैं मणि को इसलिए नहीं बचाता कि वो क़ीमती है। बचाता हूँ क्योंकि जो इसके अंदर है, उसे दुनिया से बचाना ज़रूरी है। एक ही रूह, दो जन्म, और वही भोलापन जो उसे दोनों बार क़ुर्बानी की तरफ़ खींच रहा था।

दिन चढ़ते ही असली खेल शुरू हुआ। शिवांश की टीम को मंदिर के चारों तरफ़ सर्वे के खूँटे गाड़ने थे, ये तय करने के लिए कि पहले कहाँ खुदाई हो।

"किआरा, तुम यहाँ की ज़मीन जानती हो। बताओ, पहली खुदाई के लिए सबसे अच्छी जगह कौन सी है? जहाँ नीचे कुछ मिलने की सबसे ज़्यादा उम्मीद हो।"

और यहीं किआरा ने अपना पहला वार किया, बिना किसी को भनक लगे। उसने ठीक उस दिशा की तरफ़ इशारा किया जो तहख़ाने से सबसे दूर थी, एक बंजर टीला, जिसके नीचे सिवाय रेत और पुरानी टूटी नींव के कुछ नहीं था।

"वहाँ, साहब। उस टीले के नीचे। पुराने लोग कहते थे वहाँ मंदिर का ख़ज़ाना-घर था। सबसे ऊँची जगह हमेशा सबसे ख़ास होती थी। अगर कहीं कुछ है, तो वहाँ है।"

"देखा नव्या? यही स्थानीय जानकारी है जो कोई मशीन नहीं देती। सबसे ऊँची जगह, सबसे ख़ास। तर्क सही है। खूँटे उस टीले पर गाड़ो!"

और किआरा ने अपने भीतर एक छोटी सी जीत गिनी। जितने दिन वो लोग उस बंजर टीले को खोदते रहेंगे, उतने दिन तहख़ाना सुरक्षित रहेगा। एक दिन बचा। फिर एक और। और हर बचा हुआ दिन नागमणि की रात के क़रीब था।

"साहब! साहब! अनर्थ हो गया! राशन वाले तंबू में... तंबू में एक साँप निकला! इतना बड़ा! काला! फन उठाए बैठा है आटे की बोरी पर! मैंने कहा था ना, ये जगह श्रापित है!"

सारा कैंप उस तंबू की तरफ़ भागा। और सिर्फ़ किआरा जानती थी कि वो साँप वहाँ अपने आप नहीं आया था। उसने उसे बुलाया था, रात के अँधेरे में, एक ऐसी सीटी में जो इंसानी कान नहीं सुनते। एक छोटा सा डर, बोया हुआ। ताकि मज़दूर काम पर आते हुए दो बार सोचें।

"मनोहर, ये रेगिस्तान है। यहाँ साँप निकलते हैं। ये श्राप नहीं, भूगोल है। उठाओ इसे एहतियात से, दूर छोड़ आओ। और कोई मज़दूर काम नहीं छोड़ेगा।"

किआरा ने भीड़ के पीछे से देखा। ये आदमी डरता नहीं था। सौ साल में उसने बहुतों को भगाया था, पर ये वाला हर डर को तर्क से काट देता था। और नागिन को पहली बार लगा कि शायद इसे रोकना उतना आसान नहीं होगा जितना उसने सोचा था। और फिर, अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, उसके होंठ मुस्कुरा दिए। इस आदमी की ज़िद उसे हमेशा से अच्छी लगती थी।

उस रात, जब पूरा कैंप सो गया, एक परछाईं तंबुओं के बीच से बहती हुई निकली। किआरा। उसने दिन में गड़े कुछ सर्वे के खूँटे चुपचाप उखाड़े और उन्हें दस क़दम इधर उधर गाड़ दिया, इतना कम कि किसी को शक न हो, और इतना ज़्यादा कि कल की सारी नाप ग़लत निकले।

यही उसका असली हथियार था। साँप और श्राप तो तमाशा थे। असली लड़ाई इंच-इंच की थी, नक़्शों में, नापों में, दिशाओं में। एक इच्छाधारी नागिन आधुनिक मशीनों से लड़ रही थी, चुपचाप, अकेले, अँधेरे में, और अभी तक जीत रही थी।

"कौन है? किआरा बिटिया, तू है क्या? इतनी रात को बाहर मत घूम, नागिन पकड़ लेगी..."

"सो जाओ, काका। नागिन को तुमसे कोई काम नहीं। उसका काम कोई और है।"

शाम ढली। बंजर टीले पर दिन भर की खुदाई बेनतीजा रही, जैसा किआरा जानती थी। थके हुए शिवांश ने अपना लैंप उठाया और मंदिर के बाहरी ढाँचे की तरफ़ चल दिया, अकेला, हार न मानने वाला। किआरा जानती थी कि उसे नहीं जाना चाहिए। फिर भी वो पीछे चली गई।

"तुम्हें पता है, किआरा, सब कहते हैं मैं ज़िद्दी हूँ। पर सच बताऊँ? मैं इस मंदिर के लिए ज़िद्दी नहीं हूँ। मुझे लगता है मैं यहाँ किसी और चीज़ के लिए आया हूँ। कुछ ऐसा जो मुझे ख़ुद नहीं पता।"

"जैसे क्या, साहब?"

"बचपन से मुझे एक ही सपना आता है। रेत। एक जलता हुआ पत्थर। और एक औरत, जिसका चेहरा मैं कभी नहीं देख पाता, पर जिसका ग़म मैं जागते हुए भी महसूस करता हूँ। पागलपन है ना? एक ऐसी औरत के लिए दुखी होना जो कभी मिली ही नहीं।"

"और उस सपने में... आप उसे बचा पाते हैं?"

"नहीं। हर बार वो मुझसे दूर खड़ी रहती है, और मैं उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाता हूँ, और हर बार अँधेरा हमारे बीच आ जाता है। मैं उसका हाथ छू नहीं पाता। कभी नहीं। और जब मैं जागता हूँ, तो मेरी आँखें भीगी होती हैं, किसी ऐसे के लिए जिसे मैं जानता तक नहीं।"

और किआरा उसके ठीक बगल में खड़ी थी। वो औरत। और उसे अपना चेहरा पत्थर की तरह शांत रखना था, जबकि उसके अंदर सौ साल का समंदर उमड़ रहा था। वो हाथ, जो सपने में उस तक नहीं पहुँच पाता था, आज सिर्फ़ एक बित्ते की दूरी पर था। उसे बस बढ़ना था।

"शायद वो औरत भी आपके लिए दुखी होती हो, साहब। कहीं। किसी सपने में। शायद उसे भी लगता हो कि वो किसी को ढूँढ रही है जिसका चेहरा उसे याद नहीं रहता। और शायद वो चाहती हो कि इस बार अँधेरा उनके बीच न आए।"

एक पल के लिए हवा रुक गई। लैंप की लौ काँपी। शिवांश उसकी तरफ़ झुका, जैसे किसी अनदेखी डोर ने खींचा हो, और किआरा को भी लगा कि उसका सौ साल पुराना संकल्प रेत की तरह बह रहा है। कितना आसान होता, बस एक पल में सब कुछ भूल जाना।

"तुम... तुम अजीब तरह से बात करती हो, किआरा। जैसे तुम उस औरत को जानती हो।"

इससे पहले कि किआरा जवाब देती, शिवांश के हाथ में पकड़े रडार-स्क्रीन ने एक तीखी आवाज़ की। एक बीप। फिर दो। फिर तेज़, लगातार।

"रुको। रुको! ये देखो! यहाँ, इस दीवार के पीछे, ज़मीन के नीचे... एक रास्ता है। एक छिपी हुई सुरंग! नव्या! नव्या, इधर आओ, जल्दी!"

और किआरा का दिल जैसे रुक गया। क्योंकि वो जानती थी वो सुरंग कहाँ जाती थी। सीधे तहख़ाने की तरफ़। सीधे मणि की तरफ़। बंजर टीले का सारा खेल एक पल में बेकार हो गया था। मशीन ने वो पकड़ लिया था जो सौ साल से किसी इंसान की नज़र से बचा था।

"मिल गया। किआरा, मुझे मिल गया! बारह साल की मेहनत, और आज... ये रहा! तहख़ाने का रास्ता, बिलकुल यहाँ!"

और उस एक पल में, जब मणि इतनी क़रीब आ गई, जब सौ साल की पहरेदारी टूटने के कगार पर आई, किआरा का काबू फिसल गया। सिर्फ़ एक पल को। लैंप की काँपती रोशनी में, उसकी काली आँखें बदल गईं, और उनमें एक गहरी, सुनहरी, नागिन जैसी चमक तैर गई।

"शिवांश? क्या मिला? किआरा, तुम ठीक..."

नव्या ठीक उसी पल किआरा की तरफ़ मुड़ी, जिस पल उसकी आँखें सोने की तरह जल रही थीं। लैंप की लौ काँपी। एक परछाईं गिरी। और नव्या की नज़र, वैज्ञानिक की तेज़, शक्की नज़र, सीधे किआरा के चेहरे पर पड़ी।

मणि का रास्ता खुल चुका था। और नागिन का राज़, सौ साल में पहली बार, एक इंसान की आँखों के सामने, रोशनी में आ गया था।

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नागमणि की रात