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अध्याय 9 / 27 पढ़ने में 11 मिनट

बावड़ी की रात

नागमणि की रात द्वारा Avni Oberoi

सरपगढ़ की सबसे पुरानी बावड़ी, गाँव से परे, रेत के नीचे उतरती हुई पत्थर की सौ सीढ़ियाँ, और सबसे नीचे, एक चौकोर चाँद, पानी में क़ैद। दिन में ये जगह सूनी पड़ी रहती थी, गाँव वाले यहाँ आते ही नहीं थे, कहते थे इसका पानी अभिशप्त है। पर रात को, जब चाँद ठीक सिर पर आता, तो ये बावड़ी जैसे साँस लेने लगती थी, और उसकी दीवारें कोई पुरानी कहानी फुसफुसाने लगती थीं, जिसे सुनने वाला अब कोई नहीं बचा था।

शिवांश अपनी ज़िद पर अड़ा था। उसके रडार ने बावड़ी की तह से मंदिर के तहख़ाने की तरफ़ एक पुरानी जल-सुरंग पकड़ी थी, और एक शिलालेख, जो सिर्फ़ तभी उभरता जब चाँदनी पानी से टकरा कर दीवार पर पड़े। किआरा ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की थी। और हार गई थी।

"देखो, किआरा। जैसे ही चाँद उस कोने पर आएगा, लिखाई ख़ुद उभर आएगी। सौ साल में शायद ही किसी ने इसे इस वक़्त, इस रोशनी में देखा हो। और मैं चाहता था कि जब मैं देखूँ, तो तुम मेरे साथ हो।"

"ये जगह रात को जीवितों के लिए नहीं है, साहब। लौट चलो। जो लिखाई सौ साल छुपी रही, वो एक रात और छुप सकती है।"

"तुम, जो मरी हुई लिपियाँ माँ-बोली की तरह पढ़ती हो, तुम मुझे भूत-प्रेत से डरा रही हो? नहीं, किआरा। आज रात नहीं। आज मैं कहीं नहीं जा रहा।"

और किआरा चुप हो गई, क्योंकि वो उसे सच नहीं बता सकती थी, कि वो इस बावड़ी से इसलिए डरती है क्योंकि इसकी हर सीढ़ी उसे याद है। यहीं, इसी पानी के किनारे, सौ साल पहले, एक मंदिर के पहरेदार ने पहली बार उसका हाथ थामा था। यही उनकी जगह थी। पृथ्वी की, और उसकी।

वो पानी के किनारे तक उतरे, सीढ़ी दर सीढ़ी, अँधेरे में गहरे। ठंडी हवा, गीली चट्टान, और वो चौकोर चाँद, दोनों के बीच पानी पर काँपता हुआ। हर क़दम के साथ किआरा को लग रहा था कि वो वक़्त में उतर रही है, नीचे, और नीचे, उस रात की तरफ़ जिसे वो सौ साल से भूलना चाहती थी और भूल नहीं पाई थी। उसने पानी में उँगली डुबोई, और एक पल को, पूरी एक सदी पीछे चली गई।

"मेरे लोग कहते हैं कि बावड़ी का पानी यादें रखता है। जो इसमें झाँकता है, उसे कभी-कभी वो दिख जाता है, जो कभी था। जो अब नहीं है।"

"और तुम्हें क्या दिखता है, किआरा? इस पानी में?"

"एक लड़की। बहुत पुरानी। जो यहाँ किसी का इंतज़ार करती थी। और एक आदमी, जो हर रात आता था, और एक रात नहीं आया। और वो लड़की आज भी उसी सीढ़ी पर बैठी है, इंतज़ार में।"

और शिवांश ने कुछ नहीं कहा। उसने बस उसे देखा, चाँदनी में, और उसे लगा कि उसने ये कहानी पहले भी कहीं सुनी है। अपने अंदर। अपने उसी सपने में, जो उसे बचपन से नहीं छोड़ता था।

"पता है, यहाँ, इन मशीनों और परमिटों से दूर, मैं बस एक थका हुआ आदमी हूँ। ज़िंदगी भर मैंने मुर्दों का पीछा किया, किआरा। पुरानी हड्डियाँ, पुराने पत्थर। शायद इसलिए, कि जिसे मैं सच में ढूँढ रहा था, वो भी कहीं दफ़्न थी। किसी बहुत पुरानी क़ब्र में।"

"और अगर वो मिल जाए? अगर एक दिन वो सपना उठ कर तुम्हारे सामने आ खड़ा हो? तब क्या करोगे?"

"तब मैं उसे इस बार जाने नहीं दूँगा। चाहे पूरी दुनिया बीच में आ जाए। चाहे मुझे इसकी जो भी क़ीमत चुकानी पड़े।"

और किआरा को अपनी साँस रोकनी पड़ी। क्योंकि उसने ये शब्द पहले भी सुने थे। हूबहू। एक और आवाज़ में, इसी बावड़ी में, इसी चाँद के नीचे। और वो आवाज़ अब एक नए चेहरे से, नई ज़बान में, फिर निकल रही थी।

"किआरा, जब मैं तुम्हें देखता हूँ, तो मुझे डर लगता है। इसलिए नहीं कि तुम अजनबी हो। इसलिए कि तुम अजनबी नहीं लगतीं। जैसे मैं तुम्हें बरसों से जानता हूँ। जैसे मेरा कोई हिस्सा कहीं तुम्हारे पास छूट गया था, और आज लौट आया है।"

"शिवांश, मत करो। तुम नहीं जानते तुम क्या कह रहे हो, और किससे कह रहे हो। कुछ दरवाज़े हैं जो एक बार खुल जाएँ, तो फिर कभी बंद नहीं होते।"

"तो मत करो बंद। ... सौ साल बहुत होते हैं किसी दरवाज़े को बंद रखने के लिए, किआरा।"

और वो एक-दूसरे की तरफ़ झुके, इतने पास कि बावड़ी का वो चौकोर चाँद उनके बीच से ग़ायब हो गया। किआरा जानती थी कि ये ग़लत है, कि इससे इतिहास दोहराएगा, कि इसके पीछे मौत खड़ी है। पर सौ साल की तड़प एक पल में सारी अक़्ल हरा गई। उसने ख़ुद को उसकी तरफ़ बहने दिया।

और ठीक उसी पल, जैसे ही उनकी उँगलियाँ पानी के नीचे छूईं, बावड़ी का पानी जैसे काँप उठा। और दोनों की आँखों के पीछे, एक साथ, एक ही दृश्य फट पड़ा, बिजली की तरह।

वही बावड़ी। वही चाँद। पर पत्थर नए, दीवारें साबुत, और सीढ़ियों पर कतार में सैकड़ों दीये जल रहे थे, जैसे किसी उत्सव की रात हो। और पानी के किनारे, वही लड़की, इसी चेहरे में, एक जवान पहरेदार का हाथ थामे, खुल कर हँसती हुई। बेफ़िक्र। पहरेदारी के बोझ से पहले की। मौत के आने से पहले की। ज़िंदा, और अपने प्यार में डूबी हुई।

"तुम फिर देर से आईं।"

शब्द शिवांश के मुँह से निकले, पर वो उसके नहीं थे। वो सौ साल पुराने थे। वो पृथ्वी के थे। और किआरा का जवाब, बिना सोचे, वही निकला जो उसने सौ साल पहले दिया था, इसी सीढ़ी पर।

"नागिन वक़्त की मोहताज नहीं होती, पहरेदार। तुम इंतज़ार करना सीखो। ... मैं हमेशा आती हूँ। हर जनम, मैं तुम्हारे पास लौट ही आती हूँ।"

और फिर दृश्य टूट गया, काँच की तरह। दोनों हाँफते हुए पीछे हटे, पानी छलका, और चाँद फिर से उनके बीच आ गिरा। शिवांश की आँखें फटी थीं, और उनमें आँसू थे, जिनकी उसे कोई वजह नहीं पता थी।

"ये क्या था? मैंने ये देखा, किआरा। साफ़-साफ़। तुम्हें। मुझे। यहीं, इसी जगह, इन्हीं सीढ़ियों पर। तुमने मुझे पहरेदार कहा। मैं एक वैज्ञानिक हूँ, मैं इस पर यक़ीन नहीं कर सकता, पर मेरा जिस्म काँप रहा है, और मेरी आँखों में आँसू हैं। मैंने तुम्हें पहले भी प्यार किया है। मुझे नहीं पता कैसे, या कब, या किस जनम में। पर मेरी रूह जानती है। मैंने तुम्हें खोया है, और उस खोने का दर्द मैं आज भी, इस साँस में, ढो रहा हूँ।"

"शिवांश..." "और अगर मैं कहूँ कि ये सच है? कि तुमने सच में, बहुत पहले, किसी और नाम से... कि मैंने भी तुम्हें खोया है, ठीक इसी बावड़ी में, और सौ..."

और वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाई। और वो भी नहीं रुका। उनके होंठ बस एक साँस की दूरी पर थे। सौ साल की दूरी सिमट कर एक पल में समा गई थी। और उस एक पल में, किआरा ने पहली बार सोचा कि शायद, शायद, वो दोनों को बचा सकती है।

और तभी बावड़ी का पानी उबल पड़ा। हवा में एक फुफकार गूँजी, इतनी गहरी कि पत्थर की सीढ़ियाँ काँप गईं। चाँद पर एक साया गिरा, और वो साया किसी बादल का नहीं था।

"तो ये चल रहा है, रानी? मेरी पीठ पीछे? मैंने तुम्हें उसे बचाने की मोहलत दी थी, उसे चूमने की नहीं! सौ साल पहले भी तूने मुझे इसी जगह ठुकराया था। आज मैं वो पल तुझसे छीन लूँगा!"

और अँधेरे से वो निकला, अपने असली रूप में, एक विशाल नाग, चाँदनी में काला चमकता, आँखें दो दहकते अंगारे। सौ साल का जलता हुआ इश्क़ और सौ साल की जलती हुई नफ़रत, एक साथ, बावड़ी के पानी में उतर आए।

"किआरा, पीछे हटो! ये क्या है? इतना बड़ा साँप... ये मुमकिन नहीं! कोई साँप इतना..."

"शिवांश, मेरे पीछे रहो! आँखें बंद कर लो, और चाहे कुछ भी हो जाए, खोलना मत! मुझ पर भरोसा करो, बस इस एक बार!"

और किआरा के पास सोचने का वक़्त नहीं था। तक्षक का फन सीधे शिवांश की तरफ़ लपका, और उस एक पल में उसके सामने फिर वही तराज़ू आ खड़ा हुआ, अपना भेद, या पृथ्वी की जान। और इस बार, बिना पलक झपकाए, उसने जान चुनी।

उसने ख़ुद को छोड़ दिया। सौ साल में पहली बार, किसी इंसान के सामने, उसने अपना इंसानी खोल गिरने दिया। वो खोल एक झटके में उतर गया, जैसे साँप केंचुली छोड़ता है। और जहाँ एक पल पहले किआरा खड़ी थी, वहाँ अब एक और नागिन थी, दूधिया चाँदी-सी दमकती, फन इतना चौड़ा कि उसने आधे चाँद को ढक लिया, तक्षक से भी सुंदर, और उतनी ही ख़तरनाक। कोई मामूली साँप नहीं। सौ साल की पहरेदार, अपने पूरे, असली, दिव्य रूप में।

दो नाग बावड़ी के पानी में टकराए, फन से फन, सदी की सारी नफ़रत एक गुत्थी में उलझ गई। पानी उछला, दीवारों से टकराया, और चाँद उस उथल-पुथल में सौ टुकड़ों में बिखर गया। किआरा ने अपना पूरा विशाल शरीर शिवांश और तक्षक के बीच डाल दिया, एक ढाल, एक दीवार, जो टूट तो सकती थी, पर उस बेहोश होते इंसान के आगे से हट नहीं सकती थी। सौ साल पहले वो उसे बचा नहीं पाई थी। आज, अपनी जान देकर भी, वो उसे मरने नहीं देगी।

"अपने असली रूप में, मेरे सामने, उस इंसान के लिए! अब देख लेगा वो तुझे, किआरा। और जान लेगा तू क्या है। और तब वो तुझसे उतनी ही नफ़रत करेगा, जितनी उस रात करता होगा, जब तूने उसे अपनी बाँहों में मरने दिया था!"

पर किआरा ने उसे पीछे धकेल दिया, फुफकार के बदले फुफकार, ताक़त के बदले ताक़त। तक्षक, जो आज शिवांश को मारने नहीं, सिर्फ़ ये पल तोड़ने आया था, एक आख़िरी ज़हरीली हँसी छोड़ कर अँधेरे में घुल गया, अपना असली काम कर के।

क्योंकि उसका असली हथियार उसके ज़हर के दाँत नहीं थे। उसका असली हथियार वो सच था, जो अब बावड़ी की सीढ़ियों पर, मशाल की रोशनी में, खुल कर सामने पड़ा था।

क्योंकि शिवांश आँखें बंद नहीं रख पाया। कोई नहीं रख पाता। और मशाल की काँपती रोशनी में, उसने वो देखा जो एक इंसानी दिमाग़ नहीं सँभाल सकता। जहाँ एक पल पहले वो लड़की खड़ी थी, जिसे वो चूमने ही वाला था, वहाँ अब एक विशाल, चमकती नागिन थी।

"किआरा...? नहीं। नहीं, ये तुम नहीं हो सकतीं। मैं... मैंने अभी तुम्हारा हाथ थामा था..."

और नागिन मुड़ी, और उन विशाल, सुनहरी आँखों में शिवांश ने वही नज़र देखी, वही उदासी, वही सौ साल पुराना ग़म, जो उसके सपने की औरत की आँखों में हमेशा रहता था। दो दुनियाएँ एक ही चेहरे में टकराईं, और शिवांश का दिमाग़ उस टक्कर को झेल नहीं पाया।

उसकी नज़र धुँधलाने लगी। बावड़ी घूमने लगी। सपना और हक़ीक़त, प्यार और दहशत, अपनापन और डर, सब एक साथ उसके सीने में उमड़ आए, और उन्हें सँभालने की कोई जगह उसके अंदर नहीं बची। जिस औरत को वो एक पल पहले चूमने वाला था, और जो चीज़ अब उसके सामने थी, उन दोनों को एक कर पाना उसके इंसानी दिमाग़ की हद से बाहर था।

"शिवांश! नहीं, मुझे देखो, मैं वही हूँ! मैं वही हूँ जो अभी तुम्हारे साथ थी, वही जिसे तुमने पहचाना था! जाओ मत, प्लीज़..."

पर बहुत देर हो चुकी थी। शिवांश की आँखें पलट गईं, घुटने मुड़े, और वो गीली सीढ़ियों पर, उसी बावड़ी में जहाँ सौ साल पहले उनका प्यार शुरू हुआ था, बेहोश होकर गिर पड़ा।

और किआरा, फिर से इंसानी रूप में, उसे अपनी बाँहों में थामे, गीली सीढ़ी पर बैठ गई, ठीक वैसे जैसे सौ साल पहले उसे थामा था, उसी बावड़ी में, उसी चाँद के नीचे। बस इस बार वो साँस ले रहा था। और इस बार, उसका राज़, जो सौ साल में कोई इंसान नहीं जान पाया था, एक इंसान की बंद आँखों के पीछे क़ैद हो चुका था। सवाल बस इतना था, कि जब वो आँखें फिर खुलेंगी, तो उनमें प्यार बचेगा, या सिर्फ़ दहशत।

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