Chapter 20 of 27 12 min read
बीती रात के राज़
अपनी ही मौत की याद में उतरते ही शिवांश को सौ साल पुरानी उस रात के टुकड़े दिखते हैं, पर वो जुड़ते नहीं, इसलिए वो किआरा को लेकर भैरवी के पास पहुँचता है और उस अधूरी रीत का पूरा सच माँगता है। भैरवी की ज़ुबानी और शिवांश की लौटती याद से वो राज़ खुलता है जो सब कुछ पलट देता है, कि पृथ्वी उस रात कोई बेबस तमाशाई नहीं था जो बचने के लिए हाथ बढ़ा रहा था, बल्कि उसने ख़ुद को वेदी पर झोंक कर मुहर थामने की कोशिश की थी और तक्षक ने उसे इसीलिए मारा, और मरते हुए उसने मणि किआरा के हाथ में दबा कर उसे थामे रहने को कहा था। यानी किआरा ने मणि को शिवांश पर नहीं चुना था, ख़ुद पृथ्वी ने वो चुनाव किया था और मणि उसके हाथ सौं
उस रात शिवांश के तंबू में एक ही दीया जल रहा था, और उसकी लौ काँप रही थी, जैसे उसे भी पता हो कि यहाँ कुछ बहुत पुराना, बहुत ख़तरनाक जगाया जा रहा है। शिवांश आँखें मूँदे बैठा था, और सारी उम्र जिस सपने से भागता आया था, आज पहली बार, उसकी तरफ़ चल रहा था।
और टुकड़े आने लगे। एक चमकता हुआ तहख़ाना। एक पत्थर, नीली आग से भरा। तक्षक का हँसता चेहरा। और एक औरत, बाल बिखरे, आँखें सुनहरी, उसके ऊपर झुकी हुई, चीख़ती हुई। पर हर टुकड़ा एक दीवार से टकरा कर बिखर जाता, जैसे कोई उसे पूरा होने से रोक रहा हो।
"आग... हर तरफ़ आग। और वो मुझे पकड़ रहा है... तक्षक... और तुम, किआरा, तुम मणि थामे खड़ी हो... पर आगे क्या? आगे क्या हुआ? मुझे दिखता क्यों नहीं!"
और तभी तंबू का परदा हटा, और किआरा अंदर आई, और उसने शिवांश को उस हालत में देखा, पसीने में डूबा, काँपता, आधा यहाँ, आधा सौ साल पुरानी उस आग में। वो दौड़ कर उसके पास गिरी।
"शिवांश! बाहर आओ। मेरी आवाज़ सुनो, मेरी तरफ़ लौटो। मैंने कहा था ना, वो याद तुम्हें तोड़ देगी। बस करो, वापस आ जाओ मेरे पास।"
"नहीं। मैं इतने पास हूँ। मैंने टुकड़े देखे, किआरा, पर वो जुड़ते नहीं। कोई चीज़ है जो मेरी याद थाम नहीं पा रही, जैसे वो हिस्सा दर्द से इतना जला है कि आँख वहाँ जाने से मना कर देती है।"
"तो रहने दो उसे अधूरा। कुछ राज़ अधूरे ही अच्छे होते हैं। हमारे पास जो दिन बचे हैं, उन्हें इस पुरानी आग में मत जलाओ, शिवांश।"
"नहीं। जो मेरी याद नहीं थाम सकती, वो शायद किसी और की ज़ुबान थाम ले। मुझे भैरवी के पास ले चलो। अभी। जो उस रात बाहर खड़ी थीं, वो जानती होंगी वो जो मैं भूल गया हूँ। और तुम भी मेरे साथ चलोगी। ये सच तुम्हें भी सुनना है।"
और वो दोनों उस रात के अँधेरे में निकल पड़े, टूटे मंदिर के उस कोने की तरफ़, जहाँ एक सूखा पीपल खड़ा था, वही पीपल जिसके नीचे सौ साल पहले किआरा ने अपने प्यार को दफ़नाया था। और उसी सूखे पेड़ की जड़ों के पास, चाँदनी में, भैरवी बैठी थी, जैसे उन्हीं का इंतज़ार कर रही हो।
"मुझे पता था तुम आओगे। जब कोई अपनी ही मौत का दरवाज़ा खटखटाता है, तो देर-सवेर वो मेरे दरवाज़े तक पहुँचता ही है। बैठो। पर सोच लो। कुछ राज़ दफ़्न इसलिए किए जाते हैं कि उन्हें उठाने वाले हाथ फिर वही नहीं रहते।"
"किआरा सौ साल से एक झूठ का बोझ अपनी पीठ पर ढो रही है, माता जी। हर रात ख़ुद को एक ऐसे गुनाह की सज़ा देती है जिसे मैं समझ भी नहीं पाता। अगर उस रात का सच उसे उस बोझ से आज़ाद कर सकता है, तो मैं उसे उठाऊँगा। चाहे उसका वज़न कुछ भी हो।"
और भैरवी ने एक लंबी साँस ली, वो साँस जो सौ साल से उसके सीने में एक पत्थर की तरह अटकी थी। उसने आँखें मूँदीं, और वो रात, जो उसने किसी को कभी पूरी नहीं सुनाई थी, उसकी बूढ़ी ज़ुबान पर उतरने लगी।
"सौ साल पहले, इसी नागमणि की रात, ये मुहर पहली बार पतली पड़ी थी। रीत होनी थी। किआरा को उस वेदी पर खड़ा होकर मुहर नई करनी थी। और पृथ्वी, इसका पहरेदार, इसका प्रेमी, बस एक ही काम के लिए वहाँ था, किआरा की रखवाली, ताकि वो रीत पूरी कर सके। बाक़ी सब उसे बाद में समझ आया।"
और फिर, उस कहानी में, तक्षक आया। जैसे आज आया है, वैसे ही तब भी। भूख का वारिस, आधी रात का साया।
"तक्षक ने रीत शुरू होने से पहले ही तुम दोनों को घेर लिया। और उसने वही किया जो वो सबसे अच्छा करता है। उसने एक तराज़ू रखा। एक तरफ़ मणि, एक तरफ़ पृथ्वी की जान। उसने पृथ्वी को दबोच रखा था, और किआरा से कहा, मणि छोड़ दो, वेदी से हट जाओ, और मैं इसे जीने दूँगा।"
"मुझे ये याद है, माता जी। मुझे यही याद है। तक्षक ने पृथ्वी को जकड़ रखा था। और कहा, मणि दे दो। और मैं... मैं वहीं जम गई। मणि मेरे हाथ में थी, और पृथ्वी उसकी क़ैद में। और मैं... मैंने मणि नहीं छोड़ी। मैंने उसे मरने दिया।"
"नहीं, किआरा। यहीं तू सौ साल से ग़लत है। यहीं तेरी याद ने तुझसे झूठ बोला है। तूने उसे मरने नहीं दिया। तू भूल गई कि उस पल तेरी नज़र मणि पर थी, तक्षक पर थी, पर पृथ्वी पर नहीं। और इसीलिए तूने वो नहीं देखा जो मैंने बाहर से देखा था।"
और उसी पल, शिवांश के अंदर, वो दीवार, जिससे हर याद टकरा कर बिखर जाती थी, चटकने लगी। जो हिस्सा दर्द से जला हुआ था, वो अब रोशन होने लगा।
"मुझे... मुझे याद आ रहा है। मैं तक्षक की पकड़ में बेबस नहीं खड़ा था। मैंने... मैंने उसका हाथ झटका। और मैं किआरा की तरफ़ नहीं भागा। मैं वेदी की तरफ़ भागा। मुहर की तरफ़।"
"हाँ। पृथ्वी ने ख़ुद को छुड़ाया, और उस टूटती मुहर पर अपना पूरा ज़ोर लगा दिया, अपने हाथों से, अपने शरीर से, उसे थामने की कोशिश की। वो जानता था कि एक पहरेदार वो रीत पूरी नहीं कर सकता जो सिर्फ़ एक नागिन कर सकती है। पर वो तक्षक को एक पल के लिए रोक सकता था। किआरा को एक साँस दे सकता था। और उसने वही किया।"
और तक्षक ने पृथ्वी पर वार किया। किसी जलते हुए प्रेमी की तरह नहीं, किसी जीते हुए दुश्मन की तरह नहीं। उसने वार इसलिए किया क्योंकि उस पल पृथ्वी ही वो इकलौती चीज़ था जो उसकी जीत और मुहर के बीच खड़ी थी। पृथ्वी कोई मोहरा नहीं था। वो उस रात का असली पहरेदार था।
"और यहीं, किआरा, वो रात अधूरी रह गई। तक्षक ने पृथ्वी को मार कर तेरा ध्यान चीर दिया। तूने मणि तो बचा ली, तक्षक को उससे दूर तो रख लिया, पर वो रीत, वो पूरी बँधाई, जो उस रात होनी थी, वो कभी हुई ही नहीं। तूने बस इतना किया कि मुहर टूटे नहीं। पूरी नई नहीं हुई। और इसीलिए वो सौ साल से चरमरा रही है, आधी बँधी, आधी खुली।"
"तो जिस चटकती मुहर को देखकर मैं हैरान थी, उसकी जड़ मैं ख़ुद हूँ। उस रात मैं उसे पूरा बाँध नहीं पाई, क्योंकि तुम मेरी गोद में मर रहे थे। और सौ साल वो दरार बढ़ती रही, और मुझे लगता रहा कि मैं एक अटूट पहरा दे रही हूँ।"
"नहीं... पर मैंने उसे मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाते देखा था। मैंने सोचा वो मुझसे कह रहा है, बचा लो मुझे। मैंने सोचा उसकी आख़िरी नज़र में मेरे लिए एक गुहार थी, जिसे मैंने ठुकरा दिया।"
"मैं बचने के लिए हाथ नहीं बढ़ा रहा था, किआरा। मुझे अब याद है। मैं तुम्हारी तरफ़ हाथ इसलिए बढ़ा रहा था क्योंकि मेरे उस हाथ में मणि थी। मैं गिरते-गिरते उसे तुम्हारे हाथ में दबा रहा था। मैं तुमसे बचने की भीख नहीं माँग रहा था। मैं तुम्हें मणि सौंप रहा था।"
और वो आख़िरी लफ़्ज़, जो सौ साल से उस जली हुई दीवार के पीछे दबे थे, शिवांश की ज़ुबान पर लौट आए, ठीक वैसे जैसे पृथ्वी ने अपनी आख़िरी साँस में कहे थे।
"थामे रहना। छोड़ना मत, किआरा। चाहे कुछ भी हो जाए, इसे छोड़ना मत। जियो, और इसकी रखवाली करना। दुनिया को बचाना। मुझे मत बचाना। मुझे मत... मैं तो जा रहा हूँ। पर तुम रहना। तुम थामे रहना।"
"तुमने... तुमने चुना था। मैंने नहीं। ये चुनाव मैंने नहीं किया था। तुमने मणि मेरे हाथ में रखी थी, और मुझसे कहा था थामे रहना। और मैं सौ साल... सौ साल समझती रही कि मैंने तुम पर एक पत्थर चुना।"
"तूने उसे कभी नहीं छोड़ा, बेटी। तूने ठीक वही किया जो वो मरते हुए तुझसे माँग कर गया था। तक्षक ने तेरे सामने कोई और रास्ता छोड़ा ही नहीं था, और पृथ्वी ने वो आख़िरी चुनाव तेरे हाथ से छीन लिया, ताकि उसका बोझ तुझे न तोड़े। पर वो बोझ तुझे फिर भी तोड़ता रहा। सौ साल। एक झूठ पर।"
और उस सूखे पीपल के नीचे, जिसकी जड़ों में सौ साल पुरानी वो हड्डियाँ सोई थीं, किआरा टूट कर रो पड़ी। पर ये वो रोना नहीं था जो सौ साल से उसके सीने में जमा था। ये वो रोना था जो एक बहुत भारी पत्थर के अचानक उठ जाने के बाद आता है। दर्द का नहीं, रिहाई का।
"सौ साल, शिवांश। सौ साल मैंने ख़ुद को एक ऐसे गुनाह की सज़ा दी जो मैंने किया ही नहीं। मैंने अपने आप से प्यार करना छोड़ दिया था। मैंने सोचा मैं वो नागिन हूँ जिसने अपने प्रेमी पर एक चमकते पत्थर को चुना।"
"और तुम वो नागिन कभी थीं ही नहीं। सुनो मुझे, किआरा। जिस रात मैं मरा, मेरी आख़िरी सोच तुम्हारा डर नहीं था, तुम्हारी माफ़ी नहीं थी। मेरी आख़िरी सोच तुम्हारा गर्व था। मैं मरते-मरते सोच रहा था, ये औरत थामे रहेगी। ये दुनिया को बचा लेगी। मैं ठीक चुन कर जा रहा हूँ।"
और सौ साल पुराना वो ज़ख़्म, जो इतने जनम, इतनी रातें, इतनी दूरियाँ झेल चुका था, आख़िरकार भरने लगा। वो ग़ुस्सा नहीं जो उस पहले चुंबन की रात लौट आया था, वो बेवफ़ाई का शक नहीं। बस दो रूहें, एक सूखे पेड़ के नीचे, एक पुराने झूठ से आज़ाद।
"सौ साल में पहली बार, मेरे अंदर वो चीख़ चुप है। वो जो हर रात कहती थी, तूने उसे मरने दिया। आज वो चुप है। तुमने उसे चुप करा दिया।"
"और इस बार, किआरा, कोई किसी से चुनाव नहीं छीनेगा। ना तुम मेरे लिए मरोगी, ना मैं तुम्हारे लिए। इस बार हम कोई तीसरा रास्ता चुनेंगे। साथ। तुम और मैं, एक ही तरफ़।"
"इतनी जल्दी वादे मत करो, बच्चो। तक्षक ने पृथ्वी पर जो वार किया था, उसके पीछे एक और वजह थी, जो अभी तुम दोनों को दिखनी नहीं चाहिए। बस इतना जान लो, कि तक्षक उस रात पृथ्वी को मारना नहीं, कुछ और चाहता था। और वो चीज़ वो अब भी चाहता है।"
एक पल के लिए, बस एक पल के लिए, उस टूटे मंदिर में एक ऐसी शांति उतरी जो सौ साल से किसी ने महसूस नहीं की थी। दो प्रेमी, एक बूढ़ी गुरु, और एक भरता हुआ ज़ख़्म। पर शांति, इस कहानी में, कभी लंबी नहीं चलती।
क्योंकि दूर, कैंप की तरफ़ से, एक आवाज़ आई। कोई चीख़ नहीं। उससे भी बुरा। एक ख़ामोशी, जो अचानक बहुत गहरी हो गई थी। और उसी पल, किआरा के नथुनों में वो ठंडी, तहख़ाने वाली बू घुसी, जो सिर्फ़ एक चीज़ का मतलब रखती थी।
"तक्षक। वो यहाँ है। या था। शिवांश, कैंप। जल्दी।"
और वो दोनों अँधेरे में कैंप की तरफ़ भागे। तंबू ख़ाली थे, दीये बुझे हुए, और हवा में एक अजीब सी ठंडक तैर रही थी। मनोहर, अपनी पट्टियों में लिपटा, एक तंबू के बाहर बेहोश पड़ा था, साँस चल रही थी, पर घायल। और नव्या का तंबू खुला था, परदा फड़फड़ा रहा था, और अंदर कोई नहीं था।
"नव्या! नव्या, कहाँ हो तुम? उसकी किताबें, उसका चश्मा... सब यहीं है। पर वो नहीं है। किआरा, वो नहीं है।"
और तभी शिवांश की नज़र ज़मीन पर पड़ी। नव्या के चश्मे के पास, रेत पर, एक चीज़ पड़ी थी जो वहाँ नहीं होनी चाहिए थी। एक साँप की उतरी हुई काली केंचुली, ताज़ा, चमकती हुई, एक घेरे में रखी हुई। तक्षक का हस्ताक्षर।
"वो उसे ले गया। तक्षक नव्या को ले गया। उस लड़की को, जो कभी नागों में यक़ीन ही नहीं करती थी। जो सबसे मासूम थी। वो जानता है हम उसे मरने नहीं दे सकते।"
और जैसे ही किआरा की उँगलियाँ उस केंचुली को छूने बढ़ीं, हवा में एक फुसफुसाहट उठी, ठंडी और चिकनी, जैसे रेत पर कोई साँप रेंगा हो। शब्द नहीं, पर उन दोनों के दिमाग़ में एक ही पैग़ाम उतर गया, जैसे तक्षक की आवाज़ ख़ुद हवा में लिखी हो।
पहरेदार को नागमणि की रात, सूरज ढलते ही, तहख़ाने ले आओ। पृथ्वी की रूह को, अपनी मर्ज़ी से, मेरी वेदी तक। तब ये इंसानी लड़की साँस लेती रहेगी। और अगर तुमने चालाकी की, तो नागमणि की रात का पहला ख़ून इसी लड़की का होगा। सोच लो, किआरा। इस बार तराज़ू में एक अजनबी की जान है। देखते हैं तू किसे थामती है।
और वो फुसफुसाहट हवा में घुल गई। पर उसका ज़हर वहीं रह गया। तक्षक ने वो एक जान उठा ली थी जिसे किआरा और शिवांश किसी क़ीमत पर नहीं खो सकते थे। एक मासूम, जो इस पूरी लड़ाई में बस इत्तेफ़ाक़ से आ फँसी थी। सौ साल का ज़ख़्म अभी-अभी भरा था। और तक्षक ने, ठीक उसी पल, एक नया ज़ख़्म खोलने का सामान भेज दिया था। घड़ी अब उलटी नहीं, सीधी चल रही थी, और वो सीधे नागमणि की उस रात की तरफ़ जा रही थी।
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